शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

शिवस्वरोदय-22

शिवस्वरोदय-22

आचार्य परशुराम राय

इस अंक में मनोकामना की सिद्धि के संदर्भ में दिए गए श्लोकों पर चर्चा की जा रही है।

यत्रांगे वहते वायुस्तदंगस्यकरस्तलाम्

सुप्तोत्थितो मुखं स्पृष्ट्वा लभते वांछितं फलम् ॥ (89)

अन्वय - सुप्तोत्थित: अंगे वायु: वहते तदगस्य कर: तलाम्

मुखं स्पृष्ट्वा वांछितं फलं लभते।

भावार्थ - प्रात: काल उठकर यह जाँच करनी चाहिए कि स्वर किस नासिका से प्रवाहित हो रहा है। इसके बाद जिस नासिका से स्वर चल रहा हो उस हाथ के करतल (हथेली) को देखना चाहिए और उसी से चेहरे का वही भाग स्पर्श करना चाहिए। अर्थात् यदि बायीं नासिका से साँस चल रही हो तो बाँए हाथ की हथेली ऊपर से नीचे तक देखनी चाहिए और उससे चेहरे का बायाँ हिस्सा स्पर्श करना चाहिए। यदि दाहिना स्वर चल रहा हो तो दाहिने हाथ से स्पर्श करना चाहिए। ऐसा करने से वांछित फल मिलता है। वैसे स्वर-विज्ञानियों ने यह भी सलाह दी है कि विस्तर से उतरते समय (प्रात:काल) उसी ओर का पैर जमीन पर सबसे पहले रखना चाहिए जिस नाक से साँस चल रही हो।

English Translation:- A person who needs desired results out of his performance or in his work, he should check his breath first on the bed in morning at the time of arising. If he finds the breath flowing through left nostril, he should look at left palm and should touch left side of his face with the same palm. In case right nostril is flowing, he should do the same with right hand and right side of the face. The wise, who are well versed in Swara-Science suggests that the same foot should be kept on the ground while leaving bed in the morning.

परदत्ते तथा ग्राहये गृहन्निर्गमनेऽपि च।

यदंगे वहते नाड़ी ग्राहयं तेन करांघ्रिणा॥ (90)

अन्वय - यह श्लोक अन्विति क्रम में है, अतएव अन्वय की आवश्यकता नहीं है।

भावार्थ - दान देते समय अथवा कुछ भी देते समय या लेते समय उसी हाथ का प्रयोग करना चाहिए जिस नासिका से स्वर प्रवाहित हो रहा हो। इसी प्रकार यात्रा शुरू करते उसी ओर के पैर को घर से पहले निकालना चाहिए जिस नासिका से स्वर प्रवाहित हो रहा हो। ।

English Translation:- While giving or taking any thing we should use the same hand through which nostril the breath is flowing. In the same manner while undertaking any journey, we should get out of our residence taking step with the same leg.

न हानि: कलहो नैव कंटकैर्नापि भिद्यते।

निवर्तते सुखी चैव सर्वोपद्रव वर्जित:॥ (91)

अन्वय - यह श्लोक की लगभग अन्वित क्रम में है। इसलिए अन्वय नहीं दिया जा रहा है।

भावार्थ - उपर्युक्त श्लोक में बताए गए तरीके को जो अपनाते हैं, उन्हें न कभी नुकसान होता है और न ही अवांछित व्यक्तियों से कष्ट होता है। बल्कि इससे उन्हें सुख और शान्ति मिलती है।

English Translation:- Those who follow the instructions mentioned in the previous verse, they are neither in loss ever nor get troubled by unwanted people. In other words, they get pleasure and peace.

गुरु- बंधु- नृपामात्येष्वन्येषु शुभदायिनी।

पूर्णांगे खलु कर्त्तव्या कार्यसिद्धिर्मन:स्थिता॥ (92)

अन्वय - यह श्लोक भी अन्तिम क्रम में है।

भावार्थ - जब अपने गुरु, राजा, मित्र या मंत्री का सम्मान करना हो तो उन्हें अपने सक्रिय स्वर की ही ओर रखना चाहिए।

English Translation:- When we desire to honour our Master (Guru), King, Friend or minister, we should see that they are on the same side through which nostril the breath is flowing.

अरिचौराधर्मधर्मा अन्येषां वादिनिग्रह:।

कर्त्तव्या: खलु रिक्तायां जयलाभसुखार्थिभि:॥ (93)

अन्वय - जयलाभसुखार्थिभि: अरि-चौराधर्मधर्मा अन्वेषां वादिनिग्रह:

रिक्तायां खलु कर्तव्या:।

भावार्थ - जय, लाभ और सुख चाहने वाले को अपने शत्रु, चोर, साहूकार, अभियोग लगाने वाले को रोकने हेतु उन्हें अपने निष्क्रिय स्वर की ओर, अर्थात जिस नासिका से स्वर प्रवाहित न हो उस ओर रखना चाहिए।

English Translation:- Those who are desirous of victory, gain and pleasure, they should see that their enemies, thieves, moneylenders or accusers are on the side through which nostril breath is not flowing.

दूरदेशे विधातव्यं गमनं तु हिमद्युतौ।

अभ्यर्णदेशे दीप्ते तु कारणाविति केचन॥ (94)

अन्वय - दूरदेशे गमनं हिमद्युतौ केचन अभ्यर्णदेशे दीप्ते कारणौ इति विधातव्यम्।

भावार्थ - लम्बी यात्रा का प्रारम्भ बाएँ स्वर के प्रवाह काल में करना चाहिए और कम दूरी की यात्रा दाहिने स्वर के प्रवाह काल में करनी चाहिए।

English Translation:- In case of undertaking long journey we should select the time when left nostril breath is flowing and for short journey right nostril.

यत्किंचित्पूर्वमुद्दिष्टं लाभादि समरागम:।

तत्सर्वं पूर्णनाडीषु जायते निर्विकल्पकं। (95)

अन्वय - अन्वय की आवश्यकता नहीं है।

भावार्थ - उपर्युक्त फल मनुष्य को तभी मिलते हैं, जब वह ऊपर बताए गए तरीकों को अपनाता है। ऐसा करने पर निश्चित सफलता मिलती है।

English Translation:- The desired results as stated in the previous six verses are achieved or obtained only when the instructions said therein are followed.

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17 टिप्‍पणियां:

  1. ज्ञानपरक पोस्ट। काश! हम सब इसका पालन कर सकते।

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  2. शिवस्वरोदय का यह अंक भी पहले की भांति अत्यंत ज्ञानवर्धक और उपयोगी लगा !
    साभार,
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  3. सदा की तरह यह अंक भी ज्ञानवर्धक और प्रेरक है।

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  4. यदि आप अच्छे चिट्ठों की नवीनतम प्रविष्टियों की सूचना पाना चाहते हैं तो हिंदीब्लॉगजगत पर क्लिक करें. वहां हिंदी के लगभग 200 अच्छे ब्लौग देखने को मिलेंगे. यह अपनी तरह का एकमात्र ऐग्रीगेटर है.

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  5. देखता हूं अमल में लाकर। शायद लाभ हो।

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  6. ज्ञानवर्धक और जीवनोपयोगी प्रस्तुति के लिए धन्यवाद।

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  7. बहुत ही उपयोगी श्रृंखला है। आभार

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  8. शिवस्वरोदय का थोड़ा बहुत उपयोग शुरू किया है।
    जानकारी है बहुत उपयोगी।

    आभार,

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  9. शिवस्वरोदय पर अपनी प्रतिक्रियाओं के माध्यम से उत्साह बढ़ाने के लिए आप सबको आभार।

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  10. ज्ञान वर्धन होता है इस श्रंखला को पढकर!!

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  11. बहुत अच्छा लगता है यह सब पढ़कर. थोड़ा थोड़ा समझ में भी आता है। आपको बहुत बहुत धन्यवाद।

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  12. यह विद्या विलुप्त सी हो चली थी। आपके प्रयासों से इसका थोड़ा प्रसार हो रहा है। यही अच्छा लग रहा है।

    आभार,

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  13. इस बेहतरीन काम के लिए हिंदी जगत आपका आभारी होगा ! शुभकामनायें !!

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  14. बहुत ही ज्ञानवर्धक जानकारी, लेकिन हमे तो अपना ही ध्यान नही रहता, ओर इसे केसे करे, कुछ समय बाद रिटायर हो जायेगे तो फ़िर समय ही समय होगा, धन्यवाद

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  15. बहुत उपयोगी, ग्यानवर्द्धक जानकारी है। इस प्रयास की जितनी भी तारीफ की जाये कम पडेगी हमारे शास्त्रों मे ग्यान का ंदार भरा पडा है मगर आसानी से उपल्ब्ध न होने और सरकारों बुद्धिजीविओं की उदासीनता के चलते आम लोग उसका लाभ नही उठा पाते। कुछ स्वार्थी तत्व इन्हीं सूत्रों के दुआरा लोगों को गुम राह कर के धन कमा रहे हैं। आज के संत भी अपना नाम चमकाने के लिये सही ग्यान के नाम पर अपना ही नाम रटवाये जा रहे हैं आज बहुत जरूरत है आने वाली पीढी को अपनी पुरातन विरासत और इन ग्रंथों से वेद पुराणौं से परिचय करवाने की। निश्चित ही ये ग्यान गुणकारी और उपयोगी है। धन्यवा। आपकी कर्मनिषठा को सलाम्।

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