गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

चौपाल : देशरत्न के जन्मदिवस पर

-- करण समस्तीपुरी
हम भूल गए उनकी विरासत को दोस्तों !
बड़ा बेगाना हुआ ग़ालिब अपने ही शहर में !!
आज सुबह से ही यह शे'र मेरी जुबाँ पे मौजूं है सबब है अपेक्षाकृत कम पढ़े जाने वाला हिंदी के एक अखबार के एक कोनो में छपी खबर। आज है देशरत्न का जन्मदिन। जी हाँ, आज स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जन्म-दिवस है। क्या आपको भी यह अभी याद आया। है न बड़ी विडम्बना जिसने देश की स्वतंत्रता और निःस्वार्थ सेवा में सबकुछ अर्पण कर दिया, उस महान सख्सियत को हम देशवासियों ने इतनी सहजता के साथ भुला दिया.... मन के किसी कोने मे उनकी याद तक नहीं रही। या रही तो दफ़न ही रह गयी। आपको क्या कहूँ, मैं खुद ही अहले सुबह अख़बार की खबर से याद कर पाया... और तभी से बार-बार जहन में आ रहा है, "हम भूल गए उनकी विरासत को दोस्तों.....।" इसी के साथ याद आता है, कोई पांच वर्ष पुराना बाकया।
यूँ तो सरकारी सेवा के प्रति कभी से अपनी अनुरक्ति नहीं रही पुनश्च यायावरी प्रवृति के वशीभूत प्रतियोगिता परीक्षा के बहाने पहुँच गया गोरखपुर। परीक्षा में बैठने की औपचारिकता पूरी की फिर गोरखनाथ मंदिर, गीता प्रेस और आस पास के कुछेक कम प्रसिद्द दर्शनीय स्थलों की परिक्रमा कर वापस रेलवे स्टेशन आ गया। तब तक समस्तीपुर जाने वाली सभी गाड़ियां जा चुकी थी। समीप के एक चालू भोजनालय में पंद्रह रूपये में भर पेट भोजन किया और वापस स्टेशन पर आ कर मच्छरों से मारा-मारी करते हुए रात के पहर गिनने लगा। उस दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही नित्यचर्या निभानी पड़ीं। तब तक दिल्ली से विलम्ब से आ रही आम्रपाली एक्सप्रेस के गोरखपुर आगमन का समय हो चला था। टिकट पहले ही ले रखा था। गाड़ी मे सवार हुआ। अपनी विलंबित चाल पर मुहर लगाती हुई गाड़ी कोई सात घंटे बाद एक छोटे से स्टेशन पर रुकी और किसी तकनिकी कारण से रुकी ही रही। शीघ्र गंतव्य पर न पहुँच पाने की झुंझलाहट पर स्टेशन पर फैली गन्दगी कोढ़ मे खाज जैसी लग रही थी। कोई दस मिनट तक उमस भरे स्लीपर डिब्बे मे अटके रहने के बाद एक सज्जन से स्टेशन का नाम सुन सर श्रद्धा से नत हो गया। कौन सा स्टेशन है भैय्या? दिल्ली से आ रही एक युवती के सवाल पर उस सज्जन ने कहा था 'जीरादेई'। अब तो मेरी आँखें श्रद्धा से चमक उठी और हृदय जहां अब तक उताबलापन और व्यग्रता का साम्राज्य था, वहाँ अथाह श्रद्धा आ गयी। अरे... यही है वो जगह जिसका उल्लेख बचपन से एक महापुरुष पर लेख मे करता आ रहा हूँ। अब तक गन्दगी की वजह से जिस स्थान को मन ही मन असंख्य गालियाँ दे चुका था, श्रद्धा से नत उसे चूम लेने को जी कर रहा था।
मैं झटके से गाड़ी से बाहर आ गया। मन ही मन उस धरती को नमन किया। उत्सुक आँखें वजह तलाश रहीं थी कि आखिर क्या है इस गाँव मे कि हम इसे बचपन से याद करते आ रहे हैं। वही अति पिछड़े प्रदेश का एक एक पिछड़ा सा गाँव। आखिर स्टेशन पर लिट्टी-समोसे बेचने वाले से मैं ने पूछ ही लिया, "भैय्या यहीं है राजेंद्र बाबू का घर ?" प्रश्न पर पुलकित होता हुआ लिट्टी वाला आत्मीयता के साथ मुझे प्लात्फोर्म के शेड से बाहर ला, आँखों को सिकोड़, बाएं हाथ से मेरे सर को अपने सिर लगा दायें हाथ को सामने दिखलाते हुए, भोजपुरी मे बोला, "हउ देख'... उ बड़का उजरा मकान लौकता... पीला मुंडेर वाला... उहे बा नु राजेंदर बाबू के मकान।" कुछ स्पष्ट दिखा नहीं फिर भी मैं ने पूछा कितना दूर होगा यहाँ से? "कोस भर होई"। कहता हुआ वह तो अपने खोमचे की ओर बढ़ गया लेकिन मैं देशरत्न का घर देखने का मोह-संबरण नहीं कर सका। गाड़ी से अपना छोटा सा बैग उतार कंधे पे लटकाया और चल पड़ा, एक अनजान डगर, जो वर्षों से आता था मेरे अवचेतन में। स्टेशन से दक्षिण दिशा मे कच्चे पक्के पथ पर कोई घंटे भर के करीब चलते हुए, एक विशाल भवन दिखा, सफ़ेद रंग में रंगा... अपने सपूत की सादगी की कहानी कह रहा। बाहर एक गहरे नीले रंग के तख्ते पर लिखा हुआ था, 'देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म यहीं हुआ था।" मन ऐसी अद्वैत शान्ति में डूब गया मानो कोई अनुपम तीर्थ में पहुँच गया होऊं। मकान पर ताला लटक रहा था। कोई केयर-टेकर या ऐसा कुछ नहीं था, जिसकी अनुमति से मकान पर लगा ताला खुल सके और मैं इस पवित्र तीर्थ का भ्रमण कर सकूँ। मैंने मकान के फाटक पर सिर झुका कर दंडवत प्रणाम किया। तब तक कुछ ग्रामीण 'राजेन्द्र बाबू पर डॉक्युमेंट्री फिल्म बनाने वाला' समझ कर करीब आ गए। बिना पूछे ही प्रशासनिक उदासीनता और गाँव मे मूलभूत सुविधाओं के घोर अभाव पर सरोष वक्तव्य देने लगे। बाद में मेरी सच्चाई जान एक अमूल्य सत्य बतलाये। पास के कुआं की ओर इशारा करते हुए बोले कि किसी जमाने में देशरत्न के परिवार में पानी की आपूर्ति इसी कुँए से होती थी। फिर उनके परिवार का एक संक्षिप्त ब्यौरा दिया और बड़ी उदासी के साथ कहा कि 'अब तो यहाँ कोई आता नहीं। सरकार ने राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर रखा है लेकिन रख-रखाव का तो कोई इंतजाम ही नहीं है।' अभी तक मन में जो उल्लास था इन बातों ने उनमे थोड़ा कसैलापन घोल दिया था। एक ग्रामीण के चाय के आग्रह को विनम्रता से अस्वीकार कर वापस स्टेशन जाने के साधनों के बारे में पूछा। उनके बताये अनुसार तांगे पर सवार स्टेशन की ओर चल तो पड़ा लेकिन मन अभी तक स्मृतियों के जाल से बाहर नहीं आ पाया था।

'लोगबा का कही लोगबा इहे में परेशान बा !'

मेरे बाबा राजेन्द्र बाबू का हवाला देकर यह कहावत कहा करते थे। और सच में देशरत्न की उक्ति आज भी कितनी चरितार्थ है! आज भी हम अपनी परेशानियों से इतने परेशान नहीं हैं जितनी इस बात से कि लोग क्या कहेंगे ? लेकिन राजेंद्र बाबू भी 'लोगबा का कही' सोच के परेशान होते तो क्या जीवन की हरेक परीक्षा मे सर्वोच्च स्थान प्राप्त करते हुए भारत के राष्ट्रपति भवन तक का सफ़र तय कर पाते? उन्होंने तो राष्ट्रपति भवन में भी इसकी परवाह नहीं की। इस सन्दर्भ में रांची के उस जमाने के सांसद राम बहादुर बाबू का एक संस्मरण याद आता है। राजेंद्र बाबू दुबारा भारत के राष्ट्रपति चुने गए थे। एक दिन रामबहादुर बाबू उनसे मिलने राष्ट्रपति भवन गए। उस समय राजेंद्र बाबू हाथ में सुई लिए खादी का बना वर्षो पुराना अपना जीर्ण-शीर्ण चादर खुद से सी रहे थे। रामबहादुर बाबू ने उनसे नए चादर लेने का आग्रह किया। उस पर राजेन्द्र बाबू का जवाब था, "रामबहादुर ! मेरे पास तो फटी हुई चादर भी है। इस देश में तो ऐसे भी लोग हैं जिन्हें तन ढकने के लिए चिथरा भी नसीब नहीं है। मैं उनका भी राष्ट्रपति हूँ। मुझे नयी चादर लेने का कोई हक नहीं है।" ऐसी बेमिसाल थी डॉ. प्रसाद की सादगी।

लोक कलाओं से बड़ा लगाव था देशरत्न को !

राजेंद्र बाबू को लोक-कलाओं से बड़ा लगाव था। विदेसिया नाच उन्हें बहुत पसंद था। कहा तो यहाँ तक जाता है कि पटना कोलेजिएट स्कूल में इनके लगातार अव्वल आने से परेशान एक अँगरेज़ अधिकारी ने राजेंद्र बाबू के प्रतिद्वंदी अपने बेटे को कक्षा में प्रथम लाने की गरज से एक बार परीक्षा की पूर्व-रात्री राजेंद्र बाबू के आवास के पास विदेसिया नाच का आयोजन करवा दिया था। लेकिन राजेंद्र बाबू ने रात भर नाच भी देखा और उस परीक्षा में भी प्रथम आये। हिंदी रेडियो के इतिहास में क्रांतिकारी नाटक 'लोहा सिंह' में 'खदेरन को मदर' की कालजयी भूमिका निभाने वाली शान्ति देवी को उन्होंने अपने हाथों से पुरस्कृत किया था और कहा था, "शांति तू दिल्ली आ...!" देशरत्न को भोजपुरी भाषा भी बहुत प्रिय थी और भोजपुरी बिहार-उत्तरप्रदेश-मध्य प्रदेश के लोगों से वे यथासंभव भोजपुरी में ही बात करते थे।
आज़ादी की लड़ाई में बापू के कंधे से कंधे मिला कर चलने वाले राजेंद्र बाबू को पद-लोलुपता कभी छू तक ना पायी। गांधी जी के आदर्शों को अपने कर्मों में आत्मसात किये राजेंद्र बाबू देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होने के बावजूद कभी भी व्यक्तिगत स्वार्थ या राजनैतिक महत्वाकांक्षा के शिकार नहीं हुए। असाधारण प्रतिभा के धनी डॉ. प्रसाद न केवल राष्ट्रपति बल्कि भारत के संविधान सभा के अध्यक्ष भी रहे। देश पर अपना सर्वस्व उत्सर्ग करने वाले इस महापुरुष को उनके जन्मदिवस पर याद करने के लिए भी व्यस्त राष्ट्र को फुरसत कहाँ ? तो बस शे'र मैं फिर दुहरा देता हूँ,
"हम भूल गए उनकी विरासत को दोस्तों ! बड़ा बेगाना हुआ ग़ालिब अपने ही शहर में !!"

10 टिप्‍पणियां:

  1. भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के 125 वें जन्म दिन पर आपका यह आलेख बहुत ही समयोचित और सटीक है। सबसे पहले तो हम उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। आज तो ऐसा लगता है कि वे प्रायः भुला ही दिए गए हैं। उनके ऐसा सादगी भरा जीवन बिताने वाला शायद ही कोई दूसरा हुआ हो। पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहने वाले राजेन्द्र बाबू कहा करते थे, “यद्यपि मैंने अपनी पढ़ाई अंग्रेजी के अक्षरों को सीखने से आरंभ की थी पर मेरा विश्वास है कि यदि शिक्षा को प्रभावशाली बनाना है तो वह जनता की भाषा में ही दी जानी चाहिए।”
    शिक्षा के ढ़ांचे में बदलाब लाने और जनता की भाषा में शिक्षा दिए जाने के हिमायती राजेन्द्र बाबू ने 1950 में ही ग्राम्य विश्व विद्यालय खोले जाने की वकालत की थी। वे रट्टामार पढ़ाई के खिलाफ थे। आज जब शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन की बहस चारो ओर हो रही है, इस विषय पर राजेन्द्र बाबू के विचार काफी प्रासंगिक हो जाते हैं।

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  2. "रामबहादुर ! मेरे पास तो फटी हुई चादर भी है। इस देश में तो ऐसे भी लोग हैं जिन्हें तन ढकने के लिए चिथरा भी नसीब नहीं है। मैं उनका भी राष्ट्रपति हूँ। मुझे नयी चादर लेने का कोई हक नहीं है।"
    बहुत सुंदर शव्द है यह काश इन्हे मन्मोहन ओर उस की पार्टी के लोग पढ पाते, ऎसे लोगो को कोन याद रखता है नेहरु ओर सोनिया सब की आंखो का तार है जी,
    मै नमन करता हुं इस महान आत्मा को जो अमर है

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  3. बहुत अच्छा आलेख। डा. राजेन्द्र प्रसाद को शत-शत नमन।

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  4. बहुत अच्छा लगा पढ़कर। हमारी श्रद्धांजलि।

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  5. डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जी के बारे में आपने बहुत ही बढ़िया आलेख लिखा है ! उनके जन्मदिवस पर शत शत नमन और श्रधांजलि अर्पित करती हूँ!

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  6. अच्छा आलेख। डा. राजेन्द्र प्रसाद को शत-शत नमन।

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  7. आपका यह आलेख बहुत ही समयोचित और सटीक है। डा. राजेन्द्र प्रसाद को शत-शत नमन।

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