बुधवार, 20 जुलाई 2011

देसिल बयना – 90 : आपहि टांग उघारिये, आपहि मरिये लाज

देसिल बयना 90 : आपहि टांग उघारिये, आपहि मरिये लाज

करण समस्तीपुरी

“आग लगावे पानी में ई नयकी दुल्हनिया…. गुलटेनमा कक्का हो…. हमर बचबा के जननिया…. गुलटेनमा कक्का हो…. हमर बचबा के जननिया….. !” आन दिन भोरे-भोर भकोसन चचा पराती गाते थे मगर आज सांझ में काहे सोहर उठा दिये?

हमरे घर के पजरिये में रहते थे। जात-बिरादरी का जानें मगर तीन पुश्त से दोस्ती-यारी चला आ रहा था दोनो परिवार में। भकोसन चच्चा के सगे गुलटेन कक्का से हमरे बाबा की दोस्ती थी। भकोसन चच्चा से बाबूजी की दाँतकटी रोटी और उनका बेटा मंगरुआ हमरा लंगौटिया यार। ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे…. तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ ना छोड़ेंगे….! मगर मंगरुआ निकला चुप्पा-बदमाश। ससुर जुआनी के देहरी पर पैर रखते ही साथ छोड़ दिया।

लड़िकपन में केतना मार खाये…. मगर दोनो शीत-बसंत का जोड़ी टूटा नहीं। गिल्ली-डंडा, कबड्डी, डोल-पत्ता…. बुद्धन बुढौ को चिढ़ाना, कोठी पर वाला महंथ के गाछी से आम का टीकोला तोड़ना, देसुआ वला के खेत से मकई का बाल… पाप-पुण सब में सहभागी। पदुम लाल गुरुजी के इस्कुल से लेकर पुरना कौलेज तक पहुँच गये ऐसहि हाथ में हाथ दिये। हम तो वैसे ही सिकिया पहलवान रह गये मगर मंगरुआ मिसरिया बाबा के अखारा पर दंड पेल के बाँह-पुट्ठा बना लिया था। जुल्फ़ी भी कटिनगर कटाता था। साइकिल हांकते-हांकते अगिला चक्का उठा देता था। क्या मजाल कि खेती-गिरहस्थी में हाथ लगाये…? हर घड़ी फ़ुलपैंट में हवाई-शाट कोंच के चमरौधा बेल्ट कसे रहता था। कहता था कि बंबई जाकर सनीमा का हीरो बनेगा।

अदरा नछत्तर चढ़ते झमझमा के बरसा था। किसान-गिरहस्थ सब के चेहरे पे चमक आ गयी थी। टुन-टुनुन-टुन…टुन…. भोर से लेकर पहर सांझ तक बरखा रानी के छम-छम पर जब बैलों के गले की घंटी ताल मिलाती थी बरबस पुरबैय्या का आंचल उड़ने लगता था। खेत की मेड़ों से फूटते थे पंचम स्वर….



“सावन के बरसे बदरिया हो…. धान रोपे किसान… !

गोरिया के भींगे धानी चुनरिया…. बलमा लगावे छतरिया हो …

धान रोपे किसान….!!”



ऐसने ताक के समय में भकोसन चचा को जाना पड़ा शहर दरिभंगा। कहचरी का काम था। मंगरुआ को कह गये थे झिंगुरदास और कोकैय्या को लेकर काली चौरी से तुलसीफ़ुल का बिचरा उखरबा कर डोरा में रोपवा देने। मगर मंगरुआ पर तो हीरोगिरी का भूत चढ़ा हुआ था। उ भला कादो-कीचर में जायेगा। दो दिन बाद भकोसन चचा आये। सबसे पहिले चच्ची से धनरोपनी का ही समाचार पूछे। चच्ची तो अपना भरसक हल्के-फुल्के कही थी मगर चचा के कान के केश का गुच्छा एकदम खड़ा हो गया। आँखें लाल और भौंह फरफराने लगी, “आज आने दो ई करमकीट को… मार-मार के सारा हिरोपनी पछुआरे से निकालते हैं।”

हम दोनों एक पहर रात ढले अखारा पर से आये थे। उ अपने घर गया और हम अपने। अब पता नहीं रात में क्या हुआ मगर धमा-धम की आवाज तो आई थी एकाध दफ़े। अगले दिन मंगरुआ नजर नहीं आया। हम भी सहम के कहीं नहीं निकले। दोपहर में चच्ची आयी मंगरुआ को खोजने तो हमैं अचरज लगा…. आज तक तो उ हमैं छोड़ के कहीं गया नहीं…. हमें घर में देख चच्ची का भी अंदेशा बढ़े लगा और हम भी सोच में पड़ गये।

फिर सौ ओझाई-गोसाईं, मन्नत-कबुला हुआ। पंदरहिया बीत गया मगर मंगरुआ का कौनो समाचार नहीं। भकोसन चच्चा पश्चाताप में जले जा रहे थे और चच्ची तो बिछौने पकड़ ली थी।

उ दिन टोले में चिट्ठी बाबू को दोपहरिया में देखकर सब अपने-अपने घर से निकल आये थे। चिट्ठी बाबू भकोसन चचा का नाम पुकार कर कहे, “बंबई से बैरंग आया है।” सब लोग चिट्ठी बाबू को गोल-गंडा घेर लिया था। जरूर मंगरुए का तार होगा।

दोहाई बाबा विश्वनाथ के! सच्चे मंगरुए का तार था। चिट्ठी बाबू को अठन्नी थमा कर बैरंग भकोसन चच्चा हमरे तरफ़ सरका दिये। चोटबा अंगरेजी में हिन्दी लिखा था,



“बाबूजी को मालुम कि हम बंबई पहुँच गये। सब बात समाचार तो ठीक है मगर इहाँ तो अपना गाँव से भी ज्यादा गरीबी है। अच्छे-अच्छे घर की बहू-बेटियों को भी पहनने के लिये पूरे कपड़े नहीं मिल रहे हैं। बाबूजी को मालुम कि गाँव भर में चंदा करके सौ-पचास साड़ी भेजवा दीजिये। हम इहां बंटवा देंगे। और कौनो चिंता फिकिर का बात नहीं है।”



हा… हा… हा…. ! चिट्ठी सुनके उहाँ मौजूद सकल सभा की हंसी छूट गयी। भकोसन चचा गमछी के छोड़ से आँखों का कोर पोछने लगे। चच्ची तो चिट्ठी हमरे हाथ से लेकर कलेजा में सटा ली थी। उ दिन पहिल बार हमैं मंगरुआ से इर्ष्या हो रही थी।

पता नहीं भकोसन चचा साड़ी-उड़ी भेजाए कि नहीं मगर ऐसहि साल-दो साल तक चिट्ठी-पत्री आते रहा। होली-दिवाली में मनिआटर भी आता था। अचानक पंद्रह दिन पहिले गाँव में एगो मोटर हरहराते हुए आया और पेंपेंप…पेंपेंप करते हुए सीधा भकोसन चचा के दरवाजे जा लगा। बच्चा-बूढ़ा जर-जनानी सब मोटर को घेर लिहिस। शायद एमपी-कलस्टर आये होंगे। कहीं राशन काट बंटेगा।

images (4)ओह तोरी के…. ! ई तो मंगरुआ निकल रहा है मोटर से। अरे बाप रे… अब तो और गवरु जवान हो गया है। कोट पैंट पहिर के आया है। सब और करीब हो गया। भकोसन चच्चा तो कहीं बाहेर गये हुए थे। चच्ची भीड़ को चीर कर बढ़ी। मंगरुआ माय के पैर छूता उसे पहिले ही उ उको पकड़ के रोने लगी। हम भी अपने दरवाजे पर से गमछे लपेटे भागे। मंगरुआ मोटर के पछारी से बक्सा-पेटी निकाल रहा था। हमें देखकर सरपट लिपट गया। उ तो दो मिनिट के बाद उका कुछ याद आया तो मोटर का दहिना तरफ़ वाला दरवाजा खोला। आहि रे दैय्या…. ! ई मंगरुआ तो दुल्हिन लेके आया है… उ भी एकदम अंगरेजी मेम।

चच्ची तो सकदम रह गयी। केहु गया भकोसन चच्चा को समाद कहे। इधर उहाँ बेगर न्योत-हकार के जुटी महिला मंडली दुल्हिन के स्वागत का गीत शुरु कर दी। आनन-फ़ानन में दुल्हिन को साड़ी ओढ़ाकर आंगन ले जाया गया। बाद में चच्चा भी आये। दोनो प्राणी के चेहरे पर असंतोष तो था मगर बरसों बाद बेटे के आने की खुशी और फिर कहीं खो न जाने का डर ने हालात से समझौता करा दिया था।

एकाध दिन तो गुजरा मगर उ बम्बैया दुल्हिन कोहबर में केतना दिन रहे? अंगना देहरी, द्वार-दरवाजा सब आने-जाने लगी। फिर कुछ दिन में साड़ी कट के सलवार-फ़्राक हो गया। फिर घंघरी-कुर्ता। उ दिन तो और हद होय गया। उ मंगरुआ वाला बेल-बटम पहिन के लफ़्फ़-राइट करने लगी। मरद-मानुस मुरी घुमा के निकल जायें तो औरत जात मुँह पर अंचरा रख के हंसे… लड़िका-बच्चा सब तो आगे-पीछे डोलने ही लगा। भकोसन चचा खेत से लौट रहे थे। इ दिरिस देख के सो भकचोंधर लगा कि सांझे सोहर उठा दिये, “आग लगावे पानी में ई नयकी दुल्हिनिया…. !”

उन दिनों टोला में दुइए गप्प था। एक स्थल पर का सावनी मेला और दूसरा मंगरुआ की लुगाई का करतब। पहिल सोमवारी का सारा तैय्यारी हो गया था। ई दफ़े मंगरुआ कस के चंदा भी दिया था और मेला के सजावट में भी जी-जान से लगा रहा। दुकान दौड़ी सब लग गया था। खेल-तमाशा भी।

चच्ची बहुरिया से बोलीं, “आज सब कनिया-पुतरिया मेला जा रही हैं। तुम भी चाहो तो साथ में चली जाओ…!”

बहुरिया तो पहिलहि से डोला फ़नाई हुई थी जानेको। चच्ची कहती चाहे नहीं कहती। अब जब ससुरिया का औडर भी मिल गया तो लगी नख-शिख सिंगार करे। बड़की भौजी बता रही थी कि उ बम्बैया बहू तो कजरा-गजरा के बाद छः बार डरेसे बदली। खने ई घंघरी तो खने उ घंघरी।

आखिर घंटा भर के मेहनत के बाद जौन पहिर के तैय्यार हुई उ तो लगता था कि उके छ्ट्ठी का कपड़ा ही होगा। बेचारी घंघरी घुठने तक भी नहीं पहुँची। बहुरिया वही पहिन के मेला जाने को तैय्यार। चच्ची इन्डायरेट बोली भी मगर बहुरिया तो अपने में मगन। चल पड़ी।

अब लोग मेला क्या देखेगा…? यही को देखे। बेचारी जिधरे जाये उधरे मेला… ! अब उको कुछ उकठ लगने लगा था। फिर भी अब का करे…. मौडर्न फ़ैशन है। अब गाँव-समाज में न भल-मानुस बहिन-बेटी के नाता लगा कर मुरी झुका लेते थे। मेला-ठेला में तो बुझले बात। दस गाँव का दस किसिम का लोग? कौन लुच्चा कौन लफ़ंगा… केहु के माथा पर लिखा तो नहीं होता है। उसी में से किसी ने बहुरिया के कदली-स्तंभ जैसे मखमली पैर को देखकर बजा दिया सीटी। और पता नहीं क्या हुआ….।

images (26)कनिया बेचारी अगल-बगल देखी। सब घुंघट काढ़े। अब बेचारी गयी सरमाय। उधर आन गाँव से आये कुछ मनचले लड़कों की छिछली नजर लगातार इसी का पीछा कर रही थी। बेचारी इधर-उधर देखी। कौनो उपाय नहीं सूझा तो…. छपाक…! वही स्थल पर वाला पोखर में कूद पड़ी। हाहाकार मच गया। लोग-वाग दौड़ा। हल्ला सुनके हमलोग भी दौड़े। “हाय नारायण… उ को तैरने भी नहीं आता है।” एक औरत चिल्ला कर बोली थी। कौन है… कौन है? ऊ पानी में कभी तर कभी ऊपर हो रही थी। हमलोग कुछ सोचे उ से पहिलहि दो जवान पानी में गोता लगाके उको कंधा पर लिये उपराये। आहि तोरी के…. ई तो…. हम मंगरुआ का मुँह देखे लगे। मंगरुआ फ़टाक से आगे बढ़कर उको उठाइस। पेट-पीठी दबाया। चक्करघिन्नी नचाया।

तब तक में भकोसन चच्चा और चच्ची भी दौड़े आ गये। फिर उसको लाद-उद के घर लाया गया। जब सब शांत-उंत हो गया तो भकोसन चचा चच्ची से पूछे, “ का हुआ… तुम कछु कह दी थी कि मंगरुआ से लड़ाई झगरा…?”

चचा की बात पुरी होने से पहिले ही चच्ची बोल पड़ी, “मार बढ़नी… हम काहे कुछ बोलेंगे… मंगरुआ तो उको माथे पर नचाता है।”

“फिर उ जलसमाधि काहे ले रही थी….?”, चच्चा का अगिला सवाल, “हमें फ़ंसाने के लिये….?”

चच्ची बांये हाथ को नचाकर ठुड्डी के नीचे लगाते हुए बोली, “अ दुर्र जाओ… ! अरे देखे नहीं कैसन बित्ता भर के घंघरी पहिन के गयी थी मेला…? सब यही को घूर रहा था। शायद कोई कुछ कह भी दिया। पहिरावा-ओढावा कैसनो हो मगर है तो उच्च कुल की। लाजे पोखर में कूद गयी।”

चच्ची का जवाब पूरा हुआ तो चचा मुँह बनाकर बोले,



“वाह! ’आपहि टांग उघारिये, आपहि मरिये लाज।’ कोई कहा था वैसा डरेस पहनने के लिये? अपने मन से न गयी थी। अपने गयी थी फ़ैशन में देह उघार के और अपने लाजे डूबकर मरने भी लगी। भई ससुराल गाँव में थोड़ा पर्दा-लिहाज से रहना चाहिये कि नहीं…. अपनी ही करनी से न डूब रही थी। जैसी करनी वैसी भरनी।”



चच्चा हमरे तरफ़ मुँहकर के बोले थे, “है कि नहीं हो सिकी पहलवान ?”

हम बोले,



“हाँ चचा ! ठीके कहते हैं। ’आपहि टांग उघारिये, आपहि मरिये लाज।’ आखिर हमरे करम का फ़ल हमें ही मिलता है। हमरे गलती की सजा भी हमें ही मिलेगी।



बात समाप्त होने पर चचा की प्रशंसा भरी नजरों से नजरें टकराई थी।

20 टिप्‍पणियां:

  1. मनोज जी
    देसिल बयना के माध्यम से गाँव की खुशबू बाटते रहते हैं ,आभार

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  2. चचा ने नजरों से प्रशंसा कर दी, लेकिन प्रशंसा के लिए हमारे सोचे सब शब्‍द थोथे और फीके पड़ रहे हैं, इस पोस्‍ट के लिए.

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  3. जैसी करनी वैसी भरनी
    भाषा पूरी तरह समझ नहीं आती, पर गुदगुदाती जरूर है

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  4. करण बउआ!
    आज त सका पदारथ का दरसन हो गया... सिनेमा का माफिक.. सुरू हुआ त बुझाया कि दोस्ती का कहानी है, बाद में गाँव से भागा अउर गाड़ी छकडा में लौटा मेमिन के साथ.. लगा कि किसन-सुदामा का खिस्सा होगा... उसके बाद सुरू हुआ परम्परा और संस्कृति का खेला.. अउर एगो ग्रहन करने जोग सिच्छा..
    एक दम सुपर हिट कहानी है.. अउर रफ़्तार त राजधानी को मात करता है.. "इन्डायरेट" आज का सब्द.. कुल मिलाकर स्वस्थ मनोरंजन के साथ सिच्छा का छौंक.. एही त खासियत है देसिल बयना का!!
    कुल मिलाकर

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  5. गाँव का सारा चित्र खींच दिया आपने करन भाई... मधुश्रवानी आ रहा है....इस पर भी कुछ लिखिए... वैसे आजकल हमारी सरकार ऐसे ही कर रही है.... ’आपहि टांग उघारिये, आपहि मरिये लाज।’.. सुन्दर बयना

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  6. बहुत बढ़िया आलेख ! लाजवाब प्रस्तुती!

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  7. hamto naye hain pc culture ke liye
    'desil baynaa mei aapahi taang ughariye ,aaphi mariye laaj badi rochak lage

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  8. सभी पाठकों को नमस्कार एवं धन्यवाद !

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  9. शुद्ध देशी..
    एकदम बिहारी अन्दज..खांटी

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  10. wah!,wah! maja aa gaya padhkar.Laga mano darbhanga ke kisi gaon meinbachapan bitakar aa rahe hain.Lajwab.

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  11. आज के बयना का जो प्रस्तुतिकरण आपने किया है करण वह अत्यंत रोचक है। लगता है गांव में बैठकर सारा दृश्य साक्षात आंखों के सामने घूम रहा हो!
    मज़ा आ गया।

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  12. सन्दर्भ के अनुकूल रोचक रचना। बहुत-बहुत साधुवाद।

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  13. waah... bas maan lei ki maja aaiga padhi ke...
    sudhh desi bhasa... aapan boli...
    aur prastuti mein to aap hamesha hi ustaad hain...

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  14. ’आपहि टांग उघारिये, आपहि मरिये लाज।’ आखिर हमरे करम का फ़ल हमें ही मिलता है। हमरे गलती की सजा भी हमें ही मिलेगी।”

    एकदम सटीक....

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  15. अपने तेज धार के साथ "शब्द" अनसन पर बैठा था बिलकूल अन्ना हजारे की तरह. कथानक शुरुआत में ही रामदेव-सा हंगामा करके चला गया. कहानी की कद वर्त्तमान सरकार से भी लम्बी थी बिलकूल अँधेरे में भावों का धड्पकड़ किया. और आम जनता की तरह पाठक सोचने पर मजबूर है, काश रामदेव, अन्ना और सरकार में सामंजस्य बैठ पाती. अगला देसिल बयाना का इंतज़ार.

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  16. आपके समस्तीपुरी आलेखों को पढ़ दिल बाग-बाग हो जाता है, काफी रोचक है आपकी भाषा -शैली . आपके अनवरत लेखन के लिए मेरी शुभकामनाएँ.

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आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।