रविवार, 10 जुलाई 2011

भारतीय काव्यशास्त्र – 74

भारतीय काव्यशास्त्र – 74

आचार्य परशुराम राय

पिछले कुछ अंकों में पदैकदेश के अन्तर्गत काल, वचन, पुरुष, पूर्वनिपात विभक्ति, प्रत्यय, उपसर्ग और निपात द्वारा रसध्वनि व्यंग्य पर चर्चा की गयी थी। इस अंक में इनमें से कई व्यंग्यकारकों द्वारा एक साथ रसध्वनि के कुछ उदाहरण दिए जाएँगे और ध्वनि (व्यंग्य) की कुल संख्या कितनी है, इसपर चर्चा की जाएगी।

यहाँ एक ऐसा उदाहरण लेते हैं जिसमें सर्वनाम, प्रातिपदिक और वचन तीनों से एक साथ रसध्वनि की अभिव्यंजना की गयी है। यह श्लोक राघवानन्द नामक नाटक से लिया गया है। यह श्लोक विभीषण की रावण के प्रति उक्ति है-

रामोS भुवनेषु विक्रमगुणैः प्राप्तः प्रसिद्धिः परामस्मद्भाग्यविपर्ययाद्यदिर परं देवो न जानाति तम्।

बन्दीवैष यशांसि गायति मरुद्यस्यैकबाणाहतिश्रेणीभूतविशालतालविवरोद्गीर्णैः स्वरैः सप्तभिः।।

अर्थात् (हे रावण,) वह राम अपने पराक्रम और गुणों से तीनों लोकों में विख्यात हो चुके हैं। महाराज, हमारे भाग्य के उलट जाने से आप उन्हें पहचान नहीं पा रहे हैं। उनका यशगान एक ही पंक्ति में खड़े विशाल सात ताल-वृक्षों के उन छिद्रों से निकलनेवाली हवा कर रही है, जिन्हें उन्होंने एक ही बाण के प्रहार से छेद दिया था।

यहाँ वीर-रस की अभिव्यंजना सर्वनाम असौ (यह) से किया गया है कि यह राम प्रसिद्ध है। अन्यथा राम कहने के बाद पुनः यह कहने का कोई अर्थ नहीं है। प्रातिपदिक भुवनेषु (तीनों लोकों या चौदह भुवनों में) से व्यंजित हो रहा है कि उनकी ख्याति एक-दो देशों या राज्यों में ही नही, अपितु पूरे विश्व में फैल चुकी है। बहुवचन में प्रयुक्त गुणैः शब्द से भाव व्यंजित हो रहा है कि उनकी ख्याति एक या दो गुणों से ही पूरे विश्व में नहीं फैली है, बल्कि अनेक गुणों के कारण। इसी प्रकार अस्मद् भाग्य विपर्ययात् में त्वत् (तुम्हारा) या मत् (मेरा) न प्रयोग कर अस्मद् (हमारा) प्रयोग किया गया है जिससे यह व्यंजित हो रहा है कि केवल तुम्हारा (रावण का) या मेरा (विभीषण का) भाग्य नहीं उलट गया है, बल्कि हम सभी का (सम्पूर्ण लंका वासियों का)। इस प्रकार वीररस की अभिव्यंजना सर्वनाम, प्रातिपदिक और वचन तीनों से एक साथ की गयी है।

यहाँ एक दूसरा उदाहरण लेते हैं, जिसमें एक साथ अन्य कई पदांशों से शृंगार रस की अभिव्यंजना की गयी है-

तरुणिमनि कलयति कलामनुमदनधुर्भ्रुवोः पठत्यग्रे।

अधिवसति सकलललनामौलिमियं चकितहरिणचलनयना।।

अर्थात् नव-यौवन का उदय होने पर इस नायिका की भौंहें कामदेव की धनुष के सान्निध्य में बैठकर उसकी (कामदेव की धनुष की) कलाओं में प्रशिक्षित होकर चकित हिरण के समान चंचल नेत्रों वाली यह नायिका युवतियों का सरताज़ बन गयी है।

यहाँ तरुणिमनि में त्व के स्थान पर इमनिच् प्रत्यय के प्रयोग से पद में कोमलता लाकर यौवन में सुकुमारता का व्यंग्य दिखाया गया है, जो त्व प्रत्यय से नहीं आता। क्योंकि त्व कर्ण-कटु होता, अर्थात सुनने में कर्कश लगता तो यौवन में कठोरता का भाव आ जाता। इसी प्रकार अनुमदनधनुः में अव्ययीभव समास होने से पूर्वपद की प्रधानता हो जाती है और इसके कारण नायिका की भौंहों का कामदेव की धनुष से अधिक कारगर होना या वश में करने की सामर्थ्य का होना व्यंजित होता है। यदि इसके स्थान पर मदनधुषसमीपे प्रयोग होता तो यह व्यंग्य नहीं आ पाता। पुनः मौलिमधिवसति पद में मौलि शब्द को अधिकरण (कारक) में मौलौ के स्थान पर कर्म (कारक) में मौलिम् प्रयोग किया गया है। क्योंकि सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक) में प्रयोग करने पर केवल एक युवती में उसका अर्थ नियत हो जाता, जबकि द्वीतीया विभक्ति में प्रयोग करने से वह सभी युवतियों पर लागू होगा। यहाँ इमनिच् प्रत्यय, कर्म कारक और अव्ययीभाव समास द्वारा शृंगार रस व्यंग्य है।

इसी प्रकार अन्य प्रकृति, प्रत्यय आदि द्वारा व्यंजित व्यंरग्य को समझना चाहिए। अब ध्वनि-चर्चा यहीं समाप्त होती है। अन्त में ध्वनियों (व्यंग्यों) को एक बार पुनः स्मरण कर लेते हैं और इनकी संख्या पर चर्चा कर लेते हैं, ताकि उनके नाम पुनः एक बार आ जाएँ।

सर्वप्रथम ध्वनि के दो भेद- 1. अविवक्षितवाच्य ध्वनि (लक्षणामूलध्वनि) और 2. विवक्षितवाच्य ध्वनि (अभिधामूलध्वनि)।

अविवक्षितवाच्य ध्वनि (लक्षणामूलध्वनि) के दो भेद- 1. अर्थान्तर-संक्रमित-वाच्य ध्वनि और 2. अत्यन्त-तिरस्कृत-वाच्य ध्वनि।

विवक्षितवाच्य ध्वनि (अभिधामूलध्वनि) के दो भेद- 1. असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि और 2. संलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि।

असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि को रसध्वनि के नाम से भी जाना जाता है और इसे केवल एक ही माना गया है। परन्तु इसके अन्तर्गत 1. रस, 2. रसाभास, 3. भाव, 4. भावाभास, 5. भावोदय, 6. भावशान्ति, 7. भावसंधि और 8. भावशबलता माने जाते हैं। संलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि के तीन भेद किए गए हैं- 1. शब्दशक्त्युत्थ ध्वनि, 2. अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि और 3. उभयशक्त्युत्थ ध्वनि।

शब्दशक्त्युत्थ ध्वनि के दो भेद- 1. वस्तुध्वनि और 2. अलंकारध्वनि।

अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के तीन भेद- 1. स्वतःसम्भवी ध्वनि, 2. कविप्रौढोक्तिसिद्ध ध्वनि और 3. कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध ध्वनि। इन तीनों के चार-चार भेद- 1. वस्तु से वस्तु व्यंग्य, 2. वस्तु से अलंकार व्यंग्य, 3. अलंकार से वस्तु व्यंग्य और 4. अलंकार से अलंकार व्यंग्य। इस प्रकार इसके 12 भेद हुए और 1 उभयशक्त्युत्थ ध्वनि। कुल 18 हुईं। इनमें से उभयशक्त्युत्थ ध्वनि को छोड़कर शेष 17 ध्वनियों की संख्या वाक्यगत और पदगत भेद से 34 हुई। इसके अतिरिक्त अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के 12 प्रबन्धगत भेद हुए। इन्हें मिलाकर 47 (=1+34+12) संख्या हो जाती है। असंलक्ष्यक्रम ध्वनि के पदांश, वर्ण, रचना और प्रबंध के भेद से चार भेद और होते हैं। इन चारों को मिला देने पर ध्वनि की कुल संख्या 51 हो जाती है। पुनः ती प्रकार के संकर और संसृष्टि के भेद से कुल संख्या 10455 हो जाती है। यह गणना आचार्य मम्मट के अनुसार है। आचार्य अभिनवगुप्त ने 7420 गणना की है, जबकि आचार्य विश्वनाथ कविराज ने 5355 मानी है। यह अन्तर कैसे हुआ, यह एक लम्बा विषय है। कभी इस विषय पर स्वतंत्र रूप से चर्चा होगी।

अगले अंक से गुणीभूत-व्यंग्य पर चर्चा प्रारम्भ होगी।

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8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही उपयोगी जानकारी उपलब्‍ध करा रहे हैं आप। आभार।

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  2. sadar pranaam |
    बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ||

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  3. मनोज कुमार जी आपका आभार!
    आचार्य परशुराम राय जी के आलेख बहुत उपयोगी और सारगर्भित हैं!

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  4. मनोज कुमार जी आपका आभार!
    आचार्य परशुराम राय जी के आलेख बहुत उपयोगी और सारगर्भित हैं!

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  5. इस श्रृंखला को ध्यान से पढ़ने के बाद लगता है कि साहित्य न पढ़ पाने के कारण जीवन अधूरा रह गया!!

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  6. भारतीय काव्यशास्त्र को समझाने का चुनौतीपूर्ण कार्य कर आप एक महान कार्य कर रहे हैं। इससे रचनाकार और पाठक को बेहतर समझ में सहायता मिल सकेगी। सदा की तरह आज का भी अंक बहुत अच्छा लगा।

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