मंगलवार, 1 नवंबर 2011

भगवान अवधूत दत्तात्रेय-4


भगवान अवधूत दत्तात्रेय-4

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक तक भगवान दत्तात्रेय के चौबीस गुरुओं की चर्चा की गयी। इस अंक में उनकी अन्य शिक्षाओं को जानने के पहले इनके जीवन के विषय में थोड़ी चर्चा कर लेते हैं। वैसे इसकी चर्चा प्रथम अंक में ही करनी चाहिए थी। लेकिन पहले इस विषय पर इतनी लम्बी चर्चा करना अभीष्ट नहीं था।

प्रथम अंक में यह बताया गया था कि ये विश्वविख्यात महर्षि अत्रि और माता अनसूया की संतान हैं। महर्षि अत्रि का आश्रम प्रसिद्ध तीर्थ चित्रकूट में था। यहीं भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ और बचपन बीता। कहा जाता है कि महाराज यदु के साथ पूर्वोक्त संवाद यहीं हुआ था, भगवान दत्तात्रेय एक बालक थे। वैसे भागवत महापुराण में ग्यारहवें स्कंध के सातवें अध्याय में उल्लिखित पचीसवें श्लोक के अनुसार महाराज यदु के साथ उनकी भेंट तरुण अवस्था में हुई थी -

अवधूतं द्विजं कञ्चिच्चरन्तमकुतो भयम्।

कविं निरीक्ष्य तरुणं यदुः पप्रच्छ धर्मवित्।।11-07-25।।

चित्रकूट उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की सीमा पर विन्ध्य पर्वतमाला में स्थित है। महर्षि अत्रि के आश्रम के पीछे एक ऊँची चोटी है और वहीं पास में स्थित एक गुफा से मन्दाकिनी की निर्मल धारा निकलती है। कहा जाता है कि वहाँ के वातावरण में आज भी निर्भयता और शान्ति पूर्णरुपेण पूर्ववत व्याप्त है। इस स्थान के बहुत करीब रहकर भी कभी वहाँ जाकर देखा नहीं, इस पोस्ट को लिखते समय इस पर बहुत ही क्षोभ हो रहा है। पं. राजमणि तिगुणैत अपनी पुस्तक The Tradition of the Himalayan Masters में लिखते हैं कि यहाँ तीर्थयात्रियों के हाथ से चावल आदि के ग्रास उछलकर मछलियाँ निर्भयता से ले लेती हैं। बन्दर आकर उनका स्वागत करने के आदी हैं। आज भी सौम्य और शान्त आवाज वहाँ गूँजती रहती है कि अपनी भावशून्य बौद्धिकता से संतों द्वारा सिंचित चेतना को दूषित न करें। यह स्थान आज भी उनकी पावन साधना से चेतन तथा सजीव है और सत्यान्वेषी साधकों के लिए गुरुवत मार्गदर्शन करता है।

इसके अतिरिक्त भगवान अवधूत दत्तात्रेय की तपोभूमि गुजरात से लेकर हिमालय के पूर्वोत्तर क्षेत्र तक फैली हुई है। गुजरात में स्थित गिरिनार सबसे प्रसिद्ध स्थान है जहाँ इन्होंने तपस्या की थी। कहा जाता है कि भगवान परशुराम को दीक्षा देने के बाद उन्होंने इसी स्थान पर आकर 12 वर्ष तक तपस्या करने का निर्देश दिया था। हिमालय के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थित नीलाचल में भी भगवान दत्तात्रेय ने तपस्या की और काफी समय तक यहाँ रहे। भगवान परशुराम की दीक्षा-स्थली यही भूमि है। लोगों का मानना है कि ये जिन स्थानों पर रहे वे आज भी इनकी आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण हैं और जो साधक इन स्थानों पर साधना करते हैं, उनकी आध्यात्मिक चेतना की सूक्ष्म तरंगों से लाभान्वित होते हैं।

भगवान अवधूत दत्तात्रेय की परम्परा योग और तंत्र दोनों में पायी जाती है। सिद्धों की परम्परा में भी तंत्र और योग दोनों का समागम देखा जाता है। आधुनिक विज्ञान की तरह आध्यात्मिक क्षेत्र में भी प्रयोग होते रहे हैं। यही कारण है कि यह जगत जितना वैज्ञानिक उपलब्धियों से परिपूर्ण है, उससे कहीं अधिक आध्यात्मिक उपलब्धियों से। ये विभिन्न मार्ग अथवा धर्म आज अस्तित्व में हैं या थे, वे हमारी आवश्यकता के अनुसार ऋषियों ने डिजाइन किए थे। हमारी मानसिक दशा और मूल प्रवृत्तियों के अनुसार हमें एक आध्यात्मिक मार्ग की आवश्यकता होती है। उसका निर्धारण सद्गुरु ही कर सकता है। इसीलिए स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि जो लोग यह सोचते हैं कि उन्हीं का धर्म सबसे अच्छा है और इसलिए उन्हीं का धर्म बचेगा तथा अन्य सभी धर्म नष्ट हो जाएँगे, लेकिन जिस दिन ऐसा होगा, वह दुनिया के लिए सबसे बड़े दुर्भाग्य का दिन होगा। क्योंकि वे जानते थे कि सभी धर्म लोगों की आवश्यकता हैं।

विज्ञानभैरव नामक ग्रंथ का अवलोकन करते समय मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि उसमें यौगिक साधना की कुल 112 विधियों का उल्लेख है। कुछ साधक विद्वान इसे आगम (तांत्रिक) ग्रंथ भी मानते हैं। इस ग्रंथ के विषय में आपने प्रवचन में कहा है कि इसमें प्रदत्त कुछ विधियाँ उन लोगों के लिए हैं जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, कुछ उनके लिए हैं जो अभी यहाँ हैं और कुछ उनके लिए हैं जो भविष्य में पैदा होंगे। अतएव जो धर्म के रहस्य को जानते हैं, वे दूसरे धर्म की न तो निन्दा करते हैं और न ही उनका अनादर। वे ही महान आध्यात्मिक विभूतियाँ जगह-जगह अवतार लेकर वहाँ के लोगों के कल्याण के लिए विभिन्न आध्यात्मिक मार्गों का विधान करते रहते हैं, जिन्हें हम धर्म या कुछ नाम देकर उनके बारे में एक भिन्न अवधारणा बना लेते हैं।

भगवान कृष्ण के इस कथन स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः का बहुत ही गलत अर्थ समझा और समझाया गया। इसका भाव यही है कि हमारी अपनी मूल मनोवृत्तियाँ और प्रकृति के अनुकूल मार्ग ही हमारे लिए कल्याणकारी हो सकते हैं। किसी गुरु के चमत्कारिक कृत्यों से आकर्षित या सम्मोहित होकर अपने उचित मार्ग को छोड़ देना घातक होता है। लेकिन यदि वह सद्गुरु है, तो आपको कदापि भ्रमित न कर अपने मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक चलने की प्रेरणा देगा। कहा जाता है कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शरीर छोड़ने के बाद स्वामी विवेकानन्द गुरु की खोज में इधर-उधर भटकते रहे। इसी प्रयास में गाजीपुर में स्थित एक गुफा में रहने वाले पवहारी बाबा के पास गये। पहले तो महीनों उनसे भेंट ही नहीं हो पायी। क्योंकि पवहारी बाबा अपने मन के मालिक थे, उनकी इच्छा हुई बाहर आयें या बिना खाए-पिए महीनों अन्दर ही पड़े रहें। जब एक दिन संयोग से स्वामी विवेकानन्द की उनसे मुलाकात हुई, तो उन्होंने सीधे स्वामी जी से कहा कि ठाकुर से अधिक तुम्हें कोई नहीं दे सकता। जाओ और उनके आदेश का पालन करो, तुम्हारा कल्याण होगा।

इसी प्रकार का उल्लेख परमहंस योगानन्द जी की आत्मकथा Autobiography of A Yogi (योगी कथामृत) में मिलता है। 1935 में उन्होंने क्रिसमस के अवसर पर अपने एक शिष्य श्री ई.ई.डिकिन्सन को एक चाँदी का कप भेंट किया। इसपर वे भाव-विभोर हो गए और परमहंस जी को बताया कि 43 वर्ष पहले जब वे स्वामी विवेकानन्द के पास दीक्षा लेने गए थे, तो उन्होंने कहा था कि आपका गुरु आएगा और आपको चाँदी का कप भेंट देगा। तबसे मैं इसकी प्रतीक्षा कर रहा था।

अतएव धर्मान्तरण साधक की आवश्यकता होती। प्रलोभन देकर धर्मान्तरण कराना और प्रलोभन में आकर धर्मान्तरण करना, दोनों के लिए घातक है। जो सद्गुरु हैं वे साधक या जिज्ञासु के आध्यात्मिक विकास को ध्यान में रखकर उसे दिशा निर्देश देते हैं। गुरु का निर्देश कभी लोभ के कारण नहीं होता। शिष्य से उसका प्रेम अहेतुक (unconditional) होता है और इसी प्रेम का बीज वह अपने शिष्य के हृदय में बोता है, जिसे प्रारम्भ में समझना काफी कठिन होता है और एक अजीब तरह की उबन और घबराहट होती है। दीक्षा के पहले हमारी तैयारी जितनी अधिक होती, इस प्रकार की समस्या कम होती है।

इन परम्पराओं की नींव हम लोगों की कल्पना से परे है। जबतक हम सद्गुरु के मार्गदर्शन में अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरु कर आगे नहीं बढ़ते, हम आभास तक कर सकते। उसके पूर्व हमारे मन में अनेक शंकाएँ उठती हैं, विश्वास और अविश्वास के बीच भ्रमित मनोदशा हमें दिशाहीन कर पलायन के लिए प्रेरित करती है और अधिकांश लोग अपना पथ छोड़कर पुनः पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। साधना के पूर्व की तैयारी बहुत आवश्यक होती है, ताकि सद्गुरु को हम आकर्षित कर सकें। हम सामान्य मनुष्य के पास वह दृष्टि नहीं होती कि अपने गुरु को पहिचान सकें, जबतक कि वह स्वयं न बताए। इस कथन के पक्ष और विपक्ष में काफी तर्क की सम्भावना है। पर, एक साधक को इन मनोदशाओं से होकर गुजरना पड़ता है।

ऐसे साधक यदि उन स्थानों पर, जहाँ उनके गुरु या उस परम्परा के सद्गुरुओं ने साधना की है, या उसका गुरु जिस स्थान पर साधना करने का निर्देश दे, वहाँ साधना करने से उसकी आध्यात्मिक उन्नति सुगम और त्वरित गति से होती है। इसीलिए सम्भवतः दीक्षा देने के बाद भगवान अवधूत दत्तात्रेय ने भगवान परशुराम को गिरिनार जाकर तपस्या करने का आदेश दिया था। यदि दूसरी परम्परा के साधक भी उन स्थानों पर साधना करते हैं, तो उन्हें भी वहाँ व्याप्त आध्यात्मिक तरंगें लाभ पहुँचाती हैं।

इस अंक में बस इतना ही। सम्भव हुआ तो आगे से भगवान दत्तात्रेय के प्रिय शिष्य भगवान परशुराम पर चर्चा की जाएगी।

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11 टिप्‍पणियां:

  1. स्वामी राम की पुस्तक तो पढ़ी है। उनके शिष्य की यह he Tradition of the Himalayan Masters फ्लिपकार्ट पर अपनी विश लिस्ट में संजो ली है। कभी ली/पढ़ी जायेगी।
    अत्रि के पुत्र चन्द्र के विषय में कौतूहल है। मेरे गोत्र के अधिष्ठाता हैं वे।

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  2. "मन्दाकिनी की निर्मल धारा निकलती है। कहा जाता है कि वहाँ के वातावरण में आज भी निर्भयता और शान्ति पूर्णरुपेण पूर्ववत व्याप्त है।"
    अत्यंत दुखद है कि अब परिदृश्य बिलकुल ही बदल गया है ..मंदाकिनी एक गंदे नाले जैसी हो गयीं हैं और जगह उजाड़ ! और यह बदलाव देखते देखते हुआ है ..मैं करीब पच्चीस वर्ष पहले वहां गया था और तब स्थति इतनी बुरी नहीं थी

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  3. 'अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ,सुनत महामुनि हरसित भयऊ ' तुलसीदास बाबा के द्वारा जाना उन्हें,पर आपने अलग तरह से फिर जानकारी दी,आभार !

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  5. इसमें संदेह नहीं कि सद्पुरुषों की तपस्थली चार्ज्ड हो जाती है। ओशो कहते हैं कि गंगा की निर्मलता की वजह यह नहीं है कि वह अनगिनत जड़ी-बूटियों के मार्ग से होकर बहती है;उसका मूल कारण यह है कि सहस्त्राब्दियों से वह ऋषियों-मुनियों के तप के कारण चार्ज्ड है।

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  6. एक महत्वपूर्ण पोस्ट लेकिन पर्यावरण के छीजने के साथ सब कुछ क्षय हो रहा है .डीके कर रहा है .

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  7. सभी ग्रंथों में स्थानों के नाम दे रखे हैं, अगर आज के युग के नामों के साथ इसकी मैपिंग कर दी जाये तो समझने में आसान होगा।

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  8. गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वहन भारत में सदियों से होता आया है...चला ही गुरु नहीं खोजता बल्कि गुरु भी योग्य शिष्य कि तलाश में रहता है...ज्ञानवर्धक पोस्ट...

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