शनिवार, 30 जुलाई 2011

फ़ुरसत में … माई फ़ुट !

फ़ुरसत में

माई फ़ुट !

211622_1700089266_7326004_qमनोज कुमार

तब मेरी उम्र कोई पांच सात साल की रही होगी। गर्मियों के दिन थे। सुबह से ही पेट में दर्द शुरू हुआ। कुछेक घंटो के बाद पेट चलना शुरू हुआ। शाम तक दस्‍त के साथ कै भी होने लगी। आधी रात के बाद तो शायद मेरे होश-हवास भी न रहे होंगे। घर में जो भी प्राथमिक उपचार हुआ हो, रात के आधे पहर से अधिक बीत जाने के बाद जब स्थिति क़ाबू से बाहर हो गई तो हमे सदर अस्‍पताल, मुज़फ़्फ़रपुर ले जाया गया।

IMG_1471बीती रात कौन जगा होता है ? किसी तरह इमर्जेंसी वार्ड के कुछ लोगों को जगाया गया। वहां जो भी डॉक्‍टरनुमा व्यक्ति था उसने मेरी केस हिस्‍ट्री सुनकर सामने की तरफ के वार्ड की तरफ इशारा करते हुए बोला, “वहां भर्ती कर दीजिए।”

उधर झोपड़पट्टीनुमा दो चार कमरे बने थे। उन दिनों एकदम से अलग थलग बने ये वार्ड “कॉलरा वार्ड” कहलाते थे। उनकी खिड़कियों से झांकती पीली टिमटिमाती रोशनी मौत का पैगाम लेकर ही आती थी। शायद ही कोई वहां से दुबारा अपने घर वापस जाता रहा होगा।

डॉक्टर की बातें सुन मेरी मां ने ज़ोर से मुझे अपनी बाहों में भींच लिया और पिताजी को, जो उस वार्ड की तरफ़ चल पड़े थे, चिल्‍ला कर कहा – “नहीं … वहां हम नहीं जाएंगें ! अगर इसको मरना ही है तो घर में ही मरेगा।”

ऐसा ख़ौफ़ था कॉलरा वार्ड का। मां की बात सुन पिजाजी भी ऊहापोह में पड़ गए। डॉक्‍टर इघर हिदायत दे रहा था, “तुरंत पानी चढ़ाना पड़ेगा नहीं तो...!”

पर इस “नहीं तो” की मां को कहां परवाह थी ! वह तो उसी रिक्‍शे पर मुझे गोद में लिए लपक कर बैठ चुकी थी जिससे हम आए थे। मां की वाणी में क्या ओज था, क्या आत्म-विश्वास था, क्या भरोसा था, कि उस पीली रोशनी के दायरे से हमे बाहर ले चली और मां के अंतरआत्मा की आवाज़ सुन और उसकी आंखों की नूर देख कर पिताजी भी आ गए वापस। जैसे पक्षी अपने परकोटे में अपने बच्चे को छुपा कर लाती है वैसे ही मेरी मां मुझे लाई थी और उस दिन को याद कर मुनव्वर राना का यह शे’र मुझे बहुत सही जंचता है

ये  ऐसा  कर्ज़  है  जो मैं  अदा  कर  ही  नहीं  सकता

मैं जब तक घर न लौटू मेरी माँ सजदे में रहती है

लौटते वक़्त रिक्‍शे पर ही तय हुआ कि हम बखरी चलते हैं। वहां हमारे फूफाजी थे। वे उस गांव में रहते थे और चिकित्‍सक थे। शायद आयुर्वेद की शिक्षा उन्‍होंने ग्रहण की हो। रास्‍ते में ही बस स्‍टैंड था। हम सुबह उजाला होते होते बस से फूफाजी के यहां आ गए।

पता नहीं क्या-क्‍या उपचार मेरा हुआ, पर मुझे याद है कि कोई एलोपैथ की दवा नहीं दी गई थी। अधिकांश चीज़ें घरेलू ही थीं। ... और जो चीज़ सबसे ज़्यादा मुझपर असर की वह फूफाजी के ही स्‍वरों में – “चूरा को इतना फुला दीजिए कि भात जैसा हो जाए और फिर उसमें दही मिलाकर खिलाइए। दोपहर तक ठीक हो जाएगा।”

ऐसा ही हुआ ! शाम तक तो मैं घर के बाहर घूमने लगा, दूसरे दिन खेलने भी। उन दिनों कैसे-कैसे उपचार होते थे और हम ठीक भी हो जाया करते थे। चोट लगी कट फट गया, गेंदे के फूल का पता हाथ में मसल कर लगा देते थे, ठीक हो जाता था, दांत का दर्द हुआ, दो लॉंग खा ली, ठीक हो जाता था, सर्दी हुई - तुलसी का काढ़ा बना कर पी लिया, पेट में दर्द हुआ, आजवायन खा लिया, कान में दर्द होने पर सरसों का तेल डाल लिया, ... ये पत्ती खा लिया, … वो काढ़ा पी लिया ... हम उन्हीं उपचारों से ठीक भी हो जाया करते थे।

याद है मुझे, जब हमें पेट में दर्द होता था, तो नानी पेट पर सरसों तेल लगाकर एक दीपक जला कर रख देती थी और उसके ऊपर कोई लोटा आदि से उसे ढंक देती थी। कुछ देर मे दर्द गायब !

ये प्राकृतिक चिकित्‍सा या घरेलू नुस्‍खें, ये हमारी पद्धतियां थीं। हमारी पारम्परिक पद्धति। आज के बदलते दौर में हम यह सब भूलने लगे हैं। भूलने लगे हैं - और भी बहुत कुछ ...

Spindle-4.jpgस्वस्थ होकर जब फूफाजी के यहां से लौटे तो हमारी परीक्षा शुरू हो चुकी थी। उन दिनों एक पेपर होता था जिसमें हमें हस्‍तकला और स्वच्छता की परीक्षा देनी होती थी। उस दिन परीक्षा में हमें जो काम मिला था, कुछ जंगल आदि साफ करने का। उसे पूरी तन्‍मयता से किया और भरपूर नम्‍बर प्राप्‍त किया। उन दिनों की शिक्षा पद्धति में हमारे समाज आदि की आवश्‍यकताओं को ध्‍यान रखा जाता था। नैतिक शिक्षा और शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य हमारी बुनियादी शिक्षा का आधार था। गृह एवं कुटीर उद्योग की वकालत की जाती थी। मुझे याद है कि एक पीरियड हुआ करता था, जिसमें हम तकली से सूत कातते थे। जिसका जितना अच्छा, पतला और मज़बूत सूत होता था उसे उतने अच्‍छे अंक मिलते थे। आज के विद्यार्थी से तकली के बारे में पूछिए, तो शायद नाम भी न सुना हो उसने, कातना तो दूर की बात है।

DSCN1383हम तकली कातते होते थे तथा आंखो और मन में बापू की तस्‍वीर समाई होती थी। बापू जैसा बनने की सोच विकसित होती थी। इस सूत से, इस धागे से, उस महात्‍मा तक एक बंधन बंधता था। हमें गर्व महसूस होता था। घर में चरखा होता था। महिलाएं चरखा कातती थी। उसके सूत बेचकर कुछ आमदनी भी हो जाया करती थी। चरखा और सूत आत्‍म-सम्‍मान का “प्रतीक”था। कुछ नहीं तो चरखा है ना जी, हाथ में हुनर हो तो हम जीविकोपार्जन कर लेंगे।

“प्रतीक” बहुत बड़ी चीज होती है। तब के नेताओं में हमारे “प्रतीक” थे –पं. नेहरू, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, अब्दुल कलाम आज़ाद, शास्‍त्री जी और आज कलमाडी साहब, राजा साहब, अमर साहब , येदुरप्‍पा साहब ! तब सूत हमारा आत्‍म विश्वास और आत्‍म सम्‍मान का सूचक था, और आज ...  “माई फ़ुट ...!”

images (53)हां जी, आज सूत की माला पहना दो यही तो कहते हैं – “सूत ... माई फ़ुट !” उससे जूता साफ कर लिया, कचड़े में डाल दिया। न आज गांधी का महत्‍व है और न उन “प्रतीकों” का। आज के युवा “कमीने” फिल्‍म देखते हैं, “डेलही-वेलही” की भाषा बोलते हैं और “ढ़न्न्‌ टनन्‌” गाते हैं। अब मानवीय संवेदना, लोकाचार का नहीं, “गुल्लक तोड़कर टनटनाने” आदि का “प्रतीक” ज्यादा है।

गांधी जी ने वर्षों पहले भांप लिया था कि स्विस बैंक में धन जमा करने वाले नेताओं द्वारा इस देश के करोड़ो बेरोज़गार लोगों के लिए रोज़गार देना उनके बस की बात नहीं होगी। इसलिए वे लोगों को आत्‍मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया करते थे। बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के आगे नतमस्‍तक लोगों ने गांधी जी को दफना दिया है, उनके “प्रतीकों” को जूतों की नोक पर रख लिया है। “ग्रामीण विकास” करने वाले ये लोग गांवों में पेप्‍सी-कोला का साम्राज्‍य खड़ा कर उस साम्राज्‍यवादी ताकतों को न्‍योत रहें हैं, जिन्हें गांधी जी ने सत्‍य, अहिंसा और स्‍वदेशी के बल पर देश से खदेड़ा था।

गांधी जी ने देश की समस्‍याओं के समाधान के लिए विवेकपूर्ण और वैज्ञानिक उपागमों को खारिज नहीं किया, बशर्ते कि वे नैतिक सिद्धांतों के अनुरूप होते। इसे वे रचनात्‍मक कार्यक्रम कहते थे। लेकिन वे स्‍वदेशी तकनीक को बढ़ावा देते थे, जो अधिकतम लोगों की जरूरत को पूरा करने वाला होता था। उनके प्रचार में चरखे का गौरवपूर्ण स्‍थान था। उनका मानना था कि इससे गरीबों को जीने का साधन मिलेगा और अपने लिए कपड़ा बुनकर वे पैसे बचा सकते हैं। 1919 में उन्‍होंने चरखे का प्रयोग शुरू किया। सबसे अच्‍छे चरखे को 5,000 रूपये इनाम देने की घोषणा हुई। शीघ्र एक साधारण और सुवाह्य चरखा इज़ाद हुआ। गांधीवादी कार्यकर्ताओं ने इन चरखों को बनाने के लिए चंदे इकट्ठा किए। चरखे बनाकर गरीबों में बांटे गए। सूत बुने गए। उन्‍हें हस्‍तकरघा बुनकरों को दिया गया। खादी कपड़ा बना। खादी भंडार खोले गए। स्‍वदेशी वस्तुओं को स्‍वीकारा किया गया और विदेशी का बहिष्‍कार।

DSCN1384गांधी जी कहते थे – मैं भोजन के बिना तो रह लूंगा, मगर चरखे के बिना नहीं रह सकता। जब मैं चरखे पर सूत कातता हूँ, उस समय मुझे गरीब की याद आती है। गांधी जी की मान्‍यता थी कि चरखा कातने में ही देश के लाखों लोगों को रोजगार मिल सकता है। इसमें कम पूँजी की भी जरूरत पड़ती है।

गांधी जी ने आर्थिक स्‍वतंत्रता के लिए “स्‍वेदशी” का आह्वान किया। चरखा कातना उसी स्वदेशी का एक दैनिक उदाहरण था, “प्रतीक” था, एक विराट धर्म नीति थी। जिसका उद्देश्‍य मनुष्‍य को मुक्ति देना था। वे “आखिरी आदमी” को अपना लक्ष्‍य मानते थे।

आज गांधी नहीं रहे। उनके मूल्‍य भी एक-एक कर दरकिनार किए जा रहे हैं। सारी दुनियां का परिदृश्‍य हमारे सामने है। विज्ञान की ध्‍वांसात्‍मक तकनीक का अमानवीय रूप, बेशुमार दौलत पाने की अदम्य लिप्‍सा और बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों का नंगा नाच, हिंसा और आतंकवाद का बोलबाला, लोकतंत्र के हत्‍यारों का वर्चस्‍व,साम्प्रदायिकता, जातिवाद, अशिक्षा, गरीबी, अशांति और शोषण ... सब है हमारे सामने। इन सबके बारे में किसे सोचना है, और वे क्‍यों सोंचें ... हुंह ... माइ फ़ुट !

46 टिप्‍पणियां:

  1. आज भी आपकी बात सही है। हम सब उन पुराने घरेलू नुस्खों को भूलते जा रहे हैं। आज के युग में आजी, दादी, मौसी कहीं नही दिखती। सिक्का बदल सा गया है। पुरानी मान्यताएं ताख पर रख दी गयी हैं। 'शीला की जवानी ....' वाली गीत गाने वाली आधुनिक माँ के मन में शायद पुराने नुस्खे अब कैस उभर सकते हैं। आपके बाल मन का संस्मरण एवं प्रस्तुति में भाषा-शैली का समायोजन बहुत ही अच्छा लगा। धन्यवाद।

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  2. @ प्रेम सरोवर जी,
    बहुत सही कहा आपने ... बहुत ऐसी चीज़ भूल रहे हैं और उन्हें भुला कर हम ख़ुद को आधुनिक कहते हैं।

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  3. Bahut hee badhiya aalekh! Meree betee taklee se soot katayee kartee hai!

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  4. @ क्षमा जी,
    ओह! जानकर बहुत ख़ुशी हुई कि तकली से सूत की कताई को आज भी महत्व दिया जा रहा है।

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  5. मनोज जी सब भूलते जा रहे है हम, अपनी संस्कृति, अपने व्यवहार, अपने आचरण , अच्छी याद दिलाती रचना उस लोक में पहुच गया

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  6. बहुत रोचकता से आपने बहुमूल्य भाव पर ध्यान आकृष्ट किया है ..!!चरखे का महत्व अब कोई कहाँ समझता है ...?जबकि चरखे को दुबारा जीवित करके एक क्रांति लाई जा सकती है ...!!आज हमारी राजनीती सिर्फ वोट की राजनीती है ...जन-कल्याण कोई सोचता ही नहीं है ...चाहे कोई भी पार्टी क्यों न हो..|

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  7. पहले जब इतने डॉक्टर आदि न थे तब इन्हीं घरेलू नुस्खों का इस्तेमाल कर लोग अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखते थे, अब तो खैर तमाम डाक्टर इजाद हो गये हैं और उतनी ही नई किस्म की बीमारीयां भी।

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  8. एक दम सही कहा मनोज भाई

    बाद गांधीजी के यार इस मुल्क़ में|
    पुस्तकों में ही गांधीगिरी रह गई||

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  9. कुछ नई अच्‍छी चीजें भी हो रही होंगी.

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  10. america me gharelu nuskho ko khoja ja raha hai aur bharat me samapt kiya ja raha hai. bahut achchi post.

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  11. एक गाना याद आ गया "वो शाम कुछ अजीब थी ये शाम भी अजीब है" एक दूसरा, "वो सुबह जरूर आएगी" / अच्छा आलेख.

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  12. प्राकृतिक और घरेलू उपचार तब भी कारगर थे, तो आज भी हैं , लेकिन आज के कथिक पढ़े- लिखे लोग तो बस पशिचमी हवा में बह रहे हैं , बेहतर पोस्ट

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  13. बचपन की यादें ताज़ा कर दीं आपने.
    वो तकली और वो सूत कातना.आपकी पोस्ट पढ़ रहा हूँ और उन दिनों को याद करता जा रहा हूँ.
    मुनव्वर राना जी का एक बड़ा मौज़ू शेर मुझे भी याद आ रहा है,सुनियेगा:-
    जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है.
    माँ दुआ करते हुए ख़्वाब में आ जाती है.

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  14. फुर्सत में एक बेहतरीन पोस्ट ..

    सच है आज कल घरेलु उपचार के बारे में बच्चे सुनना ही नहीं चाहते ..बस जो डॉक्टर बता दे वही ब्रह्म वाक्य बन जाता है ...आज कल कि दादी नानी चुप रहने के अलावा कुछ नहीं कर पातीं ..
    आज कल प्रतीक भी बदल गए हैं ..तकली पर सूत हमने भी काता है ..अब नंबर कैसे आए वो याद नहीं ..


    विज्ञान की ध्‍वांसात्‍मक तकनीक का अमानवीय रूप, बेशुमार दौलत पाने की अदम्य लिप्‍सा और बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों का नंगा नाच, हिंसा और आतंकवाद का बोलबाला, लोकतंत्र के हत्‍यारों का वर्चस्‍व,साम्प्रदायिकता, जातिवाद, अशिक्षा, गरीबी, अशांति और शोषण ... सब है हमारे सामने...

    हुंह माई फुट .... इन शब्दों में गहन क्षोभ दिख रहा है

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  15. bahut achchi post hai.....bachpan ki sari choti-choti baaten yaad dila gayee......takli.....gende ke fool ka ras......

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  16. बहुत ही सुन्दर विषय और शैली भी |
    बधाई, मनोज जी ||

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  17. मनोज जी आपने सचमुच बहुत फ़ुरसत फ़ुरसत निकाल कर गहनता के साथ पोस्ट लिखी है ,शब्दो का सेतु बहुत सुंदर बन पड़ा है |बधाई

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  18. बचपन में माताजी को तकली पर सूत काटते हुए देखा है और सूत देकर गाँधी आश्रम से सूती सारी लेते हुए भी . सबकुछ आँखों के सामने घूम सा गया. फुरसत में तो आप कमाल करते है.

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  19. jitni tareef karungi, kam hoga ... aur munnwar rana ki ye panktiyaan - jawaab nahin -


    ये ऐसा कर्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता

    मैं जब तक घर न लौटू मेरी माँ सजदे में रहती है

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  20. आपकी बीमारी वाली घटना मुझे अपनी सी लगी....ऐसी ही बातें मेरे दादाजी सुनाते थे!उस समय परिवार के सदस्यों के बीच कितना अपनापन लगता था...!आज तो परिवार इक्कठा भी होता है तो बस स्वार्थ वश....!बहुत ही अच्छी रचना..

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  21. क्या कहें कुछ भी वैसा नही रहा।


    आपकी रचना आज तेताला पर भी है ज़रा इधर भी नज़र घुमाइये
    http://tetalaa.blogspot.com/

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  22. आपके संस्मरण ने मुझे भी बचपन की तकली याद दिला दी...तकली और कपास की पोनी से एक बित्ता सूत कात लेना बहुत बड़ी उपलब्धि लगती थी उस समय.

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  23. बहुत कुछ याद दिला दिया.....


    और बातों ही बातों में बहुत कुछ आप ने लिख भी दिया.......

    बदिया लगा आप का अंदाज़

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  24. बहुत ही उम्दा संस्मरण...

    घरेलू उपचार से लेकर घरेलू उद्योग तक की बहुत ही महत्वपूर्ण बातों पर प्रकाश डाला है...सूत कातना..टोकरी बुनना सब अब इतिहास होते जा रहे हैं...लोगो के पुराने हुनर अब प्रदर्शनी की वस्तुएं बन कर रह गयी हैं.

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  25. मनोज जी हम तो आपके पंद्रह साल बाद के हैं लेकिन मुझे भी याद है कि हमारे स्कूल में चरखा चलता था. हमारी माँ चरखा चला चला के हमें पढाई है... घर के बाकी खर्चे पूरे किये हैं... लार्ड मकेले ने ब्रिटिश संसद में कहा था कि भारत को यदि उपनिवेश बनाना हो तो उसकी प्राचीन जीवन पद्धति और संस्कृति को नष्ट करना होगा... आज वो उनके जाने के बाद अधिक हो रहा है... आधी बीमारी तो सुबह जगने से ही ठीक हो जाती है... एक बार हमको भारी कफ हो गया था.. माँ कहती है कि अक्वन के पत्ते पर घी रख के गर्म करके कंठ पर सकने से ठीक हो गया था... पश्चिम हमारी प्राचीन चीज़ों को चुपके से अपना रहा है... बड़े बुजुर्गों के पैर को छूने वाली संस्कृति आज 'माई फुट' संस्कृति बन रही है...

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  26. सच ही कहा है आपने कि गांधी के आदर्शों को,उनकी समाज सेवाओं को,देश के लिए उनके बलिदान को आज हम भूलते जा रहे हैं। हम आज के नेताओं के स्वार्थलोलुपता, उनके घोटालों और भ्रष्टाचार पर तीखी टिप्पणी मात्र कर घटना को भुला देते हैं पर क्या कभी हमने ये सोचा है कि हमने देश के लिए क्या किया? आपके लेख ने हमें यह याद दिला दिया कि सिर्फ आलोचना करना नहीं बल्कि देश के प्रति हमारा भी कुछ कर्तव्य है।

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  27. कई दिनों से आँखें साथ नहीं दे रहीं लेकिन पढ़ने का मोह जाता नहीं चाहे टिप्पणी न दें पाएँ...यहाँ यह बताना ज़रूरी लग रहा है कि इस वक्त भी हम काली चाय को ठंडा करके उससे आँखें धोकर यहाँ आए हैं...दूसरा यह कि खालिस सूती खादी कपड़े देश ही नहीं विदेशों में भी बहुत मँहगे हैं...दूर से ही देख कर खुश हो जाते हैं...माँ का प्यार देखकर मन भावुक हो गया..

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  28. कई दिनों से आँखें साथ नहीं दे रहीं लेकिन पढ़ने का मोह जाता नहीं चाहे टिप्पणी न दें पाएँ...यहाँ यह बताना ज़रूरी लग रहा है कि इस वक्त भी हम काली चाय को ठंडा करके उससे आँखें धोकर यहाँ आए हैं...दूसरा यह कि खालिस सूती खादी कपड़े देश ही नहीं विदेशों में भी बहुत मँहगे हैं...दूर से ही देख कर खुश हो जाते हैं...माँ का प्यार देखकर मन भावुक हो गया..

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  29. अब तो सर से पैर तक गांधीजी का प्रयोग हो रहा है।

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  30. आजकल के समयों की बेहद यथार्थपरक और सटीक अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  31. जब तक सब साथ आगे बढ़ना नहीं चाहेंगे...तरक्की सिर्फ चुने हुए लोगों तक ही सीमित रहेगी...गाँधी की सोच अलग थी...आज जब अरबों-करोड़ों नोट...बोरे और दीवारों से निकलते हैं...तो लगता है...की हम अपनी भूख से ज्यादा खाने के चक्कर में देश का हाजमा भी ख़राब कर रहे हैं...दूसरों पर राज करने की तमन्ना आदमी से जो ना कराये...वो कम...जब तक हम मजदूर की तरह काम नहीं करते...तब तक हम उसके योगदान की कीमत नहीं आंक सकते...गाँधी जी की कतली-पूनी...इसी बात का प्रतीक थीं...

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  32. कितनी पुरानी बात को आपने ऐसे लिखा है जैसे आज-कल की घटना हो .
    आपको हरियाली अमावस्या की ढेर सारी बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं .

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  33. हम नई पीढ़ी के लोगों को गौर करने की जरुरत है …
    सुन्दर सारगर्भित पोस्ट … धन्यवाद .

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  34. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  35. आपकी पूरी पोस्ट पढ़ भी ली और चित्र भी देख लिए ..पर आपके बचपन की फोटो पर अभी ध्यान गया ... लगता है की पूरे स्वस्थ हो कर घूम रहे हैं और फोटो खिंचाए हैं ...

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  36. अब यह सब हमारे पिछड़ेपन अथवा गरीबी की निशानी माने जाने लगे हैं। प्रतीकों और स्वदेशी की तो बात ही क्या,भाषा तक लुप्त हो रही है और सरकार है कि उन्हें प्रोत्साहित करने की बजाए,रिकार्ड कर रही है,ताकि अगली पीढ़ी उसे म्यूजियम में सुन सके!

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  37. संस्मरण को वर्तमान परिपेक्ष्य से जोड़ बड़ी रोचकता से प्रस्तुत किया है!
    सादर!

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  38. पारम्परिक सन्दर्भों को उत्कीर्ण करती रचना काफी रोचक, आकर्षक और प्रेरक है। साधुवाद।

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  39. ओह्ह सोच रहा हूँ "माई फ़ुट !"

    पर इससे क्या होगा अब "वी शुड हिट बाय अवर फ़ुट।"

    इन पुराने नुस्खों को किसी ब्लॉग पर सहेजा जाये तो सबके काम आयें, सोचियेगा । और अगर कोई ब्लॉग हो तो पता बताइयेगा ।

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  40. लेख का एक-एक शब्द यथार्थ परक है । आयुर्वेद और घरेलू उपचार जो आपने लिखे हैं आज भी प्रासांगिक हैं उन्हें न अपनाना लोगों की गलती और अज्ञान का प्रतीक है । गांधी जी के संबंध मे भी आपका विश्लेषण सटीक है ।

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  41. जब रेशम का कीडा नेताओं की जेब मे अपना घर बना ले तो फिर तकली के सूत की उन्हें क्या जरूरत है। सब कुछ उलटा पुलटा हो रहा है। विचारनीय पोस्ट। धन्यवाद।

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  42. गाँधी के आदर्श ताक पर रख दिए गए है , जब फायदा उठाना हो तो तुरंत याद आ जाते हैं !
    देशी उपचार बहुत उपयोगी है , कई प्रयोग मैंने भी अजमाए हैं !
    कतली ,सूत स्कूल के जमाने की याद दिला गए , हमारे बच्चे जानते भी नहीं की ये होते क्या है , जिम्मेदारी हमारी भी तो बनती ही है !
    अच्छी पोस्ट !

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  43. सूत, तकली, चरखा, बापू --- सब अप्रासंगिक!
    अब माई फुट बचा, कैटल क्लास का उपहास बचा। :(

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  44. हमारे मन में यह बैठा दिया गया है कि कुछ नई चीज़ें हो रहीं हैं और वो अच्छी भी हैं... इसलिए पुराणी चीज़ें और अच्छी चीज़ें बेकार और आउटडेटेड लगने लगी हैं.. नीम के गुणों को मार्गोसा बना दिया और अच्छा हो गया..
    कपूर और घी की मालिश हम आज भी करते हैं, बच्चे से लेकर बड़े तक.. गीला भात और बहुत से नुस्खे.. अरे इलाज छोडिये मनोज जी, घाघ और भड्डरी की कहावतें और उन्से की जाने वाली मौसम की भविष्यवाणी.. सब माई फुट हो गया है.. आज के तथाकथित वैज्ञानिक और अत्याधुनिक उपकरण यदि बता दें कि आज बारिश होगी तो छाता भूलने का अफ़सोस नहीं होता..
    बचपन की उस भयानक याद से गांधी के संवाद तक "फुर्सत में" का यह अंक बहुत विचारोत्तेजक रहा!!

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  45. aaj aapne charkhe ki charcha kar mujhe is lekh ke zariye mera bachpan aur meri dadi maa yaad dila di. jab vo charkha kata karti thi to ham unke kacche soot ko khol kar unke charo taraf lapet dete the...shararte to karni hi thi na.

    aur jo purane nuskhe bataye maine bahut dhyan se padhe aur inhe smaran rakhne ki koshish karungi taki kabhi bhavishy me kaam aa sake.

    is lekh ke zariye mahatam gandi ki neetiyon aur charkhe ki mahetta par jo aap ne likha uske baare me pahle itna gehan gyan nahi tha, apke lekh se pata chala. aabhari hun. aur ant me hamare desh ki urvyvastha....huh my foot me sab nihit ho gaya...sach ye do shabd 'huh, my foot' bahut kuchh ankaha bayaan kar jate hain.

    shukriya is aalekh ke liye.

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