शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

शिवस्वरोदय-21

शिवस्वरोदय-21

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में यह बताया गया था कि किन-किन परिस्थितियों में किस स्वर का प्रवाहकाल लाभप्रद होता है। इस अंक का प्रतिपाद्य विषय है कि यदि नियत तिथि को प्रात:काल नियत स्वर प्रवाहित न हो तो किस प्रकार के दुष्परिणाम सामने आते हैं या आने की संभावना बनती है।

यदा प्रत्यूषकालेन विपरीतोदयो भवेत्।

चन्द्रस्थाने वहत्यर्को रविस्थाने च चन्द्रमा:॥ (82)

अन्वय - यदा प्रत्यूषकालेन विपरीतोदय: भवेत् (अर्थात्) चन्द्रस्थाने अर्क: वहति रविस्थाने चन्द्रमा: च।

प्रथमे मन उद्वेगं धनहानिर्द्वितीयके।

तृतीये गमनं प्रोक्तमिष्टनाशं चतुर्थके ॥ (83)

अन्वय - प्रथमे मन-उद्वेगं द्वितीयके धनहानि: तृतीय गमनं प्रोक्तं चतुर्थक इष्टनाशम्।

पंचमे राज्य-विध्वंसं षष्ठे सर्वार्थनाशनम्।

सप्तमे व्याधिदु:खानि अष्टमे मृत्युमादिशेत्॥ (84)

अन्वय - यह श्लोक अन्वित क्रम होने से अन्वय नहीं दिया जा रहा है।

भावार्थ - समझने की सुविधा हेतु तीनों श्लोकों का भावार्थ एक साथ दिया जा रहा है।

प्रात: काल में (सूर्योदय के समय) यदि विपरीत स्वर प्रवाहित होता है, अर्थात् प्रात:काल सूर्य स्वर के स्थान पर चन्द्र स्वर प्रवाहित हो और चन्द्र स्वर के स्थान पर सूर्य स्वर प्रवाहित हो, तो प्रथम काल खण्ड में मानसिक चंचलता होती है, दूसरे कालखण्ड में धनहानि, तीसरे में यात्रा (अनचाही) चौथे में असफलता, पॉचवें में राज्य विध्वंस, छठवें में सर्वनाश, सातवें में शरीर व्याधि और कष्ट तथा आठवें कालखण्ड में मृत्यु। (82 - 84 श्लोक)

English Translation:- All the three verses have been taken together for comprehension.

If in the morning, i.e. at sun rise, as per turn breath flow should be through right nostril but it is flowing through left nostril or the turn is of left nostril but breath flow is through right nostril, then such opposite flow causes unpleasant results. In such cases, if 24 hours are devided into eight equal parts, in the first part we observe mental restlessness, second part causes loss of property, third unwanted journey, fourth unsuccess, fifth destroy of kingdom (house etc), sixth total or maximum loss, (miseries), Seventh physical disease and pain (also trouble) and eighth part causes death or trouble like death. ( 82 – 84 verses).

कालत्रये दिनान्यष्टौ विपरीतं यदा वहेत्।

तदा दुष्टफलं प्रोक्तं किंचिन्यूनं तु शोभनम॥ (85)

अन्वय - यह श्लोक भी अन्विति क्रम में है, अतएव इसका अन्वय नहीं दिया जा रहा है।

भावार्थ - आठ दिनों तक निरन्तर प्रात:, दोपहर और सायंकाल यदि विपरीत स्वर चले, तो सभी कार्यों में असफलता मिलती है और कीर्ति लेशमात्र भी नहीं मिलती।

English Translation:- If in place of left nostril right nostril breaths and in place of right nostril left nostril breaths continuously for eight days during all the three transition points of the days, i.e. sun-rise, mid day and sunset, we never get success and name and fame.

प्रातर्मध्याहृयोश्चन्द: सांयकाले दिवाकर:।

तदा नित्यं जयो लाभो विपरीतं विवर्जयेत्॥ (86)

अन्वय - यह श्लोक भी अन्विति क्रम में है अतएव इसका अन्वय आवश्यक नहीं है।

भावार्थ - यदि सूर्योदय काल और मध्याह्न में चन्द्र स्वर और सूर्यास्त के समय सूर्य स्वर प्रवाहित हो तो उस दिन हर तरह की सफलता मिलती है। लेकिन स्वरों का क्रम यदि उल्टा हो, तो शुभ कार्यों को न करना ही बुद्धिमानी है।

English Translation:- If breath flows through left nostril at sun-rise and mid-day and through right nostril at sun-set, we get all types of success. But if the order of breath is opposite to the above, we must postpone good and auspicious work.

वामे वा दक्षिणे वापि यत्र संक्रमते शिव:।

कृत्वा त्पादमादौ च यात्रा भवति सिद्धिदा॥ (87)

अन्वय - यह श्लोक भी अन्विति क्रम में है अतएव अन्वय नहीं दिया जा रहा है।

भावार्थ - यात्रा प्रारम्भ करते समय जिस नाक से साँस चल रही हो वही पैर घर से पहले निकाल कर यात्रा करनी चाहिए। इस प्रकार यात्रा निर्विघ्न सफल होती है।

English Translation:- While undertaking the journey we take the same foot out of house through which nostril the breath flows at the time.

चन्द्र: समपद: कार्यो रविस्तु विषम: सदा।

पूर्णपादं पुरस्कृत्य यात्रा भवति सिद्धिदा॥ (88)

अन्वय - आवश्यकता नहीं है।

भावार्थ - यदि चन्द्र स्वर प्रवाहित हो तो समसंख्या में तथा सूर्य स्वर के प्रवाह के समय विषम संख्या में कदम भरना चाहिए। इससे यात्रा सिद्धिप्रद होती है।

English Translation:- In case of flow left nostril our steps should end in even numbers, whereas in case of right nostril they should be in odd numbers.

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12 टिप्‍पणियां:

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  2. उपयोगी आलेख. मैं ने अपने पितामह से यह सीखा था कि "यात्रा प्रारम्भ करते समय जिस नाक से साँस चल रही हो वही पैर घर से पहले निकाल कर यात्रा करनी चाहिए। इस प्रकार यात्रा निर्विघ्न सफल होती है।" आज इसे श्लोक रूप में जान कर बहुत अच्छा लग रहा है. सहसा गोलोकवासी 'मेरे बाबा' का चेहरा भी आँखों के आगे तैर गया... !

    आचार्यजी, बहुत-बहुत धन्यवाद !!

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  3. आदरणीय श्री परशुराम जी,
    पिछले कई अंको को लगातार पढ़ रहा हूँ ,स्वर प्रवाह के गुण- दोष की इतनी गहरी जानकारी आपके लेख में समाहित होती है जिसे जानने के लिए बड़ी साधना करनी पड़ती!
    आप जैसे मनीषियों के जुड़ने से ही मनोज ब्लॉग का आज ब्लॉग जगत में एक गरिमामय स्थान है !
    आपका कृपाकांक्षी ,
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  4. उपयोगी और सार्थक प्रस्तुति।

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  5. ज्ञानवर्धक जानकारी के लिए आभार।

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  6. राय जी इसका एक-एक अंक संग्रहणीय है। बेहद ज्ञानवर्धक प्रस्तुति।

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  7. स्वरयोग एक उपयोगी विद्या है जिसका प्रयोग स्वास्थ्य और व्यवहार को सुफल बना सकता है। यह ज्ञान सभी के समक्ष क्रमवार प्रस्तुत करने के लिए आचार्य राय जी को बहुत बहुत धन्यवाद।

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  8. सभी पाठकों कों स्वरोदय विज्ञान पर रुचि प्रदर्शित करने तथा अपनी टिप्पणियों के माध्यम से प्रोत्साहित करने के लिए आभार।

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