सोमवार, 28 नवंबर 2011

हंसी-झरनों का राग

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Sn Mishraश्यामनारायण मिश्र

Indian-motifs-26लीला ! ओ लीला !

कोहरे में डूबा होगा घर-गांव

यादों की गलियों

घूम रहा एकाकी

      मन गीला गीला।

 

दूर,

तुमसे दूर

मीलों दूर

      लोहे की नगरी यह पिंजरा।

सीख नहीं पाता

मन यंत्रों की भाषा

तेरी उन्मुक्त हंसी-झरनों का

                  राग नहीं बिसरा।

लघुता,

स्वीकारता नहीं

आदत में बसा हुआ

      अगहन का विस्तृत

                 नभ गहरा नीला।

रातों की चुप्पी को

तोड़ रही सांसों की

      घुरुर-घुरुर चक्की।

लगता है

भीतर ही भीतर तुम

      गा गाकर पीस रही मक्की।

क्या अच्छा होता,

जो होता

      दुनिया की जगह

               सिर्फ़ इक कबीला।

21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर नवगीत पढ़ने को मिला.आभार.

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  2. रातों की चुप्पी को

    तोड़ रही सांसों की

    घुरुर-घुरुर चक्की।

    लगता है

    भीतर ही भीतर तुम

    गा गाकर पीस रही मक्की।...bahut hi sundar geet

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  3. सीख नहीं पाता

    मन यंत्रों की भाषा

    तेरी उन्मुक्त हंसी-झरनों का

    राग नहीं बिसरा।
    बहुत ख़ूबसूरत, बधाई.

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  4. वसुधैव कुटुम्‍बकम् की बात अच्‍छी लगी। लेकिन दुनिया तो आज बाजार बनती जा रही है। कहाँ रहे गाँव?

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  5. रातों की चुप्पी को

    तोड़ रही सांसों की

    घुरुर-घुरुर चक्की।

    लगता है

    भीतर ही भीतर तुम

    गा गाकर पीस रही मक्की।
    नवगीत की मिठास शाश्वत प्रतीत होती है .

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  6. रातों की चुप्पी को

    तोड़ रही सांसों की

    घुरुर-घुरुर चक्की।

    लगता है

    भीतर ही भीतर तुम

    गा गाकर पीस रही मक्की……………कितनी गहरी बात कह दी…………सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  7. अदभुद प्रेम गीत... भावुक मन कहाँ सीख पता है यंत्रों की भाषा.... बहुत बढ़िया...

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  8. मैं तो मक्की पर अटक गया! शीत आ गया है और इस मौसम में मक्की की रोटी नहीं बनी घर मे‍!

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  9. दैनिक जीवन की सामान्य चीजों को लेकर कविता में अनुस्यूत करना श्यामनारायण मिश्र जी की प्रकृति है। आभार।

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  10. दैनंदिन जीवन के प्रतीक और इस प्रकार की छंद रचना... विलक्षण है यह प्रतिभा!!

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