बुधवार, 8 दिसंबर 2010

देसिल बयना - 59 : बहू-बहू रट मरो...

-- करण समस्तीपुरी

बड़ी लटारम है दुनिया में ए बाबू ! कंकड़ चुन-चुन महल बनाया... लोग कहे घर मेरा है। ए बाबू ! एक दिन जाना होगा सबको मालिक के दुअरिया... ओढ़ के चदरिया.... ! फिर भी, हाय रे मायाजाल ! जीव गयो लपटाय। वृथा जनम गंवाय।

वही महोखिया ताई.... एक दिन राजा हरिश्चंद्र जी कंचन भरे खजाना.... ! आहा.... ! साच्छात इन्द्रानी के तरह सजी-धजी रहती थी। आज उकी लाश देखने लायक भी नहीं है। गठरी में बंधा हुआ...... ! राम हो !
मधकोठी के ठीक चौबटिया सटा के टोला का अकेला पकिया घर। भगवान दया से खता-पीता परिवार। सोलह बीघा जोत, आधा दर्जन माल-जाल, नौकर-चाकर, हलवाह, बेगार का पलटन। मगर फिर भी घर सूना-सूना। आहा भगवान सब कुछ दीये मगर महोखिया ताई के गोदी में बारह बरिस तक हरियरी नहिये आया। बेचारी सिहंता आजी पोता-पोती का सपने लिए सरंग सिधार गयी।
भकोलिया माई कह रही थी कौनो ऐसा देवता-पित्तर नहीं बचे जिनको कबूला मन्नत नहीं किया हो। कौनो ऐसा पीर-पैगम्बर नहीं रहे जिनका पैर नहीं पूजा हो। हर तीरथ में माथा टेक आये। हर व्रत साधा मगर करम गति टारत नाही टरे..... रे भाई!
झानकुआ की अम्मा कहती थी कि हर साल बेचारी महोखिया ताई चैती और कातिक छठ में पानी में खड़ी होती थी। टहल बजाने वाला का फौज मगर पर्व का हरेक काम खुदे करती थी। गेहूं पिसते हुए महिला सब गीत का टंकार छोड़ती थी, "बांझी कहे सूत दिहा हो दीनानाथ......!" महोखिया ताई का आँख लोरा जाता था।
छट्ठी मैय्या के महिमा अपरम्पार। गवना के चौदह बारिस गए ई धरमुआ जनमा। उल्लास..... हे बूझिये कि पूरा टोल अयोध्या नगरी हो गया था। छट्ठी में घूरन काका बारहों वरन का भोज किये थे। मास धर बधैय्या चलता रहा.... !
धरमू पत्थर पर दूभी जैसे उगा था। जनम से पहिलही कितना मन्नत-कबूला हो गया था। आगे छींक पर भी हनुमान जी को परसाद चढ़ता रहा। मंदिरे-मंदिरे, घाटे-घाटे लट कटाते-मुंडन करवाते सात साल बीत गया। नवम चढ़ते जनेऊ का धागा दे कर ताई और काका उको घोड़ी पर बैठाने का सपना देखने लगे।
पूरा गाँव में परसिद्ध हो गयी थी महोखिया ताई। चुरीहारा आये, मनिहारा आया, कपरिया आये, सोनार आये जौहरी आये, जौन फेरी वाला आये..... ताई के द्वार पर एक बैठकी जरूर लगता था। ताई हँसते-बोलते मोटगर सौदा करती थी और फिर संगी-बहिनपा को इतरा के बोलती थी, "अब हमैंह कौनो शौक बांकी नहीं रहा। ई सब तो अपनी बहू के लिए ले रहे हैं।"
बहू आयेगी तो ये करेगी। बहू आयी तो ऐसे करेंगे। बहू आयेगी तो ऐसे चलेगी। बहू आयेगी तो इहाँ रहेगी। बहू के लिए, ये लिया है। बहू के लिए वो लिया है... बहू के लिए .... मतलब आठो पहर सीता राम के बदले बहू-बहू।
बलिहारी ताई का.... एकीसम चढ़ते धरमुआ को घोड़ियो पर चढ़ा दीये। जमीदारी घर से जब्बर पतोहू उठा लाई थी। कुछ दिन तो कनिया-पुतरिया में बीता मगर जल्दिये धरमू की लुगाई अपना रूप दिखाने लगी। महोखिया ताई कुलीन घर के थी। मगर कितना दिन बात पेट में दबा के रहे... ? दुल्हिन के करदानी जब कहर ढाने लगा तो सांझ-भिनसार घर में अट्ठा-बज्जर। धरमुआ तो गोबरधने हो गया था। बीवी को कुछ कहे का हिम्मत नहीं था और माई की कोई गलती ही नहीं थी.... बेचारा कहे तो किसको.... ? ताई को बहू का जितना शौक था सब पूरा होने लगा.... !
हलवाह को हटाया। जोड़ी बैल बेच दिया... ! नौकर के छुट्टी... खेती-पथारी सब जय-जय सियाराम। कनिया करम के चोर और मुँह के ऐसा जोर कि ताई को कौन कहे काका के मुँह में भी ठायं-ठायं झोंक देती थी। नया जमाना के बहुरिया.... सब कुंजी पर काबू कर के बूढा-बूढी को ठन-ठन गोपाल... ! महोखिया ताई इतना पर भी मुँह नहीं खोलती थी मगर काका को खाने-पीने में भी तकलीफ होता था तो बेचारे फूट पड़ते थे। फिर देखो आँगन में वनदेवी के नाच। काका के सात पुरखा के उद्धार और ताई के तन-बदन का तेरहो गति निश्चिते था।
पता नहीं उ दिन का हुआ था। एक दिन पहिले तो काका से मुंहतोड़ी पूरा टोला सुना था मगर ताई तो चुप्पे रही थी। हालाँकि लोग तो बूझिये गए थे कि अभी से तो ताई के अंग-प्रत्यंग का आरती होगा। मगर परिणाम ऐसा होगा कौन सोचा था... राम कहो। तीने बरिस में अरोसी-परोसी सब आजिज हो गए थे। बेचारे काका-ताई पर का गुजरती होगी सो रामे जाने।
लगता है... उ राते पानी सचे में नाक से ऊपर गुजर गया होगा। नहीं तो ताई ऐसा कदम नहीं उठाती। बज्जर गिरे उ औरत के कलेजा पर.... इतनो पर भी कनिको कसक नहीं। भोरे कक्का कुहरते हुए आये, "बौआ... जल्दी चलो.... दौड़ो... तोहरी ताई रेलवे तरफ चली गयी है.... ! ई हराशंख औरतिया... तोहरी ताई का परान ले कर ही दम लेगी.... ! धरमुआ गया है पाछे मगर पता नहीं उका सुनेगी कि नहीं.... ! हमरे बुढ़ापा में नहीं दौड़ा जा रहा है बेटा.... ! जल्दी दौड़ो ... बचाय लो ताई को.... !" काका की घिग्घी बांध गयी थी।
हम झटपट बटेसर को उठाए और दौड़े पुरुब दिश। पाछे से चौबनिया, पकौरी लाल और झमेली भी दौड़े आए। मगर विधि के विधान कौन बांटे... ! ई घिन के जिनगी से बेचारी ताई उब गयी थी। धरमुआ लग्गा भर से माई-माई करते रहा और ताई.........! आह....... एक बेर पीछे मुड़ कर देखी और आँख पोछ के पचबजिया पसिंजर के आगे कूद गयी....... !" जाओ रे देव.... ! हमलोग पहुँच भी नहीं पाए।
ओह.... ! गए थे ताई को लौटाने... लाये खाट पे गठरी। आधे रास्ता में काका मिल गए। कन्धा पर खटिया देखिये के उ वहीं गश्त खा के गिर गए। किसी तरह होश में लाकर दुन्नु परानी को लेकर दरबाजा पर आये। मगर धन उ छुलाछन के जी, आँख के कोर भी नहीं भींगा। देहरिये से लौट गयी।
इधर गाँव-जवार में जो ही सुना.... सब दौड़ा। पूरा चौबटिया लोगों से गहा-गही। धरमुआ इधर-उधर कर रहा था। बेचारे काका गठरी के बगल में अगरबत्ती जला-जला कर माथा पीट लेते थे और गिर जाते थे। गाँव-घर के लोग... सब जान समझ गया था। फिर भी जले पर नमक। सब दरेग दिखा कर पूछे, "अरे राम हो... ई सब कैसे हो गया.... घूरन बाबू ?"
काका बेचारे सवाल सुन-सुन के पत्थर हो गए थे। झुनकी मौसी ताई की ख़ास सखी थी। उ जो आयी तो काका को झकझोर कर लगी चिग्घार मारने.... "ई सब कैसे हुआ बाबू.... !" काका के आँख से अविरल आंसू बहे जा रहे थे। अचानक पत्थर के जुबाँ में हरकत आयी। एक ही वाक्य बोले, "बहू-बहू रट मरो ! बहू हुई तो कट मरो !!" इतना कह कर काका अपना सर पटक दीये गठरी के बंधे हुए मुँह पर।
सब की जुबाँ जैसे गले में धंस गयी थी। कलेजे के नीचे एक दर्द जैसा महसूस होने लगा था। सब सकदम। चुपचाप बांकी संस्कार का निर्वाह किया गया। मगर काका का एकमात्र वाक्य हमरे दिमाग में सनीमा के रील के तरह चल रहा था, "बहू-बहू रट मरो ! बहू हुई तो कट मरो !!" जिस संवेदना के साथ काका ने ये बात कही थी कि उका अरथ भी ढूँढने में जतन नहीं करना पड़ा। मतलब कि "जिसकी उत्कट अभिलाषा रहे वही विपरीत निकल जाए तो समझिये मौत के बराबर ही है।" दूसरे शब्दों में कहें तो 'अरमानों का टूटना साँसों के टूटने जैसा ही है।" बेचारी महोखिया ताई.... बहू के लिए कितने सपने संजोये थी... मगर ऐसन सुलक्षण बहू कि......... ! भले कहे काका, "बहू-बहू रट मरो ! बहू हुई तो कट मरो !!"

37 टिप्‍पणियां:

  1. आशा के विपरात कोई भा काम होने पर मन को शुकुन नहा मिलता है। मन के अनुसार सब काम होने लगे तब दुख कौन बात का रहता- करन भाई।
    तोहार देशिल बयना के बारे में बहुत लोगन के मन में अईसन लिखे खातिर भाव उठेला लेकिन मन पछता के रह जाला। राम राम भाई-फिर देखा होइ। जाड़ा पाला के दिन बा कान तोप के रहियेगा।

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  2. इतनी अच्छी जानकारी देने के लिए, धन्यवाद

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  3. करण जी, आज के देसिल बयना की संवेदना अंदर तक धंस गई है। एक सरस रोचक प्रवाह के साथ चलती कहानी तीर की तरह सीधे दिल में धंस गई और आंसुओं का अविरल प्रवाह थमने का नाम नहीं ले रहा।
    आज सच में, दिल से, आपकी लेखनी को सलाम। आज तो मैं भी कहूंगा कि आप सच मे ‘रेणु’ जी की विरासत को सम्भाले हुए हैं। भगवान आपको और आपकी कलम को इसी तरह से प्रेरणा देते रहे। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    हिन्दी साहित्य की विधाएं - संस्मरण और यात्रा-वृत्तांत

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  4. आज सोचे कि जल्दी जल्दी पढा लेते हैं,नहीं त फिर मौके नहीं मिलता है, त आप मने खराब कर दिए करन बाबू!! का कहें! देसिल बयना त शिए है, मगर जे कथा आप बयान किए ऊ हम समझ सकते हैं.. ई बेदना का पहिला भाग से त हम खुदे गुजरे हैं, बाकी पछिला भाग भगवान सात घर दुस्मनो को नहिं देखाए!!

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  5. बहुत स्वाभाविक सी कहानी में रचा गया कथानक कहावत के अर्थ को संप्रेषित करने में पूर्णतया सक्षम है। यह करण जी की लेखनी की बहुआयामी सामर्थ्य है जो वह कहावत के अनुरूप कथानक और देशज भाषा गढ़ लेते हैं। बहुत बहुत बधाई।

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  6. बहुत सुन्दर कहानी है करण जी। मन को छू गई।

    आभार,

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  7. करण भइया आपको बार बार बधाई देने का मन कता है। आपकी रचना की भाषा स्थानीय जरूर है लेकिन मन को स्पर्श कर जाती है।

    आभार,

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  8. द्रवित कर देने वाली कहानी के माध्यम से एक और देसिल बयना से परिचय हुआ।

    आपका आभार,

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  9. बहुत अच्छा लगा आज का देसिल बयना। कहानी संवेदना से मन भींग गया। कहावत का अर्थ तो अपनी जगह है लेकिन कहानी के पात्र की तरह बहू - राम राम !

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  10. पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ.. यह ब्लॉग हिंदी का उत्कृष्ट ब्लॉग है.. जितना मैंने देखा है.. प्रायः बुधवार के देसिल बयाना के कई अंको को पढ़ लिया हूँ.. भाई करण आप ने अपनी धरती, अपने अंचल, वहां कि संस्कृति और देशजता को बहुत ही सशक्त रूप से प्रस्तुत किया है.. एक दिन आपके देसिल बयना सन्दर्भ ग्रन्थ बन जाएगी.. शुभकामना सहित...

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  11. करण जी ,मिथिलांचल की कहावतों और मुहावरों को केवल संरक्षित ही नहीं कर रहे आप ,उन्हें अर्थ सहित जन-मन में स्थापित भी करे दे रहे हैं . साधुवाद देती हूँ आपको !

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  12. करण जी , आज का देसिल बयना सच में बहुत सीख दे गया ...बहुत मार्मिक कथा लिखी है ...लेकिन शायद सत्य को प्रेषित करती हुई ....

    देसिल बयना के माध्यम से बहुत कुछ पाठकों तक पहुंचा रहे हैं ..आभार

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  13. मिथिलांचल की कहावतों और मुहावरों को केवल संरक्षित ही नहीं कर रहे आप ,उन्हें अर्थ सहित जन-मन में स्थापित भी करे दे रहे हैं

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  14. बहुत बढ़िया प्रस्तुति.....भाई करण जी को बधाई ....

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  15. @ प्रेम सरोवर,
    ए भाई ! बड़ी नीक लागे ली तोहरी टिप्पणिया.... ! उम्मीद है आपका प्रोत्साहन ऐसे ही बना रहेगा. धन्यवाद !

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  16. @ सुनील कुमार, महेंद्र मिश्र, आ. परशुराम राय, गुड़ वन, नॉटी बॉय,
    आप सब का आभारी हूँ. आपकी प्रतिक्रियाएं बहुत ही उत्साहवर्धक हैं. ख़ास कर नॉटी बॉय जी, आपकी टिपण्णी आपकी तरह ही मासूम है. धन्यवाद !

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  17. @ मनोज कुमार,
    कम से कम आप तो अतिशयोक्ति से बचिए...... ! धन्यवाद नहीं कहूँगा !!

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  18. @ चला बिहारी....
    कहाँ चले गए थे चचा....? हम इहाँ देसिल बयना ले-ले के आपको ढूंढ़ रहे थे और देखिये आज..... 'आपके आने से इस घर में कितनी रौनक है. आपको देखें कभी अपने घर को देखें हम.... !' वैसे आप जौन बात कहें हैं उका डर तो हमको लगिए रहा था. सचे कह रहे हैं बड़ी डर-डर कर इसका चरमोत्कर्ष लिखे...... ! मगर आपके आने से ढेरों पाठकों का आशीर्वाद मिला... तो श्रम सार्थक जान पड़ता है. धन्यवाद नहीं दूंगा.... लेकिन अब से नागा नहीं कीजिएगा... !

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  19. @ हरीश प्रकाश गुप्त,
    हौ महाराज,
    इहाँ आके कछु कहि देत हो.... कबो आंच पे भी चढ़ाए का किरपा करौ..... !

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  20. @ कुमार पलाश,
    पलाश भाई, आपहुं तो हमारी धरती के ही हैं. बहुत अच्छा लगा आपका प्रथम आगमन. उम्मीद है अब यह सिलसिला बना रहेगा.... ! धन्यवाद !!

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  21. @ प्रतिभा सक्सेना, संगीता स्वरुप, अरुण चन्द्र रॉय,
    आपकी प्रतिक्रिया हमरी रचनात्मकता का नियामक है. बहुत-बहुत आभार !
    अरुणजी,
    आप तो बुझबे करते हैं मैथिल और मैथिली के बात.......... !

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  22. कंकड़ चुन-चुन महल बनाया... लोग कहे घर मेरा है। ए बाबू ! एक दिन जाना होगा सबको मालिक के दुअरिया... ओढ़ के चदरिया.... ! फिर भी, हाय रे मायाजाल ! जीव गयो लपटाय। वृथा जनम गंवाय।
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    जबतक माया जाल है तभी तक दुनिया भी है!
    सुन्दर पोस्ट!

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  23. @ शास्त्री जी,
    आपका आशीष मिला...... बहुत-बहुत आभार....!

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  24. कथानक,पात्र ,परिवेश सब कुछ जीवंत है !
    करन जी,इस बार का देसिल बयना बहुत मार्मिक है ! सामाजिक परिस्थितियों पर विचार करने को विवश करती है !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  25. @ ज्ञानचंद मर्मज्ञ
    धन्यवाद मर्मज्ञ जी! हम तो भोरे से आपके स्नेहिल आशीष की परतीच्छा कर रहे थे.... ! आज बहुत लेट से आये... सब कुछ सकुशल है न...... ?

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  26. Kya karan ji..aj tak to desil bayna padhkar hasiye ni rukta tha aur aj anssun thamne ka nam ni le raha...
    Bahot bahot aur bahot he emotional likh dala apne...aur jo b likha ekdume sahi b likha hai....armaon ka tootna sans tootne k barabar he hota hai..aur ka kahe.. :( apki lekhni ko aj ek bar fir se salam karte hai...

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  27. रोचक प्रस्तुति . देसिल बयना के माध्यम से आंचलिक जीवन का सजीव चित्रण मिलता है . शुभकामना .

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  28. @ मोहसिन,
    धन्यवाद !
    @ रचना,
    अब का करें.... अब आप जैसे पाठक हँसते हँसते बोर हो गए तो अब रुलाना तो पड़ेगा ही......... ! खैर आप आये बहार आयी...... !!

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  29. काम करते करते दिमाग ख़राब हो गया था की देसिल बयना के नए अंक की सूचना मिली | सोचा, थोड़ा टाइम पास किया जाय और दिमाग रिफ्रेश कर लिया जाय | शीर्षक पढ़कर ही उत्सुकता बढ़ गयी थी और जैसे जैसे पढना शुरू किया...बस खो सा गया| भाई, आपकी रचना पहले पाठक को जकरती है, फिर इतने जोर से झकझोरती है की दिमाग झन्ना उठता है| अगली बार से थोरा सावधान रहूँगा आपकी रचना से, शायद लग्गा भर| :)

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  30. @ राजीव जी,
    अपने काम में जादे मशगूल रहिएगा तो ऐसेही न झकझोर के जगायेंगे......... ! मगर आपकी प्रतिक्रिया से जो अपनापन झलकता है उस पर तो सातो खंड सरंग के मजा भी फीका..... बहुत-बहुत धन्यवाद !!

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  31. इस बार भी देसिल बयना पढकर अच्छा लगा.

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  32. कथा, शिल्प और उससे जुड़ी भावना बेहद ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है आपने। इस शानदार लेखन के लिये मेरी ओर से बधाई स्वीकारें।

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  33. मनोज जी!
    कहानी तो बहुत अच्छी है, भावों का प्रवाह भी बेजोड़ है परन्तु यह भाषा कौन सी है - भ्ज्पुरी तो है नहीं, क्या मैथिलि है? वैसे बोलियों का मिला जुला प्रयोग एक चुहल सा पैदा करता है.......

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  34. "जिसकी उत्कट अभिलाषा रहे वही विपरीत निकल जाए तो समझिये मौत के बराबर ही है।" दूसरे शब्दों में कहें तो 'अरमानों का टूटना साँसों के टूटने जैसा ही है।"

    एकदम सच ! जिसकी उत्कट अभिलाषा हो वो अक्सर विपरीत ही निकलता है.. बहुत साल पहले पढ़ी वसीम बरेलवी जी की एक ग़ज़ल, आज आपकी रचना पढ़ कर बहुत शिद्दत से याद आई "इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जायेगा"

    मंजु

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