गुरुवार, 21 जुलाई 2011

आँच-78 .....मन तो चाहे अम्बर छूना...

समीक्षा

आँच-78

मन तो चाहे अम्बर छूना...

clip_image002हरीश प्रकाश गुप्त

विगत सप्ताह “छान्दसिक अनुगायन” ब्लाग पर पुनः जाने का संयोग बना तो एक छोटे से गीत “मन तो चाहे अम्बर छूना...” तथा एक गजल के माध्यम से एक कवयित्री, मेरे लिए नई हैं, से परिचय हुआ। उनकी दोनों रचनाएं बहुत सधे ढंग से सरल शब्दों में अभिव्यक्त हुई हैं और संवेदना जगाती हैं। पेशे से शिक्षिका यह कवयित्री हैं मधु शुक्ला। मूल रूप से उत्तरप्रदेश की निवासी यह कवयित्री सम्प्रति व्यावसायिक प्रतिबद्धताओं के चलते भोपाल में वास करती हैं। साहित्य उनके अध्ययन का विषय रहा है परन्तु यह उनका अध्यवसाय भी है। आज के आँच स्तम्भ में उनके इसी परिचय गीत पर चर्चा अभिप्रेत है। यह गीत उक्त ब्लाग पर इसी 13 जुलाई को प्रकाशित हुआ था।

हर एक व्यक्ति को स्थितियों-परिस्थितियों से अवश्य जूझना पड़ता है, संघर्ष करना पड़ता है। कठिनाइयाँ जीवन की राह दुष्कर बनाती है। लेकिन जिसके अन्दर इन कठिनाइयों का सामना करने का साहस है, विषमताओं में जकड़े होने के बावजूद उसका ध्येय हमेशा उसकी मंजिल बना रहता है। व्यक्ति के व्यवहार में दो तत्वों की प्रधानता होती है- बुद्धि-तत्व की और हृदय-तत्व की। जीवन की वास्तविकताओं के संघर्ष का नेतृत्व बुद्धि-तत्व करता है जबकि हृदय-तत्व कल्पना लोक की उड़ान का। यह आभासी है। यह कभी सुखद आकाश में विचरण कराता है तो कभी अवसाद के गहन विवर में भी पहुंचा देता है। मन तो मुक्त है। मन की चाहत अनन्त है। जिसने संघर्षों से पार पाने की ठान ली हो तो उसकी चाहना शिखर को छूने की ही होगी। भले ही वास्तविकता उसे स्वीकार करे अथवा न करे। परछाईं तो वास्तविकता है और हर पल की साक्षी भी अतः उसका प्रेक्षण भी यथार्थ होगा। मन तो चाहे अम्बर छूना, पांव धंसे हैं खाई। दूर खड़ी हँसती है मुझ पर, मेरी ही परछाई। यही मन व्यक्ति को कभी-कभी जीवन के कठोर यथार्थ से दूर ले जाकर आभासी सुख देने वाली दुनिया में ले जाता है, जहाँ उसे सब कुछ अपेक्षित मिलता है। यहाँ तक कि जिस यथार्थ का साक्षी वह स्वयं रहा होता है, वह भी वहाँ ध्वनित नहीं होता क्योंकि वहाँ वह अपेक्षित नहीं है। लेकिन यह सब आभासी दुनिया में ही है, वास्तविक दुनिया में तो एक छलावा है, कंचन मृग की तरह, जो आकर्षित तो करता है लेकिन वास्तव में उसका अस्तित्व नहीं है। ये चाहतें मरीचिका की भाँति आकर्षक दिखती हैं और इन्हें पाने की लालसा भटकाती भी हैं। तब यह और दुष्कर हो जाता है जब मन को तोष देने वाला विश्वास भी अब साथ छोड़ देता है। इच्छाओं का कंचन मृग , किस वन में भटक गया। बतियाता था जो मुझसे, वह दर्पण चटक गया। अपने ही स्वर अब कानों को , देते नहीं सुनाई। परिवर्तन की बयार में सम्बन्धों का क्षरण हुआ है और अविश्वास उपजा है। सामाजिक बदलाव के इस दौर में सम्बन्धों के मायने भी बदले हैं, सरसता क्षीण हुई है। आपसी विश्वास अविश्विसनीय बन चुका है और यह सब एक यथार्थ है। जैसे-जैसे इन सम्बन्धों की वास्तविकता पर्त दर पर्त खुलती है, सम्बन्ध टूटते जाते हैं। यहाँ तक कि अपने भरसक प्रयासों के बावजूद स्वयं पर से भी विश्वास डिग जाता है। विश्वासों की पर्त खुली तो, चलती चली गयी। सम्बन्धों की बखिया, स्वयं उघड़ती चली गयी। चूर हुए हम स्थितियों से , करके हाथापाई। समाज की दशा से जो अंधकार आच्छादित है उसमें अब आशा की किरण भी नहीं दिखती और इससे कवयित्री व्यथित है। राह कठिन है, लेकिन कुछ हासिल करने के प्रयासों के बावजूद निराशा व्याप्त है और कवयित्री सफलता के प्रति ईषत सशंकित भी है। परिवर्तन की जाने कैसी , उल्टी हवा चली। धुआँ -धुआँ हो गयी दिशाएं , सूझे नहीं गली। जमी हुई हर पगडंडी पर, दुविधाओं की काई |

इसी भाव-भूमि पर विरचित यह गीत प्रगति की ओर अग्रसर आधुनिक समाज का प्रतिबिम्ब है, जिसमें विषमताएं है, जीवन संघर्ष भी हैं और यथार्थ भी है। कवयित्री ने बहुत ही सरल शब्दों में सरस गीत की रचना की है। गीत के भाव सघन है, स्वर जन सामान्य का और क्षेत्र व्यापक। क्योंकि आम जीवन इन्हीं तरह के संघर्षों की व्यथा कथा होता है। हमें अपने समाज में ऐसी ही परिस्थितियां चहुँदिश दिखाई पड़ती हैं। इसीलिए यह गीत व्यक्तिनिष्ठता से ऊपर उटकर आम जन की अभिव्यक्ति सा प्रतीत होता है।

गीत के शिल्प पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि एक-आध स्थानों को छोड़कर कवयित्री की सजग दृष्टि इस गीत पर आद्योपांत रही है। गीत में प्राजंलता पूर्णरूपेण दर्शनीय है। भले ही कवयित्री ने मात्राओं पर विशेष ध्यान दिया हो अथवा नहीं, पंक्तियों को यदि युग्म में देखा जाए तो एक स्थान पर – दूसरे पद की तीसरे पंक्ति-युग्म में दो मात्राओं की कमी है – को छोड़कर यह गीत मात्राओं की कसौटी पर भी सफल है। प्रत्येक पद के पहले दो पंक्ति-युग्म 26-26 मात्राओं के हैं तथा अंतिम युग्म में व पहले पद के दोनों युग्मों में 28-28 मात्राएं हैं। मात्राओं की यही एकरूपता गीत को प्रवाहमान बनाती है। तीसरे पद की दूसरी पंक्ति में चलती शब्द प्रसंग में अनुपयुक्त लगता है और प्रभावी अर्थ नहीं देता। यदि इसके स्थान पर खुलती होता तो शायद अधिक आकर्षक प्रतीत होता। यह टंकण त्रुटि भी हो सकती है। गीत में प्रयुक्त बिम्ब जमी हुई हर पगडंडी पर, दुविधाओं की काई नया सा लगता है। हालाकि अन्य बिम्ब भले ही नवीन न हों लेकिन भाषा में ताजगी है और अर्थपूर्ण प्रयोग इन्हें आकर्षक बनाते हैं। यह छोटा सा गीत कवयित्री में सम्भावनाओं का संकेत भर है।

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12 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया समीक्षा और सारगर्वित प्रस्तुति...आभार

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  2. समीक्षा पढने के बाद कविता पढ़ी ... एक अच्छी कविता की सारगर्भित समीक्षा

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. गीत की हर एक पंक्ति प्रभावित करती है.समीक्षा भी बढिया है.

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  5. कविता पहले ही पढ़ चुका था. आज समीक्षा भी देखने का मौका मिला..गुप्त जी जिस तरह कविता के मंथन के बाद अमृत निकलते हैं वह कम समीक्षक ही कर पाते हैं... सुन्दर गीत की सुन्दर समीक्षा...

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  6. पहली बार पढ़ा मधु जी को .बढ़िया समीक्षा एक सुन्दर गीत की.

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  7. मन तो न जाने क्या-क्या छूना चाहता है!
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    बढ़िया विश्लेषण ही कहूँगा मैं तो आज की पोस्ट को!

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  8. अत्यंत सूक्षमता से आपने कविता की समीक्षा की है।

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  9. samiksha padhne ke baad kavita padhne ki badi koshish ki magar kavita nazar nahi aai ,kal phir koshish karti hoon .

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  10. @ ज्योति सिंह

    गीत का लिंक गीत के ऊपर ही दिया है। वहीं पर क्लिक करके देख लें।

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  11. स्वतन्त्रता दिवस की शुभ कामनाएँ।

    कल 16/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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