गुरुवार, 28 जुलाई 2011

आँच-78 ..... कविताओं में ढूँढ रहा हूँ .....

समीक्षा

आँच-78 .....

कविताओं में ढूँढ रहा हूँ .....

clip_image002हरीश प्रकाश गुप्त

मेरा फोटोश्री आशीष अवस्थी युवा रचनाकार हैं। वे कानपुर से हैं, बावजूद इसके मेरा उनसे सम्पर्क अभी तक उनके ब्लाग तक ही सीमित रहा है। वे अपने ब्लाग सागर पर प्रायः कविताएं पोस्ट करते रहते हैं। इसी सप्ताह उन्होंने अपने ब्लाग पर अपनी प्रथम काव्य रचना के उद्घोष के साथ एक कविता “कविताओं में ढूँढ रहा हूँ, मैं अपनी कविता को” (लिंक) लगाई थी। युवा कवि की पहली रचना के तथ्य को दृष्टि में रखते हुए जब मैंने कविता पढ़ी तो मुझे कवि में पर्याप्त सम्भावनाएं दिखीं। आशीष जी ने इस कविता में भावभूमि पर गहरे उतरकर शब्द-शृंखला रचने का जो प्रयास किया है, वह प्रशंसनीय है। अतः विचार किया कि इस कविता को आँच पर लिया जाए।

कवियों के प्रारम्भिक दौर में रचनाएं प्रायः व्यक्तिनिष्ठ विचारों से स्फूर्त हुआ करती हैं। अनेकानेक सामाजिक और सांसारिक विकार, विषमताएं और विद्रूपताएं जब युवा मन को आन्दोलित करती हैं, तब आशा की किरण भी प्रकाशित होती है और कदाचित थोड़ी निराशा भी। सुखद अपेक्षाएं एवं आदर्श नियामक की भूमिका में होते हैं। ऊर्जा प्रतिकार करने का अवलम्ब होती है। वह निराशा का त्याग कर अपने कल्पनालोक में जिस चित्र की रचना करता है, उसके केन्द्र में वह अनायास स्वयं ही उपस्थित होता जाता है। धीरे-धीरे कवि की रचनाएं व्यक्तिनिष्ठता के बन्धन से मुक्त होकर सामान्यीकरण की ओर उन्मुख हो जाती हैं। आशीष की यह कविता भी अपनी इस निष्ठा का त्याग नहीं कर पाई है और शीर्षक से शुरू होकर अन्त-पर्यन्त व्यक्तिसूचक सर्वनाम के आश्रय से आबद्ध रही है।

इस लौकिक जगत में व्यक्ति का सामना अनेक प्रकार की स्थितियों, परिस्थितियों से होता है। ये कभी हताशा उपजाती हैं और निरुत्साहित करती हैं, तो कभी जीवन को हर्ष और उल्लास से भर देती हैं। कभी एकान्त की गहराई में ले जाकर तन्हा बनाती हैं, कभी क्षोभ और क्लेशकारी होती हैं, तो कभी अन्तर्मन को असीम आनन्द से सराबोर कर देती हैं। ये कभी सुखकारी होती हैं, तो कभी दुखद और पीड़ादायी। इनकी जनक कभी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ होती हैं, तो कभी सम्बन्ध, रिश्ते और नाते। कभी ये निराशा के ऐसे निविड़ अन्धकार में पहुँचा देती हैं कि कोई राह नहीं सूझती। तब बुद्धि और विवेक भी सहयोग नहीं करते और स्वयं पर भी सन्देह होने लगता है। वहाँ कवि की वेदना सस्वर हो उठती है। आशावान कवि-हृदय हर कठिनाई में भी राह खोजने का प्रयत्न करता दिखता है। आशा उसकी शक्ति होती है और मंगल उसका अभिप्रेत। इसीलिए उसके चित्रों में उद्देश्य भी रहता है और कामना भी। स्वयं की खोज भी होती है और स्वयं से साक्षात्कार भी । अपने निज की तलाश करती आशीष की यह कविता इसी भावभूमि पर रची गई है।

आशीष की निष्ठा आशा है, तभी वह अन्धकार में भी जीवन की आशा करते हैं। जीवन के अन्तिम क्षण में भी सुख की अभिलाषा रखते हैं।

मन के अन्धकार सागर में, जीवन की आशा को।

अन्तिम क्षण में ढूँढ रहा हूँ सुख की अभिलाषा को।

जहाँ मृत्यु सुनिश्चित हो वहाँ पर भी जीतने की कामना करते हैं, जिस पर बैठ मृत्यु रण में, मैं जीत सकूँ उस रथ को।

एकाकीपन में स्वयं को ही खोजते हैं

तन्हाई के कारण खोई, मैं अपनी सुध बुद को।

सच तो ये है मैं अपने में ढूँढ रहा हूँ खुद को।

अपने सपनों को पाने के प्रति अभिलाषा की उनकी पराकाष्ठा है और इसके लिए वह चिरनिद्रा का वरण करने से भी नहीं डिगते।

जीवन के गम भी सो जाए, ऐसी चिर निद्रा को।

वे जब अपनी कविता को ढूँढने की बात कहते हैं तो यह संसारिक भीड़-भाड़ में खो-से गए अपने व्यक्तित्व की तलाश होती है। चिरनिद्रा की कामना खुशियों के बदले अपना सब कुछ न्योछावर करने की है। अश्रु भावना का प्रवाह हैं अतः भावना और पवित्रता के साथ कलुषरहित मन की कामना कवि की निश्छल अपेक्षा है। इस प्रकार कविता में प्रयोग हुए बिम्ब अपनी अर्थवत्ता प्राप्त करते हैं। प्रयुक्त बिम्ब यद्यपि सामान्य हैं लेकिन प्रयोग-सिद्ध हैं और सार्थक हैं। यद्यपि कविता में लय बनाने का सोद्देश्य प्रयास किया गया है, परन्तु गीतात्मकता एकाधिक स्थान पर बाधित हुई है। तीसरी, आठवीं और दसवीं पंक्ति को छोड़कर पूरी कविता में 28-28, एकसमान मात्राएं हैं। पांचवीं पंक्ति में ना के स्थान पर करने से यहां दोष दूर हो जाता है। छठवाँ पद अपना अन्वय खोज रहा है, अतः उस पर कवि का ध्यान आकर्षित है। कविता में कुछ प्रयोग दोष-से दिखते हैं। वे टंकण त्रुटियाँ भी हो सकती हैं तथापि उनकी ओर संकेत करना समीचीन होगा। जैसे – दूसरी पंक्ति में नयनों के जल से पवित्र हो में जल सी होना चाहिए। अन्तिम से पूर्व की पंक्ति में खोई में स्त्रीलिंग का कोई औचित्य नहीं है। इसी पंक्ति में सुध-बुद में सुध-बुध होना चाहिए। संक्षेप में कहना होगा कि गीत के भाव सघन हैं, अतएव शिल्प में थोड़े से प्रयास से इसे उत्कृष्ट रूप प्रदान किया जा सकता है।

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17 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी जानकारी, सुन्दर पोस्ट

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  2. कविता में अपनी कविता को ढूँढने में ही कविता है... मनोज जी परखी नज़र और गुप्त जी की समीक्षा से आशीष की कविता से परिचय और कविता पाठ का आनंद मिला... आंच का एक और बढ़िया अंक...

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  3. Yua rachnakar Harish Prakash ji ke baare mein bahut achhi samiksha prastuti ke liye aabhar!

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  4. बहुत ही सुन्दर उदारताभरी समीक्षा। साधुवाद।

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  5. सागर जी की कविता छंदबद्ध है और उसमें प्रवाह है.इनका हिंदी साहित्य में आगे अच्छा योगदान होगा इसकी उम्मीद जागती है.समीक्षा भी अच्छी.

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  6. बहुत बढ़िया सर ।
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    कल 29/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. बेहतरीन समीक्षा जिसके द्वारा आपने कविता में निहित भाव को पाठकों के समक्ष खोला है।
    आभार इस प्रस्तुति के लिए।

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  8. हरीश प्रकाश जी... बहुत बहुत धयवाद मेरी रचना की समीक्षा की और उसमे छिपी त्रुटियों से अवगत कराया.. मैं पूरा प्रयास करूँगा की आगे से आपकी बतायी सभी त्रुटियो क दूर करने का ध्यान रखूँगा....आपका बहुत बहुत आभार....

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  9. @ कविता रावत जी,

    पोस्ट पर अपने पधारने के लिए आभार।

    पुनःश्च, यह रचना मेरी नहीं है बल्कि युवा रचनाकार श्री आशीष अवस्थी की है। मैंने तो बस कविता पर अपने विचार मात्र प्रकट किए हैं।

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  10. उत्तम कविता,सम्यक् समीक्षा। कवि आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख हो रहा प्रतीत होता है।

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  11. bahut acchhi sameekhsha padhne ko mili.

    aap pahle jab jis kavita ki sameeksha karte the tab us kavita ko sidebar me paste karte the. agar vahi tareeka apnaye to pathakgan ko sahayak hoga kyuki ek hi jagah par pathak ko sab kuchh mil jayega.

    aabhar.

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