बुधवार, 29 दिसंबर 2010

लुच्‍चा के मौगत माघ महीना ..

लुच्‍चा के मौगत माघ महीना


करण समस्‍तीपुरी


प्‍यार तेरा...... दिल्‍ली की सर्दी । आ...हा...हा...... उ..... हु.... हु.... हु... हु.... । बाप रे..... ! दिल्‍ली में तो जानमारूक ठन्‍डी है। लगता है खून जम जायेगा। देखिए न... ससुर हाथो ऐसन ठिठुर गया है कि की बोर्ड खटखटाने में भी तरद्दुद है। हो बाबू..... ! अब देखिए न राते देसिल बयना भी नहीं लिख पाये। इहां जो हिसाब-किताब है उ को देख कर तो एक्कहि कहावत याद आती है – “लुच्‍चा के मौगत माघ महीना।”

अब का बतायें....... बंगलोर से दिल्‍ली आ तो गये मगर........ कहां उ सोलह से पच्‍चीस डिग्री और कहां इ दू से आठ डिग्री...... ! उपर से साफ्टवेयर के सोफ्ट बाबू सब.... एगो लैपटोपिया बैग में अधकट्टी पैन्‍ट और अंग्रेजी कुर्ती (टी शर्ट) कोंचे और जीन्‍स पर ब्‍लेजर तान के चल दिए। रे बाबू...... ! दिल्‍ली की सर्दी कहीं ई ब्‍लेजर से सुनता है...... ? एक्कहि दिन गुरगांव से दरियागंज आये-गये कि ऐसन वायवरेशन मोड लगा जो अभी तक हिलिये रहे हैं और नाक सुसरी अलगे गंगोतरी के तरह सुर-सुर बह रही है। उ का कहते हैं....... “लुच्‍चा का मौगत माघ महीना।” मगर हमरा तो ई पूसे में हो गया। खैर चलिये... सर्दी-गर्मी तो लगले रहता है.... अब देर सवेर आज आपको यही देसिल बयना बुझा देते हैं।

समरगंज वाली भौजी का छोटका भाई है न... लुचरूआ......... सार का नाम भी है लुचरू और काम भी लुच्‍चे वाला। लुच्‍चा कहते हैं हमरे ऐसन फोकटिया हीरो को। देह में दम नहीं बजार में धक्‍का। ससुर दिखाबे के चक्कर में जान गंवाये।

ऐसन लुच्‍चा था उ लुचरूआ भी। झार-फानुस, इतर-गुलाब और जुल्‍फी के बड़ी शौकीन। बरमहले (हमेशा) आते रहता था शीतलपुर। हमलोग उसे बड़ी चिढ़ाते थे। समझिए कि उसका नामे हो गया था लुच्‍चा।
उ दफे अपने गांव दिश भी ऐसने शीत-लहरी हुआ था। आदमी तो आदमी ..... ससुर पेड़-पौधा... गाय-गोरू सब के प्राण अवग्रह में। जमीन के अन्‍दर रहे वाला सांप उंप उहो कितना चित हो गया था।

वही माघ महीना में लुचरूआ आया था तिल-सन्‍क्रान्ति का चिउरा-दही और कदीमा लेके। ससुर समरगंज से साइकिले खरखराते हुए आया था। उका डरेस था....... देख के तो हमरो कलेजा पर सांप लोट गया था। टटे-टाइट बेल-बटन पर चमाचम हवाई शर्ट......... पैर में कोल्हापुरी चप्‍पल, कमर में चमरौंधा बेल्‍ट और माथा पर कटिनगर जुल्‍फी .... एकदम हीरो जैसा।


उ दिन तो खूबे हंसी-मजाक हुआ.... सब उ लुचबा को चिढ़ाये कि ससुर दरिद्दर....; स्‍वेटर-टोपी बेच के दालमोट खा गया..... !” और उ अकेले सब को हांके हुए..... “मारो भुच्‍चर सब... फैशन का हाल का जाने..... !”


खैर अगला दिन पिलान बना जोगी चौक मीना पिच्‍चर पलेस में सनिमा देखे का। हम भी बड़ी मचल कर महतारी से गुहार किये थे। मगर डांट ही मिला, “खबरदार......... ! ई शीत-लहरी में प्राण गंवाये का कौनो जरूरत नहीं है।” खादी-भण्‍डार वाला मोटका चद्दर का गांती कसते हुए महतारी बोली थी।

खैर जोखन भैय्या, लालटेन सिंघ, चम्‍पई लाल और लुचरू तैय्यार हो कर चले मैटनी शो के लिए। रे बलैय्या के.... बांकी सब तो स्‍वेटर-टोपी और दुशाला ओढ़ के तैय्यार है मगर ई लुचरूआ लुच्‍चा के तरह ही जायेगा का.....? जोखन भैय्या बोले भी कि “अरे स्‍वेटर पहिन लो.... ठंडी मार देगा आने में।”

“जवानी के खून में एतना गर्मी है कि ठन्‍डी की बाप भी कुछो नहीं बिगाड़ेगा !” लुचरूआ चबा-चबा कर बोला था।

समरंगज वाली भौजी फेंकन भाई वाला गलेबन्‍द ला के दी थी, “भैय्या.... कम से कम ई बांध लो.... माथा-कान तो ढका रहेगा....... !

फिर भी लुचरूआ इतरा के बोला था, “रहे दो बहिन। गलेबन्‍द शीतलपुर वाले को ही शोभता है। ई बान्‍धे से तो केश का इस्‍टायले चौपट हो जाएगा।” इतना कहे के साइकिल जोत दिया। उ.......हा..... हा..... हा..... हा..... हा..... गिरि्र्र्र्र्गर्गिर्र.............. गिरि्र्र्र्र्गर्गिर्र........... सांझ गिरते ही हार कंपकंपा देने वाली ठन्‍डी। रह-रह कर दांत किटकिटा जाते थे। सांझे से कुहासा घिरने लगा था। सब जने तो बोरसी (अंगीठी) सेबे हुए थे मगर समरगंज वाली भौजी भीतर-बाहर ... भीतर-बाहर कर रही थी, “ओह....... ! कैसी ठन्‍ड है.... लुचरू ने स्‍वेटर-टोपी भी नहीं लिया है ..... पता नहीं कब आयेगा.....?”

सात बज गया सबको अंदेसा होने लगा .. तभिए साइ‍किल की घंटी खनखनाई। चारो जने आ गये थे। फेकन भाई डपट के पूछे, “अरे! इत्ती देर काहे में लगी थी? कहीं तारी-दारू तो न पीये लगा था रास्ते में?”
जोखन भैय्या बोले, “इ सब अपने दुलरूआ साले से न पूछो।”

“ उ लुचबा है कहां......?”, फेंकन भाई पूछे थे ।
“हई का है.......?” लुचरू को बांह पकर कर आगे करते हुए जोखन भैय्या बोले थे।
“आहि तोरी के.... ई हीरो बाबू तो जोखन भैय्या के चद्दर का गांती बांधे हुए है...... !” हमलोग को अचरज हुआ था।

बाद में लालटेन सिंघ बताया, “सनीमा देख के निकले। बजार के भीड़-भार पार करते कोहरा घिर गया। ई लुचरू बबू चले थे, फुचुक्‍की पैन्‍ट और हवाई शार्ट में........ ठन्‍डी में देह भुलक (सिहर) गया... गिरे धराम से। नीचे अपने और उपर साइकिल। उहां से होश कर के बढ़े तो काली चौरी में फिर धराम भटक्का.... और चारो नाल चित। अब तो बाबू साहेब को उठने का भी होश ना रहा...... उ तो घुरचन साहु का ईख पेराई हो रहा था। हमलोग किसी तरह उठा-पुठा के लाये। घुरचन का बेटा चुल्‍लु भर करूआ तेल मला। आधा घंटा हाथ पैर सेंके। फिर जोखन के चद्दर का गांती बांध के साहेब को साइकिल पर पीछे बैठा के लाये हैं।”
फेंकन भाई बिगड़ कर बोले थे, “मारो साले को। ई शीत लहरी में स्‍वेटर-टोपी छोड़ के जाएगा लुचपनी करने तो दुर्दशा होगी ही न....।”

ओह तो ई कथा हुई थी....... सचे में बेचारा लुचरूआ का घुटना-केहुनी तो छिल ही गया था.... मुंह भी फूल के तुम्‍मा लग रहा था।

खैर तभी तो किसी तरह सेदा-मारी कर के सुलाये मगर अधरतिया से दोसरे तमाशा शुरू। लुचरू भगत को रद्द-दस्‍त जारी..... हाथ-पैर में ऐंठन।

जोखन भैय्य गये अधरतिये में जोगारी मिसिर वैदजी को बुला के लाये। वैदजी नबज टटोले। हथबत्ती जला कर जीभ देखे। चौंक कर कहे, “अरे बाप रे......... जीभ तो एकदम काली स्‍याह हो गई है। ई को तो भयंकर पाला मार दिया है। कहीं बाहर-उहर गया था का.....?”

फिर कथा का रिपीट टेलीकास्‍ट हुआ। जोगारी मिसिर कतरी सुपारी चबा कर बोले, बिस्‍टी पहने के शीत-लहरी से लड़े...... ! ऐसन लुच्‍चा का मौगत(दुर्दशा) माघे महीना में होता है....... फैशन के पाछे कपड़ा खोल के भागेंगे तो माघ की ठंडी तो पटका मारेगा ही..... !” कह के मिसिरजी पुरिया-पत्ती बनाने लगे।

उधर लुचरू बेचारा कराह रहा था और इधर हमलोगों को एगो नया फकरा मिल गया था, “लुच्चा के मौगत माघ महीना.... !” मतलब समय के विपरीत आचरण करने वाले आसान समय में तो निकल जाते हैं किन्‍तु कठिन समय में बुरे फंसते हैं।

9 टिप्‍पणियां:

  1. इस अंक का इन्तजार रहता है हर बार ...आज भी बढ़िया रहा ...शुक्रिया

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  2. आपका ई जो कमाण्ड है न हमरो मन में इर्सा पैदा कर दएता है.. कोनो दिन हमरा चरित्र में इर्सा का दोस पैदा हो गया त इसका जिम्मेदार आप ही होइयेगा..
    ई हो देसिल बयना में साँस लेवे का जगहे नहीं छोड़े हैं आप, बुझाता है एक्के साँस में पार...
    एगो सिकायत दर्ज कीजिये, चचा कहते हैं अऊर दिल्ली से भाग जाते हैं.. ई अच्छा बात नहीं है!!

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  3. @ सलिल जी,
    दिल्लिए में है। हम्हूं उसको बोले कि चच्चा का नजर तेज है, तुम्हारे पोस्ट में घूसकर पकर लेंगे ... मुदा ऊ त एकदम्मे ठंडाया हुआ है। लुचबा की तरह।

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  4. इस पोस्ट को पढ़कर तो हमें भी सरदी लगने लगी!

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  5. अरे करन भाई,
    हम बहुत ही धर्म संकट में घिरल बानी। भाई, जादा कुछ ना कहब लेकिन तहरा शैली के देख के मन में इहे भाव आवत बाकि शुरूआत में तू ब्लाँगजगत में विम्ब के रूप में अवतरित भईल और धीरे-धीरे प्रतीक बनल जात बाड़। अब हमार रब से गुजारिश रही की अगला साल-2011 तहरा जिंदगी में इतना खुशी दे कि तहरा कहे खातिर मजबूर हो जाए के पड़ी कि ऱब अब कुछ ना चाही। तोहारा से न जाने काहे एगो आत्मीय रिश्ता बरबस ही जुड़ गईल बा, हमरो पता नईखे। समय के कमी बा फिर मुलाकात होइ। एगो भोजपुरी गाना सुन ल भाई, दिल्ली का सियाचीन सें भी शरीर गरम रही।
    सैयां के साथ रजैया में ,
    बड़ा नीक लागे मड़ैया में।
    सादर।

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  6. :) :) बहुत बढ़िया ....कहावत के लिए कहानी भी जोर दार ...

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  7. दिल्ली की सर्दी में भींगी हुई जीवंत पोस्ट !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  8. O Karan Bhaiya,

    Hum jaise luchcha ko bhi kuchh sikhane ko mil gaya. Hum bhi is baat ka khyal rakhenge aur aapka desil bayana padhana nahi chhorenge.


    Delhi aaye bataye bhi nahi bahut bura laga, Ab aap se kabhi bhi ..........!

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