बुधवार, 2 नवंबर 2011

देसिल बयना – 103 : रविहु की एक दिवस में तीन अवस्था होय... !

 

- करण समस्तीपुरी

स्वस्ति श्री पत्र लिखा बंगलुरु से करण समस्तीपुरी के तरफ़ से छट्ठी मैय्या और बाबा सुरुजदेव के चरण-कमलों में सादर प्रणाम पहुँचे। व्रती महिलाओं को शुभकामनाएं और बिलागर बंधु-बांधवों को छ्ट्ठी मैय्या का आशीष।

आगे बात-समाचार सब तो ठीक है। मगर तत्र कुशलं अत्र नास्तु। एक तो आप वरुण देवता का पावर सीज करि रखी हो...! महराज रेवाखंड पर बरसिये नहीं रहे हैं बरसों से...! उपर से आपकी सौतिनिया डीजल-पिटरोल का दाम भी अकास ठे114का दी है...! उ तो धन्य हो रेवाखंडी उत्साह... कि खेत सुखाए तो सुखाए मगर दमकलो से पोखर भरकर आपका अरघ जरूर उठाता है।

कलजुगही खान-पान का हिसाब-किताब तो पते है, “तीन बेर खाती सो तीन बेर खाती है...!” घर की दाल हो तो मुर्गी बराबर लगती है और सब्जी किस चिड़िया का नाम है....? उ तो पाहुने के आने पर पता चलता है। उ दूध-दही के नदी का जमाना गया अब तो पौकिट में लाने के लिये भी पाकिट टटोलना पड़ता है। लछमिया का बेटा को भी कुपोषण से सुखंडिस हो गया...!

[IMG_1861%255B11%255D.jpg]बहरहाल आप तो देवीजी मेवा-फ़ल-पकवान का अर्घ्य लेके चली गयीं, और भक्तजनों को दे गयीं महंगाई की कोढ़ में खर्चे का खाज। ले बेटा, ना नोच सकते हो न सहला सकते हो... अब कुहर-कुहर कर मरो... साल भर। बहुत कर सकते हो तो कुक्कुर जैसे छटपटाओ... इधर से उधर नाचो... जैसा कोढिया कुक्कुर पूँछ में खुजली होने पर राउंड-राउंड नाचते रहता है।

माई ! केतना लोग तो भरम में पड़ गया है कि कौन देवी बड़ी हैं—महंगाई देवी की षष्ठी देवी। उ तो धन-धन आदितदेव जो जल-खप कर सबकुछ देखिते रहते हैं। मगर इ महंगाई के मारे बेचारे सुरुज बाबा के भी ओजोन-लेयर में छेद हो गया है।

वैसे हमको ई भी पता है कि इ चिट्ठी-पतरी से कुछो होने वाला नहीं है। तैयो मन का भरास निकाल रहे हैं। जब भारत के इत्ते बड़े-बड़े अरथ-शास्त्री महराज सब खाली चिंते जता रहे हैं... तो आप भोली-भाली देवीजी भला क्या उपाय कर सकती हैं। वैसे हमको ई भी पता है कि आपके दरबार से ई का जवाब भी शायदे आयेगा...! और आयेगा भी तो क्या....? उ भी हमको पता है। आप क्या कहियेगा... हमहि लिख देते हैं।

“ए कलजुगी भगतराज...! हमरे साथ तो सुरुजदेव के भी पूजा करते हो ना... तो सिरिफ़ हाथ जोड़े खड़े नहीं रहो... कुछ सीख भी लो....! अब तुमहि देख लेयो सुरुज महाराज को... इन्ना तेजस्वी और कौनो है... सब में समरथ...! मगर इतनीIMG_1924 सम्पन्नता के बाद भी उन से ज्यादा फ़लेक्सिबल कौन होगा...? एक्कहि दिन में समय के हिसाब से तीन-तीन अवस्था धर लेते हैं। सुबह लाल-आल आभायुक्त... बाल रवि... उदीयमान... दोपहर में प्रचंड और सांझ ढलते सारा उर्मि-रश्मि समेट कर घुप्प! जब देखते हैं कि अंधरिया के साम्राज्य से लड़ नहीं सकते तो चुपचाप गुम हो जाते हैं और फिर अगले भोर मौका लगते ही लाल-लाल! उ कहते हैं न कि जैसी बहे बयार, पीठे वा दिश कीजिये।

सो हे भगत-शिरोमणि ! हमें कोसना-गोहराना छोड़कर सुरुज महाराज वाली जीवन पद्धति अपनाओ। समय के हिसाब से जीना सीखो। जब सुरुज महाराज की अवस्था एक जैसी नहीं रहती तो मर्त्यलोक के मरणशील मानवों की क्या गत है? जब अनुकूल समय हो तो फ़हराओ... लहराओ... प्रतिकूल समय आने पर घबराओ नहीं... उसके मुताबिक चलो... कुछ संचित करके रखो... ताकि अगले सुबह फिर उग सकें... लहरा सकें... फ़हरा सकें...! और ई समय का चक्कर है। ई ऊँच-नीच से मन छोटा मत करना। याद रखना, “रविहुँ की एक दिवस में तीन अवस्था होय!” तो तुमलोग तो मनुष के जात संघर्ष करने के लिये ही जनम लिये हो। जैसे बानर से आदमी बने वैसहि अपने पराक्रम से आदमी जैसा रहना भी सीख लो।”

है ना...! यही कहोगी न देवी जी...! हमें पता है। इसीलिये ई चिट्ठी-पतरी यहीं रोकते हैं। समय और औकात के हिसाब से अपनी जरूरत घटा-बढ़ा के हमलोग खुदे चला लेंगे। ठीके बात है, “रविहुँ की एक दिवस में तीन अवस्था होय...!” जब भगवाने का ई हाल है तो भगत का तो जय-जय हो!

विशेष अगले पत्र में। बांकी श्रेष्ठ-जनों को प्रणाम और कनिष्ठों को स्नेह। लिखने में जो भूल-चूक हुई हो माफ़ करेंगे। कम लिखे को ज्यादा समझेंगे। और जौन कुछ आपके अख्तियार में हो तो... कोशिश कीजियेगा। चलिये अब बाय-बाय!

आपका,

करण समस्तीपुरी

14 टिप्‍पणियां:

  1. shandar vyangya....deshi shabdon ke upyog aaur gramin bhasha ka pura lutf uthaya..sadar pranam ke sath

    उत्तर देंहटाएं
  2. सूर्य षष्ठी (छठ) पर्व की आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सूर्य षष्ठी (छठ) पर्व की आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सूर्य षष्ठी (छठ) पर्व की आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. छठ पर्व की आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ । सूर्य देवता आपकी सभी कामनाएं पूरी करे |

    उत्तर देंहटाएं
  6. करन बाबू, आपकी पाती अच्छी लगी। एक स्थान पर उचित नहीं लगा। मैं तो सबेरे से आपकी प्रतीक्षा कर रहा था। सोचा शायद मेल हड़ताल तो नहीं हो गया।
    बहुत-बहुत साधुवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  7. आप घर आए नहीं।
    आपको मिस किया।
    और आपके हिस्से का सारा काम भी हमने किया।.
    आते तो एक बार फिर मुज़फ़्फ़रपुर जाते।
    अब अगली बार।

    उत्तर देंहटाएं
  8. सो हे भगत-शिरोमणि ! हमें कोसना-गोहराना छोड़कर सुरुज महाराज वाली जीवन पद्धति अपनाओ। समय के हिसाब से जीना सीखो। जब सुरुज महाराज की अवस्था एक जैसी नहीं रहती तो मर्त्यलोक के मरणशील मानवों की क्या गत है? जब अनुकूल समय हो तो फ़हराओ... लहराओ... प्रतिकूल समय आने पर घबराओ नहीं... उसके मुताबिक चलो... कुछ संचित करके रखो... ताकि अगले सुबह फिर उग सकें... लहरा सकें... फ़हरा सकें...


    बहुत सार्थक सन्देश दिया है इस बार देशील बयना में ... छठ की शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  9. सूरज महाराज की जीवन पद्धति के जरिये सुन्दर सीख !

    उत्तर देंहटाएं
  10. छठ पर्व की आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ ।

    उत्तर देंहटाएं
  11. आपने ये अच्छा किया...डायन को देवी बना दिया...शायद अब मंहगाई देवी कुछ कृपा दृष्टि बनाएं...

    उत्तर देंहटाएं

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।