सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

प्रभुसत्ता निर्भर है आज कबाड़ी पर


प्रभुसत्ता निर्भर है आज कबाड़ी पर

श्यामनारायण मिश्र

कीर्ति की पहाड़ी पर

चढ़ने को आतुर हैं बौने
बैठकर प्रपंचों की
         पुश्तैनी गाड़ी पर।

दुधमुहों के
मृदुल अधरों पर
आचरण का एक अक्षर
         धर नहीं सकते।
किन्तु,
अपने मुंह मियां मिट्ठू बने
बात अपने पुण्य की
         कहते नहीं थकते।
पुरखों की थाती
यश-गौरव, प्रभुसत्ता
सब कुछ तो निर्भर है
         आजकल कबाड़ी पर।

दांव पर
सब कुछ लगा कर मौज में
नौसिखिए
         फेंट रहे पत्तियां
गंधमादन घाटियों में
जल रहीं
आयात की
         बारूदी उदबत्तियां।
रास-रंग में डूबे
उथले मन वाले लोग
हुद्द-फुद्द
         नाच रहे ताड़ी पर।

3 टिप्‍पणियां:

  1. वर्तमान परिवेश पर करारा व्यंग्य करता भाव प्रवण नवगीत है।

    आप सबको धनतेरस और दीपपर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।

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