मंगलवार, 19 जुलाई 2011

भारत और सहिष्णुता-11

भारत और सहिष्णुता-11
clip_image002रक्षा मंत्रालय में कार्यरत जितेन्द्र त्रिवेदी  रंगमंच से भी जुड़े हैं, और कई प्रतिष्ठित, ख्यातिप्राप्त नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन कर चुके हैं। खुद भी नाटक लिखा है। न सिर्फ़ साहित्य की गहरी पैठ है बल्कि समसामयिक घटनाओं पर उनके विचार काफ़ी सारगर्भित होते हैं। वो एक पुस्तक लिख रहे हैं भारतीय संस्कृति और सहिष्णुता पर। हमारे अनुरोध पर वे इस ब्लॉग को आपने आलेख देने को राज़ी हुए। उन्हों लेखों की श्रृंखला हम हर मंगलवार को पेश कर रहे हैं।

जितेन्द्र त्रिवेदी

अंक-11

imagesआइये अब हम बुद्ध के गृह त्‍याग के कारणों पर विचार करें। बुद्ध के गृह त्‍याग के कारणों में सबसे अधिक लोकप्रियता प्राप्‍त करने वाला प्रकरण वह है जिसमें बुद्ध का अलग-अलग घटनाओं में एक बीमार व्‍यक्ति को देखना, एक वृद्ध व्‍यक्ति से रास्‍ते में टकराना और एक शव यात्रा का दर्शन करना प्रमुखता से उनमें बैराग भाव के उदय और अन्‍तत: गृह त्‍याग का दृढ़ निश्‍चय करने में सहायक बताया जाता है। किन्‍तु बौद्ध साहित्‍य का गम्‍भीरता से अध्‍ययन करने पर ऊपर दिये कारणों को प्रमुखता से स्‍वीकार करना ठीक प्रतीत नहीं होता। बुद्ध के गृह त्‍याग के उपरोक्‍त कारणों के अलावा कुछ महत्‍वपूर्ण कारणों की ओर ध्‍यान खींचना और उनके माध्‍यम से यह बताना हमारा प्रधान उद्देश्‍य रहेगा कि यदि आज भी समूचा विश्‍व बुद्ध की प्रारम्भिक चिंता पर गौर करे और उनके द्वारा सुझाये रास्‍ते पर चलने की कोशिश करे तो बुद्ध के बताये सहिष्‍णुता के मार्ग के जरिये कई तरह की आपाधापी और झगड़ों से बचा जा सकता है। बुद्ध के घर छोड़ने का सबसे बड़ा कारण था उनकी मनोवैज्ञानिक दशा, जिसकी वजह से वे बचपन से ही घर को कूड़े-कचरे की जगह और प्रवज्‍या को खुली हवा समझा करते थे और उनके इस मनोविज्ञान के कारण जब उन्‍होंने बचपन से ही शाक्‍य, कोलिय आदि गणराज्‍यों की जमीन, नदी आदि के लिये नियमित होने वाली लड़ाइयों और खून-खराबे को देखा तो उनके बालमन में यह बात दृढ़ता से स्‍थापित हो गयी होगी कि इस तरह तो एक के बाद एक बदला लेने की लड़ाइयाँ अनंत काल तक जारी रह सकती हैं और मानवता कभी भी सुखी हो ही नहीं सकेगी। उन्‍होंने यह दृढ़ निश्‍चय किया कि मानव को इन लड़ाइयों से अलग कोई राह दिखाना आवश्‍यक है, क्‍योंकि बात-बेबात की छोटी-बड़ी लड़ाइयों को देख-देख कर उनका जी उकता गया था। गौतम बुद्ध स्‍वयं इस मनोदशा को चित्रांकित करते हुये ‘अत्‍तदण्‍डसुत्‍त’ में इस प्रकार कहते है:

अत्‍तदण्‍डा भयं जातं, जनं पस्‍सथ मेधकं।

संवेगं कित्‍तयिस्‍सामि यथा संविजितं मया।।1।।

फन्‍दमानं पजं दिस्‍वा मच्‍छे अप्‍पोदके यथा।

अन्‍जज्यण्‍णेहि व्‍यारूद्धे दिस्‍वा मं भयभाविसि।।2।।

समन्‍तमसरो लोको, दिसा सब्‍बा समेरिता।

इच्‍छं भवनमत्‍तनो नाद्दसासिं अनोसितं।

ओसाने त्‍वेव व्‍यारूद्धे दिस्‍वा में अरती अह।।3।।

अर्थात् (1) शस्‍त्र भयावह लगा। (उससे) यह जनता कैसे झगड़ती है देखो। मुझे संवेग वैराग कैसे उत्‍पन्‍न हुआ, यह मैं बताता हूँ। (2) अपर्याप्‍त पानी में जैसे मछलियाँ छटपटाती हैं वैसे एक-दूसरे से विरोध करके छटपटाने वाली प्रजा को देखकर मेरे अन्‍त:करण में वैराग उत्‍पन्‍न हुआ। (3) चारो ओर का जगत असार दिखाई देने लगा, सब दिशाऍं कॉंप रही हों ऐसा लगा और उसमें आश्रय का स्‍थान खोजने पर स्‍थान नहीं मिला, क्‍योंकि अन्‍त तक सारी जनता को परस्‍पर लड़ते हुए देखकर मेरा जी ऊब गया।

नदी के पानी और जमीन को लेकर या ऐसे ही अन्‍य क्षुद्र कारणों से शाक्‍य और कोलियों में प्राय: झगडे़ हुआ करते थे। ऐसे अवसरो पर बुद्ध के सामने यह असमंजस रहता था कि वे शस्‍त्र उठायें या नहीं। वे समझने लग गये थे कि शाक्‍यों और कोलियों के झगडे़ यदि बलपूर्वक निपटा भी दिये जाएं तो भी वे खत्‍म नहीं होगें क्‍योंकि आगे फिर किसी नये कारण से झगड़े की गुंजाइश बनी रहेगी। इस तरह अनंत काल तक बदला लेने की प्रवृत्ति मनुष्‍य को चैन से जीने नहीं देगी। उन्‍हें ऐसा लगा कि फिर इस शस्‍त्र ग्रहण से क्‍या लाभ? इस शस्‍त्र धारण करने के मार्ग पर चलने से वे ऊब गये और उन्‍होंने यह निश्‍चय कर लिया कि वे इसके उलट मार्ग प्रतिपादित करेंगे।

इसकी पुष्टि इस संवाद से होती है जिसमें जब वे घर छोड़ रहे थे तब अपने घोड़े कंथक से कहा था- ‘हे तात्! तू एक रात आज मुझे तार दे, बाद में मैं देवताओं समेत मनुष्‍यों का तारनहार बनूँगा’ इस प्रकार बुद्ध के गृह त्‍याग के कारणों में सर्व प्रमुख कारण था - तत्‍कालीन समाज में होने वाले लड़ाई-झगड़े और बुद्ध का उन झगड़ों से जी मिचलाना उबना। इस तरह गौतम ने केवल आत्‍मबोध द्वारा मोक्ष प्राप्ति के लिये गृह त्‍याग नहीं किया था अपितु उनके मन में सदैव यह विचार चलता रहता था कि क्‍या शास्‍त्रों के बिना, परस्‍पर मित्रता के आधार पर किसी समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता? उन्‍होंने ऐसे समाज के लिये कुछ मानदण्‍ड स्‍थापित किये और समाज को ऐसे लोगों को पहचानने के लक्षण बताये ताकि उनसे सावधान रहा जा सके -

"इन लोगों की बात सुनकर उन लोगों में विरोध पैदा करने के लिये वह इन्‍हें आकर बता देता है। एकता से रहने वालों में फूट डालता है या झगड़ने वालों को भड़काता है। झगड़े बढ़ाने में उसे मजा आता है, झगड़े बढ़ाने वाली बातें वह करता है अथवा वह गाली गलौज करता है। दुष्‍टता से भरा हुआ कर्कश, कटु, हृदय को चुभने वाला, क्रोधयुक्‍त एवं संतोष को भंग करने वाला वचन वह बोलता है या फालतू बकवास करता है। अनुचित समय बोलता है, न कही हुई बातें गढ़कर कहता है, अधार्मिक, शिष्‍टाचार विरुद्ध, ध्‍यान न देने योग्‍य प्रसंग पर शोभा न देने वाला, व्‍यर्थ विस्‍तार वाला और अनर्थकारी भाषण वह करता है।"

इस तरह बुद्ध ने हमको हमारे ही भीतर दुष्‍ट और सज्‍जन व्‍यक्ति के लक्षण बताकर अपने जीवन को उत्‍तरोत्‍तर ऊंचाई पर ले जाने के तरीके बताये।

बुद्ध ने सारे समाज को एक झटके में सुधारने की बजाय व्‍यक्ति के सुधार को अधिक महत्‍व दिया। उन्‍होंने अपनी पूरी प्रतिभा और बल इस बात पर केन्द्रित किया कि सभी को बदलने की अपेक्षा व्‍यक्ति अपने भीतर झॉंकना शुरू कर देगा तो मानवता स्‍वत: ही सुखी हो जायेगी। बुद्ध का सीधे-साधे शब्‍दों में कहना था- "तुम अपना देख लो, दूसरा भी देर-सवेर अपना देख ही लेगा, कोई व्‍यक्ति जब तक खुद कीचड़ में खड़ा है तो दूसरे को भला वह कैसे कीचड़ में से निकाल सकता है पर जो कीचड़ से बाहर निकल आया है, वह दूसरों को भी बाहर निकालने में मदद कर सकता है।

"इस तरह उन्‍होंने स्‍व-विकास (self development) को ही प्राथमिकता दी और इसे ही संपूर्ण सृष्टि (उनके शब्‍दों में प्रजा) के उद्धार का तरीका बताया। दूसरों में सुधार की चिंता करने की अपेक्षा प्राणपण से व्‍यक्ति अपने को सतत ऊपर उठाता जाये, यही बुद्ध का मूल मंत्र था, जो आज भी प्रांसगिक है। जब तक हम दूसरों पर अंगुली उठाने की जगह अपने भीतर नहीं झांकेगें तब तक यह उठापटक चलती रहेगी। दिनकर ने अपनी पुस्‍तक ‘संस्‍कृति के चार अध्‍याय में गांधी विषयक विचार में बड़ी मार्मिक बात कही है जो महात्‍मा बुद्ध के ऊपर भी उपरोक्‍त प्रसंग में लागू होती है:-

"गांधी और मार्क्‍स में एक मुख्‍य भेद यह है कि मार्क्‍स सारे भूगोल को चमड़े से मढ़ देना चाहते हैं किन्‍तु गांधी समझते हैं कि हर आदमी के पाँव में जूते पहना देने से भी वही कार्य संपन्‍न होता है।"

बुद्ध सारे समाज के लिये सुधार के किसी पैकेज की अपेक्षा व्‍यक्ति के भीतर सुधार की चिन्‍ता से ओत-प्रोत थे और तार्किक ही है कि जब व्‍यक्तियों में सुधार होने लगेगा तो समाज स्‍वत: ही सुधरा कहा जायेगा।

10 टिप्‍पणियां:

  1. "गांधी और मार्क्‍स में एक मुख्‍य भेद यह है कि मार्क्‍स सारे भूगोल को चमड़े से मढ़ देना चाहते हैं किन्‍तु गांधी समझते हैं कि हर आदमी के पाँव में जूते पहना देने से भी वही कार्य संपन्‍न होता है।"

    गहन विचार।

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  2. बहुत बढ़िया जानकारी
    देने वाला विश्लेषण ||
    बधाई ||

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  3. तुम अपना देख लो, दूसरा भी देर-सवेर अपना देख ही लेगा, कोई व्‍यक्ति जब तक खुद कीचड़ में खड़ा है तो दूसरे को भला वह कैसे कीचड़ में से निकाल सकता है पर जो कीचड़ से बाहर निकल आया है, वह दूसरों को भी बाहर निकालने में मदद कर सकता है।


    सचमुच, जीवन में उतारने योग्य दृष्टांत है...

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  4. बहुत बढ़िया जानकारी
    देने वाला विश्लेषण ||

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  5. तार्किक और ज्ञान वर्धक आलेख.
    सच ही है खुद को सुधार लो जग अपने आप ही सुधर जायेगा.

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  6. जब व्‍यक्तियों में सुधार होने लगेगा तो समाज स्‍वत: ही सुधरा कहा जायेगा।

    शब्दशः सही ..!बहुत बढ़िया आलेख .आभार.

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  7. समय की आवश्यकता के अनुसार समाज को नियंत्रित करने के लिए स्मृतियों का प्रादुर्भाव हुआ। उनको अंतिम मानकर बदलते परिवेश के हिसाब से उनमें संशोधन की आवश्यकता पर बल नहीं दिया गया। परिणाम स्वरूप एक पक्ष उसका हिमायती बना रहा, जबकि दूसरा पक्ष उन नियमों से हटकर सुविधानुसार उन नियमों में विचलन को स्वीकार करते रहे। कालान्तर में लगता है पहला पक्ष भी छद्म रूप से हिमायती बना रहा और छिपकर विचलन को स्वीकार करता रहा। इसमें शास्त्र का कोई दोष नहीं था। यहाँ तक कि कालान्तर में बौद्ध दर्शन भी उन्हीं परिस्थितियों का शिकार हुआ। समय-समय पर जो समाज-सुधारक आए, उनकी बातों को व्यापक स्तर पर बहुत बाद में सुना और समझा गया। इन परिस्थितियों पर विचार करते हुए जबतक समय के परिवर्तन को स्वीकार करते हुए उसमें समाज और व्यक्ति के हित को ध्यान में रखकर विभिन्न शास्त्रों में परिवर्तन को संशोधित करना, जिसकी गुंजाइस शास्त्रों में निहित है, आवश्यक है। लेखक ने वैसे इन बातों को जगह-जगह स्थान दिया है। इन्हीं गुंजाइशों ने भारतीय सहिष्णुता को विस्तार दिया है। इन पहलुओं को श्री जितेन्द्र जी ने बड़े ही स्वाभाविक ढंग से रूपायित किया है।

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  8. आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

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  9. Gautam buddh ke gruhtyaag me kewal ek baat akhartee hai,aur wo hai,unhone apnee patnee ko wishwas me nahee liya!

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