शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

फ़ुरसत में ... सबसे बुरा दिन

फ़ुरसत में ...

सबसे बुरा दिन

IMG_0047मनोज कुमार

L.S. collegeMuzaffarapurमहाविद्यालय में सबसे बुरा दिन गर्मी की छुट्टियों के बाद खुलने वाला दिन होता है। इस वक्तव्य के पीछे यह मंशा कतई नहीं है कि एक लंबी छुट्टी के बाद फिर से कॉलेज जाना पड़ रहा है, इसलिए वो सबसे बुरा दिन हो गया। अजी, सिच्युएशन तो इसके विपरीत थी। उन साठ दिनों की छुट्टियों में तो हम कॉलेज की जुदाई में घुल-घुल कर आधे हो गए थे। जब से कॉलेज में एडमिशन लिया तब से गर्मी की छुट्टियां शुरु होने तक कुछ इस क़दर उसके हैबिचुएटेड हो गए थे कि उसके बिना सारी गर्मी और पूरी छुट्टी एक आफ़त की तरह ही लगी हमें। हम तो बेसब्री से कॉलेज के खुलने का इंतज़ार कर रहे थे। ज्यों-ज्यों कॉलेज के खुलने का दिन निकट आता गया फिर से कॉलेज प्रांगण में होने का रोमांच बढ़ता जा रहा था। इसी रोमांच से रोमांचित हम एक नए रूप में फिर से कॉलेज जाने की तैयारियों में जुट गए थे।

उन दिनों हमारे प्रांत के घर-घर में आने वाला अख़बार आर्यावर्त्त होता था। पर उसमें न कोई ‘रंगीन’ पृष्ठ होता था और न ही कोई क्वालिटी वाला क़ागज़। इसलिए चाचा के यहां से सर्चलाइट की पुरानी प्रति, और ख़ास कर रविवार का स्पेशल अंक लाया। इस स्पेशल अंक चुनने की दो ख़ास वजहें थीं। पहली, कि उसके क़ागज़ अच्छे होते थे, क्वालिटी वाले। इसीलिए शायद उस दिन का मूल्य अन्य दिनों की तुलना में अधिक भी होता था। दूसरी वजह यह कि उन विशिष्ट पृष्ठों पर उन दिनों की मशहूर सिने तारिकाओं के फोटो भी होते थे, ब्लैक एण्ड व्हाइट ही सही।

छांटकर अपनी प्रिय हिरोइन वाला अंक हमने लिया। घर आए। बड़ी जोड़-तोड़ और काट-छांट के बाद अपनी किताब-कॉपियों पर ऐसा फिट किया कि हमारी प्रिय हिरोइन का चेहरा उनके फ्रण्ट पेज पर खिलखिला रहा था।

इसके बाद कॉलेज लौटने की तैयारी का दूसरा चरण शुरु हुआ। इस बार बारी थी पोशाक की। नई पोशाक तो होली-दिवाली पर ही घर में मिलने की उम्मीद रहती थी। ज्यों-ज्यों बड़े होते गए हम, हमारी अर्ध-वार्षिक पोशाकों का कोटा घट कर वर्षिक हो गया। मतलब यह कि होली में बहन को तो दिवाली में मुझे। और जब बहन का दाखिला मेडिकल कॉलेज में हो गया, तो आय के एक मात्र स्रोत पिताजी के मासिक बजट ने हमारी वार्षिक पोशाक के कोटे को द्विवार्षिक कर दिया था। ऐसी परिस्थिति में हमारा अथक प्रयत्न यह होता था कि हमारी कुल जमा एक-दो पोशाकों की ताज़गी और चमक-दमक हर हाल में बरकरार रहे। गर्मी की छुट्टी के बाद कॉलेज खुलने के उत्सव ने हममें उत्साह का संचार कर ही दिया था। कोयले के चूल्हे पर एल्यूमुनियम की देकची में पानी गर्म किया गया। उसमें टाटा ब्रांड का सोडा डाला गया। कपडों को उसमें डाला गया। फिर कपड़ों की धुलाई का कार्यक्रम शुरु हुआ। ‘पिटना’ से पीट-पीट कर कपड़ों में घुसे बैठे मैल के कण-कण को निकाल बाहर किया गया। फिर साफ पानी से सफाई के बाद रोबिन-ब्ल्यू और टीनोपाल से उसकी चमक का इंतज़ाम किया गया। फाइनली मांड़ डाल कर कलफ़ की गई और अंत में कोयले के चूल्हे पर इस्तरी गर्म कर कपड़े की तह सीधी की गई।

जूते तो हमने यूपीएससी के इंटरव्यू के वक़्त पैरों में डाले थे। उन दिनों पंचवर्षीय योजना के प्रावधान की तरह चलाई जाने वाली चट्टी को सरसों के तेल से चमका कर रविवार को धूप में सूखने के लिए डाला और मन-ही-मन में दूसरे दिन कॉलेज में उस चट्टी को पहन कर ‘मच-मच’ करते हुए चलने की सुखद कल्पना में खो गए।

... और वो दिन आ ही गया। सुबह पांच बजे तक नित्यक्रिया से निपट कर अपनी कॉलेज ले जायी जाने वाली किताबें-कॉपियों को टेबुल पर सजा कर रखा। उसके बाद फ्लोरा फाउण्टेन-पेन, जिसका रस पिछले साठ दिनों की उपेक्षा के दंश से सूख चुका था, में फिर से जीवन रस का संचार हो, इस जुगत में भिड़ गए। पहले तो गर्म पानी में उसकी नींब और जिभिया की साफ-सफाई की गई, फिर सुलेखा स्याही से उसकी उदर-तृप्ति।

इसके उपरान्त स्नान से निपट कर हनुमान चालीसा का सस्वर पाठ, जो नहाने से ही शुरु होता था और कपड़ा पहनते-पहनते खत्म हो जाया करता था, कर हमने अपने धार्मिक रुझान का परिचय देते हुए उनसे (हनुमान जी से) अपने हिस्से का बल-बुद्धि-विद्या का आशीष लिया और तैयार हुए।

घर में तो टाटा का नारियल तेल हुआ करता था। गर्मी की छुट्टी के बाद अमूमन बरसात का मौसम होता है। ऐसे मौसम में एक तो यह तेल पिघला नहीं होता और दूसरे इसमें एक विचित्र प्रकार की गंध आ जाती है। ऐसे में हमें फिर चाचा की याद आई। सुबह-सुबह चाची ने मुझे अपने यहां देख मेरे वहां मेरे आने का इरादा भांप लिया और मुस्कुराते हुए बोलीं ‘उधर तक्खा पर रखा है।’ हम भी झेंपने की जगह ढीठ की तरह हें-हें करते हुए बढ़ गए और केयो कार्पिन से अपने रूखे-सूखे और उलझे-सुलझे बालों को तर किया।

सारी तैयारी पूरी हो गयी थी। मां के हाथों बना फुलका खाकर उदरपूर्ति की और दही के साथ 'जतरा' बनाया। फिर रवाना हुए कॉलेज –‘आफ़्टर समर वैकेशन!’gate

वही कॉलेज जो साठ दिन पहले हमारा अपना था, आज उसके प्रांगण के बाहर पहुंचते ही दिल धड़-धड़ कर रहा था। खैर अपनी कक्षा के सामने पहुंचते ही लड़के-लड़कियों की रंगीनियां नयनों को हर्षित और मन को पुलकित कर रही थीं। सब आपस में अपने-अपने दल में गप-शप करने में मशगूल थे। कौन क्या कह रहा था, कम-से-कम मुझे तो कुछ भी पता नहीं चल रहा था। हलो-हाय का ज़माना वह था नहीं, स्थानीय भाषा में ‘की रे सब ठीक-ठाक?’ से मेरी भी यार-दोस्तों द्वारा खबर ली गई और हमने भी औपचारिक जवाब देकर उनसे पल्ला झाड़ा। कारण मेरे अपने थे। मुझे उनकी बातों की न तो सुध थी और न ही उनमें मेरी रुचि। इधर-उधर नज़रें फिराईं। रमणियों का दल आपस में खुसर-पुसर किए जा रहा था। ‘उधर’ सीधे-सीधे देखना उन दिनों की तहज़ीब में नहीं था, और जिन्हें हम देखना चाह रहे थे, वह ‘हवा’ अभी बही नहीं थी। तभी एक जानी-पहचानी-सी परफ़्यूम के झोंके ने मानों हमें ‘उनके’ आने का अहसास दिला दिया। सुगंध के झोंको से ‘हवा’ की तरफ़ रुख़ किया। अभी उनके परिधानो के दर्शन ही हुए थे कि ‘हवा’ तेज़ चाल से क्लास में प्रवेश कर गई और अपना स्थान ग्रहण कर चुकी थी।

पहली तीन कतारों पर तो उसी दल का सर्व-सिद्ध अधिकार था। और उसके ठीक पीछे की चौथी कतार में कुछ दादा टाइप के दल अपना अधिकार जमा चुके थे। हम तो वैसे भी शारीरिक बल के मामले में अति-पिछड़े वर्ग की श्रेणी में आते थे, जिनका जन्म-सिद्ध अधिकार पिछली बेंच पर होता था।

क्लास में किसका मन लगता? हम तो क्लास ख़त्म होने का इंतज़ार कर रहे थे ताकि ‘उनका’ दीदार कर सकें। फिजिक्स की क्लास खत्म हुई। वहां से केमिस्ट्री की क्लास तक के सफ़र की शुरुआत कुछ इस गति से हुई कि ज्यों-ज्यों फासला कटता गया त्यों-त्यों छात्रों की गति धीमी और छात्राओं की सामान्य से अधिक होती गयी।

कारण?

IMG_0579... अब बताने का समय आ गया है। हमने आज की ‘फ़ुरसत में’ के शुरु में ही कहा था कि “महाविद्यालय में सबसे बुरा दिन गर्मी छुट्टियों के बाद खुलने वाला दिन होता है।”

जो कल्पनाएँ छात्रों ने गर्मी की छुट्टी के पहले पाल रखी थीं, वे छुट्टियों के बीच पल्ल्वित-पुष्पित होकर परवान चढ़ चुकी थीं। पर छुट्टियों के समाप्त होने के बाद आज अपनी-अपनी ‘हवाओं’ को खोजती उन सबकी निगाहें जब ‘उन्हें’ देख पाईं तो पता चला कि ‘हवा’ ने दिशा ही बदल ली है।

इन छुट्टियों के बीच जो महत्वपूर्ण परिवर्तन उन ललनाओं में आए थे वे यूं थे –

पहला कि उनमें कइयों के परिधान सलवार-फ़्राक की जगह पारंपरिक साड़ी ने ली ली थी।

दूसरे, पहले नाखून पर एक विद्यार्थिन द्वारा नेल पालिश लगाना भी विद्यार्थी जीवन की अशिष्टता मानी जाती थीं. किन्तु उनके न सिर्फ़ आज नाखून रंगीन थे, बल्कि हाथ भी मेहंदी रचे थे और होठों पर लिपिस्टिक पुती थी।

तीसरे, सादगी की प्रतिमूर्ति उनमें से कई ललनाओं ने कलाइयों के साथ गले में भी सोने के गहने धारण किए हुए थे।

IMG_0837चौथा और सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह था कि छुट्टी के पहले की शर्माती-सकुचाती बालाएं अब आज़ाद परिंदे की तरह इधर-उधर मचलती-फुदकती नज़र आ रही थीं। और सबसे बड़ा परिवर्तन यह था कि उनके दीदार को हमारे दल की निगाहें जब नख से ऊपर उठते-उठते उनके मुख पर पड़ीं तो उनके माथे की बड़े आकार की बिन्दी और शिख पर दिखा मांग में भरे सिन्दुर का लाल रंग। अभी की तरह नहीं कि जिसका प्रदर्शन संकोच के साथ किया जाए। ‘हवा’ भी उनमें से एक थीं।

केमिस्ट्री क्लास तक जाते-जाते न जाने कितनों की आशाओं पर तुषारापात हो गया था, कितनों की कल्पनाओं की दुनिया उजड़ गई थी। हमारे मन में बार-बार यह प्रश्न कौंधता रहा कि ये गर्मी की छुट्टियां होती ही क्यूं है?

सुबह घर से कॉलेज आने में जिस रास्ते को हमने आधे घंटे में तय किया था वापसी के वक़्त वही रास्ता डेढ़ घंटे से तय कर रहे थे, किन्तु अभी भी घर नज़र नहीं आ रहा था। इधर मन में विचारों की ‘हवा’ नहीं आंधी चल रही थी।

26 टिप्‍पणियां:

  1. 'हवायें' जो बदलीं सो बदलीं पर इसी तर्ज़ पर कई हवाओं के 'पानी' भी तो बदल गये होंगे :)

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  2. -अर्द्ध-वार्षिक पौशाकों का कोटा घट के वार्षिक हो गया
    -मांड वाला कलफ
    - केयों कार्पिन
    और इस के बाद लिपिस्टिक, साड़ी, नेल पोलिश, माथे पर बिंदिया और माँग में सिंदूर

    हाए हाए हाये - सर जी बहुत कुछ कह गए हैं आप। अब तो याद ही करो बस, और भाभीजी को मत बताना - भाई करवा चौथ है आज।

    गुजर गया एक साल

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  3. व्यंग्य बहुत ही अच्छा और कसा हुआ है।

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  4. ये स्मृतियां भी एक अजीब सी चीज होती है । जिंदगी के सही संदर्भों में देखा जाए तो इन स्मृतियों का बहुत ही महत्व है । ये हमें तोड़ती नही हैं चाहे उन्हे सोचकर दुख मिले या सुख, कभी न कभी हमें विगत जीवन का एक पैमाना देने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर जाती हैं । आज हम इस उम्र की दहलीज पर पहुँच कर इन स्मृतियों को महत्व नही देते हैं लेकिन सही तरह से इनके विवर में झांका जाए तो उस समय जो भाव कच्चे मन में पल्लवित एवं पुष्पित हुए थे, उनको कभी भी किसी के लिए अलग करना संभव नही हो पाएगा । बहुत अच्छा एवं मनोहारी संस्मरण प्रस्तुत करने के लिए आपका आभार ।
    धन्यवाद।

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  5. मस्त राप्चिक पोस्ट :) आनंदम्..आनंदम्।

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  6. आपने कालेज के दिनों की यादें ताज़ा करा दीं.

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  7. गर्मी की छुतियों के बाद सबसे बुरा दिन ... न जाने क्या क्या सोच कर गए थे ... पर हावाओं का रुख बदल गया ..आंधी में उड़ गयी सोच ... आज फुरसत में खोला है खूब स्मृतियों का पिटारा ..लगता है आज तूफ़ान का सामना करने की तैयारी है ..

    बढ़िया संस्मरण

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  8. करवा चौथ के अवसर पर नायाब पोस्‍ट। हा हा हाहा। कॉलेज के सुनहरी दिन वापस कहाँ आते हैं?

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  9. बहुत मजेदार वर्णन .. भूली बिसरी यादें ही तो रह जाती है अपने पास !!

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  10. बड़ा ही रोचक आख्यान, बार बार हँसने का क्रम हो गया।

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  11. हुम्म्म्म- अच्छा है ,सहज भाव से लिखा गया ,बहुत लोग कुछ याद करके असहज होंगे।

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  12. वाह ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  13. उफ़ …………ये तो वो ही बात हो गयी बडे बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले……………वैसे ऐसी यादे उम्र भर याद रहती हैं।

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  14. रोचक --

    बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||
    शुभ-कामनाएं ||

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  15. lolz..हा हा हा ..च च च ...मजा आ गया ..
    केयो कर्पिन
    कापियों के खूबसूरत जिल्द.
    और चमकते कपड़े
    उफ़..पत्नीश्री को मत पढवा दीजियेगा आज के दिन ये :):)

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  16. behtarin...chemistry lab se baapas aane me badhi hui samaybadhi swabhavik hai..purane daur ka ekdam jewant chitran karte hue shandaar tarike se likhi behtarin rachna..sadar pranam ke sath

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  17. शीर्षक तो बहुत अटपटा है मगर पोस्ट चटपटी है!
    --
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  18. बहुत खूब।

    छुट्टियों के बाद आने पर हवाएं ऐसी बदल जाएंगी, सोचकर बड़ी हैरानी होती है। पर, है तो वास्तव में बुरी लगने वाली ही बात। लेकिन, खूबी तो इसे सच्चाई और ईमानदारी के साथ स्वीकार करने की है।

    हा... हा... हा..। आज जरा सँभलकर रहिएगा।

    आपके लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।

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  19. हवाओं का रुख इस तरह बदला ...सहानुभूति है !
    टिनापोल , केयोकार्पिन , सुलेखा स्याही , फ्लोर फाउन्टेन पेन ...कितना जाना पहचाना लग रहा है यह वक्त !
    चुलबुली यादें !

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  20. आपके व्यंग्य-विधा की विशेषता यह है कि आप साधु शब्दावली में हल्की-फ़ुल्की बातों से शुरु कर उत्तरोत्तर विषय-गांभीर्य को प्रकट करते हैं परंतु आलेख का प्रवाह और मूड यथावत रहता है। संतुलित हास्य आपके लेखन में स्वतः आता है।

    धन्यवाद!

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  21. यादें भी क्या चीज़ होती हैं ... पीछा नहीं छोडती ... व्यंगात्मक शैली लाजवाब है आपकी ...

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  22. यादें याद आती हैं.....
    फस्ट इयर की छुट्टियाँ अक्सर ऐसे ही मौसम के साथ आती थीं.

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