शनिवार, 4 दिसंबर 2010

फ़ुरसत में …. एक समसामयिक पोस्ट .. ऐसे थे राजेंद्र बाबू

करण समस्तीपुरी

भारत की पहचान है भारतीयता को भूलना। वैसे तो हम भूल ही गए थे मगर आज फुर्सत में बैठे तो याद आया कि कल देशरत्न डॉ राजेन्द्र प्रसाद का जन्मदिवस था। अब राजेन्द्र बाबू ठहरे भारतीयता के प्रतीक। तो हमने भारत की पहचान कायम रक्खी और भारतीयता के प्रतीक को भूल गए। है न मुझ में आदर्श भारतीय का आदर्श गुण... ?

हम   भूल   गए उनकी   विरासत   को दोस्तों !

बड़ा बेगाना हुआ ग़ालिब अपने ही शहर में !!

सच में यार... ! अब कौन इतना याद रखता है... ? अरे राजेंद्र बाबू थे कभी बहुत प्रतिभाशाली। देश की स्वाधीनता के लिए लम्बा संघर्ष भी किया था। भारतीय गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति भी रहे थे। लगातार दो कार्य-काल तक। सदाचारी थे। महापुरुष थे। ये सब तो प्राथमिक कक्षाओं में राजेंद्र प्रसाद पर निबंध पढ़-लिख कर सबको पता चल ही जाता है। अब जमाना चाँद से भी आगे गया और हम प्राथमिक कक्षाओं में ही उलझे रहेंगे क्या.... ?

वैसे भी क्या है राजेंद्र बाबू का जन्मदिवस... ? न कोई राष्ट्रीय-राजकीय अवकाश... न कोई शान्ति-क्रांति-विजय-पराजय-बाल-वृद्ध दिवस.... ! न कोई भव्य समारोह... कुछ भी तो नहीं। बस राजेंद्र बाबू के जीवन की तरह एकदम सादा.... पटना के सदाकत आश्रम में छोटी सी प्रतीमा पर दो फूल चढ़ा लिए। जय हो... !

अब पता नहीं शायद भविष्य की पीढ़ी यह जान पायेगी कि यह वही राजेन्द्र प्रसाद हैं जिनकी प्रेसिडेंसी कॉलेज की उत्तरपुस्तिका में लिखा गया था, ”The examinee is better than the examiner.”

राजेंद्र बाबू की प्रतिभा के सम्बन्ध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। प्रेसिडेंसी कॉलेज की ही एक घटना है,

सन १९०२ ई. में राजेन्द्र प्रसाद ने कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। यह सरल स्वभाव और निष्कपट युवक बिहार की सीमा से पहली बार बाहर निकल कर कलकत्ता जैसे बड़े शहर में आया था। अपनी कक्षा में जाने पर वह छात्रों को ताकता रह गया। सबके सिर नंगे थे और वह सब पश्चिमी वेषभूषा की पतलून और कमीज़ पहने थे। उन्होंने सोचा ये सब एंग्लो-इंडियन हैं लेकिन जब हाज़िरी बोली गई तो उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि सबके नाम हिन्दुस्तानी थे।

राजेन्द्र प्रसाद का नाम हाज़िरी के समय नहीं पुकारा गया तो वह बहुत हिम्मत करके खड़े हुए और प्राध्यापक को बताया। प्राध्यापक उनके देहाती कपड़ों को घूरता ही रहा। वह सदा की तरह कुर्ता-पाजामा और टोपी पहने थे। 'ठहरो। मैंने अभी स्कूल के लड़कों की हाज़िरी नहीं ली,' प्राध्यापक ने तीखे स्वर में कहा। वह शायद उन्हें एक स्कूल का लड़का समझ रहा था। राजेन्द्र प्रसाद ने हठ किया कि वह प्रेसीडेंसी कालेज के छात्र हैं और अपना नाम भी बताया। अब कक्षा के सब छात्र उन्हें घूरने लगे क्योंकि यह नाम तो उन दिनों सबकी ज़ुबान पर था। उस वर्ष राजेन्द्र प्रसाद नाम का लड़का विश्वविद्यालय में प्रथम आया था। ग़लती को तुरन्त सुधारा गया और इस तरह राजेन्द्र प्रसाद का कॉलेज जीवन आरम्भ हुआ।

वर्ष के आख़िर में एक बार फिर ग़लती हुई। जब प्रिंसिपल ने एफ. ए. में उत्तीर्ण छात्रों के नाम लिए तो राजेन्द्र प्रसाद का नाम सूची में नहीं था। राजेन्द्र प्रसाद को अपने कानों पर विश्वास नहीं आया। क्योंकि इस परीक्षा के लिए उन्होंने बहुत ही परिश्रम किया था। आख़िर वह खड़े हुए और सम्भावित ग़लती की ओर संकेत किया।

प्रिंसिपल ने तुरन्त उत्तर दिया कि वह फ़ेल हो गए होंगे। उन्हें इस मामले में तर्क नहीं करना चाहिए। 'लेकिन, लेकिन सर', राजेन्द्र प्रसाद ने हकलाकर, घबराते हुए कहा। इस समय उनका ह्रदय धक-धक कर रहा था। 'पाँच रुपया जुर्माना' क्रोधित प्रिंसिपल ने कहा। राजेन्द्र प्रसाद ने साहस कर फिर बोलना चाहा। 'दस रुपया जुर्माना', लाल-पीला होते हुए प्रिंसिपल चिल्लाया।

राजेन्द्र प्रसाद बहुत घबरा गए। अगले कुछ क्षणों में जुर्माना बढ़कर 25 रुपये तक पहुँच गया। एकाएक हैड क्लर्क ने उन्हें पीछे से बैठ जाने का संकेत किया। एक ग़लती हो गई थी। पता चला कि वास्तव में राजेन्द्र प्रसाद कक्षा में प्रथम आए थे। उनके नम्बर उनकी प्रवेश परीक्षा से भी इस बार बहुत अधिक थे। प्रिंसिपल नया था। इसलिए उसने इस प्रतिभाशाली छात्र को नहीं पहचाना था।

राजेन्द्र प्रसाद की छात्रवृत्ति दो वर्ष के लिए बढ़ाकर 50 रुपया प्रति मास कर दी गई। उसके बाद स्नातक की परीक्षा में भी उन्हें विशिष्ट स्थान मिला। यद्यपि राजेन्द्र प्रसाद सदा विनम्र बने रहे मगर उन्होंने यह महत्वपूर्ण पाठ पढ़ लिया था कि अपने संकोच को दूर कर स्वयं में आत्मविश्वास पैदा करना ही होगा। अपने कॉलेज के दिनों में राजेन्द्र प्रसाद को सदा योग्य अध्यापकों का समर्थन मिला, जिन्होंने अपने छात्रों को आगे बढ़ने की प्रेरणा एवं उच्च आचार-विचार की शिक्षा दी।

लोगबा का कही लोगबा इहे में परेशान बा !'

मेरे बाबा राजेन्द्र बाबू का हवाला देकर यह कहावत कहा करते थे। और सच में देशरत्न की उक्ति आज भी कितनी चरितार्थ है! आज भी हम अपनी परेशानियों से इतने परेशान नहीं हैं जितनी इस बात से कि लोग क्या कहेंगे ? लेकिन राजेंद्र बाबू भी 'लोगबा का कही' सोच के परेशान होते तो क्या जीवन की हरेक परीक्षा मे सर्वोच्च स्थान प्राप्त करते हुए भारत के राष्ट्रपति भवन तक का सफ़र तय कर पाते? उन्होंने तो राष्ट्रपति भवन में भी इसकी परवाह नहीं की। इस सन्दर्भ में रांची के उस जमाने के सांसद राम बहादुर बाबू का एक संस्मरण याद आता है। राजेंद्र बाबू दुबारा भारत के राष्ट्रपति चुने गए थे। एक दिन रामबहादुर बाबू उनसे मिलने राष्ट्रपति भवन गए। उस समय राजेंद्र बाबू हाथ में सुई लिए खादी का बना वर्षो पुराना अपना जीर्ण-शीर्ण चादर खुद से सी रहे थे। रामबहादुर बाबू ने उनसे नए चादर लेने का आग्रह किया। उस पर राजेन्द्र बाबू का जवाब था, "रामबहादुर ! मेरे पास तो फटी हुई चादर भी है। इस देश में तो ऐसे भी लोग हैं जिन्हें तन ढकने के लिए चिथरा भी नसीब नहीं है। मैं उनका भी राष्ट्रपति हूँ। मुझे नयी चादर लेने का कोई हक नहीं है।" ऐसी बेमिसाल थी डॉ. प्रसाद की सादगी।

बाबू राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वज मूलरूप से अमोढ़ा (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। यह एक कायस्थ परिवार था। कुछ कायस्थ परिवार इस स्थान को छोड़ कर बलिया जा बसे थे। कुछ परिवारों को बलिया भी रास नहीं आया, वे वहां से बिहार के जिला सारन के एक गांव जीरादेई में आ बसे थे। इन परिवारों में कुछ शिक्षित लोग भी थे। इन्हीं परिवारों में राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वजों का भी परिवार भी था। जीरादेई के पास ही एक छोटी सी रियासत थी—हथुआ। चूंकि राजेन्द्र बाबू के दादा पढ़े-लिखे थे, अतः उन्हें हथुआ रियासत की दीवानी मिल गई पच्चीस तीस सालों तक वे उस रियासत के दीवान रहे।

उन दिनों बंगाल में सांस्कृतिक और सामाजिक जागृति हो रही थी। भारतीय इतिहास में यह संकट का समय था। सन १९०५ में हुए बंगाल के विभाजन ने जनता में राजनीतिक जागरूकता विकसित कर दिया था।

उन दिनों का वातावरण...नये जीवन और नई आंकाक्षाओं से भरा हुआ था। राजेन्द्र बाबू भी उनके प्रभाव से बच नहीं पा रहे थे। वह डॉन सोसाइटी के सदस्य बन गये जो छात्रों को अपनी भारतीय विरासत पर गर्व करना सिखाती थी। इसके बाद जल्दी ही राजेन्द्र प्रसाद सार्वजनिक और सामाजिक कार्यों की ओर आकर्षित हुए।

बंगाल का विभाजन लोगों में बढ़ती हुई राष्ट्रीयता की भावना को जानबूझकर दिया गया धक्का माना गया। इसने तिलक, लाला लाजपत राय और विपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं द्वारा आरंभ किये गए स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन (भारतीय चीज़ों का इस्तेमाल और ब्रिटिश चीज़ों का बहिष्कार) ने आग में घी का काम किया। राजेन्द्र प्रसाद भी इस आंदोलन की ओर आकर्षित हुए। अब पहली बार राजेन्द्र प्रसाद ने पुस्तकों की तरफ कम ध्यान देना शुरू किया। स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन ने राजेन्द्र प्रसाद के छात्रालय के छात्रों को बहुत प्रभावित किया। उन्होंने सब विदेशी कपड़ों को जलाने की क़सम खाई। एक दिन सबके बक्से खोल कर विदेशी कपड़े निकाले गये और उनकी होली जला दी गई। जब राजेन्द्र प्रसाद का बक्सा खोला गया तो एक भी कपड़ा विदेशी नहीं निकला। यह उनके देहाती पालन-पोषण के कारण नहीं था। बल्कि स्वतः ही उनका झुकाव देशी चीज़ों की ओर था।

इस तरह वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े। वक़ील के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत की। राजेन्द्र बाबू गांधी जी के समर्पण एवं साहस से बहुत प्रभावित हुए और 1921 में उन्होंने सीनेटर का पदत्याग कर दिया। गाँधीजी ने जब विदेशी संस्थाओं के बहिष्कार की अपील की थी तो उन्होंने अपने पुत्र, जो एक अत्यंत मेधावी छात्र थे, उन्हें कोलकाता विश्वविद्यालय से हटाकर बिहार विद्यापीठ में दाखिल करवाया था। स्वाधीनता आंदोलन के साथ-साथ कई सामजिक कार्यों को भी अंजाम देते रहे।

1934 में वे कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गये। नेताजी के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने पर कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार उन्होंने एक बार पुन: 1939 में संभाला था।

भारत की स्वाधीनता के बाद अन्तरिम सरकार में उन्हें खाद्यमंत्री की जिम्मेदारी दी गयी। फिर बारी आयी विश्व के विशालतम लोकतंत्र के लिए उदार संविधान की। विशाल देश के लिए विशाल संविधान। उस विशाल संविधान के लिए, सुगठित संविधान सभा.... अध्यक्ष कौन होगा... ? राजेंद्र बाबू से अधिक योग्य और कौन हो सकता था... ? संविधान सभा के अध्यक्ष। संविधान सभा के अंतर्गत अनेक कमिटियों के अध्यक्ष।

संविधान के लागू होने से एक दिन पहले 25 जनवरी 1950 को उनकी बहन का निधन हो गया, लेकिन वे भारतीय गणराज्य के स्थापना की रस्म के बाद ही अंतिम संस्कर में भाग लेने गये। संविधान लागू होने पर उन्होंने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार संभाला।

बारह वर्षों के लिए राष्ट्रपति भवन उनका घर था। उसकी राजसी भव्यता और शान सुरूचिपूर्ण सादगी में बदल गई थी। राष्ट्रपति का एक पुराना नौकर था, तुलसी। एक दिन सुबह कमरे की झाड़पोंछ करते हुए उससे राजेन्द्र प्रसाद जी के डेस्क से एक हाथी दांत का पेन नीचे जमीन पर गिर गया। पेन टूट गया और स्याही कालीन पर फैल गई। राजेन्द्र प्रसाद बहुत गुस्सा हुए। यह पेन किसी की भेंट थी और उन्हें बहुत ही पसन्द थी। तुलसी आगे भी कई बार लापरवाही कर चुका था। उन्होंने अपना गुस्सा दिखाने के लिये तुरन्त तुलसी को अपनी निजी सेवा से हटा दिया। सारा दिन काम करते हुए उनके दिल में एक कांटा सा चुभता रहा था। उन्हें लगता रहा कि उन्होंने तुलसी के साथ अन्याय किया है। राजेन्द्र प्रसाद ने तुलसी को अपने कमरे में बुलाया। तुलसी अपनी गलती पर डरता हुआ कमरे के भीतर आया। उसने देखा कि राष्ट्रपति सिर झुकाये और हाथ जोड़े उसके सामने खड़े हैं। उन्होंने धीमे स्वर में कहा, "तुलसी मुझे माफ कर दो।" तुलसी इतना चकित हुआ कि उससे कुछ बोला ही नहीं गया। राष्ट्रपति ने फिर नम्र स्वर में दोहराया, "तुलसी, तुम क्षमा नहीं करोगे क्या?" इस बार सेवक और स्वामी दोनों की आंखों में आंसू आ गये।

लोक कलाओं से बड़ा लगाव था देशरत्न को !

राजेंद्र बाबू को लोक-कलाओं से बड़ा लगाव था। विदेसिया नाच उन्हें बहुत पसंद था। कहा तो यहाँ तक जाता है कि पटना कोलेजिएट स्कूल में इनके लगातार अव्वल आने से परेशान एक अँगरेज़ अधिकारी ने राजेंद्र बाबू के प्रतिद्वंदी अपने बेटे को कक्षा में प्रथम लाने की गरज से एक बार परीक्षा की पूर्व-रात्री राजेंद्र बाबू के आवास के पास विदेसिया नाच का आयोजन करवा दिया था। लेकिन राजेंद्र बाबू ने रात भर नाच भी देखा और उस परीक्षा में भी प्रथम आये। हिंदी रेडियो के इतिहास में क्रांतिकारी नाटक 'लोहा सिंह' में 'खदेरन को मदर' की कालजयी भूमिका निभाने वाली शान्ति देवी को उन्होंने अपने हाथों से पुरस्कृत किया था और कहा था, "शांति तू दिल्ली आ...!" देशरत्न को भोजपुरी भाषा भी बहुत प्रिय थी और भोजपुरी बिहार-उत्तरप्रदेश-मध्य प्रदेश के लोगों से वे यथासंभव भोजपुरी में ही बात करते थे।

12 वर्षों तक राषट्रपति के रूप में कार्य करने के पश्चात उन्होंने 1962 में अपने अवकाश की घोषणा की। बाद के दिनों में उन्हें सरकार द्वारा दिया जानेवाला सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा गया।

सितंबर 1962 में अवकाश ग्रहण कर पटना आ गए। सदाकत आश्रम में बना देशरत्न का बसेरा। किन्तु छूट गया जीवनसंगिनी का संग। पत्नी राजवंशी देवी का निधन हो गया था। इसी आश्रम में देशरत्न ने २८ फ़रवरी १९६३ को अपने जीवन की अंतिम सांस लिया था।

राजेंद्र बाबू के बारे में बापू का कहना था, राजेन्द्र बाबू के पवित्र चरित्र को पढकर कौन कृतार्थ नहीं होगा। राजेन्द्र बाबू का त्याग हमारे देश के लिए गौरव की वस्तु है। नेतृत्व के लिए इन्हीं के समान आचरण चाहिए।

राजेन्द्र बाबू के प्रति पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, एक मामूली हैसियत से वह भारत के सबसे ऊंचे ओहदे पर पहुंचे, फिर भी उन्होंने अपना तर्ज़ नहीं बदला। हिंदुस्तानियत उनमें सोलहों आने थी। व्यक्तित्व की महानता के साथ-साथ उनकी सरलता और नम्रता बराबर बनी रही। उन्होंने ऐसी मिसाल क़ायम की, जिससे भारत की शान और इज़्ज़त बढी। वास्तव में वे भारतीयता के प्रतीक हो गए।

आज़ादी की लड़ाई में बापू के कंधे से कंधे मिला कर चलने वाले राजेंद्र बाबू को पद-लोलुपता कभी छू तक ना पायी। गांधी जी के आदर्शों को अपने कर्मों में आत्मसात किये राजेंद्र बाबू देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होने के बावजूद कभी भी व्यक्तिगत स्वार्थ या राजनैतिक महत्वाकांक्षा के शिकार नहीं हुए। असाधारण प्रतिभा के धनी डॉ. प्रसाद न केवल राष्ट्रपति बल्कि भारत के संविधान सभा के अध्यक्ष भी रहे। देश पर अपना सर्वस्व उत्सर्ग करने वाले इस महापुरुष को उनके जन्मदिवस पर याद करने के लिए भी व्यस्त राष्ट्र को फुरसत कहाँ ? तो बस शे'र मैं फिर दुहरा देता हूँ,

हम भूल गए उनकी विरासत को दोस्तों !

बड़ा बेगाना हुआ ग़ालिब अपने ही शहर में !!

30 टिप्‍पणियां:

  1. आदर्णीय राजेन्द्र बाबु पर अच्छी प्रस्तुति.उन्हें नमन.

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  2. भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद का स्मरण कर मन गर्वित हो उठा। वह आज भी हमारे प्रेरणा स्रोत हैं। तुलसी के साथ पेन वाली घटना भावुक ककर गई।
    आपका आभार।

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  3. डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद को शत शत नमन।

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  4. डॉ राजेन्द्र प्रसाद आज भी हमारे प्रेरणा स्रोत हैं।
    उनको शत शत नमन।

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  5. महात्‍मा गाँधी पर एक पुस्‍तक में लिखा था कि जब महात्‍मा राजेन्‍द्र बाबू से मिले थे तब राजेन्‍द्र बाबू की फीस एक केस के दस हजार रूपए थी। उन्‍होंने सब कुछ त्‍याग कर स्‍वाधीनता के लिए गांधीजी के साथ चल पड़े। ऐसे महान थे राजेन्‍द्र बाबू। लेकिन आज केवल एक परिवार ही महान बनकर रह गया है जिसने देश के लिए कोई कुर्बानी नहीं की। राजेन्‍द्र बाबू को नमन।

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  6. वैसे भी क्या है राजेंद्र बाबू का जन्मदिवस... ? न कोई राष्ट्रीय-राजकीय अवकाश... न कोई शान्ति-क्रांति-विजय-पराजय-बाल-वृद्ध दिवस.... ! न कोई भव्य समारोह... कुछ भी तो नहीं। बस राजेंद्र बाबू के जीवन की तरह एकदम सादा.... पटना के सदाकत आश्रम में छोटी सी प्रतीमा पर दो फूल चढ़ा लिए। जय हो...

    राजेन्द्र बाबू के जन्मदिन पर आपने बहुत अच्छी पोस्ट लगायी है ..वैसे बहुत कुछ तो उनके बारे में जानते थे लेकिन फिर से भारत के इस सपूत के बारे में पढ़ना अच्छा लगा ....

    राजेन्द्र बाबू को नमन

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  7. राजेंद्र बाबू के त्याग,उनकी विनम्रता और उनके सरल जीवन से हमें सीख लेनी चाहिए !
    राजेंद्र बाबू को शत शत नमन !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  8. बाबू राजेन्द्रप्रसाद की यह घटनायें स्कूली समय में मेरे लिये प्रेरणा दिया करती थीं।
    कुछ ऐसा ही हुआ था मेरे साथ जब मैने क्लास टीचर को कहा था कि वे रिजल्ट निकलने पर मेरा नाम प्रथम श्रेणी में नहीं, मैरिट लिस्ट में देखें। और एक बार मेहनत कर मैं सभी सवाल करने के बाद यह लिख पाया था कि कोई सात जांच लें।
    बिल्कुल वैसे ही जैसे बच्चा किसी महान बड़े की नकल करे!
    राजेद्र बाबू मेरे लाइटहाउस हैं। और जब भी मेरी ट्रेन जीरादेई (उनके जन्म स्थान) से गुजरती थी, रोमांच हो आता था!

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  9. हम भूल गए उनकी विरासत को दोस्तों !
    बड़ा बेगाना हुआ ग़ालिब अपने ही शहर में !!

    sangeeta swaroop ji ne mere man kee baat likh dee..main bhi yahi kahana chahti thi...
    Bharat ke is sapoot ko shat-shat naman..

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  10. व्यक्तित्व की महानता के साथ-साथ उनकी सरलता और नम्रता बराबर बनी रही। राजेन्द्र बाबू का त्याग हमारे देश के लिए गौरव की वस्तु है। नेतृत्व के लिए इन्हीं के समान आचरण चाहिए।
    कोटि-कोटि नमन।

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  11. sabhi paathkon ko hriday se dhanyawaad ! roman lipi me likhne ke liye maafee chaahata hoon.

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  12. 7/10

    आज जब आस्थाएं चरमरा रही हैं, पतन-मार्ग पर आगे निकलने की होड़ मची है,
    ऐसे में सादगी, सहजता, सरलता, सत्यता, विद्वता एवं कर्त्तव्यपरायणता आदि गुणों से परिपूर्ण माँ भारतीय के सच्चे सेवक डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी को स्मरण करना प्रेरणादायक है.
    बहुत ही दुखद है कि इस महापुरुष के लिए आज तक भारत सरकार ने किसी दिवस की घोषणा नहीं की।
    खैर ऐसे महापुरुष किसी सम्मान के मुहताज नहीं होते. ऐसे महापुरुष तो लोगों के दिल में विराजते हैं, सम्मान पाते हैं और जनमानस द्वारा जयकारे जाते हैं।
    इस महापुरुष को मैं शत-शत नमन करता हूँ।

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  13. राजेन्द्र बाबू जी के विषय में जानकार अच्छा लगा ...बहुत रोचक और ज्ञानवर्धक ...आभार

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  14. आपकी लेखन शैली बहुत प्राभावशाली है.राजेंदर बाबू की जीवनी कई बार पढ़ी है पर इस तरह नहीं.
    उनके जन्मदिवस पर सार्थक पोस्ट.
    आभार आपका.

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  15. स्वतंत्रता के बाद आदरणीय राजेन्द्र बाबू जैसे सुयोग्य, ईमानदार, राष्ट्रभक्त, विनम्र और चरित्रवान व्यक्तित्वों को किताबी आदर्श बना दिया गया और व्यावहारिक आदर्श दूसरे बन गए। परिणामस्वरूप पतन तो होना ही था।

    प्रेरणादायक प्रस्तुति के लिए आभार।

    राजेन्द्र बाबू को शत शत नमन।

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  16. हम हर साल गांधी जयंती भी मनाते हैं पर उनके सिधान्तों को मानने वाला आज बेवक़ूफ़ कहलायेगा ...
    देशरत्न डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी को नमन ! उनके आरे में इतनी अच्छी जानकारी प्रकाशित करने के लिए शुक्रिया !

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  17. डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद को शत शत नमन।

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  18. अव्श्यकता भी नहीं कि ये लोग याद करें इन जैसे महापुरुष को... इनके याद करने से तो लगेगा कि राजेन बाबू पर सिर्फ इनका हक़ है,जो उनके लिए शर्म करनेवाली बात होगी.. न याद करने सए कम से कम हर उस सच्चे भारतीय के मन में वो हैं, जिसे आज की दुर्दशा पर रोना आता है!!

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  19. नीचे अब भी वही लोग हैं-ज़मीन से जुड़े किसी अपने से मुलाक़ात भर से आह्लादित होने वाले। कैसे समझाएँ खुद को कि ऊपर की आबोहवा अब वैसी नहीं रही।

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  20. अच्छा लगा भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी के बारे में जानकर. उनकी हर एक बात विचारणीय लगी. उनको शत शत नमन।

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  21. Vidya aur vinay ki saumya murti Dr Rajendra Prasad ji ke sambandh mein achhi jankari mili.Presidency College mein hi nahi valki CALCUTTA HIGH COURT mein Chief Justice ke room ke samane tatha Calutta ke Surendra Nath College ke mukhya dwar par marble ke upar likha hai-Dr Rajendra Prasad one of the alumuni of this institution. Pathaar par khude is sentence ne mujhe usi College se Law Degree dila di.Is prakar ke post ka intajar rahega taki hum aapne prakashstambhon ke najdik rah sakein. Dhanyavad.

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  22. बहुत ही उम्दा पोस्ट.....डॉ.राजेन्द्र बाबु को हार्दिक नमन...

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  23. करन कल मनोज जी के विचार ब्लॉग से प्रिंट लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी से बड़े बेटे का परिचय करवाया.. वहां तक तो ठीक था .. छोटा बेटा जो कि केवल साधे तीन साल का है.. जिद्द करने लगा इस प्रिंट से कहानी सुनने को.. मैंने उसे जब बताया कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद देश के फर्स्ट प्रेसिडेंट थे.. वो जिद्द पर अड़ गया कि देश के फर्स्ट प्राइम मिनिस्टर थे चाचा नेहरु.... इस से आगे वह कुछ सुनने को तैयार नहीं हुआ.. इस बात से यह स्पस्ट होता है कि स्कूल, कालेग.. मीडिया.. अखबार.. और तमाम साधनों और संसाधनों का राजनैतिक उपयोग इस प्रकार किया जाता है कि गाँधी जी और नेहरु परिअर से विलग किसी राजनितिक व्यक्तित्व के बारे में देश की नई पीढी अवगत ना हो... यह एक गंभीर विषय है जिस पर विचार करने कि आवश्यकता है...क्या किसी प्रकार का दिवस मनाने के लिए किसी राजनीतिज्ञ की अकाल मृत्यु आवश्यक है... जैसा कि श्रीमती इंदिरागांधी या राजीव गाँधी जे के जन्म्दिवा और पुण्य तिथि को बना दिया गया है.... यदि अंतर्राष्ट्रीय दवाब ना हो तो गाँधी जी के साथ भी यह देश ऐसा ही करता... बहुत अच्छा आलेख है आपका.... ये सारी बातें बिहार में कक्षा तीन से पांच में ही बता/पढ़ा ड़ी जाती हैं.. दुःख है कि देश नहीं जानता इन्हें... एक व्यक्ति ने 'थे एक्सामिनी इस बेतर देन एक्सामिनर' के विषय पर अपने अल्पज्ञान के कारण कहा कि ऐसा बिहार में हुआ होगा... उन्हें नहीं पता कि यह बात प्रेसिडेंसी कालेज कोल्कता की है... बहुत शोध और प्रचार प्रसार कि आवश्यकता है राजेंद्र बाबु को पुनः मुख्य धारा की स्मृति में लाने के लिए.. नई पीढी से परिचय करने के लिए... आकाशवाणी पर उनिकी स्मृति में संभाषण के अतिरिक्त और कोई खबर नहीं दिखी है उनके १२५वे जन्म दिवस पर... डाक विभाग भी भूल गया वरना एक डाक टिकट जारी की जा सकती थी....

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  24. चलिये आपन्के माध्यम से राजेन्द्र बाबु को याद कर ही लिया .

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  25. डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद को शत शत नमन........

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  26. इतनी ज्ञानवर्धक और अच्छी पोस्ट को पाठकों तक पहुँचाने के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार ! आजकल के नेताओं के बारे में सोच कर ही मन क्षुब्ध हो जाता है ! कहाँ गये ऐसे लोग जिन्होंने देशहित को प्राथमिकता दी और स्वयम् को पीछे रखा ! आज के बच्चे, जिन्हें इनके जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए, शायद इनका नाम तक नहीं जानते ! इस आलेख को हर कक्षा की पाठ्य पुस्तक में अनिवार्य रूप से होना चाहिए ! राजेन्द्र प्रसाद जी को सविनय नमन !

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  27. सार्थक संग्रहनीय पोस्ट!
    राजेंद्र बाबू को नमन!

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