मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

भगवान अवधूत दत्तात्रेय

भगवान अवधूत दत्तात्रेय

- आचार्य परशुराम राय

श्री जितेन्द्र त्रिवेदी जी इन दिनों कुछ आवश्यकता से अधिक व्यस्त हो गए हैं। इसलिए वे अपनी पोस्ट नहीं भेज पाए हैं। मेरे मन में भी इस विषय पर पिछले एक वर्ष से कुछ विचार उमड़-घुमड़ रहे थे। सोचा, ऐतिहासिक पर्व चल ही रहा है, तो क्यों न ब्रेक में पुराणेतिहास के कुछ पहलुओं पर चर्चा कर ली जाए। अतएव श्री त्रिवेदी जी के ब्रेक का लाभ उठा लिया।

भगवान दत्तात्रेय कई वैदिक मंत्रों के द्रष्टा महर्षि अत्रि और माता अनसूया के पुत्र हैं। इनका नाम दत्त है। आत्रेय (अत्रि की सन्तान) इनके पिता के नाम से बना विशेषण है, जो इनके नाम के साथ लगा है। महर्षि अत्रि की तीन सन्तानें हैं- भगवान दत्तात्रेय, महर्षि दुर्वासा और चन्द्रमा। यहाँ इनके लिए वर्तमान काल का प्रयोग किया गया है, क्योंकि मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय और दुर्वासा अमर हैं और साधक आज भी उनके भौतिक अस्तित्व का साक्षात् करते हैं।

भगवान दत्तात्रेय एक योगी तथा तन्त्र के वामाचार और दक्षिणमार्ग के गुरु के रूप में प्रसिद्ध हैं। इन्हें अवधूत भी कहा जाता है। शायद ये पहले (आदि) अवधूत हैं। अवधूत को परिभाषित करते हुए कहा गया है- अक्षरत्वात् वरेण्यत्वात् धूतसंसारबन्धनात् तत्त्वमस्यर्थसिद्धत्वादवधूतोSभिधीयते सुना जाता है कि क्षत्रिय समुदाय का इक्कीस बार संहार करने के बाद भगवान परशुराम अत्यन्त उद्विग्न और निराश होकर शान्ति की खोज में अपने गुरु कश्यप ऋषि के पास गए और अपनी समस्या का निदान पूछा। कश्यप ऋषि का इस सृष्टि के विकास में महान योगदान माना जाता है। कहा जाता है कि इस सृष्टि में जितने भी प्राणी हैं, वे इन्हीं की सन्तानें हैं। इन्हें महाराज, महर्षि, प्रजापति आदि कहा जाता है। कश्यप ऋषि ने भगवान परशुराम को भगवान दत्तात्रेय जी की शरण में जाने के लिए कहा।

पुराणों के अनुसार भगवान दत्तात्रेय ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों के सम्मिलित अवतार हैं। इनके उपदेश या शिक्षाएँ विभिन्न पुराणों, दत्त संहिता, अवधूत गीता, दत्तात्रेय उपनिषद् और अवधूत उपनिषद् में संग्रहीत हैं। कहा जाता है कि इनके 24 गुरु थे। भागवत महापुराण में अवधूतोपाख्यान के रूप में अपने अन्तिम दिनों में भगवान कृष्ण ने उद्धव से दत्तात्रेय और महाराजा यदु के इस संवाद का उल्लेख किया है। इसका विवरण एकादश स्कन्ध के सातवें और आठवें अध्याय मिलता है।

भगवान कृष्ण कहते हैं कि उनके पूर्वज धर्म के मर्मज्ञ महाराज यदु, जिनकी बुद्धि अत्यंत शुद्ध थी, ने त्रिकालदर्शी और परम तेजस्वी तरुण अवधूत दत्तात्रेय से उनका सत्कार कर नम्रतापूर्वक पूछा कि “हे ब्रह्मन्, न आप कोई काम करते हैं, न आपको यश, आयु, सम्पति आदि की जिज्ञासा है, फिर भी आपके पास इतनी निपुण बुद्धि कैसे प्राप्त हुई? आपने किससे शिक्षा ग्रहण की? अपने माता-पिता से?

भगवान दत्तात्रेय ने महाराज यदु से कहा कि “हे राजन्, सबसे कुछ न कुछ सीखा है, केवल माता-पिता से ही नहीं। इसके लिए मैंने कई गुरुओं से शिक्षा ग्रहण की। मेरे गुरु हैं- पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, मधुमक्खी, हाथी, शहद निकालने वाला, हरिण, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, क्वारी कन्या, बाण बनानेवाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट।

इसके बाद उन्होंने महाराज यदु से इनसे ली गयी शिक्षाओं का उल्लेख निम्नलिखित प्रकार किया -

माँ पृथ्वी मेरी पहली गुरु हैं। उन्होंने मुझे बताया कि मुझे लोग रौंदते हैं, अपने-अपने प्रारब्ध के अनुसार तरह-तरह के उत्पात करते हैं। फिर भी मैं रोती-चीखती नहीं, उनसे बदला नहीं लेती। बल्कि उन्हें वह सबकुछ देती हूँ, जो उनके लिए आवश्यक है। धीर साधु पुरुष को चाहिए कि वह लोगों की मजबूरी को समझे, न क्रोध करे और न ही अपना धैर्य छोड़े। वृक्षों और पर्वतों की सभी चेष्टाएँ दूसरों के हित में लगी रहती हैं। हमें चाहिए कि उनकी शिष्यता स्वीकार कर उनसे परोपकार की शिक्षा लें।

मेरे दूसरे गुरु पवन हैं। वह अनवरत चलता रहते हैं। वह फूल, काँटा, पवित्र, अपवित्र सबको समान रूप से स्पर्श करते हैं। सबको ताजगी प्रदान करते हैं, बिना किसी से आसक्त हुए। उनसे मैंने बिना किसी से आसक्त हुए या घृणा किए, बिना ईर्ष्या के, बिना भेदभाव के सबको ताजगी प्रदान करना सीखा। शरीर के अन्दर रहने वाली प्राण वायु के रूप में उन्होंने सिखाया कि आवश्यकता के अनुसार ही वस्तुओं का ग्रहण करें, इन्द्रियों की अनावश्यक चाह की पूर्ति में अपना श्रम व्यर्थ न करे।

मेरे तीसरे गुरु आकाश हैं। इस जगत में आग लगती है, बरसात होती है, सूर्य, चन्द्र अनेक खगोलीय पिंड भ्रमण करते हैं। वे बिना किसी भेदभाव, बिना किसी से आसक्त हुए दृश्य, अदृश्य सबको समान रूप से उचित स्थान देते हैं। लेकिन उनमें से कोई भी उनकी चेतना को प्रभावित नहीं करता। वह सभी घटनाओं के असम्पृक्त भाव से द्रष्टा हैं।

मेरा चौथा गुरु जल है। यह जगत में जीवन के नाम से जाना जाता है। जो भी इसके सम्पर्क में आता है, उसे स्वच्छ करता है, जीवन प्रदान करता है। यह हमेशा प्रवाहमान रहता है। यदि ठहर जाय, तो विकृत हो जाता है। इसलिए सदा प्रवाहमान रहते हुए अर्थात् विचरण करते रहना चाहिए और लोगों का भला करते रहना चाहिए।

उन्होंने अपने पाँचवें गुरु अग्नि के विषय में बताया कि यह सबको जलाकर प्रकाश और उष्णता में बदल देती है, उसके तेज को कोई दबा नहीं सकता। उसके पास संग्रह करने के लिए कोई पात्र नहीं है। अतएव मैंने इनसे सीखा कि जीवन में जो कुछ मिलता है, उसे बिना संग्रह किए और विभिन्न परिस्थितियों से अप्रभावित रहते हुए प्रकाश में परिवर्तित कर देना चाहिए ताकि उस प्रकाश में लोग सुरक्षित होकर चल सकें।

अपने छठवें गुरु चन्द्रमा के विषय में भगवान दत्तात्रेय बताते हैं कि वह बढ़ता, घटता रहता है, पर अपने अस्तित्व और आकृति को कभी नहीं खोता। अतएव चाहे दुख हो, सुख हो, उत्थान या पतन हो, हानि या लाभ हो अथवा शरीर की विभिन्न अवस्थाएँ- शैशव, बाल, यौवन, वार्धक्य हों, उससे बिना प्रभावित हुए मैं सदा अपने अस्तित्व के प्रति सजग रहता हूँ।

सातवें गुरु सूर्य के विषय में उन्होंने बताया कि वह अपनी तप्त किरणों से जल सोखकर बादल में परिवर्तित करता है, जो बिना किसी भेदभाव के जंगल, पहाड़, रेगिस्तान, गाँव, शहर, हर जगह वितरित करता है। इससे मैंने सीखा कि विभिन्न स्रोतों से ज्ञान प्राप्त करके उसे व्यावहारिक ज्ञान में परिवर्तित कर बिना भेदभाव के सबमें समान रूप से वितरित करना चाहिए।

मेरा आठवाँ गुरु कबूतर है। बहेलिए द्वारा अपने दल या परिवार के पकड़े जाने पर कबूतर उन्हें बन्धन से छुड़ाने के चक्कर में स्वयं जाल में फँस जाते हैं। इनसे मैंने सीखा कि भले ही सकारात्मक प्रतिक्रिया क्यों न हो, मोह और भावावेश में पड़कर अपना सर्वनाश नहीं करना चाहिए। ऐसे पुरुष को ज्ञानीलोग आरूढच्युत (मूर्ख) कहते हैं। मानव शरीर मुक्ति का खुला हुआ द्वार है। वह अपने परास्वरूप को प्राप्त कर सकता है। केवल गृहस्थी ही उसकी सीमा नहीं है।

अगले अंक में अवधूत दत्तात्रेय जी के शेष गुरुओं के विषय में और अपने निजी जीवन, सामाजिक जीवन या आधुनिक प्रबंधन में नीति के रूप में इनकी प्रासंगिकता पर चर्चा करना अच्छा रहेगा, क्योंकि यह पोस्ट काफी लम्बी हो चली है। आभार।

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16 टिप्‍पणियां:

  1. “हे राजन्, सबसे कुछ न कुछ सीखा है, केवल माता-पिता से ही नहीं। इसके लिए मैंने कई गुरुओं से शिक्षा ग्रहण की। मेरे गुरु हैं- पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, मधुमक्खी, हाथी, शहद निकालने वाला, हरिण, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, क्वारी कन्या, बाण बनानेवाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट।

    सृष्टि का प्रत्येक जीव हमारा गुरु है हम हर किसी से कुछ न कुछ सीखते ही हैं बेशर्त हमारी सोच सकारात्मक हो ....फिर भी यह तो सत्य है किदुनिया एक रंगमंच है .......बेहद ज्ञानवर्धक लेख .....!

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  2. आपके ज्ञान को नमन. कितना विस्तृत अध्यनन है आपका. विलक्षण आलेख .अपने चरणों में स्थान दें कुछ पलो के लिए आचार्य.....

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  3. मेरे मायके में दत्तात्रय को कुलदैवत
    के रूप में पूजा जाता है आपने जो
    जानकारी दी है अपने पिता द्वरा
    बचपन में मैंने सुना,और पढ़ा है !
    बहुत अच्छी जानकारी दी है आभार !

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  4. ज्ञानवर्धक पोस्ट, संग्रह कर ली है।

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  5. भगवान अवधूत दत्तात्रेय--

    भावपूर्ण प्रस्तुति ||
    बहुत सुन्दर |
    हमारी बधाई स्वीकारें ||

    http://dcgpthravikar.blogspot.com/2011/10/blog-post_10.html
    http://neemnimbouri.blogspot.com/2011/10/blog-post_110.html

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  6. बहुत सुन्दर चर्चा -प्रवाचनामृत! आगे के अंक का भी इंतज़ार है

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  7. ये आपने बहुत सुन्दर प्रसंग लिखा है…………अंत मे एक बात और बताइयेगा कि शिक्षा गुरु चाहे कितने बना लिये जायें मगर दीक्षा गुरु सिर्फ़ एक ही होता है …………दत्तात्रेय के 24 गुरुओं मे से यदि मानव एक भी गुरु का अनुसरण कर ले अर्थात एक भी शिक्षा यदि ग्रहण कर ले तो जीवन सरस हो जाये और वो वास्तव मे इंसान बन जाये।

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  8. बहुत ही ज्ञानवर्धक पोस्ट...अच्छी जानकारी

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  9. आचार्य जी! इनका मात्र नाम ही सुना था..जिज्ञासा थी जानने की और आज आपने मेरी यह इच्छा पूरी कर दी.. और यह सब पढकर ह्रदय पुलकित हो उठा.. और यह शब्द "पुलकित" होना मैं जानबूझकर प्रयोग कर रहा हूँ..क्योंकि यह सब पढकर मेरे मन में जो भाव उठा रहे हैं उसके लिए यही सर्वथा उपयुक्त शब्द है!!
    कुछ ऐसे ही भाव मैंने अपनी एक कविता में व्यक्त किये थे (मनोज जी को प्रेषित की थी वह कविता) और आज इस महान विभूति से मिलकर आपका आभार व्यक्त करता हूँ!!

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  10. दत्तात्रेय के अमर होने की बात हमने भी सुनी है। ऐतिहासिक पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाई।

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  11. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  12. भारतीय अधयात्म के सूत्रों को बताती प्रेरक पोस्ट!!!रोचक प्रस्तुतिकरण।

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