रविवार, 23 अक्तूबर 2011

भारतीय काव्यशास्त्र – 88

भारतीय काव्यशास्त्र – 88

आचार्य परशुराम राय

अबतक श्रुतिकटु, च्युतसंस्कार, अप्रयुक्त, असमर्थ, निहतार्थ, अनुचितार्थ, निरर्थक, अवाचक, अश्लील (तीन प्रकार - ब्रीडा, जुगुप्सा और अमंगल), संदिग्ध, प्रतीत, ग्राम्य, नेयार्थ, क्लिष्ट, अविमृष्टविधेयांश, और विरुद्धमतिकृत या विरुद्धमतिकारिता शब्द या पददोषों के विषय में चर्चा हो चुकी है। तथापि, कुछ बातें एक बार और स्पष्ट कर देने से आगे के अंकों को समझने में सुविधा होगी।

उक्त काव्य-दोषों की चर्चा करते समय यह बात बताई जा चुकी है, पर आगे बढ़ने से पहले एक बार पुनः स्मरण कर लेते हैं कि इनमें से सात दोष श्रुतिकटु, निहतार्थ, निरर्थक, अवाचक, अश्लील, संदिग्ध और नेयार्थ पदांश में पाए जाते हैं। पदांश में होने के कारण पददोष भी होते हैं। लेकिन अन्तिम तीन दोष क्लिष्ट, अविमृष्टविधेयांश, और विरुद्धमतिकृत या विरुद्धमतिकारिता केवल समास होने के कारण पददोष होते हैं।

च्युतसंस्कार, असमर्थ और निरर्थक दोषों को छोड़कर उक्त सभी दोष एक से अधिक पदों में आ जाएँ, तो वे वाक्य-दोष हो जाते हैं। उदाहरण के तौर पर एक दोष यहाँ ले लेते हैं और अविमृष्टविधेयांश वाक्य दोष को देखते हैं। निम्नलिखित श्लोक हनुमन्नाटकम् से लिया गया है और यह रावण की उक्ति है-

न्यक्कारो ह्यमेव मे यदरयस्तत्राप्यसौ तापसः

सोSप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः।

धिग्धिक् शक्रजितं प्रबोधितवता किं कुम्भकर्णेन वा

स्वर्गग्रामटिकाविलुण्ठनवृथोच्छूनैः किमेभिर्भुजैः।।

अर्थात् इस संसार में मेरे शत्रु हों, मेरे लिए बड़े अपमान की बात है, वह भी तपस्वी, वह भी मेरी नाक के नीचे राक्षस-कुल का विनाश कर रहे हैं, यह सबकुछ देखकर रावण जी रहा है, आश्चर्य है। इन्द्रजीत मेघनाद को धिक्कार है, कुम्भकर्ण को भी जगाने से क्या हुआ। और तो और, स्वर्ग रूपी छोटी गँवई (पुरा) को लूटकर व्यर्थ ही गर्व में फूली मेरी इन भुजाओं से क्या लाभ हुआ।

इस श्लोक में न्यक्कारो (हि)अयमेव (धिक्कार यही है) में अयमेव (यही) उद्देश्य है और न्यक्कारः (धिक्कार) विधेय है। उद्देश्य के स्थान पर विधेय और विधेय के स्थान पर उद्देश्य का प्रयोग करने के कारण यहाँ विधेय का अविमर्श हो गया है। इसी प्रकार वृथोच्छूनैः (व्यर्थ फूली हुई) में वृथा विधेय है और उच्छूनता (फूली हुई) उद्देश्य है, क्योंकि उच्छून भुजाओं की व्यर्थता को प्रधानता देना ही यहाँ कवि का उद्देश्य है। लेकिन समास में वृथा शब्द पहले आ जाने के कारण वह अप्रधान हो गया है। अतएव यहाँ भी विधेय का अविमर्श हुआ है। अतएव उक्त दोनों पदों के कारण यहाँ वाक्यगत अविमृष्टविधेयांश दोष है। इसके अतिरिक्त इसमें अन्य कारण से भी दोष हो सकता है।

वाक्यगत अविमृष्टविधेयांश दोष की एक और स्थिति बनती है और वह है- यत् (जो) और तत् (वह) के समुचित प्रयोग का अभाव। संस्कृत में एक नियम है- यत्तदोर्नित्यसम्बन्धः अर्थात् यत् (जो) और तत् (वह) का सम्बन्ध नित्य है, जहाँ जो आएगा वहाँ वह आएगा ही। इसके अन्तर्गत जहाँ-वहाँ आदि भी आते हैं। यह नियम हिन्दी भाषा एवं अन्य भाषाओं में भी लागू होता है। लेकिन निम्नलिखित दो स्थितियाँ अपवाद हैं-

(क) जहां प्रक्रान्त अर्थात् प्रकरण, प्रसिद्ध और अनुभूत अर्थ के लिए तत् (वह) शब्द का प्रयोग होता है, वहाँ यत् (जो) शब्द के प्रयोग की आवश्यकता नहीं होती।

(ख) जहाँ उत्तर (बाद के) वाक्य में यत् (जो) शब्द का प्रयोग होता है, वहाँ पूर्व वाक्य में तत् (वह) शब्द का बोध सामर्थ्य से अपने-आप हो जाता है। अतएव वहाँ तत् (वह) पद का प्रयोग आवश्यक नहीं होता। जैसे- मैं समझ गया, जो आप कहना चाहते हैं

अतएव पुनरावृत्ति से वचने के लिए शेष उक्त वाक्य-दोषों पर चर्चा न करके यहीं समाप्त करते हैं। इन वाक्य-दोषों के अतिरिक्त इक्कीस प्रकार के ऐसे दोष हैं जो केवल वाक्य में ही होते हैं- प्रतिकूलवर्णता, उपहतविसर्गता, विसंधि, हतवृत्तता, न्यूनपदत्व, अधिकपदत्व, कथितपदत्व, पतत्प्रकर्षत्व, समाप्तपुनरात्तता, अर्थान्तरैकवाचकता, अभवन्मतसम्बन्ध, अमतयोग, अनभिहितवाच्यता, अस्थानपदत्व, अस्थानसमासता, संकीर्णता, गर्भितत्व, प्रसिद्धिविरोध, भग्नप्रक्रमत्व, अक्रमत्व और अमतरार्थत्व

इन दोषों पर अगले अंक से चर्चा शुरु करेंगे। इस अंक में बस इतना ही।

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6 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक चर्चा का समापन !
    दिवाली की असीम शुभकामनाएँ !

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  2. मंगल मय हो सबको दीपों का त्यौहार ,दीपों का आकाश .आभार इस काव्यात्मक अन्वेषण के लिए .

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  3. आपकी यह सुन्दर प्रस्तुति कल सोमवार दिनांक 24-10-2011 को चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ की भी शोभा बनी है। सूचनार्थ

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  4. बहुत उपयोगी मार्गदर्शन मिल रहा है।

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  5. बहुत ही सुन्दर और सार्थक, ज्ञानपरक् जानकारी के लिए साधुवाद!
    दिवाली की हार्दिक शुभकामनायें!
    जहां जहां भी अन्धेरा है, वहाँ प्रकाश फैले इसी आशा के साथ!
    chandankrpgcil.blogspot.com
    dilkejajbat.blogspot.com
    पर कभी आइयेगा| मार्गदर्शन की अपेक्षा है|

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  6. दीपावली पर आपको और परिवार को हार्दिक मंगल कामनाएं !
    सादर !

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