गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

आँच – 90 : थिरक-थिरक उठते संबोधन


आँच 90 :  थिरक-थिरक उठते संबोधन

-- करण समस्तीपुरी

श्री श्यामनारायण मिश्र कोमल भाव के कवि हैं। इनकी पंक्तियों में पंत सदृश भावों की तरलता दिखती है, किन्तु ऐसा लालित्य अन्यत्र दुर्लभ है। मिश्रजी की रचनाओं में सरस आंचलिक अभिव्यक्तियां हिलोरें मारती हैं। आप ललित भारतीय संस्कृति के मधुर गायक हैं। आप ग्रामीण जीवन के कुशल चितेरे हैं। आपकी रचनाओं के एक-एक शब्द रस की ऐसी चासनी में डूबे होते हैं, जिसे आंच पर चढ़ाने का साहस मैं तो नहीं ही कर सकता। इसीलिये आज मैं आंच नहीं सांच लेकर आया हूँ।

“अर्थोगिरामपिहितपिहित्श्च कश्चित्‍सौभाग्यमेति मरहट्टबधूकुचाभः।
नांध्रीपयोधर इवतितरां निगूढः, नो गुर्जरी स्तनं इवतितरा प्रकाशः ॥”
कविता वही सर्वोत्त्म है, जिसका अर्थ मराठबालाओं के कुच की तरह अधखुला हो। मिश्रजी लक्षणा के कवि हैं। इनकी प्रायः कविताएं लक्षणा-मिश्रित व्यंजना के उदाहरण हैं। आपके गीतों के बिम्ब बोलते हैं, कर्णप्रिय शब्दों से आगे बढ़कर। आलोच्य रचना “थिरक-थिरक उठते संबोधन” भी इसी श्रेणी का गीत है, जिसे पढ़ते हुए इस महानगरीय कोलाहल में भी एक अलग ही कल्प-लोक का निर्माण हो जाता है। उस कल्प लोक में होते हैं रिमझिम-रिमझिम सावन, फ़ाग और चैता के बोल, कान्हा के वेणु का स्वर, धेनुओं के ग्रीवालंबित घंटियों का ताल, वृंदावन की हरितिमा, कालिंदी का कल-कल प्रवाह, शस्य-श्यामल खेतों में श्रमरत कृषक-वृंद और मेड़ों पर गीत-गाती ग्राम-बालाएं।

वर्षा-ऋतु में प्राणवान हुई प्रकृति का बड़ा ही सजीव चित्रण है। इस पावस-गीत की हर एक पंक्ति में कवि ने लक्षणा-वृत्ति का निर्वाह किया है। पहले बंद में गरजते बादलों के लिये “ढोल बजाना” और आकाश में नाचती बिजली के लिये “घुंघरु बांधना” कोई ऐसा शब्द नहीं है, जिसे सामन्य श्रोता-पाठक परिचित नहीं हों, किन्तु मिश्रजी ने इन उपमानों का प्रयोग इतनी सुंदरता के साथ किया है कि ये अत्यंत नवीन, मनोरम और सौंदर्यप्राण लगते हैं।

वर्षा की बूंदों से बचने के लिये पपिहरी मड़वा पर आ गयी है। खेतों में पानी लगते ही गाँवों में बिरहा के स्वर गूंजने लगे हैं। ठुमरी एक ऐसी गायन शैली है, जिसमें कई रागों को जोड़-तोड़ कर गाया जाता है। शायद इसी गुण के कारण कवि ने कभी तेज, कभी मद्धिम, रुक कर फिर तेज चलने वाली दही विलोने की प्रक्रिया का लक्षण ठुमरी से किया है।

थिरक-थिरक उठरे संबोधन, छुटकी-बड़की-मझली कवि का अभिप्रेत है आंचलिक संबोधन में निहित अपनापन। तथाकथित आधुनिक और विकसित समाज के संबोधन में इस अपनत्व का किंचित अभाव होता है।

गीत पंक्ति-दर-पंक्ति आंचलिक जीवन की गहराईयों में लिये जाता है। अगले बंद में कवि ने हरी-भरी प्रकृति के चित्र को और जीवंत बनाने के लिये लोक-गीत की शैलियों का बहुत ही चमत्कारिक किन्तु संगत प्रयोग किया है।

“ससुर सवैया जेठ अल्हैती,
देवर जैसे रसिया।
सास-जेठानी जैसी सोहर,
ननदी बात-बतसिया।
ठनगन करते आंगन देखे सेज सुहागिन मचली।”

हरेक संबंध के साथ जुड़े सांगितिक विशेषण पारिवारिक-जीवन और संबंधों की विशिष्टता को अनुप्राणित करते हैं।

सवैया एक पौराणिक छंद है, जिसमें मात्राओं का अनुशासन आवश्यक होता है। ससुर का आदरणीय संबंध इसी पौराणिकता और अनुशासन-प्रियता का द्योतक होता है। अल्हैती गाँव में गाए जाने वाला आल्हा-उदल की वीरगाथा है, जिसमें ओज के स्वर मुखर होते हैं। इसका गायन कभी मध्यम और बहुधा उच्च स्वर में होता है। जेठ में अपेक्षाकृत ओज की अधिकता और अन्य चारित्रिक साम्य के कारण यह उपमान भी उपयुक्त जान पड़ता है। देवर अर्थात यौवन में प्रधानता है रस की, और ननद में बाल-सुलभ अल्हड़पन की इसी लिये बात-बतसिया मतलब कि हवा-हवाई

सास और जेठानी जैसे संबंध सोहर (अक्सर बच्चों के जन्म पर गाये जाने वाला गीत) की तरह पारंपरिक होते हैं, कभी नीम-नीम, कभी शहद-शहद, कभी नर्म-नर्म, कभी सख्त-सख्त। 

सेज सुहागन मचली सावन प्रतीक है संयोग का। संदेश है नव-सृजन का। यह एक और बेजोर लाक्षणिक प्रयोग है। परिवार के अन्य सदस्यों को अन्य अभिरुचियों में लिप्त पाकर सुहागन की शृंगारिक अभिलाषाएं मचलने लगती हैं।

कविता के अंतिम बंद उज्ज्वल अतीत के आंचल में ले जाते हुए प्रतीत होते हैं।
सुआ (सुगा) पढाते महाकव्य किंवदन्ति है कि आठवीं शताब्दि में मिथिलांचल में हुए प्रसिद्ध मीमांसक मंडन मिश्र के घर तोते भी वेद का पाठ करते थे। ग्रामीण जीवन में सिर्फ़ अल्हड़ भोलापन ही नहीं होता, यह बौद्धिकता का भी उद्गम है। तथाकथित आधुनिक युग को दर्पण दिखाने का प्रयास कि जो दुर्लभ ग्यान आज के मनुष्य को नहीं है वह तो उस समय सुग्गे जैसे मानवेत्तर प्राणी भी रखते थे। बड़े-बड़े दर्शन और सिद्धांत जिनकी खोज अध्येता पुस्तकालय और प्रयोगशालाओं में करते रहते हैं, वो सूत्र गाँव के सहज जीवन में सहजता से प्रस्फ़ुटित हो जाता है, खैनी मलते दर्शन

मचिया बुनते अर्थशास्त्र कौटिल्य की कर्म-निष्ठा और विद्वता को इंगित करने का अस्पष्ट प्रयास है। आंचलिक अर्थ में कहें तो अर्थशास्त्र के उत्पादन-आपूर्ती-मांग के सिद्धांत को व्यवहारिक रूप गांवों में कहीं अधिक सहजता से दिया जाता है।   

इस प्रकार आलोच्य रचना शब्द और अर्थ की गरिमा के साथ आद्योपांत कल-कल बहती है। पहला बंद में पावस में प्रकृति का सुंदर चित्रण है तो दूसरा सरस पारिवारिक संबधों का किन्तु अंतिम बंद उपर्युक्त जो कि कविता का मूल भाव भी है से कटा हुआ सा प्रतीत होता है। कवि ने ऐतिहासिक आख्यानों को इंगित कर कविता की गरिमा बढ़ाने का सुंदर प्रयास किया है मगर अर्थ का उत्कर्ष नहीं आ पाने से भाव अस्पष्ट रह गये हैं।

ग्यान-विग्यान कभी पुराना और अनुपयोगी नहीं होता, (जिसे हम बेशक गंवार, पुरातनपंथी कह कर त्याग देते हैं)। बस उसके जिल्द अर्थात बाह्य-स्वरूप पर गए कालक्रम और अनभ्यास के धूल को झार दें तो वह फिर से अपनी आभा बिखेरने लगते हैं। यदि छायावाद की स्थुल और सूक्ष्म की प्रवृति से अर्थाग्रह करें तो बाह्य-स्वरूप ही मलीन होती है, अंतर में आत्मा का स्वरूप सदा उज्ज्वल रहता है।
इस प्रकार अन्त्य-पंक्ति “जिल्दे ही दिखती हैं मैली, हर किताब है उजली” यद्यपि व्यापक अर्थ का द्योतक है, परंतु इसका साम्य अन्य पंक्तियों से हठात बिठाना पड़ता है। कविता और ग़ज़ल में एक मूलभूत अंतर यह है कि ग़ज़ल के अशआर एक दूसरे स्वतंत्र भी हो सकते हैं, परंतु कविता में आद्योपांत एक ही भाव के संपोषण की परंपरा रही है। 

16 टिप्‍पणियां:

  1. करन बाबू, बहुत सुन्दर समीक्षा लिखी आपने। आपको और अपने सभी पाठकों दशहरा के पावन पर्व पर हार्दिक बधाई।

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  2. श्री श्यामनारायण मिश्र जी की रचनाएँ मुझे बहुत अच्छी लगती हैं.अच्छी समीक्षा.

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  3. आप सब को विजयदशमी पर्व शुभ एवं मंगलमय हो।

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  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. करण जी,

    मिश्रजी के गीत लोक संस्कारों की अनुगूँज होते हैं। इन्हें पढ़ना आत्मतोष देता है। गीत पर आपकी समीक्षा ने गीत के अर्थ तक सामान्य पाठक की सहज पहुँच बनाई है, क्योंकि मिश्रजी के बिम्ब अधिकतर गूढ़ बने रहते हैं। जिनका ग्राम्य जीवन से अधिक सम्पर्क नहीं रहा है उनके लिए तो ये बिम्ब और दुरूह हो जाते हैं। आपने एक-एक बिम्ब के अर्थ को जिस प्रकार विस्तार दिया है वह प्रशंसनीय है।

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  7. विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं। बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक यह पर्व, सभी के जीवन में संपूर्णता लाये, यही प्रार्थना है परमपिता परमेश्वर से।
    नवीन सी. चतुर्वेदी

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  8. सभी पाठकों को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  9. एक सांस्कृतिक समीक्षा.. मिश्र जी के कविता का माधुर्य और यह समीक्षा... एक सम्पूर्ण विन्यास प्रस्तुत किया है आपने करण जी!!
    दशहरे की शुभकामनाएं..आचार्य जी, मनोज जी, हरीश जी और आपको!!

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  10. बहुत सुन्दर समीक्षा लिखी आपने ...

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