शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

शिवस्वरोदय – 50

शिवस्वरोदय – 50

आचार्य परशुराम राय

स्वरज्ञानीबलादग्रे निष्फलं कोटिधा भवेत्।

इहलोके परत्रापि स्वरज्ञानी बली सदा।।

भावार्थ – जब एक करोड़ बल निष्फल हो जाते हैं, तब भी स्वरज्ञानी बलशाली बना सबसे अग्रणी होता है, अर्थात् भले ही एक करोड़ (हर प्रकार के) बल निष्फल हो जायँ, लेकिन स्वरज्ञानी का बल कभी निष्फल नहीं होता। स्वरज्ञानी इस लोक में और परलोक या अन्य किसी भी लोक में सदा शक्तिशाली होता है।

English Translation – When all kinds of worldly powers or strength fail, a person perfect in Swarodaya science remains powerful in this world and other worlds too.

दशशतायुतं लक्षं देशाधिपबलं क्वचित्।

शतक्रतु सुरेन्द्राणां बलं कोटिगुणं भवेत्।।

भावार्थ – एक मनुष्य के पास दस, सौ, दस हजार, एक लाख अथवा एक राजा के बराबर बल होता है। सौ यज्ञ करनेवाले इन्द्र का बल करोड़ गुना होता है। एक स्वरयोगी का बल इन्द्र के बल के तुल्य होता है।

English Translation – A Man may be powerful ten times, hundred time, ten thousand times or even like a king, but Indra, the performer of hundred Yajnyas, is crore times powerful and a Swarayogi is so powerful as Indra.

श्री देवी उवाच

परस्परं मनुष्याणां युद्धे प्रोक्तो जयस्त्वया।

यमयुद्धे समुत्पन्ने मनुष्याणां कथं जयः।।

भावार्थ – इसके बाद माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि हे प्रभो, आपने यह तो बता दिया कि मनुष्यों के पारस्परिक युद्ध में एक योद्ध की विजय कैसे होती है। लेकिन यदि यम के साथ युद्ध हो, मनुष्यों की विजय कैसे होगी?

English Translation – Then Mother Parvati tells Lord Shiva, “O God, you have told me how a fighter wins a war when men fight among themselves. Now let me know how men will invade the king of death.

ईश्वरोवाच

ध्यायेद्देवं स्थिरो जीवं जुहुयाज्जीव सङ्गमे।

इष्टसिद्धिर्भवेत्तस्य महालाभो जयस्तथा।।

भावार्थ – यह सुनकर भगवान शिव बोले- हे देवि, जो व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर तीनों नाड़ियों के संगम स्थल आज्ञा चक्र पर ध्यान करता है, उसे सभी अभीष्ट सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, महालाभ होता है (अर्थात् ईश्वरत्व की प्राप्ति होती है) और सर्वत्र सफलता मिलती है।

English Translation – Then Lord Shiva said, “O Goddess, if a man concentrates on Ajnya centre at the meeting point of three nadis by becoming motionless, he achieves all what he desires, including all successes, and ultimately becomes one with the cosmic consciousness.”

निराकारात्समुत्पन्नं साकारं सकलं जगत्।

तत्साकारं निराकारं ज्ञाने भवति तत्क्षणात्।।

भावार्थ – यह सम्पूर्ण दृश्य साकार जगत निराकार सत्ता से उत्पन्न है। जो व्यक्ति साकार जगत से ऊपर उठ जाता है, अर्थात् भौतिक चेतना से ऊपर उठकर सार्वभौमिक चेतना को प्राप्त कर लेता है, तभी उसे पूर्णत्व प्राप्त हो जाता है।

English Translation – “This visible world in forms has been produced by invisible cosmic consciousness. When a man becomes aware of this cosmic consciousness or becomes one with it, he immediately gets knowledge of everything, i.e. Sakar and Nirakar both.

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11 टिप्‍पणियां:

  1. आचार्य जी के लेख से बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है.

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  2. आद. आचार्य जी,
    सर्वप्रथम शिवस्वरोदय के 50 वें अंक के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें !ब्लॉग जगत में शिवस्वरोदय द्वारा आपने एक नया प्रतिमान स्थापित किया है जो हमें हमारे उस ज्ञान से परिचित कराता है जिसे हमारी पीढियां लगातार भूलती जा रही हैं !
    आभार !

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  3. आपका हार्दिक अभिनन्दन ||

    आभार ||

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  4. यह सम्पूर्ण दृश्य साकार जगत निराकार सत्ता से उत्पन्न है। जो व्यक्ति साकार जगत से ऊपर उठ जाता है, अर्थात् भौतिक चेतना से ऊपर उठकर सार्वभौमिक चेतना को प्राप्त कर लेता है, तभी उसे पूर्णत्व प्राप्त हो जाता है।

    बहुत सुन्दर भावार्थ...

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  5. बड़े ही सुरुचिपूर्ण ढ़ंग से आपने इस गहन ज्ञान को हम तक पहुंचाया है। आभार आपका।

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  6. तभी बुद्ध और ओशो समेत कितनों ने ही स्वर को संयत करने पर इतना ज़ोर दिया है।

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  7. कल शनिवार (०९-०७-११)को आपकी किसी पोस्ट की चर्चा होगी नयी-पुराणी हलचल पर |कृपया आयें और अपने शुभ विचार दें ..!!

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