सोमवार, 20 दिसंबर 2010

ग़ज़ल :: बातें उनकी रही अनकही

ग़ज़ल

बातें  उनकी रही  अनकही

015मनोज कुमार

मन की बात कही न   उनसे बस मन में ही छिपाए रहे.

द्वार कभी न आए वो मेरे,   हम पलकें ही   बिछाए रहे.

 

उनकी     आँखें   रहीं उनींदी,   देखता कैसे    ख़्वाब   कोई

सामने जब   आए  हम उनके,    हमसे नज़रें   बचाए रहे.

 

बंद हैं सारे   दर औ दरीचे,  बंद है यह   मन का आँगन,

झाँकें कैसे दिल में  वो पलकों की चिलमन    गिराए रहे.

 

उनके  नैनों  के  सागर  में    डूबने  की  इक  हसरत थी

दगा  दे  गई  किस्मत    वे नज़रों के द्वार    लगाए  रहे.

 

बातें  उनकी रही अनकही,   कैसे समझे भला ‘मनोज’,

कभी न की इज़हारे मोहब्बत हसरते दिल की दबाए रहे.

29 टिप्‍पणियां:

  1. झांके कैसे दिल में वो पलकों की चिलमन गिराए रहे ...
    शिकवे शिकायतों से सजी खूबसूरत ग़ज़ल !

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  2. मनोज जी,
    आपके गजल के आधार पर मैंने भी एक गीत लिखा है। इसे देखकर मन यही कहता है कि आपके गजल से मनोज को निकाल कर प्रेम लिख दे तो मेरा काम हो जाएगा। वाकई शीतकाल में ऐसे भाव आपके मन में कैसे आ गए।
    खैर,एक बात कहना चाहता हूं-इस क्षेत्र में हम कमजोर होते हैं और अंत में-
    मोहब्बत सब की महफिल में शमां बनकर नही जलती।
    लिखने के लिए मेरे पास कोई विशेषण नही है। बहुत सुंदर।

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  3. अपने एहसासों को खूबसूरत शब्द दिये हैं आपने,बधाई ।

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  4. बातें उनकी रही अनकही, कैसे समझे भला ‘मनोज’,
    कभी न की इज़हारे मोहब्बत हसरते दिल की दबाए रहे.

    वाह क्या भाव हैं ... प्यारी शिकायतों से सजी ग़ज़ल ...

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  5. उनके नैनों के सागर में डूबने की इक हसरत थी

    दगा दे गई किस्मत वे नज़रों के द्वार लगाए रहे.
    .... bahut khoob ... behatreen gajal !!!

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  6. मनोज जी ,

    बंद हैं सारे दर औ दरीचे, बंद है यह मन का आँगन,

    झाँकें कैसे दिल में वो पलकों की चिलमन गिराए रहे.

    बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ है !

    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  7. ग़ज़ल के रूप में अच्छी भावाव्यक्ति है

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  8. बातें उनकी रही अनकही, कैसे समझे भला ‘मनोज’,

    कभी न की इज़हारे मोहब्बत हसरते दिल की दबाए रहे.

    waah

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  9. उनकी आँखें रहीं उनींदी, देखता कैसे ख़्वाब कोई
    सामने जब आए हम उनके, हमसे नज़रें बचाए रहे.
    वाह वाह वाह ...क्या बात कह दी.

    बंद हैं सारे दर औ दरीचे, बंद है यह मन का आँगन,
    झाँकें कैसे दिल में वो पलकों की चिलमन गिराए रहे
    उफ़ ये तो नाइंसाफी है उनकी ...
    बहुत ही उम्दा गज़ल हुई है ...बहुत बढ़िया.

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  10. bahut hi khoobsurat...
    intzaar ka bhi apna hi maza hota hai...

    mere blog par bhi kabhi aaiye
    Lyrics Mantra

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  11. अनकही बातों को अच्छी तरह कहती है। साधुवाद।

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  12. अनकही बातों को गज़ल अच्छी तरह कहती है। साधुवाद।

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  13. आपके शब्दों ने आज तो हृदय पिघला दिया।

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  14. वाह साहब, ग़ज़ल तो जोरदार बना दी, लम्बे बहर की इतनी सधी हुई हिंदी ग़ज़ल तो किसी के ब्लॉग में पहली बार ही पढ़ी है, रूमानियत में भी क्या सादगी भरे ख़याल बाँधे है .... ;)
    लिखते रहिये ...

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  15. मनोज बाबू, ये तो पहले प्यार की अनुभूति की प्रकटन है. अब तो ऐसे ख्याल, ख्याल में भी नहीं आते!!
    बहुत सुन्दर गज़ल!!

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  16. सुन्दर व भाव पूर्ण गज़ल....बधाई

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  17. मनोज जी सुंदर रचना के लिये आप का धन्यवाद

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  18. मनोज जी,
    गज़ल का कौन सा शेर पकडूँ और कौन सा छोडूँ……………हर शेर पर आह निकलती है……………कितनी खूबसूरती से शिकायत की है कि वो शिकायत भी नही लगती बस मोहब्बत की ताबीर लगती है।

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  19. आपकी इस सुन्दर और सशक्त रचना की चर्चा
    आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    http://charchamanch.uchcharan.com/2010/12/375.html

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  20. जाड़े में गर्मी का अहसास कराती प्यारी-सी रूमानी ग़ज़ल सुन्दर है मनोज जी.इस शेर का अलग मज़ा है:-
    उनके नैनों के सागर में डूबने की इक हसरत थी
    दगा दे गई किस्मत वे नज़रों के द्वार लगाए रहे.

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  21. सुन्दरता से कोमल एहसास पिरोये है गज़ल...
    सादर!

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  22. उनकी आँखें रहीं उनींदी, देखता कैसे ख़्वाब कोई
    सामने जब आए हम उनके, हमसे नज़रें बचाए रहे.

    मनोज जी ... ये तो हसीनों की मासूम अदा है ...
    जो इनकी अदा न हो तो इत्नेर लाजवाब शेर कहाँ से निकलें ...

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  23. महिला ब्लॉगर तो खूब भड़ास निकालती हैं। पुरुष बेचारा मन की मन ही में रखता है।

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  24. बंद हैं सारे दर औ दरीचे, बंद है यह मन का आँगन,

    झाँकें कैसे दिल में वो पलकों की चिलमन गिराए रहे । अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

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  25. रूमानी भावनाओं से सजी संवरी बेहतरीन ग़ज़ल
    ...शुभकामनाएं।

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  26. वाह ..क्या बात है ....किस ज़माने के भाव ला कर गज़ल कही है ?

    बहुत खूब ..

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