रविवार, 5 दिसंबर 2010

भारतीय काव्यशास्त्र - अभिधामूलक ध्वनि

भारतीय काव्यशास्त्र - अभिधामूलक ध्वनि

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में अविवक्षितवाच्य ध्वनि अर्थात् लक्षणामूलक ध्वनि के अवान्तर भेदों –अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य ध्वनि और अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य ध्वनि का विवेचन किया गया था। इस अंक से विवक्षित वाच्य ध्वनि अर्थात् अभिधामूलक ध्वनि के अवान्तर से निरूपित भेदोपभेदों कावर्णन किया जाएगा। अवान्तर से इसके निम्नलिखित दो भेद किए गए हैं:-

1- अलक्ष्यक्रमव्यंग्य या रसादिध्वनि

2- संलक्ष्यक्रम व्यंग्य

अलक्ष्यक्रम व्यंग्य में वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ के क्रम की प्रतीति नहीं होती। इसीलिए इसका नाम अलक्ष्यक्रम व्यंग्य रखा गया है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं समझना चाहिए कि इसमें वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ की प्रतीति के क्रम का अभाव होता है। बल्कि दोनों की प्रतीति के क्रम में इतनी शीघ्रता होती है या अवकाश इतना अल्प होता है कि क्रम दिखता नहीं है या उसका अनुभव नहीं होता। यह कैसे होता है, आगे देखेंगे।

इसका दूसरा नाम रसादिध्वनि है। इसके आठ अंग बताए गए हैं - रस, भाव, रसाभास,भावभास, भावोदय, भावसन्धि, भावशबलता और भावशान्ति। जब काव्य में प्रधान रूप से इन आठों की उपस्थिति होती है तो वहाँ रसादिरूप अलक्ष्यक्रम व्यंग्य ध्वनि होती है। इनमें सर्वप्रधान रस है।

विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के संयोग से मानव मन में अन्तर्निहित स्थायी भाव का सक्रिय होना रस कहलाता है। आचार्य भरत के अनुसार भी विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति बतायी गयी है - विभावानुभाव व्यभिचाभाव संयोगात् रसनिष्पत्ति:।

स्थायी भाव वे भाव हैं जो स्थायी रूप से हमारे अन्दर स्थित हैं। कुछ विद्वानों ने इनकी संख्या आठ - रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय जुगुप्सा और विस्मय मानते हैं, तो कुछ लोग नौ मानते हैं अर्थात् उक्त स्थायी भावों के अतिरिक्त नौवाँ निर्वेद मानते हैं। इसके अतिरिक्त स्नेह/वत्सलता को भी कुछ विद्वान स्थायी भाव के रूप में लेते हैं। इन स्थायी भावों के सक्रिय होने से क्रमश: शृंगार,हास्य, करुण, रौद्र, वीर भयानक, वीभत्स और अद्भुत रस की उत्पत्ति होती है या उनका आस्वादन होता है। निर्वेद स्थायी भाव का रस है - शान्त और स्नेह या वत्सलता का वात्सल्य रस है। वैसे भक्ति रस का स्थायीभाव ईश्वर या देव विषयक ‘रति’ मानी गई है लेकिन मुझे समर्पण अधिक उपयुक्त लगता है क्योंकि समर्पण के फलीभूत होने पर ही भक्ति रस का आस्वादन संभव है। उक्त विवरण को नीचे सारिणी-बद्ध किया जाता है।

स्थायी भाव रस

रति शृंगार

हास हास्य

शोक करुण

क्रोध रौद्र

उत्साह वीर

भय भयानक

जुगुप्सा वीभत्स

विस्मय अद्भुत

निर्वेद शान्त

स्नेह (वत्सलता) वात्सल्य

ईश्वर विषयक रति भक्ति

स्थायी भावों के सक्रिय होने के लिए विभाव, अनुभाव और संचारी भावों या व्यभिचारी भावों का संयोग आवश्यक है। इनका विस्तृत विवेचन अगले अंक में किया जाएगा।

14 टिप्‍पणियां:

  1. Bharatiya KAVYA SHASTRA ke sambandh mein achhi janakari mili. Mere liye adhyyan kal ke dauran jo kuchh bhi adura rah gaya tha uski bharpai ho rahi hai.Isse smbandhit agle post ka besabri se intajar rahega.Good Morning.

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  2. भारतीय काव्यशास्त्र को हम तक सरल रूप में पहुँचाने के लिए आपका शुक्रिया ....आज की पोस्ट बहुत कुछ सिखा गयी

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  3. adbhut ! aacharya ji, wasie to is shrinkhala ke sabhi post amoolya hain kintu yah kadee chhatron ke liye atyant sugam ban pada hai. main saubhagyashaalee hoon ki yah vishay snaatak ke chhathe patra me vishay pravesh hee isee vyakhyaan se hua tha. aur vyakhyata the Dr. Vageeshwar Sharma. Unkee kaksha me main kisi kaaranvash bhee nahi chhodta tha. halaanki is samay unhe mahaavidyalay se awakaash-praapt ho gaya tha, kintu kinhi kaaryalayee avashyakta se college aane par unhone hamaare anaurodh par ek class lee thee aur yah unka hamaare varg me antim vyaakhyaan tha. lekin yah itna saras aur saral tha ki aaj bhi mere maanaspatal par ankit hai.aaj aapkee kaksha men bhi aisa hee anubhav hua. dhanyawaad.

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  4. विद्यार्थियों के लिए उपयोगी पोस्ट!
    --
    हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है!

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. मैंने तो पहले ही कहा था कि यह स्तम्भ एक कक्षा का अनुभव प्रदान करता है...आचार्य जी आपकी इस कक्षा में आकर नित यह अनुभव होता है कि एक अतुल कोष हमारे लिए आपने सहेज रखा है!!

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  7. भारतीय काव्यशास्त्र को समझाने का चुनौतीपूर्ण कार्य कर आप एक महान कार्य कर रहे हैं। इससे रचनाकार और पाठक को बेहतर समझ में सहायता मिल सकेगी। सदा की तरह आज का भी अंक बहुत अच्छा लगा।

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  8. आपका यह कार्य हिन्दी साहित्य में अमूल्य योगदान है। आभार,

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  9. ग्यानवर्द्धक पोस्ट के लिये आभार।

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