गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

आँच-46 (समीक्षा) :: माँ की संदूकची

आँच-46

माँ की संदूकची [कविता]

हरीश प्रकाश गुप्त

माँ की संदूकची माँ तेरी सीख की संदूकची, कितना कुछ होता था इस मे तेरे आँचल की छाँव की कुछ कतलियाँ ममता से भरी कुछ किरणे दुख दर्द के दिनों मे जीने का सहारा धूप के कुछ टुकडे,जो देते कडी सीख ,जीवन के लिये कुछ जरूरी नियम तेरे हाथ से बुनी सीख की एक रेशम की डोरी जो सिखाती थी परिवार मे रिश्तों को कैसे बान्ध कर रखना और बहुत कुछ था उसमे तेरे हाथ से बनी पुरानी साढी की एक गुडिया जिसमे तेरे जीवन का हर रंग था और गुडिया की आँखों मे त्याग ,करुणा स्नेह, सहनशीलता यही नारी के गुण एक अच्छे परिवार और समाज की संरचना करते हैं तभी तो हर माँ चाव से दहेज मे ये संदूकची दिया करती थी मगर माँ अब समय बहुत बदल गया है शायद इस सन्दूकची को नये जमाने की दीमक लग गयी है अब मायें इसे देना "आऊट आफ" फैशन समझने लगी है समय की धार से कितने टुकडे हो गये है इस रेशम की डोरी के अब आते ही लडकियाँ अपना अलग घर बनाने की सोचने लगती हैं कोई माँ अब डोरी नही बुनती बुनना सिलना भी तो अब कहाँ रहा है अब वो तेरे हाथ से बनी गुडिया जैसी गुडिया भी तो नही बनती बाजार मे मिलती हैं गुडिया बडी सी, रिमोट से चलती है जो नाचती गाती मस्त रहती है ममता, करुणा, त्याग, सहनशीलता पिछले जमाने की वस्तुयें हो कर रह गयी हैं लेकिन माँ मैने जाना है इस सन्दूकची ने मुझे कैसे एक अच्छे परिवार का उपहार दिया और मै सहेज रही हूँ एक और सन्दूकची जैसे नानी ने तुझे और तू ने मुझे दी इस रीत को तोडना नही चाहती ताकि अभी भी बचे रहें कुछ परिवार टूटने से और हर माँ से कहूँगी कि अगर दहेज देना है तो इस सन्दूकची के बिना नही

Nirmla Kapila अपनी व्यावहारिक सीमाओं के कारण मै अधिक ब्लागों पर विजिट नहीं कर पाता हूँ अतएव निर्मला कपिला से सम्पर्क और परिचय कुछ अधिक न होकर विभिन्न ब्लागों पर रचनाओं के संदर्भ में उनकी प्रतिक्रियाओं से ही रहा है। उनकी टिप्पणियाँ बहुत ही संयमित होती हैं तथा रचना के प्रति पूर्णतया सकारात्मक रहा करती हैं। इससे उनके व्यक्तित्व के संबंध में जो छवि निर्मित हुई वह उनकी कविता ‘माँ की संदूकची’ से कदाचित मेल खाती है। यह कविता उनके ब्लाग ‘वीर बहूटी’ पर पिछले दिनों आई थी। यही कविता आज ‘आँच’ के इस अंक का प्रतिपाद्य है।

निर्मला जी की यह कविता ‘माँ की संदूकची’ वास्तव में भारतीय समाज के संस्कारों और परम्पराओं में निहित अटूट विश्वास की पिटारी है जो उत्तराधिकार के क्रम में पीढी दर पीढ़ी होती हुई विस्तार पाती है। भारतीय समाज में स्त्रियाँ संस्कारों और परम्पराओं के निर्वाह की ध्वज वाहिका रही हैं, यह यहाँ सनातन धारणा है। प्रकारान्तर से हर माँ अपनी बेटी को प्रेम करने, आदर करने, स्नेह लुटाने, घर, समाज और रिश्तों की मर्यादा रखने, मान-सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा करने, परिवार को एक रखने के लिए टूटने की हद तक संयम रखने, कष्ट और दुख समेटने तथा खुशियाँ बाँटने आदि जैसी अनेकानेक शिक्षाएं सीधे- सीधे देने के साथ-साथ अपने आचरण के माध्यम से ममता, करुणा, त्याग एवं सहिष्णुता जैसे भावों का सहज रूप से आरोपण और पोषण करती है। वास्तव में ये परम्पराएं, जिनका निर्वाह स्त्रियों के कंधों पर रहा है, भारतीय समाज को जड़ों से जोड़ने, स्थायित्व लाने तथा लोक मानस में खुशियाँ भरने का आधार रही हैं।

निर्मला जी ने अपनी इस कविता में इन भावनाओं को बहुत ही संजीदगी से चित्रित किया है। संदूकची देने का रिवाज बेटी के विवाह के अवसर पर उसे विदा करते समय देने का है। वैसे तो इस संदूकची में उसके प्रयोग के वस्त्र, आभरण व अन्य उपयोगी वस्तुएं रखकर दी जाती हैं लेकिन कवयित्री ने इन वस्तुओं को संस्कारों के प्रतीक के रूप में प्रयोग कर सार्थक बनाने का सफल प्रयास किया है। उसमें ‘कतलियों’ के रूप में ममता का मधुर स्पर्श है तो व्यक्तित्व को परिपक्व बनाने के लिए ‘धूप के कुछ टुकड़े’ भी हैं। रिश्तों को एक सूत्र में जोड़ने के लिए ‘हाथ से बनी रेशम की डोरी’ है जो अपनत्व का भाव भी जगाती है। उसमें ‘पुरानी साड़ी की बनी गुड़िया’ के रूप में जीवन के हर एक रंग में रंगी माँ से जुड़ी बीती बातों की स्मृतियाँ भी हैं जिनके माध्यम से माँ ने उसे करुणा, त्याग, स्नेह व सहनशीलता आदि नारी सुलभ गुणों से स्नात किया है। लेकिन वर्तमान पीढ़ी की कुंठित आधुनिकता इन परम्पराओं और संस्कारों को पिछड़ेपन की निशानी मानती है और इन्हें त्यागती जा रही है। इस तथाकथित आधुनिकता ने प्रेम, स्नेह, आदर और आत्मीयता को भी संकीर्ण-संकुचित बना दिया है जिसके फलस्वरूप संबंधों में अलगाव और रिश्तों में बिखराव देखने को मिलते हैं। यह केवल कवयित्री की अपनी व्यथा नहीं है, यह लोक मन की व्यथा है जो कवयित्री के शब्दों में अभिव्यक्त हुई है।

इस भौतिक जगत में जहाँ सब सुख-सुविधाएं याँत्रिक, उपभोग्य और क्रय योग्य हो चली हैं, वहाँ मन की कोमल भावनाओं का तिरोहित हो जाना स्वाभाविक है। कविता में कवयित्री की निराशा स्पष्ट झलकती है जब वह स्त्रियोचित कौशल में निपुणता के बारे में कहती है कि ‘बुनना सिलना अब कहाँ रहा’ या ‘अब वो तेरे हाथ से बनी गुडिया जैसी गुडिया भी तो नही बनती’। ‘हाथ से बनी’ अर्थात आत्मीयता और अपनत्व की भावनाएं जो अब नहीं रहीं। इसके बावजूद संस्कारों और परम्पराओं को जीवित रखने की जिजीविषा अभी भी विद्यमान है इसलिए वह इन्हें सहेजकर आशा और विश्वास के साथ आगे बढ़ाना चाहती है। इन संस्कारों की ऊष्मा ही परिवार को, रिश्तों को, संबंधों को एक सूत्र में पिरोने तथा उसमें आत्मीयता का राग भरने का अवलम्ब है और यही आज के आधुनिक समाज में बिखराव को दूर करने तथा टूटन को जोड़े रखने में समर्थ हो सकती है।

कविता में कुछ नए प्रयोग हुए हैं। कुछ प्रयोग तो बहुत आकर्षक हैं जैसे ‘तेरे आँचल की छाँव की कुछ कतलियाँ’ में ‘कतलियाँ’ ममता में हलकी मिठास भरता हुआ अलग सा प्रयोग है। ‘धूप के कुछ टुकड़े’, ‘पुरानी साड़ी की एक गुड़िया’, ‘समय की धार से कितने टुकड़े हो गए’ आदि प्रयोग कविता का आकर्षण हैं तथापि शब्द बहुलता कविता के शिल्प को कमजोर करती है। एकाधिक स्थानों पर शब्दों के अनावश्यक प्रयोग से कविता में बिखराव आ गया है। कवयित्री ने अधिकांश स्थानों पर पूरे के पूरे वाक्य प्रयोग किए हैं और अर्थ में प्रभाव पैदा करने की दृष्टि से पंक्ति का विभाजन भी उपयुक्त नहीं हुआ है जो काव्यत्व में बाधक है, जैसे –

और बहुत कुछ था उसमेतेरे हाथ से बनीपुरानी साढी की एक गुडिया जिसमे तेरे जीवन का हर रंग था और गुडिया की आँखों मे

त्याग ,करुणा स्नेह, सहनशीलता

यही नारी के गुण

एक अच्छे परिवार और समाज की

संरचना करते हैं

या

कडी सीख ,जीवन के लिये

कुछ जरूरी नियम तेरे हाथ से बुनी

सीख की एक रेशम की डोरी

जो सिखाती थी

उक्त पंक्तियों में शब्द बहुलता और पंक्ति का अनुपयुक्त विभाजन स्पष्ट देखा जा सकता है। इसी तरह के प्रयोग कुछ अन्य स्थानों पर भी हुए हैं जिनसे बचा जाना चाहिए था।

कवयित्री कविता के भाव पक्ष के प्रति पूर्णतया सजग रही हैं इसीलिए कविता अपना भाव संम्प्रेषित तो करती है पर उसकी शिल्प के प्रति शिथिलता कविता के कसाव में कमी के रूप में द्रष्टिगोचर होती है। कविता भावनाओं की संश्लिट अभिव्यक्ति होती है अतः पुनर्लेखन कविता के शिल्प में निखार ला सकता है।

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60 टिप्‍पणियां:

  1. समीक्षा अच्छी लगी। इससे कविता का अर्थ और स्पष्ट हौ गया है साथ ही कविता की कमियों के संबंध में भी बहुत संयम के साथ सकारात्मक ढंग से संकेत किया गया है।

    बेहतरीन प्रस्तुति के लिए बधाई !

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  2. रचनाकार को उत्साहित करती हुई यह कविता की नितांत तटस्थ समीक्षा है। इसमें अर्थ को विस्तार भी है और रचनाकार के लिए दिशा और दृष्टि का संकेत भी है।

    बेहतरीन समीक्षा के लिए बधाई !

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  3. आपके ब्लाग का यह स्तम्भ साहित्य के विद्यार्थियों को कविता का मर्म समझने में दृष्टि देता है। अभी तक आँच में लगभग हर स्तर की रचनाएं शामिल की गई है और उनकी उत्कृष्ट समीक्षाएं सामने आई हैं। यह इस स्तम्भ की विविधता है। जहाँ गूढ़तम रचनाओं से पाठकगण लाभान्वित हुए हैं वहीं नए रचनाकारों की रचनाओं को चर्चा के लिए मंच मिलने से वे लाभान्वित हुए हैं।

    इस कड़ी में एक और बेहतरीन समीक्षा के लिए बधाई स्वीकार करें।

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  4. A very nice balanced evaluation and and pasitive criticism. Thanks to hichlight this meaningful poem.


    Sorry brother Hindi font lod nahin hai isliye chaah kr bhi Hindi me comments nahi de paa raha.Sankoch bhi aati hai parantu majboori hai

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  5. इस रचना में भावों की इतनी प्रबलता है कि पढते हुए कहीं लगता ही नहीं कि शब्द बाहुल्यता है ..पर आंच पर आने के बाद ऐसा लग कि कुछ कविता में कसाव किया जा सकता था ...
    समीक्षा बहुत सकारात्मक है ...फिर भी यह कविता मुझे बहुत पसंद आई थी ...

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  6. निर्मला कपिला जी की कविताओं को पढना एक अनुभव होता है.. उनकी कविताएं अमृता प्रीतम की कविताओं सी लगती हैं.. भाव में ... विम्ब में.. सम्वेदना में... पृष्ठभूमि में भी... यह कविता में भी इसकी झलक है.. गुप्त जी की समीक्षा उच्च कोटि की होती है... अपने स्तर को उन्होंने और भी बढाया है... समीक्षा को पढने के उपरान्त कविता को पुनः पढने से कविता और भी बहुमुखी प्रतीत होती है.. सुन्दर रचना, सुन्दरतर समीक्षा...

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  7. कविता का भाव पक्ष निश्चय ही बहुत शशक्त है ! पूरी कविता माँ की ममता की मिठास से भरी है !
    आपकी समीक्षा कविता की तह तक पहुँच पाने में पूर्णतः सफल हुई है!
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  8. ये कविता पहले भी पढी थी और अपना गहरा असर छोड गयी थी और आज इसकी समीक्षा ने इसे और भी मुखर कर दिया……………भाव पक्ष की प्रबलता ही इतनी होती है कि अन्य तरफ़ ध्यान ही नही जाता और हम तो भाव मे जीने वाले हैं तो इसके भावों मे ही डूब गये।

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  9. हरीश गुप्ता जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद,सुन्दर निष्पक्ष समीक्षा के लिये। सही बात है कविता बहुत जल्दी मे लिखी गयी रात को लिख कर सुबह पोस्ट कर दी जब कि इस पर और काम होना चाहिये था। आपसे बहुत कुछ सीखने को मिला। और बहुत कुछ सीखने के लिये आपसे परिचय बढाना होगा आशा है आप निराश नही करेंगे । आपसे जो प्रेरणा मिली उसके लिये भी बहुत बहुत धन्यवाद और शुभकामनायें।।

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  10. कविता और उसके भाव के बारे में समझने को मिला ...
    आभार !

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  11. निर्मला जी की ये कविता हर किसी के मन में एक गहरी छाप छोडती है और सबको अपनी सी लगती है.
    समीक्षा बहुत अच्छी लगी.

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  12. साथ के लोगों की रचनात्मकता को रखने का आपका उपक्रम सराहनीय है ! लोगों की बा-अदबी को लाना महत्वपूर्ण है !

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  13. कविता और समीक्षा दोनों परिपक्व हैं. समीक्षक ने बहुत ही तटस्थ हो कर ऐसी बारीकियों को इंगित किया है जिससे जिज्ञासु कवि/समीक्षक बेहद लाभान्वित होंगे. कवि और समीक्षक दोनों को साधुवाद !!!

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  14. @ अशोक बजाज जी,

    प्रोत्साहन के लिए आपका आभारी हूँ।

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  15. @ good_done जी,

    प्रयास करता हूँ कि दृष्टि तटस्थ और सकारात्मक रहे। आप सबकी प्रोत्साहित करने वाली प्रतिक्रियाएं मुझे बल देती हैं।

    आभार,

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  16. @ आदरणीय राय जी,

    आपके स्नेह, आशीर्वाद और प्रोत्साहन के बिना
    मेरे कार्य सफल नहीं हो सकते। आगे भी स्नेह बनाए रखने का अनुरोध है।

    आपका बहुत आभारी रहूँगा।

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  17. @ अंकुर जी,

    आपकी भावना का मैं आदर करता हूँ। आपकी प्रतिक्रिया ने मुझे खुशी प्रदान की।

    आभार,

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  18. @ जे0पी0 तिवारी जी,

    भाषा कुछ विशेष मायने नहीं रखती। आपका आना और दो शब्द कह जाना भी मूल्यांकन होता है।

    आभार,

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  19. @ संगीता जी,

    आपका मानना भी मेरे उल्लेख से मेल खाता है। कविता में भाव मुखर हैं। सकारात्मक दृष्टिकोण से कमियों का संकेत भर किया गया है।
    प्रोत्साहन के लिए आपका आभार।

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  20. @ अरुण जी,

    आप तो स्वयं कविता के सिद्धहस्त हस्ताक्षर है, बिम्बों के प्रयोग में कुशल हैं अतः आपसे अधिक क्या कहना।
    प्रोत्साह्त करने वाली टिप्पणी के लिए आभार,

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  21. @ ज्ञान चन्द मर्मज्ञ जी,

    मैंने तो प्रयास भर किया था। असल मूल्यांकन तो आप सबका ही होता है।

    प्रोत्साहन के लिए आपका आभार।

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  22. हरीश जी तटस्थ भाव से आपने बहुत ही गंभीर चर्चा प्रस्तुत की है। आभार आपकी इस प्रस्तुति के लिए।

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  23. aadarniy sir
    is baar aapki ost jara hat kar lagi.
    bahut hi achhi avamsakaratmak sandesh deti hai aapki post.
    poonam

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  24. आँच पर गुप्त जी ने निम्मो दी की कविता को लिया और हम जैसे पाठकों के लिए यह एक बेह्तरीन जुगलबंदी है. जहाँ निम्मो दी की कविता में जीवन का अनुभव दिखता है वहीं गुप्त जी की समीक्षा में उनका साहित्यिक ज्ञान!! हमारे लिए तो बस एक आनंद का अनुभव होता है!!

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  25. निर्मला कपिला जी पर बहुत ही अच्छी समीक्षा ....... सुंदर प्रस्तुति.

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  26. आपका यह महतकार्य रचनाधर्मियों को लिखने की प्रेरणा देता है!

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  27. गुप्त जी आपकी समीक्षा इतनी प्रभावी होती है की एक बार फिर से समीक्षा की गयी रचना को आपके नज़रिए से पढ़ने की जरुरत महसूस होती है. और हर बार आपकी समीक्षा, आपका नजरिया १००% खरा उतरता है...तब सही मायनों में कविता की उत्तमता का भान होता है. आपका सा नजरिया अपनी सोचों में उतारना अति आवश्यक है हम जैसों के लिए...तभी एक अच्छा सृजन हो सकता है.आभार इस समीक्षा को हम तक पहुचाने के लिए.

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  28. @ वन्दना जी,

    प्रभाव छोड़ने के सम्बन्ध में आपसे सहमत हूँ। लेकिन यदि कविता का शिल्प संश्लिष्ट होता तो यह और गहरा असर छोड़ती, शायद भूलती ही नहीं।

    सह अनुभूति के लिए आपका आभार।

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  29. @ निर्मला कपिला जी,

    धन्यवाद तो मुझे आपको देना चाहिए आपकी बेहद सकारात्मक और मेरे कार्य को सम्मान सा प्रदान करती आपकी टिप्पणी के लिए। सच, मुझे तो कुछ संशय सा हो रहा था कि कमियाँ दर्शाए जाने के बावजूद आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी। लेकिन आप आईं और अपने व्यक्तित्व के अनुरूप मुझे प्रेरित कर गईं। आपके प्रति मेरी धारणा और प्रबल हुई।
    मुझे भी लग रहा था कि यह कविता जल्दी में पूरी की गई है।

    आपकी ईमानदार प्रतिक्रिया से मुझे खुशी हुई। आभार।

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  30. @ वाणी गीत जी,

    आपकी छोटी सी टिप्पणी भी प्रोत्साहन के लिए पर्याप्त है। आपका आभार।

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  31. @ मोहसिन जी,

    आपके आने से प्रसन्नता हुई। आभार।

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  32. @ शिखा जी,

    आप लोग इसी तरह मुझे उत्साहित करती रहें, मुझे अपने कार्य के लिए ऊर्जा मिलती रहेगी। आपका आभार।

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  33. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  34. हरीश प्रकाश गुप्त ने कहा…
    @ अमरेन्द्र जी,

    बहुत सी अच्छी रचनाए भी मंच के अभाव में साहित्य के विशाल आकाश में बिना चर्चा के खो जाती हैं और नए रचनाकार हतोत्साहित हो मुख्यधारा से दूर हो जाते हैं। यह एक प्रयास है हम लोगों का।

    प्रोत्साहन के लिए आपका आभार।

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  35. @ उदय जी,

    प्रोत्साहन के लिए आपका आभार।

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  36. @ करण जी,

    सजग और प्रेरक प्रतिक्रिया के लिए आपको साधुवाद।

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  37. @ अपनत्व जी,

    समीक्षा पसंद करने के लिए आपका आभार।

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  38. @ मनोज जी,

    आभारी हम सब आपके हैं क्योंकि चर्चा का यह मंच आपने ही उपलब्द कराया है।

    प्रोत्साहन के लिए आपका आभार।

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  39. @ जमीर जी,


    प्रोत्साहन के लिए आपका आभारी हूँ।

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  40. @ झरोखा जी,

    आपको पोस्ट पसन्द आई इससे मुझे प्रसन्नता हुई। आपका आभार।

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  41. @ सलिल एवं चैतन्य जी,

    पहले तो मैं चौंक गया निम्मो दी पढ़कर। फिर आपका निर्मला जी के प्रति अपनत्व का भाव देखकर खुशी हुई। आपकी भावनाएं पढ़कर खुशी और बढ़ गई।

    प्रोत्साहन के लिए आपका आभार।

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  42. @ उपेन्द्र जी,


    प्रोत्साहन के लिए आपका आभारी हूँ।

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  43. @ रूपचन्द शास्त्री जी,

    आप-से प्रोत्साहित करने वाले पाठक मिलेगे तो आपका मंतव्य अवश्य सफल होगा।

    प्रोत्साहन के लिए आपका आभार।

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  44. @ अनामिका जी,

    आपकी भावनाएं आत्मीयता से ओतप्रोत हैं और यही आत्मीयता मेरे लिए ऊर्जा का स्रोत है।

    प्रोत्साहन के लिए आपका आभार।

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  45. पोस्ट का प्रस्तुतीकरण बहुत ही अच्छा रहा।

    बधाई।

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  46. सब लोगों ने प्रशंसा की इसलिए तो और भी अच्छी है पोस्ट।

    सभी को बधाई।

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  47. Man ki sandukchi-Is par samiksha ka swarup sabhi manako par khara utara hai.Post mein manav hriday ki jatitaon aur samvednaon ko itne sundar tarike se prastut kiya gaya hai jo iski samagrata par koi prashna chinh nahi uthata hai. Mul tathyon ko bhi achhe tarike se ghanibhut kiya gaya hai.Dhanyavad.

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  48. @ प्रेम सरोवर जी,

    समीक्षा पर आप की भाव भीनी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ।

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  49. निर्मला जी की बहुत भावपूर्ण और सुन्दर कविता की बहुत ही निष्पक्ष और नियंत्रित समीक्षा के लिये आपको बहुत बहुत बधाई ! इस कविता का सन्देश और भावपक्ष इतना सशक्त है कि कमियों की ओर ध्यान ही नहीं जाता ! आपकी सूक्ष्म दृष्टि को मेरा नमन !

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  50. @ साधना वैद जी,

    इस कविता के भाव पाठकों के हृदय को स्पर्श करते हैं। समीक्षा पर आप की भाव भीनी प्रतिक्रिया के लिए आभार।

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  51. निर्मला जी की यह सुन्दर रचना..माँ की संदुकची उनके ब्लॉग में भी पढ़ी | और इस की इतनी सुन्दर समीक्षा .. आपकी पप्रस्तुत समीक्षा आज दिनाक ३ दिसंबर को चर्चामंच पर रखी गयी है ... http://charchamanch.blogspot.com

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  52. @ डॉ नूतन नीति जी,

    समीक्षा आपको पसंद आई, मुझे प्रसन्नता हुई।
    आप की सादगी पूर्ण प्रतिक्रिया ने मेरी प्रसन्नता द्विगुणित कर दी। आभार।

    पुनःश्च, चर्चामंच पर सम्मान प्रदान करने के लिए आपका आभारी हूँ।

    - हरीश

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  53. समीक्षा बहुत अच्छी लगी!
    रचना के भिन्न पहलुओं को जानना अच्छा लगा!

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  54. @ अनुपमा पाठक जी,

    समीक्षा पर आपकी भावपूर्ण प्रतिक्रिया से प्रसन्नता हुई। आभार।

    - हरीश

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आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।