रविवार, 30 अक्तूबर 2011

भारतीय काव्यशास्त्र – 89


भारतीय काव्यशास्त्र – 89

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में पदगत, पदांशगत, समासगत और सामान्य वाक्यगत दोषों पर समापन चर्चा हुई थी। इस अंक में केवल वाक्य में पाए जानेवाले इक्कीस दोषों में से प्रथम तीन दोषों - प्रतिकूलवर्णता, उपहतविसर्गता और विसंधि पर चर्चा की जाएगी।

जहाँ रस के प्रतिकूल वर्णों का और समासयुक्त लम्बे पदों (संस्कृत में) का प्रयोग काव्य में पाया जाय, वहाँ प्रतिकूलवर्णता दोष होता है। जैसे शृंगार रस में श्रुतिकटु वर्णों का प्रयोग और रौद्र, वीर आदि रसों में कोमल वर्णों का प्रयोग प्रतिकूलवर्णता दोष होता है। जैसे नीचे के श्लोक में शृंगार रस है, पर वर्ण का इतनी बार प्रयोग हुआ है कि मजा किरकिरा कर देता है-

अकुण्ठोत्कण्ठया पूर्णमाकण्ठं कलकण्ठि माम्।

कम्बुकण्ठ्याः क्षणं कण्ठे कुरु कण्ठार्त्तिमुद्धर।।

अर्थात् हे कलकंठि (नायिका की मधुर कंठवाली दूती या सहेली), कम्बुकण्ठी (शंख के समान गरदन वाली नायिका) प्रियतमा से मिलने के लिए मेरी उत्कंठा कंठ तक आ गयी है, अतएव मुझे उसके कंठालिंगन के लिए अवसर देकर कंठ में मेरे फँसे प्राणों की रक्षा करो।

यहाँ बार-बार का प्रयोग होने के कारण प्रतिकूलवर्णता दोष है। इसी प्रकार रौद्र रस में कटु वर्णों का प्रयोग न कर कोमल वर्णों का प्रयोग करने से प्रतिकूलवर्णता दोष निम्नलिखित श्लोक में देखा जा सकता है। यह श्लोक वेणीसंहार नाटक से लिया है और द्रोणपुत्र अश्वत्थामा की उक्ति है-

देशः सोयमरातिशोणितजलैर्यस्मिन् ह्रदाः पूरिताः

क्षत्रादेव तथाविधः परिभवस्तातस्य केशग्रहः।

तान्येवाहितहेतिघस्मरगुरूण्यस्त्राणि भास्वन्ति मे

यद्रामेण कृतं तदेव कुरुते द्रोणात्मजः क्रोधनः।।

अर्थात् यही वह देश (कुरुक्षेत्र) है, जहाँ परशुराम ने अपने पिता के केश पकड़ने वाले कार्तवीर्य अर्जुन सहित क्षत्रियों का विनाशकर उनके रक्तरूपी जल से तालाबों को परिपूर्ण किया था और शस्त्र उठानेवाले शत्रुओं को निगल जानेवाले वे ही उत्तम शस्त्र मेरे पास भी हैं। इसलिए जिस प्रकार उन्होंने उस समय समस्त क्षत्रियों का विनाश किया था, आज उसी प्रकार अपने पिता के केश पकड़कर हत्या करनेवाले क्षत्रियों का विनाश मैं क्रुद्ध द्रोणपुत्र अश्वत्थामा करूँगा।

यहाँ रौद्र रस के अनुकूल कटु वर्णों का प्रयोग काफी विरल होने और लम्बे समासयुक्त पदों के अभाव में प्रतिकूलवर्णता दोष है।

एक हिन्दी का उदाहरण लेते हैं। यह प्रकृति की शोभा के प्रति लक्ष्मण की उक्ति है। इसमें प्रकृति के प्रति अनुराग भाव के अनुकूल कोमल वर्णों का न प्रयोग कर -युक्त पदों के प्रयोग के कारण यहाँ भी प्रतिकूलवर्णता दोष है-

सब जाति फटी दुख की दुपटी कपटी न रहै जहँ एक घटी।

निघटी रुचि मीचु घटीहूँ घटी जगजीव-जतीन की छूटी चटी।

अघ-ओघ की बेरी कटी बिकटी निकटी प्रकटी गुरु ग्यान गटी।

चहुँ ओरनि नाचति मुक्ति नटी गुन धूरजटी जटी पंचवटी।

जब काव्य में ऐसे पदों का प्रयोग हो जिनमें विसर्ग का अनेक बार लोप हुआ हो या ओ के रूप में आया हो, तो वहाँ उपहतविसर्गता दोष होता है। इसमें व्याकरण समबन्धी कोई त्रुटि नहीं होती है। यह दोष हिन्दी में नहीं पाया जाता है। निम्नलिखित श्लोक में इसे देखा जा सकता है-

धीरो विनीतो निपुणो वराकारो नृपोऽत्र सः।

यस्य भृत्या बलोत्सिक्तता भक्ता बुद्धिप्रभाविताः।।

अर्थात् इस संसार में वही राजा धीर, विनीत, निपुण और सुन्दर है, जिसके सेवक अपने बल पर गर्व करते हों, स्वामी के प्रति निष्ठावान हों और बुद्धि के धनी हों।

यहाँ श्लोक के पूर्वार्द्ध में धीरो विनीतो निपुणो वराकारो नृपो में धीरः, विनीतः, निपुणः, वराकारः और नृपः पदों के विसर्ग का हो गया है और उत्तरार्द्ध में भृत्या, बलोत्सिक्तता और भक्ता में इनके विसर्गों का लोप हो गया है। अतएव यहाँ उपहतविसर्गता दोष है।

जहाँ सन्धि आवश्यक हो, वहाँ सन्धि न होना या न करना ही विसन्धि दोष कहलाता है। विसन्धि दोष तीन प्रकार के होते हैं- विश्लेष, अश्लीलता और कष्टत्वविश्लेष विसन्धि दोष भी पुनः तीन प्रकार के होते हैं- विवक्षाधीन विसन्धि, प्रगृह्यसंज्ञानिमित्तक विसन्धि और असिद्धहेतुक विसन्धि। ये दोष भी हिन्दी काव्य में नहीं पाये जाते। वैसे सन्धि करना या न करना वक्ता या लेखक की अपनी इच्छा है। इसी को विवक्षाधीन कहा जाता है। लेकिन जहाँ सन्धि की सम्भावना हो, वहाँ सन्धि न करना कवि की अक्षमता का द्योतक है। इसलिए इसे काव्य में दोष की संज्ञा दी गयी है। वैसे सन्धि के कारण काव्य में क्लिष्टता और अश्लीलता भी आ जाती है। अतएव कवि को ऐसे पदों का चुनाव कर काव्य का सृजन करना चाहिए कि विसन्धि भी न हो, अश्लीलता भी न हो और काव्य में क्लिष्टता भी न आन पाए।

निम्नलिखित श्लोक में विवक्षाधीन विसन्धि और प्रगृह्यसंज्ञानिमित्तक विसन्धि दोष देखे जा सकते हैं-

राजन्! विभान्तिभवतश्चरितानि तानि

इन्दोर्द्युतिं दधति यानि रसातलेSन्तः।

धीदोर्बले अतितते उचितानुवृत्ती

आतवन्ती विजयसम्पदमेत्य भातः।।

अर्थात् हे राजन्, आपके लोकोत्तर चरित्र चन्द्रमा की कान्ति की तरह गहनतम रसातल में भी प्रकाशमान हो रहे हैं और उत्तम एवं उचित कार्यों में संलग्न आपके बुद्धिबल और बाहुबल विजय-सम्पत्ति को संसार में विस्तृत कर सुशोभित हो रहे हैं।

यहाँ पहले दो चरणों में तानि और इन्दोः के बीच दीर्घ सन्धि कर तानीन्दोः पद बनाना चाहिए था। पर ऐसा करने से छन्द-भंग हो जाता। अतएव कवि ने विवक्षा (अपनी इच्छा) को आधार मानकर संधि नहीं की, यह उसकी स्वतंत्रता है। लेकिन काव्यशास्त्री यह मानते हैं कि कवि को ऐसे पदों का चुनाव करना चाहिए कि विसन्धि दोष भी न हो और छंद-भंग भी न हो। अतएव इन दो चरणों में उक्त कारण से विवक्षाधीन विसन्धि दोष है। अन्तिम दो चरणों में हर पद के बाद सन्धि की सम्भावना होते हुए भी सन्धि इसलिए नहीं की गयी है कि वह व्याकरण विरुद्ध होता। आचार्य पाणिनि के अनुसार द्विवचन में ई, ऊ और ए की प्रगृह्यसंज्ञा होती है और इसलिए इनमें संधि नहीं होती। अतएव यहाँ संधि न कर कवि ने गलत नहीं किया, क्योंकि व्याकरण का नियम उसकी अनुमति नहीं देता। अतएव यहाँ विसंधिदोष नहीं मानना चाहिए। काव्यशास्त्र का मत यह है कि ऐसी स्थिति का प्रयोग एक स्थान पर तो क्षम्य हो सकता है, लेकिन एक ही वाक्य में तीन स्थानों पर ऐसी स्थिति का होना कवि की अक्षमता को व्यक्त करता है। इसलिए यहां प्रगृह्यसंज्ञानिमित्तक विसंधि दोष है।

असिद्धहेतुक विश्लेष विसन्धि दोष के लिए निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया जा रहा है। यह पति को वरण करने के लिए उद्यत कन्या से उसकी सहेली की उक्ति है-

तत उदित उदारहारिद्युतिरुच्चैरुदयाचलादिवेन्दुः।

निजवंश उदात्तकान्तकान्तिर्बत मुक्तामणिवच्चकास्त्यनर्घः।।

अर्थात् अत्यन्त ऊँचे उदय गिरि से विशुद्ध मोती की माला के समान मोहक कान्ति से युक्त उदित चन्द्रमा के समान, उत्तम राजवंश में उत्पन्न, चमकती मोतियों की माला धारण किए सौन्दर्य से युक्त यह राजा उत्तम बाँस से उत्पन्न बहुमूल्य मणि की तरह शोभायमान हो रहा है।

इस श्लोक में तत और उदित पदों में विसर्ग सन्धि होने के कारण उसका लोप हो गया है, जो व्याकरण की दृष्टि से उचित होते हुए भी असिद्धहेतुक संधिविश्लेष के कारण विसन्धि दोष है।

इसी प्रकार ऐसे पदों का प्रयोग करना जिसमें संधि होने से अश्लीलता झलके, वहाँ अश्लीलताजन्य विसन्धि दोष होता है-

वेगादुड्डीय गगने चलण्डामरचेष्टितः।

अयमुत्तपते पत्री ततोSत्रैव रुचिङ्कुरु।।

अर्थात् वेग से आकाश में उड़कर उत्कट चेष्टाकर चलता हुआ यह बाज उत्तप्त हो रहा है, अर्थात् लगता है कि नायक यहीं है। अतएव यहीं अपनी इच्छा पूरी करो।

यहाँ चलन् और डामर पदों में सन्धि होने के कारण चलण्डामर हो गया है। किन्तु इसका लण्डा अंश विष्टा या शिश्न अर्थ का द्योतक होने के कारण अश्लीलता की झलक देता है। इसी प्रकार रुचिं और कुरु पदों की संधि के कारण रुचिङ्कुरु का चिङ्कु अंश स्त्री की योनि का वाचक होकर अश्लीलता का द्योतक है। इसलिए यहाँ अश्लीलताजन्य विसन्धि दोष है। अतएव कवि को ऐसे पदों का चुनाव करना चाहिए था, ताकि संधि करने के बाद भी ऐसी स्थिति न आती।

संधि के कारण क्लिष्टताजन्य विसंधि दोष के लिए निम्नलिखित श्लोक उद्धृत है-

उर्व्यसावत्र तर्वाली मर्वन्ते चार्ववस्थितिः।

नात्रार्जु युज्यते गन्तुं शिरो नमय तन्मनाक्।।

अर्थात् मरुदेश के अन्त में यहाँ विस्तृत पृथ्वी सुन्दर वृक्षों की पंक्ति से ढकी हुई है। यहाँ सीधे होकर चलना सम्भव नहीं, अतएव थोड़ा सिर झुका लो।

इस श्लोक में उर्वी+असौ=उर्व्यसौ, तरु+आली=तर्वाली, मरु+अन्ते=मर्वन्ते, चारु+ अवस्थितिः=चार्ववस्थितिः और अत्र+ऋजु=अत्रर्जु पदों मे संधि के कारण अर्थबोध में कठिनाई हो रही है। अतएव इस श्लोक में क्लिष्टताजन्य विसंधि दोष है। साथ ही कर्णकटु ध्वनियों की बहुलता आ गयी है, जिससे श्रुतकटुत्व दोष भी उत्पन्न हो गया है।

इस अंकमें बस इतना ही।

*****


10 टिप्‍पणियां:

  1. ओह! कविता के नाम से बिदक कर चल देने की मेरी आदत गलत है। इतना रोचक दोष-विवरण मिस कर देता, अगर पोस्ट न पढ़ता!
    धन्यवाद।

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  2. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 31-10-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  3. हिंदी/संस्कृत भाषाएँ कितनी समृद्ध हैं...ये बानगी आपक़े पोस्ट से परिलक्षित होती है...धन्यवाद...

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  4. उत्कृष्ट जानकारी देती पोस्ट,आपका हार्दिक आभार ।

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  5. चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने आपकी पोस्ट " भारतीय काव्यशास्त्र – 89 " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 31-10-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  6. एक उत्कंठा जागी है, क्या संस्कृत काव्य में ज्यादा दोष होते हैं और हिन्दी काव्य में कम ? और इसके लिये क्या उत्तरदायी है ?

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  7. काव्यशास्त्र के बारे में विविध जानकारी प्राप्त कर मन अह्लादित हुआ।

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  8. रस्तोगी जी,
    सादर नमस्कार,

    दोनों भाषाओं की प्रकृति अलग होने के कारण काव्य दोषों में अन्तर आना स्वाभाविक है। संस्कृत में सन्धि की बहुलता पायी जाती है, विसर्ग का प्रयोग होता है और समास की प्रधानता पायी जाती है। जबकि हिन्दी की इस प्रकार की प्रकृति नहीं है। यही कारण है कि बहुत से ऐसे दोष हैं जो संस्कृत में ही पाए जाते हैं, हिन्दी में नहीं। आभार।

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  9. शायद आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर भी हो!
    सूचनार्थ!

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