बुधवार, 1 दिसंबर 2010

देसिल बयना - 58 : कदुआ पर सितुआ चोख

देसिल बयना – 58

कदुआ पर सितुआ चोख

 

कवि कोकिल विद्यापति के लेखिनी की बानगी, "देसिल बयना सब जन मिट्ठा !"
दोस्तों हर जगह की अपनी कुछ मान्यताएं, कुछ रीति-रिवाज, कुछ संस्कार और कुछ धरोहर होते हैं। ऐसी ही हैं, हमारी लोकोक्तियाँ और लोक-कथाएं। इन में माटी की सोंधी महक तो है ही, अप्रतीम साहित्यिक व्यंजना भी है। जिस भाव की अभिव्यक्ति आप AIbEiAIAAAAhCOGGwPuf3efHRhC_k-XzgODa1moYsN388brgg9uQATABK_5TSqNcP8pRR08w_0oJ-am4Ew4सघन प्रयास से भी नही कर पाते हैं उन्हें स्थान-विशेष की लोकभाषा की कहावतें सहज  ही प्रकट कर देती है। लेकिन पीढी-दर-पीढी अपने संस्कारों से दुराव की महामारी शनैः शनैः इस अमूल्य विरासत को लील रही है। गंगा-यमुनी धारा में विलीन हो रहे इस महान सांस्कृतिक धरोहर के कुछ अंश चुन कर आपकी नजर कर रहे हैं …..
करण समस्तीपुरी

 

"खीर खाय ले थारी देबो ! दूध पिए ले पारी... ! देबो गरमागरम नित चाह ! ब्रहम बाबा हमरो करा दो ब्याह !!" बेचारे अकलू भाई बड़ी वेदना से ई गीत गाते थे। आखिर ब्रहम बाबा सुनिए लिए। कमलपुर वाली कमली काकी कमला पार के कमलानन ठाकुर की कन्या से अकलू भाई का 'मंगलम भगवान विष्णु और मंगलम गरुडध्वजः' करावाइये दीये।

चार दिन चौठारी कटा के पांचवे दिन अकलू भाई लौटे थे रेवा-खंड। कनहू कहार के पालकी में नहीं, लहकन सिंघ के मोटरगाड़ी में। इहाँ भी खूब जोरगर गीत नाद का व्यवस्था था। टहलगाँव वाली काकी अपने टहल-टहल के पूरा गाँव हकार बाँट आयी थी। अंगना और दरवाजा पर समिति वाला पंचलाईट झकझका रहा था।

दू दिन तो कनिया (दुल्हन) देखाई में बीत गया। तीसरा दिन काम-काज और व्यवस्था बात में। चौथा दिन फिर कनिया का चौठारिये था। आज नव-कनिया रसोई में प्रवेश करेगी। उ के मायके से आया समान-सन्देश से ही आज रसोई बनेगा। एंह.... भोरे-भोरे भंगेरू कामत कमला पार से दही-माछ का भार भी ले आया था। सब पाहुने-पड़ोसी मूछ पर ताव दे रहे थे। हम भी कहे मारो जांघ पर भोथाहा कुल्हारी।

मिथिला की बात हो और हास-परिहास नहीं... ऐसा हो सकता है क्या ? दुल्हिन तो भोर से सब सासू-गोतनी का पैर पखार रही थी। उधर संगी-बहिनापा में गीत-नाद चल रहा था। इधर सब अकलू भाई के दोनों साला को मजाक में गोंते हुए था। अकलू भाई के एकतुरिया (हमउम्र) से लेकर छोटका घंटोलिया के मंडली तक दुन्नु साला को भकभकाए था। बेचारा इधर से छूटे तो उधर धरा जाए। 'अलख निरंजन ! बहिन के द्वार पर ऐसा दुर्गिंजन !!'

बेचारा सब का नजर ध्यान बचा कर चुपके से ससर गया रसोई द्वार पर। भौजी अपना विध-व्यवहार कर रही थी। ई दुन्नु शीत-बसंत टुकुर-टुकुर मुँह ताक रहा था। कहते हैं न कि 'नसीब हो झंडू तो का दरभंगा और का काठमांडू।' वहाँ भी ई दुन्नु पर बुलंती बुआ का नजर पर गया।

बुआ अपने मज़ाक में गोल्ड-मेडलिस्ट। रोआब से बोली, "ए नव-कनिया के भाई ! उधर का मुँह छुपा रहे हो ? अरे माय-बाप खाली बहनोई का अनाज गलाए खातिर भेजा है कि बहन का भी कछु मदद करोगे... ?"

बुलंती बुआ के बाद बतसिया दीदी भी बात लपक ली, "वही तो बुआ... ! ई देखो कहाँ का निर्दय भाई है... ! बहिन बेचारी पहिल बार रसोई छुएगी। बेचारी विध-व्यवहार में ही बेदम है और ई दुन्नु शीत-बसंत मुख-दर्शक बना हुआ है... राम कहो !"

बेचारी नयकी भौजी विध-वयवहार के बीच में नजर बचा कर एक बार अपने भाई लोग को देख लेती थी। दया तो आता था मगर करे क्या....?

बतसिया दीदी के बाद झपसी मौसी भी टपक पड़ीं, "अरी मदद-सहायता तो छोडो... जैसे माई हरजाई, वैसे बाप कसाई और ई दुन्नु तो भाकलोले बा। ई को तो मिथिला का विधि-विधान भी नहीं मालुम है, रे दाई.... ! हमरे चौठारी में हमरा तिन्नो भाई का झट-पट में सब कुछ कर दिया कि किसी को पता भी नहीं चला कि बहुरिया कब पांच पकवान बना कर रख गयी।"

लगे हाथ लखनपुर वाले पाहून भी कहे लगे, "ए साले महराज ! और केतना उद्धार करवाईयेगा... ! अरे ई तो मिथिलांचल का विध ही है। आज नई बहू रसोई पकाती है और उ के भाई लोग चौका-बर्तन, झाड़ू-बहारू करते हैं। ई रस्म है। सबको करना पड़ता है। आपही पहिले आदमी नहीं हैं। बूझे कि और असीरवाद सुनियेगा... !"

इत्ता देर से सुलगते-सुलगते बड़का बुदबुदाया, "कहियेगा तब न का काम है सो... ?" उ का बात ख़तम होए से पहिले ही भगजोगनी पसेरी (पांच किलो) भर का दो बड़ा-बड़ा कदुआ रख गयी, "लेओ पहिले यही को छील-काट के तो दिखाओ तब और कछु करना... !"

बड़का साला बोला, "ठीक है छूरी-छिलनी दीजिये... छील-काट देते हैं।" देखिये यही है मिथिला के सौरभ। उ तो हंसी मजाक न कर रहे थे। मेहमान से कौनो काम थोड़े करवाना था। लेकिन बात नीचे कैसे जाने देते। सुखाई ओझा झट से बोले, "होए मरदे... ! कौन देस के हैं ई कुटुम हो... ? बहिन के द्वार पर चाकू-छूरी चलाइयेगा... ? अरे ई विध में बिना हंसुआ-छूरी के काम करना होता है। समझे... !"

बड़का तो बकरचन जैसे बक-बक मुँह ताकने लगा मगर छोटका था कुछ तेज़। झट से ओरियानी में पड़ा हुआ एक सितुआ (सीप/घोंघा का कवच) उठा लिया। मार धर-फर वही से कदुआ को छील-चांछ के तरकारी काट दिया। भौजी भी अपने भाई के विजय पर घूँघट के अंदरे से मुस्का रही थी। साला विजेता के तरह गर्दन ऊपर कर के बोला, "लीजिये ! बिना चाकू-छूरी के ही सब्जी काट दीये न... !"

सकल सभा सकदम। ई तो भारी फटका लगा। आन गाँव से आया ई दू गो लौंडा (लड़का) ऐसा अक्ल लगाया कि सारी चाले उल्टी पड़ गयी। ई तो गाँव के इज्जत का सवाल हो गया। रेवा-खंड का झंडा कैसे झुकने देंगे... ? टपकू चचा वहीं खटिया पड़ लोटे सब खेल देख रहे थे। उ केतना अरियात-बरियात में कैसन-कैसन बतक्कर को चित कर दीये थे। झट से बोले, "ओहि कुटुंब ! अरे का काट दीये.... ?" दोनों शीत-बसंत गर्व के साथ बोला, "दोंनो कद्दू काट दीये... !"

टपकू चचा बोले, "मार बुरबक के दूम ! कदुआ काट दीये तो लगता है जैसे बड़ा भारी काम कर दीये। अरे कदुआ पर तो सितुआ भी चोख (तेज) होता है। इतना ही जुआनी का जोर है तो बिना चाकू-छूरी के जरा कटहल काट के दिखाओ... !"

हा... हा... हा... हा.... ! टपकू चचा एक्कहि बेर में ऐसा न गोटी फेंके कि बड़का साला बाएं ताकने लगा और छोटका दायें। कद्दू तो कोमल होता है तो उसको बेचारा सितुआ से भी निपटा दिया लेकिन कांटेदार कठोर कटहल... उ पर तो चाकू-छूरी भी चलाने में दम निकल जाता है, सितुआ से कौन काटेगा... ?

इधर घंटोलिया के साथी संगत सब चचा का बात लोक कर लगा कुटुम को खिसियाने, "का हो कुटुंब... 'कदुआ पर सितुआ चोख' करते हैं... अब जरा कटहल भी काट दीजिये.... ! बेचारा दुन्नु साला जुआ में हारल पांडव जैसे मूरी झुकाए बैठा रहा। उ तो कुटुंब के भाग्य से बड़का कक्का अंगना आ गए तो मजाक मंडली बंद हुआ। नहीं तो 'कदुआ पर सितुआ चोख'। उ दब्बू कुटुम पर गाँव का छोटका छौरा सब भी भारी पड़ जाता।

खैर अकलू भाई के ब्याह के बहाने एगो नया कहावत भी मिल गया। "कदुआ पर सितुआ चोख।" अर्थात "जो निर्बल हैं उनपर तो अपेक्षाकृत कम बलवान भी हावी हो सकता है... । लेकिन जो बलवान हैं उनपर.... !"

24 टिप्‍पणियां:

  1. Is bar ka deshil Bayna KADUA PAR SITUA CHOKH bahut hi achha laga.Sarthak post.Good Morning.

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  2. कथा अच्छी लगी साथ में एक कहावत और स्पष्ट हुई। आभार।

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  3. सुन्दर प्रस्तुति।
    धन्यवाद।

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  4. देसिल बयना के क्या कहने। हर बार एक रोचक प्रतुति के साथ प्रकट होता है। अब इसका उत्सुकता से इंतजार रहता है।

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  5. आँचलिक कहावतों को सरस, स्वाभाविक और मौलिक कथा के माध्यम से प्रस्तुत करके आप एक अभिनव कार्य कर रहे हैं।
    आपका आभार।

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  6. देसिल बयना बहुत अच्छा लगा करण भइया। मैथिली में तो रस टपकता है।

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  7. यहाँ पर आकर मैथिली भाषा सीखने का मौका मिल रहा है ..कथा स्पष्ट सन्देश देती है ...शुक्रिया

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  8. बहुत बढिया से बताए हैं कि कदुआ पर सितुआ कैसे तबर-तबर चलता है। हंसी-मजाक में बहुते बढिया देसिल बयना से परिचय करा दिए।
    वैसे तो ई बयना हम बहुत प्रयोग करते हैं। आखिर हर घर में हम महिलाएं इसके व्यवहार पक्ष से भलि-भांति परिचित हैं।
    हर घर में, हर काल में कदुआ पर सितुआ चोखे ही त रहता है। है कि नहीं करण जी।

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  9. करन जी,
    बड़े बुजुर्ग सच ही कह गए हैं, कभी कमज़ोर को कमज़ोर नहीं समझना चाहिए ,क्या पता कब कदुआ पर सितुआ भारी पड़ जाय !
    हमेशा की तरह सुन्दर प्रस्तुति !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  10. बहुत रसदार कथा से एक बार फिर आपने चमत्कृत कर दिया और मिथिला की संस्कृति को जीवंत रूप से प्रस्तुत कर दिया। आभार आपका। बेहतरीन!

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  11. देसिल बयना के उत्कृष्ट अंको में से एक... बहुत पुरानी कहावत का रोचक और जीवंत चित्रण जिसमे ग्रामिनांचल की महक जिन्दा है.. .. करण बधाई स्वीकार करें..

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  12. बहुत बढ़िया देसिल बयना ...मैंने तो यह कहावत पहली बार सुनी ...( पढ़ी ) ...बीच बछ में और भी लोकोक्तियों से परिचय हुआ ....बहुत रसदार रही यह कथा ..

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  13. मैं सभी पाठकों को हृदय से धन्यवाद देता हूँ. आप सभी असीम धैर्य के साथ पिछले एक साल से इस अंक को पढ़ते और अपनी स्नेहिल टिप्पणियों से मेरा उत्साहवर्धन करते आ रहे हैं.... यह अप्रतीम सहयोग मैं कभी भूल नहीं सकता. मैं आपका सदैव आभारी रहूँगा !

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  14. बहुत सुन्दर लगी कथा! बेहतरीन प्रस्तुती!

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  15. Ram Ram Karan Ji...
    Bahute din bad apka likhe desil bayna padhe aur humesa ki tarah apne bahute acha likha hai...waise to kadua humko ekdume pasand ni hai lakn e post me kadua ekdum chha gaya hai....
    Baki hum ka kahe ketno tarif karen apke lekhaki ka kamme hoga...

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  16. आपकी रोचक पोस्ट से तो हमें भी खासी जानकारी मिली!

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  17. इस बार का देसिल बयना पढकर अच्छा लगा.

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  18. .
    .
    .
    "कदुआ पर तो सितुआ भी चोख"

    वाह, अति सुन्दर कथा...

    आभार!


    ...

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  19. कद्दू और सेतुआ मिला कर कोई व्यन्जन बनता है क्या? आजकल दोनों हैं घर में। बाकी सतुआ चोख है या लऊआ, यह तो देखना पड़ेगा।

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