शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

शिवस्वरोदय-23 :: सक्रिय और निष्क्रिय स्वरों में किए कार्यों के परिणाम

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में सक्रिय और निष्क्रिय स्वरों में किए कार्यों के परिणामों चर्चा की गयी थी। वही क्रमशः दिया जा रहा है।

शून्यनाड्या विपर्यस्तं यत्पूर्वं प्रतिपादितम्।

जायते नान्यथा चैव यथा सर्वज्ञभाषितम्।।96।।

अन्वय – शून्यनाड्या विपर्यस्तं यत्पूर्वं प्रतिपादितं (तत्सर्वं भवति) न अन्यथा जायते यथा सर्वज्ञभाषितम्।

भावार्थ – उपर्युक्त श्लोकों में बताए गई विधियों के विपरीत अर्थात सक्रिय स्वर के विपरीत यदि हम निष्क्रिय स्वर में कार्य करते हैं, तो निश्चित रूप से विपरीत और अवांछित परिणाम होते हैं।

English translation – As mentioned in previous verses, if any work is undertaken during the period of breathing side, which is not suitable for the same, the result will be opposite, i.e. desired result is not obtained. This is the established view of wise-men.

व्यवहारे खलोच्चाटे द्वेषिविद्यादिवञ्चके।

कुपितस्वामिचौराद्ये पूर्णस्थाः स्युर्भयङ्कराः।।97।।

अन्वय – यह श्लोक अन्वित क्रम में ही है, अतएव अन्वय नहीं दिया जा रहा है।

भावार्थ – यदि किसी के सक्रिय स्वर की ओर कोई दुष्ट या धोखेबाज, शत्रु, ठग, नाराज स्वामी अथवा चोर दिखाई पड़ जाय, तो समझना चाहिये कि उसे खतरा है अर्थात वह सुरक्षित नहीं है।

English Translation - If any bad man, cheater, boss or master who is not pleased or thieves appear on the side through which nostril breath is not flowing, that situation is not said to be safe.

दूराध्वनि शुभश्चन्द्रो निर्विघ्नोSभीष्टसिद्धिदः।

प्रवेशकार्यहेतौ च सूर्यनाडीप्रशस्यते।98।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम है।

भावार्थ – लम्बी यात्रा का आरम्भ करते समय फलदायक है और किसी कार्यवश  किसी के घर में प्रवेश करते समय सूर्य स्वर का सक्रिय होना फलप्रद होता है।

English translation – At the time of starting a long journey if breath is flowing  through left nostril, the journey undertaken will be successful in all respect. But if someone is to visit anybody for any work, he should enter his house when breath flows through right nostril for favourable results.

अयोग्ये योग्यता नाड्या योग्यस्थानेप्ययोग्यता।

कार्यानुबन्धनो जीवो यथा रुद्रस्तथाचरेत्।99।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – जिस व्यक्ति को स्वरोदय विज्ञान की जानकारी नहीं है और वह स्वर के विपरीत अपने कार्य करता है, तो वह उस कार्य के बंधन में बँधा रहता है। इस लिए सदा स्वर के अनुकूल कार्य करना चाहिए।

English Translation – A person who is not aware of Swaroday science and he does  the things in opposite breath flow, he develops attachment to the work and its results. It is therefore better to do the work in accordance with the favourable breath flow.

चन्द्रचारे विषहते सूर्यो बलिवशं नयेत्।

सुषुम्नायां भवेन्मोक्ष एको देवस्त्रिधा स्थितः।।100।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में होने के कारण इसका अन्वय नहीं दिया जा रहा है।

भावार्थ - चन्द्र स्वर के प्रवाह काल में विष से दूर रहना चाहिए। सूर्य स्वर के प्रवाह काल में किसी व्यक्ति को नियंत्रित किया जा सकता है। शून्य स्वर अर्थात सुषुम्ना नाड़ी के प्रवाह काल में मोक्ष-कारक कार्य करना चाहिए। इस प्रकार एक ही स्वर तीन अलग-अलग रूपों में काम करता है।

English Translation – We should keep ourselves away from poisonous things during the flow of breath through left nostril. Flow of breath through right nostril is suitable for having control on others. The period of breathing through right nostril is suitable for spiritual practices. Thus the very same breath works in three different ways.

शुभान्यशुभकार्याणि क्रियन्तेSहर्निशं यदा।

तदा कार्यानुरोधेन कार्यं नाडीप्रचालनम्।।101।।

अन्वय – यदा अहर्निशं शुभान्यशुभकार्याणि क्रियन्ते तदा कार्यानुरोधेन नाडीप्रचालनं कार्यम्।

भावार्थ – जब दिन अथवा रात के समय किसी व्यक्ति को शुभ-अशुभ कोई भी कार्य करना हो, तो उसे आवश्यकता के अनुसार अपनी नाडी को बदल लेना चाहिए।

English TranslationWhile doing any auspicious or inauspicious work during the  day or night, a person should change the side of breath according to need.

अगले अंक में इडा नाडी के प्रवाह-काल में किए जाने वाले कार्यों का विवरण दिया जाएगा।

17 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय आचार्य परशुराम जी,
    पूर्व की भांति यह भाग भी विश्लेषण से भरा अत्यंत जानकारी परक है !
    धन्यवाद,
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

    उत्तर देंहटाएं
  2. अद्भुत खज़ाना है यह ज्ञान का..आचार्य जी के ज्ञान कोष का एक और नगीना!

    उत्तर देंहटाएं
  3. अचार्य जी के ग्यान और कर्मनिष्ठा को नमन करती हूँ। बहुत उपयोगी जानकारी है। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  4. पाठकों का उत्साह-वर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  5. यदि स्वरानुसार किए गए कार्यों के भी शुभ फल प्राप्त न हों,तो दोष किसे दें?

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ज्ञानवर्धक पोस्ट..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  7. "समस हिंदी" ब्लॉग की तरफ से सभी मित्रो और पाठको को एक दिन पहले
    "मेर्री क्रिसमस" की बहुत बहुत शुभकामनाये !

    ()”"”() ,*
    ( ‘o’ ) ,***
    =(,,)=(”‘)<-***
    (”"),,,(”") “**

    Roses 4 u…
    MERRY CHRISTMAS to U

    उत्तर देंहटाएं
  8. शिक्षामित्र जी,
    स्वर के साथ उसमें उदय होनेवाले तत्वों के उदय-काल का भी कार्य के सन्दर्भ में तत्वों की अलुकूलता और प्रतिकूलता का विचार भी करना चाहिए। तत्वों के विषय में चर्चा शिवस्वरोदय में श्लोक संख्या 156 से 179 तक की गई है, जिसे आगे चर्चा के लिए लिया जाएगा। वैसे इस शृंखला के प्रारम्भिक 9 अंकों को देखा जा सकता है। आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  9. "मेर्री क्रिसमस" की बहुत बहुत शुभकामनाये

    उत्तर देंहटाएं

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।