बुधवार, 6 जुलाई 2011

देसिल बयना – 88 : हाथी आया, हाथी आया, हाथी किया फ़ूं....

देसिल बयना 88

हाथी आया, हाथी आया, हाथी किया फ़ूं....

करण समस्तीपुरी

उधर तीन-चार साल से कभी रौदी तो कभी बाढ़… गये किसनमा भैय्या इसी में। ई साल रबी तोड़ के उपजा था। चढ़ते फ़ागुन पुरबा बहते देखकर मंगरू झा भविषवाणी कर दिये थे, “मोछ पर डंडा, चौबिस घंटा…! अब क्या चिंता है…? गेंहुँ के घोघ गर्भिणि स्त्री की तरह फूला हुआ है। रबी महराज के किरपा से ई बार गजेसर धाम के महंथ-महराजी जरूर आयेंगे।”

सरैसा प्रगना में गजेसर धाम बड़ा प्रसिद्ध था। बाबा कहते थे कि पहिले तो गजेसर धाम के साधु-महंथ साले-साल आते थे। ई बड़ा-बड़ा दाढ़ी, जटाधारी दर्जन भर बाबाजी और चंदन-टीका लगा आधा दर्जन मयगर हाथी का फ़ौज। शायद हथिया-भगवान के नाम पर ही उ स्थान का नाम गजेसर धाम पड़ गया होगा।

उ साधु-संत और गजेसर बाबा का डेरा सवा महिना तक रेवाखंड में ही रहता था। अगल-बगल के गाँव से भी दक्षिना वसूली यहीं से होता था। मगर ई कलयुग के प्रताप से धरतियो माता के कोख सुखने लगा…! प्रकृति के साथ लोग सब ऐसन रौद्रलीला किया कि रौदी, सुखार, बाढ़-दाहर, सुनामी-दुर्नामी और न जाने का सब होने लगा…! ई में तो गोसाईं बाबा के कहनाम कि ’मानुष के मानुष धरि खैहें… ! साधु-संत को कौन पूछे। मगर रेवाखंड में धरम-करम का संस्कार फिर भी कुछ बांकी था।

हमरे आँख के सामने की बात है। बाबाजी भी घट गये थे हाथी छः से एक हो गया था उ भी दुबला-पतला… मगर गजेसर बाबा रेवाखंड में आते रहे थे। यही पछिला दो-चार साल से धरती मैय्या साफ़ सीना फ़ाड़ दी तो बाबाजी सब भी सटक गये।

बड़का कका के आंगन में ई साल दोहरी खुशी थी। हो भी काहे नहीं…? घर में अन-धन-लक्ष्मी खल-खल कर रही थी। बैसाख पहिल पक्ख में दौनी-निकौनी निपटा के कोठी-बखारी भड़ लिये और दोसर पक्ख में लटोरन भैय्या के ब्याह। कनिया भी खूब संस्कारी… सच्छात लछमी। जब लक्ष्मी आयी तो उल्लू भी आयेगा ही। कनिया के साथे उ का भाई भी आया था दँतनिपोरा। हम तो छबीली मामी के गीते में गीत मिला दिये थे, “आज सुदिन बड़ा सुंदर हे… लछमी घर आयेल…! लछमी के साथ-साथ उल्लुओ आयेल…!” हा… हा… हा… हा…..! परिछन करने आयी आय-माय के साथ दुल्हिन की भी हँसी फूट पड़ी थी।

दँतनिपोरा आया तो था चारे दिन खातिर मगर आज-बिहान करते-करते गर्मी-तांतिल (गृष्मावकाश) आ गया। फिर बड़का कक्का भी कह दिये थे, “ई बार गजेसर धाम के साधु-महंथ जरूर आयेंगे। निपोरू भी सत्संग सुनके ही जायेगा। मग्गह-दियर में कहाँ ई सबको संस्कारी सत्संगी मिलेंगे…! साधु तो साधु गजेसर धाम के तो हाथियो का संस्कार ई दियर-दाहर के आदमी के संस्कार से अच्छा होता है… ! निपोरू बबुआ भी ई बार देखिये लेगा…!”

हाथी का नाम सुनके निपोरुआ का भी साइड से दू गो दाँत निकल गया था। उ तो ससुर बहिन-ब्याह के मंडप पर वाला हाथी पर ही बैठ के हिलते रहता था… ! इहां फ़ारबिसगंज वाली मौसी के बेटा, टपकू उ को जमनी सरकस के हाथी करतब सुनाया था… फ़ुटबाल खेलता है… तार-फोन पर हेलो-हेलो करता है…. सूंड़ उठाके सलाम ठोकता है…..! तब उको लगा कि हाथी सच्चों चलता-फिरता है….! उ तो मने-मन हाथी का केतना करतब इमेजिन कर लिया था। मौसी जब तक रही थी दँतनिपोरा हरदम टपकूए के साथे रहता था और जब देखो तब हाथिये का किस्सा।

चढ़ते अखाढ़ (आषाढ़) महंथजी का संवदिया आ गया था। शनिचर हटिया से ही शंख बजा-बजा के घोषना कर रहा था, “अलख-खोल दे पलक… दिखा दे झलक बाबा गजेसरनाथ के…. ! गुरू साहिब का हुकुम है…. तन-मन, घर-बाहेरु पवित्तर करि लेयो…! अगिला बरस्पति को संत समाज के साथ गुरु महाराज का आसन लगेगा रेवाखंड में। सिरीगुरु-चरणानुरागी अति बड़भागी रेवाखंड-निवासी… पुरवासी, प्रवासी भक्तजनों को सवा महिना तक गजेसर बाबा की पूजा-भक्ती पुनीत कारज का अवसर लगेगा…..!”

ई पाँच दिन तो ऐसे गया जैसे रेवाखंड में भारी उत्सव की तैय्यारी हो। गाय के गोबर से लिपे-पुते घर-आंगन में जब सुरुज की किरणें छिटकती थी तो लगता था कि सोनपरी नाच रही है। पूरे गाँव-घर की साफ़-सफ़ाई हो गयी थी। किसी के बीट से बांस किसी के खेत से खर… किसी के घर से रस्सी…. देखते-देखते डिहबार-थान में मचान भी बंधा गया था। थान के सामने वाला पलौट से जंगल-झार हटाकर चाकर-चौरस कर दिया गया है। लोग-वाग इहें बैठकर बाबाजी का परवचन सुनेंगे। बाँया दिस झक्खन बाबू के गाछी में हाथी रहेगा। आह केतना मनोरम लग रहा था ई सब दिरिस।

सब लोग तैय्यारी में लगा हुआ था। किसके घर से कितने दिन माला उठेगा…? आन गाँव का क्या व्यवस्था है…? विदाई में महंथजी को क्या दिया जाय…. ? रोज सांझ में बड़का कक्का के घरारी पर ई विषय पर चौपाल बैठता था। सबका सब राग और उ दँतनिपोरा का बस एक्कहि गो हथिया-राग। गौंव्वा-बहरुआ को चिंता कि केतना मुर्ति साधु आयेंगे और दँतनिपोरा को चिंता कि कितना हाथी आयेगा। सार… ई दरवाजा से उ दलान तक गुलाटी मारे फिरता था। आज-कल सरबा जमनी सरकस में जी रहा था। पुरान कपड़ा-लत्ता को गोलिया के येह बड़का फ़ुटबाल बना लिया था, हाथी के साथे खेलने के लिये।

बृहस्पति को जलखई करके निकला सो पहर बीत गया। दोपहर में नयकी भौजी कलेउ के लिये खोजी…! हौ ससुर के जनमल…. उ तो फ़ुटबाल कांख में दबाए डिहबार बाबा का दुआरि अगोरे हुए है। केतनो चलने के लिये कहे लेकिन हिला नहीं। हाय नारायण…. ! हाथी देखिये के जायेंगे। भारी जिद्दी था छौड़ा।

सांझ ढले पच्छिम बगल से घंटी-झाल-मिरदंग की आवाज आने लगी तो मरद-मानुस और काकी-आजी सब थान तरफ़ बढ़े लगी। कनिया-पुतरिया, जुबती-वॄंद गजेसर बाबा के जुलूस के दर्शन के लिये खिड़की-झरोखा लग गयीं। लड़िका बच्चा सब ताली पीट-पीट के लगा गाने, “हाथी आया… हाथी आया…. हाथी आया…..!”

डिहबार थान में मंगरू झा गजेसर बाबा के लिये आरती सजाकर तैय्यार थे तो झप्पस महतो बड़का बाल्टी में पानी भरकर पग-प्रच्छालन के लिये। ऊंह… हाथी को आरती देखा के साधु बाबा को पैर धुलाके स्वागत किया गया। ई गहागही भीड़…! सब-लोग अपना-अपना मनोकामना लेकर आया था। और उके बीच में लटोरन भैया का दँतनिपोरा साला अपना कपड़िया फ़ुटबाल लेके रह-रह के फ़ुदक आता था। एकाध बार तो गेंद को लुढ़का भी दिया कि गजेसर बाबा के चरण-धुलि मिल जाय… मगर हाय री किस्मत!

घंटा बीते महंथजी विश्राम का संख बजा दिये। लोग अपने-अपने घर लौटे। अगले कल से तो मेला ही लग गया था डिहबार थान में। गाँव-जवार के श्रद्धालु गजेसर बाबा से अपना-अपना भविष जँचा रहे थे। किसी के घर में बेटा होगा कि नहीं…. किसी की बेटी की इ लगन में ब्याह होगा कि नहीं…. मोकदमा मे जीत होगा…. गिरवी खेत छूटेगा कि नहीं…. सब अपना मनोकामना लेके और परमामिंट दर्शक निपोरुआ अपना फ़ुटबाल लेके हाजिर। गजेसर बाबा सूंड़ उठाकर जिसके माथा पर फ़ू कर देते थे उ चहकते-फ़ुदकते, बाबा का जयकारा करते हुए महंथजी के चरण पड़ता था और जिसकी बारी में सूंड़ फ़ेर लिये उ बसिया जिलेबी जैसे मुंह लटकाकर साइड पकड़ लेता था।

दुपहर तक यही काज-करम चला। आखिर दँतनिपोरा का निपोरा का नंबर भी आ गया। बेचारा बड़ा जतन से कांख मे कपड़िया फ़ुटबाल दबाए श्रद्धा से आँख मूँदकर गजेसर बाबा के आगे खड़ा हो गया। पूरे दू मिनिट तक कर जोरे रहा तब जाकर गजेसर बाबा का सूंड़ उठा और निपोरुआ के माथा पर हुआ ’फ़ूं…..’। खुशी के मारे बेचारे की आँखे चमक गयी थी। फ़ुटबाल कांख से निकालकर हाथों में थाम लिया था। मगर फिर दोबारा गजेसर बाबा की दृष्टि पड़ी ही नहीं। उल्टे बाबा का हरकारा उसे साइड हटने का फ़रमान सुना दिया।

दँतनिपोरा तो चिढ़ गया था। अरमान तो उसके डेढ़ मास से मचल रहे थे मगर इधर पाँच दिन से तो बेचारे की आस भी जग गयी थी। कल सुबह से तो बेचारा रस्ते पर आँख बिछाये हुआ था कि अब हाथी आया… तब हाथी आया। उपर से हमलोग कनखी-थपड़ी मारके पूछे का हुआ…? उ बेचारा जल-भुनकर बोला, “हाँ देख लिये बाबा रेवाखंड का अहो संस्कार और गजेसरनाथ का पराक्रम। पाँच दिन से सुन रहे थे कि हाथी आयेगा… भविष बांचेगा… असीस देगा…. ! देख लिये…. ’हाथी आया, हाथी आया हाथी किया फ़ूं….!’

’हाथी आया, हाथी आया हाथी किया फ़ूं….!’ निपोरुआ ऐसे रेगा के बोला था कि उहां इकट्ठी बाल-मंडली गीत ही गाने लगी, "हाथी आया, हाथी आया हाथी किया फ़ूं….!” निपोरुआ झुंझलाते हुए घर आया तो बड़का कक्का पूछे, “निपोरू लाल ! देख लिये गजेसर बाबा का करतब ?” “हां-हां ! देख लिये…. ’हाथी आया, हाथी आया हाथी किया फ़ूं….!’ खूब करतब किहिन गजेसर बाबा….!” दँतनिपोरा फिर ऐसा टोन मारा कि बड़का कक्का भी मुस्किया दिये थे। फिर उको समझाके बोले,

“देखो निपोरू लाल! अरे साधु-संगत में कुछ ग्यान तो हुआ ना…. !’हाथी आया, हाथी आया, हाथी किया फ़ूं….!’ मगर तुम ऐसा काम मत करना। मतलब कि नाम बड़े पर दर्शन छोटे। समझे बेटा ! सिरिफ़ नाम बड़ा रहने से कुछ नहीं होता। काम बड़े हों तब प्रतिष्ठा मिलती है। नहीं तो वह सिर्फ़ हास्य और उपहास का पात्र बनकर ही रह जाता है। सामने लोग भले ना कहें पर पीछे तो फिर यही कहेंगे, ’हाथी आया, हाथी आया हाथी किया फ़ूं….!’

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब, जमाने बाद पढ़ी ऐसी कहानी, ऐसा बयान.

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह! कमाल का लिखा है.
    आनंद आ गया.

    हाथी आया, हाथी आया, हाथी किया फ़ूं....

    मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आनंद आ गया ||

    सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई ||

    उत्तर देंहटाएं
  4. Bad sundar likhne chhi, bad nik lagal. ekta tippani - Dilli m baisal - baisal gaon ghumi aabait chhi. Hansi k bare m t question nahi karu.

    उत्तर देंहटाएं
  5. करन हमरे गाँव में भी एक दियाद में काका थे.. उनका सार भी आया था और गाँव भर का सार होके गया था... हमलोग उसका नाम रखे थे निफिकरा.. बिल्कुल जीवन से निफिकर था... कहीं ले जाइए... कुछ भी करा लीजिये.. आपके बयना के पात्र सीधे जीवन से उठे हैं.. अच्छा लगता है इनको पढके... अब समय आ गया है कि आज के समय में जो परिस्थितियां गाँव में बन रही हैं... नई व्यवस्था जो जन्म ले रही है..... जो नई कुरीतियाँ पनपी हैं... जो नई अर्थव्यवस्था और बाज़ार घुसा है.. उस पर भी नज़र डालिए... बयना और अधिक प्रासंगिक हो जायेगा.....

    उत्तर देंहटाएं
  6. ओह लाजवाब...जबरदस्त फकरा व्याख्यान......

    उत्तर देंहटाएं
  7. आज तो पाहिले हमको बुझाया कि ई घाघ बाबा का मौसम समाचार चल रहा है... रब्बी, खरीफ, आखाढ बैसाख.. हमनी के बचवान सब के लिए तो ई सब लैटिन भाखा का सब्द हो गया है..
    मग्गह परदेस के बारे में बोलकर हमको भी लपेट लिए.. साला पुराण का तो ई हाल है कि गाँव भर का साला अऊर लड़िकन का मामू हो जाता था ऐसा लोग!!
    बहुत्ते मन खुस हो गया इहाँ चौपाल में बैठकर!!

    उत्तर देंहटाएं
  8. :):) ..रोचक देसिल बयना ... हाथी आया हाथी आया हाथी किया फूं....... बढ़िया ..

    उत्तर देंहटाएं
  9. करन समस्तपुरी जी!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा आज शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है!

    उत्तर देंहटाएं
  10. करन जी, यह देसिल बयना तो बड़ा दूर तक मार कर रहा है। लोकपाल बिल के साथ भी यही दिखायी पड़ रहा है। बहुत ही सजीव वर्णन पैनी दृष्टि के साथ। आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  11. करन जी,
    आज चाय में चीनी थोड़ी कम थी जिसे आपके देसिल बयना ने पूरा कर दिया !
    क्या गज़ब का लिखते हैं आप !भाषा-शिल्प का ज़वाब नहीं !पढ़ना शुरू करें तो छोड़ने का मन ही नहीं करता !
    आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  12. अच्छी लगी यह कहानी |
    मेरे ब्लॉग पर भी कभी आएं
    आशा

    उत्तर देंहटाएं

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।