सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

प्रभुसत्ता निर्भर है कबाड़ी पर



प्रभुसत्ता निर्भर है कबाड़ी पर

श्यामनारायण मिश्र

कीर्ति की पहाड़ी पर

चढ़ने को आतुर हैं बौने
बैठकर प्रपंचों की
         पुश्तैनी गाड़ी पर।

दुधमुहों के
मृदुल अधरों पर
आचरण का एक अक्षर
         धर नहीं सकते।
किन्तु,
अपने मुंह मियां मिट्ठू बने
बात अपने पुण्य की
         कहते नहीं थकते।
पुरखों की थाती
यश-गौरव, प्रभुसत्ता
सब कुछ तो निर्भर है
         आजकल कबाड़ी पर।

दांव पर
सब कुछ लगा कर मौज में
नौसिखिए
         फेंट रहे पत्तियां
गंधमादन घाटियों में
जल रहीं
आयात की
         बारूदी उदबत्तियां।
रास-रंग में डूबे
उथले मन वाले लोग
हुद्द-फुद्द
         नाच रहे ताड़ी पर।

18 टिप्‍पणियां:

  1. कीर्ति की पहाड़ी पर
    चढ़ने को आतुर हैं बौने
    बैठकर प्रपंचों की
    पुश्तैनी गाड़ी पर।

    वाह बहुत ज़बरदस्त प्रस्तुति .वाक़ई, इसी तरह के हालात हैं.

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  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  3. दुधमुहों के
    मृदुल अधरों पर
    आचरण का एक अक्षर
    धर नहीं सकते।

    बहुत सुन्दर नवगीत ..हकीकत को कहता हुआ

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  4. सार्थक विम्बों से सजा गीत!
    सुन्दर प्रस्तुति!

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  5. संदेशपूर्ण व सकारात्मक रचना !

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  6. खुद को भी इस कविता का एक पात्र पाता हूं। शर्मनाक!

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  7. adbhut rachna...
    दुधमुहों के
    मृदुल अधरों पर
    आचरण का एक अक्षर
    धर नहीं सकते।
    waah... kitna sundar...

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  8. उदबत्तियां।
    हुद्द-फुद्द
    कुछ नए शब्द जाने.
    आभार इस सुन्दर गीत को यहाँ पढवाने का.

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  9. दुधमुहों के
    मृदुल अधरों पर
    आचरण का एक अक्षर
    धर नहीं सकते।
    किन्तु,
    अपने मुंह मियां मिट्ठू बने
    बात अपने पुण्य की
    कहते नहीं थकते।
    बहुत खूब सरर्थक और सटीक बात कहता हुआ सुंदर गीत ...आभार

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  10. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  11. अद्भुत लाजवाब नए बिम्बों से सजी एक सर्वथा भिन्न प्रस्तुति

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  12. वर्तमान सियासी परिवेश पर व्यंग्य करता बड़ा ही आकर्षक नवगीत।

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  13. .
    रास-रंग में डूबे
    उथले मन वाले लोग
    हुद्द-फुद्द
    नाच रहे ताड़ी पर।
    .
    ये क्या जाने
    प्रभुसत्ता के द्वार
    खुलते हैं किस ओर
    बस सब निर्भर है कबाड़ी पर
    कि वह उन सद्-ग्रंथों को
    किन हाथों में सौंपेगा
    जिस में भरी पड़ी है
    अमृत-ज्ञान की वर्षा...
    या वह बह जाएगी निर्झर

    बहुत सुंदर भावमयी रचना ...

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  14. किन्तु,
    अपने मुंह मियां मिट्ठू बने
    बात अपने पुण्य की
    कहते नहीं थकते।bhut khub.

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  15. कीर्ति की पहाड़ी पर

    चढ़ने को आतुर हैं बौने
    बैठकर प्रपंचों की
    पुश्तैनी गाड़ी पर।

    बहुत खूब

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