रविवार, 20 नवंबर 2011

भारतीय काव्यशास्त्र – 92


भारतीय काव्यशास्त्र – 92

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में कथितपद या पुनरुक्त, पतत्प्रकर्ष, समाप्तपुनरात्त और अर्धान्तरैकवाचकता दोषों वाक्य दोषों पर चर्चा की गयी थी। इस अंक में अभवन्मत योग, अनभिहितवाच्यता और अस्थानपदत्व वाक्य दोषों पर चर्चा की जाएगी।

जहाँ कविता में वांछित सम्बन्ध का अभाव होता है या कवि का अभिमत-सम्बन्ध (अन्वय) न बन पाये, वहाँ अभवन्मत योग दोष होता है। जैसे -

येषां तास्त्रिदशेभदानसरितः पीताः प्रतापोष्मभि -

र्लीलापानभुवश्च नन्दनवनच्छायासु यैः कल्पिताः।

येषां हुंकृतयः कृतामरपतिक्षोभाः क्षपाचारिणां

किं तैस्त्वत्परितोषकारि विहितं किञ्चित्प्रवादोचितम्।।

अर्थात् जिन राक्षसों के प्रताप की अग्नि ने अपनी उष्णता से देवताओं के हाथी ऐरावत के मद की धाराओं को सुखा दिया था, जिन्होंने नन्दनवन की छाया में जगह-जगह मद्यपान करने का केन्द् बना डाला है तथा जिनकी हुंकारों से देवराज इन्द्र भी काँप उठते थे, उन राक्षसों ने तुम्हारे लिए ऐसे कौन से सन्तोषजनक काम किए?

यहाँ द्रष्टव्य है कि द्वितीय चरण में यैः (जिनके द्वारा) तृतीया विभक्ति बहुवचन में विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुई है, लेकिन इसके समकक्ष विशेष्य संज्ञा शब्द का अभाव है। यहाँ क्षपाचारिणां (निशाचरों का) के स्थान पर क्षपाचारिभिः (निशाचरों के द्वारा) पद का प्रयोग करने से यैः के साथ अन्वित होकर कवि का अभिमत-सम्बन्ध बन जाता और इस दोष का निराकरण हो जाता।

पुनः इस दोष को एक दूसरी परिस्थिति में देखते हैं-

त्वमेवंसौन्दर्या स च रुचिरतायाः परिचितः

कलानां सीमानं परमिह युवामेव भजथः।

अपि द्वन्द्वं दिष्ट्या तदिति सुभगे संवदति वां

अतः शेषं यत्स्याज्जितमिह तदानीं गुणितया।।

संग्रामाङ्गणमागतेन भवता चापे समारोपिते

देवाकर्णय येन येन सहसा यद्यत्समासादितम्।

कोदण्डेन शराः शरैररिशिरस्तेनापि भूमण्डलं

तेन त्वं भवता च कीर्तिरतुला कीर्त्या च लोकत्रयम्।।

अर्थात्, हे राजन्, युद्धभूमि में आपके आने और धनुष पर बाण चढ़ाने पर जिसे-जिसे जो अचानक मिलता है, उसे सुनिए - धनुष को बाण, बाणों को शत्रुओं के सिर, उनके सिरों को भूमण्डल (भूमि), राजा के रूप में आप, आपको अतुल कीर्ति और तीनों लोक (मिलते हैं)।

यहाँ देखने की बात यह है कि क्रिया आकर्णय (सुनिए) का कर्म होने के कारण सभी संज्ञा पदों को कर्म कारक में प्रयोग करना चाहिए था - कोदण्डम् शरान् आदि। यदि दूसरे वाक्य के पूरे अर्थ को कर्म के रूप में यदि लिया जाय, तो उक्त पदों को कर्ता कारक के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए था - कोदण्डः शराः आदि। दूसरा रास्ता यह था कि यत्समासादितं तदाकर्णय (जो प्राप्त हुआ वह सुनिए) कर देने से कवि का अभिमत सम्बन्ध सिद्ध हो सकता था और यह कविता इस दोष से मुक्त हो जाती। तीसरा तरीका यह था कि पूर्वार्द्ध में येन येन (जिस-जिसने) के स्थान पर केन केन किं किं (किस-किसने क्या क्या पाया) प्रश्नवाचक पद प्रयोग किया जाता तो उत्तरार्द्ध में प्रयुक्त तृतीयान्त संज्ञा पदों के साथ अभिमत सम्बन्ध स्थापित हो जाता और इस दोष से मुक्ति मिल जाती।

इस दोष को समझने के लिए एक और स्थिति देखते हैं। यह श्लोक राजशेखर के नाटक बालरामायण से लिया गया है। यह परशुराम के प्रति रावण की उक्ति है-

चापाचार्यस्त्रिपुरविजयी कार्तिकेयो विजेयः

शस्त्रव्यस्तः सदनमुदधिर्भूरियं हन्तकारः।

अस्त्येवैतत् किमु कृतवता रेणुकाकण्ठबाधां

बद्धस्पर्द्धस्तव परशुना लज्जते चन्द्रहासः।।

अर्थात् त्रिपुरविजयी भगवान शिव धनुर्विद्या के आपके आचार्य हैं, आपने उनके पुत्र कार्तिकेय को भी पराजित किया है, अपने शस्त्र से हटाया गया समुद्र आपका घर है, यह पृथ्वी आपके लिए भिक्षा में दान देने की वस्तु है। फिर भी रेणुका का गला काटनेवाले आपके परशु की बराबरी करने में मेरा खड्ग चन्द्रहास अपने को लज्जित अनुभव करता है।

यहाँ भगवान परशुराम की निन्दा ही रावण का (कवि का) अभीष्ट है। किन्तु कृतवता पद करण कारक (तृतीया विभक्ति) में परशुना संज्ञा पद के विशेषण के रूप में आया है। इससे परशु का अपकर्ष व्यक्त होता है, परशुराम का नहीं और कवि का अभिमत सम्बन्ध बनाने में अक्षम हो गया है। इसलिए यहाँ अभवन्मत योग वाक्य दोष आ गया है। यदि कृतवता के स्थान पर कृतवतः किया गया होता तो यह श्लोक इस दोष से मुक्त होता।

हिन्दी वाक्य संरचना में भी इस प्रकार के दोष देखने में आते हैं। इसपर कभी स्वतन्त्र रूप से चर्चा अच्छी रहेगी। हिन्दी की कोई कविता इस समय सामने नहीं है, जिसे उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाए। यह दोष कारकों, क्रिया-विशेषणों, जो, वह - आदि शब्दों के अनुपयुक्त प्रयोग से उत्पन्न होता है।

अब लेते हैं अनभिहितवाच्यता दोष। अभिहित वाच्य का अभाव अनभिहितवाच्यता है, अर्थात् आवश्यक वक्तव्य का न कहा जाना अनभिहितवाच्यता दोष कहलाता है। इसके लिए निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया जा रहा है। यह महावीरचरित नाटक से लिया गया है। भगवान राम के द्वारा भगवान शिव का धनुष तोड़ने पर परशुराम की स्वगत उक्ति है -

अप्राकृतस्य चरितातिशयैश्च दृष्टैरत्यद्भुतैरपहृतस्य तथापि नास्था।

कोSप्येष वीरशिशुकाकृतिरप्रमेयसौन्दर्यसारसमुदायमयः पदार्थः।।

अर्थात्, यद्यपि कि इस असाधारण व्यक्ति के अद्भुत और श्रेष्ठ कार्य से मैं मुग्ध हूँ, फिर भी विश्वास नहीं होता (कि वास्तव में इन्होंने इस धनुष को तोड़ा है)। वस्तुतः यह कोई अनिर्वचनीय वीर बालक की आकृति और अपरिमेय (अतुलनीय) सौन्दर्यसार से बना हुआ पदार्थ (व्यक्तिरूप) है।

यहाँ दूसरे वाक्य में प्रयुक्त तथापि पद पहले वाक्य में यद्यपि की आकांक्षा रखता है। वैसे, यह आवश्यक नहीं है। क्योंकि दूसरे वाक्य में प्रयुक्त तथापि सामर्थ्य से यद्यपि का पूर्व वाक्य में आधान कर लेता है। परन्तु तथापि पद के प्रयोग की सार्थकता तभी सिद्ध होगी, जब पहले वाक्य की स्थिति अलग हो, जो यहाँ नहीं है। यदि इसमें अपहृतस्य पद को षष्ठी विभक्ति में न प्रयोग कर अपहृतोSस्मि प्रयोग किया जाता तो अनभिहितवाच्यता दोष से बचा जा सकता था।

अगला दोष अस्थानपदत्व है। अस्थानपदत्व का अर्थ है पद का उचित स्थान पर प्रयोग न होना। जहाँ कविता में कोई पद उचित स्थान पर न हो, तो अस्थानपदत्व दोष होता है। जैसे -

प्रियेण संग्रथ्य विपक्षसन्निधावुपाहितां वक्षसि पीवरस्तने।

स्रजं न काचिद्विजहौ जलाविलां वसन्ति हि प्रेम्णि गुणा न वस्तुषु।।

अर्थात् विपक्ष (सपत्नी) के सामने ही प्रियतम द्वारा स्वयं गूँथकर स्थूल स्तनवाले वक्ष पर पहनाई गई माला को जल से भींग जानेपर भी किसी (स्त्री) ने नहीं हटाया। क्योंकि गुण प्रेम में ही निवास करते हैं, वस्तु में नहीं।

यहाँ न काचिद्विजहौ (नहीं किसी ने हटाया) के स्थान पर काचिन्न विजहौ (किसी ने नहीं हटाया) होना चाहिए था। क्योंकि का प्रयोग क्रिया विजहौ के ठीक पहले आना चाहिए, काचित् के पहले नहीं। अतएव का उचित स्थान पर प्रयोग न होने के कारण यहाँ अस्थानपदत्व दोष है।

इस अंक में बस इतना ही।

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2 टिप्‍पणियां:

  1. भारतीय काव्यशास्त्र संस्कृत साहित्य की अमूल्य थाती है।

    हिन्दी में प्रस्तुति के लिेए आभार,

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  2. भारतीय काव्यशास्त्र को समझाने का चुनौतीपूर्ण कार्य कर आप एक महान कार्य कर रहे हैं। इससे रचनाकार और पाठक को बेहतर समझ में सहायता मिल सकेगी। सदा की तरह आज का भी अंक बहुत अच्छा लगा।

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