शनिवार, 23 जनवरी 2010

होइहैं वही जो राम रचि राखा... !

-- करण समस्तीपुरी
भाई.... हम जैसे ओफिसिअल जीव को तो बस सप्ताहांत में ही फुर्सत मिलती है। और फुर्सत ना भी मिले तो भी हम इसे फुर्सत के लम्हे ही समझते हैं। और इन फुर्सत के लम्हों को हम पल-पल बड़ी सिद्दत से जीते हैं। मेरे लिए तो पवित्र दिन बोले तो अंग्रेजी का होलीडे तो वही है, जिसमे अपने 'मंदिर' की चौखट से बाहर कदम ना रखना पड़े। बड़ी संयोग से इस बार ऐसे होलीडे का लक्षण दिख रहा था। मुद्दतों बाद आज ऐसा सप्ताहांत मिला था, जब न कोई पर्व, ना कोई पार्टी.... न ही किसी अतिथिदेवता का प्रादुर्भाव.... ! लेकिन 'होइहैं तो वही जो राम रचि राखा... !'

शनिवार की सुबह.... हस्बेमामूल देर से आती है। इस विलंवित प्रभात का एक लाभ हमें ये मिलता है कि इस दिन 'अख़बार' का इन्तज़ार नहीं करना पड़ता... कमबख्त सोफे के सामने पड़े सेंटर टेबल पर मेरा इन्तज़ार करता है। शनिवार के अख़बार को पाठक का इन्तज़ार करते देख सप्ताह भर से मन में गूंज रहे कबीर के दोहे,
"माटी कहे कुम्हार से तू का रौंदे मोहि !
एक दिन ऐसा आएगा मैं रौंदुंगी तोहि !!
आखिर करमजला अखबार सप्ताह भर सुबह सुबह हम से इन्तज़ार करवाता है.... लेकिन शनिवार आते ही एक दिन ऐसा आ ही जाता है जब यह हमारे इन्तज़ार में निःश्वास भरता रहता है।

आज का अखबार भी इन्तज़ार में टेबल पर कराह रहा था। लेकिन मुझे क्या पता.... यह कमबख्त 'मेरी राशिफल' के बदले 'लाइफ स्टाइल में फिफ्टी परसेंट डिस्काउंट सेल' का विज्ञापन ले कर आया है। अब मुझे बाबा के पराती का मतलब समझ में आया, "जो सोवत हैं सो खोवत हैं ! जो जागत हैं सो पावत हैं !!" काश सप्ताहांत की लेट-लतीफी को लात मार कर मैं जल्दी उठ गया होता... तो कम से कम इस कलमुंहे को तो छुपा ही देता। फिर न तो 'डिस्काउंट सेल' पर भाभी जी की नजर पड़ती और ना ही....... ! खैर जो जागत हैं वही पावत हैं... मैं सो रहा था तो ऋण-आवेश ही मिलना था.... !

बचने की सारी जुगत जब काम ना आई तो मन मसोस कर स्वीकार कर लिया, 'होइहैं सोई जो राम रचि राखा... !' सेल है तो जाना ही पड़ेगा..... ! जैसे-तैसे दिन का भोजन ग्रहण कर शनिवारीय सुख को तिलांजलि दे 'लाइफ-स्टाइल' की शरण लिए। पहले तो रियायती सेल ने हमारे कीमती टाइम का रेल निकाल दिया........ और फिर सूक्ष्म तारांकित *कंडीशंस अप्लायड ने रिसिसन की जली और मंहगाई की मारी जेब का तेल निकाल दिया। खैर, 'होइहैं वही जो राम रचि राखा....!' अच्छा ही हुआ कि आज अखबार में मेरा राशिफल नहीं छपा था। वर्ना ज्योतिषी जी की खैर नहीं। सच छपा होता तो सुबह में ही गाली सुनते और झूठ छपा होता तो शाम में.... ।

'डिस्काउंट सेल' के इतने फायदे हैं कि खरीददारी तो खरीददारी पैसे चुकाने के लिए भी लम्बी कतार में लगनी पड़ती है। हमारा नंबर बहुत पीछे था और काउंटर बहुत आगे। भीड़ उस से भी बेतरतीब। तभी पता चला कि एक वी.आई.पी.काउंटर भी है। हमने सोचा वी.आई.पी. नहीं हैं तो क्या हुआ... ? वी.आई.पी. का बैग तो खरीदा है, वो भी डिस्काउंट सेल में। कुछ जुगार टेक्नोलोजी लगा कर देखते हैं। लाइन के चौकीदार से आरजू-मिन्नत की... छोटे भतीजे-भतीजियों की असुविधा का रोना रोया... बेचारा बड़ा रहमदिल निकला... उसे दया आ ही गयी। हमें वी.आई.पी काउंटर में प्रवेश की इजाजत देने को राजी हो गया। चौकीदार साहब के भलमनसाहत पर हम तो बहुत प्रस्सन्न हुए। किन्तु क्षण भर में ही यह प्रसन्नता काफूर हो गयी।

सुविधा तो दिया उन्होंने लेकिन लगे सुविधा-शुल्क मांगने। हमने उनकी उम्र और सल्लज व्यवहार देख धर्म और नीति का पाशा फेंका। लेकिन तरकीब उल्टी पर गयी। चौकीदार साहब सच्चे कर्मयोगी थे। हमें ही नीति का पाठ पढ़ा गए। कहने लगे कि यह कोई नयी बात तो है नहीं। हम तो रोज हनुमान चालीसा पढ़ते हैं। उस में भी तो लिखा हुआ है, "होत न आज्ञा बिनु पैसा रे !" बिना पैसा के आज्ञा कैसे मिलेगी ? नीति के हारे हमें वहाँ भी प्रसाद चढ़ाना पड़ा। खैर वी.आई.पी. काउंटर का पास तो मिल गया। लेकिन 'होइहैं तो वही जो राम रचि राखा !' हम पहुंचे कि काउंटर ही बंद.... ! अब फिर से चलो भैय्या जेनरल काउंटर में ! धन भी गया, धर्म भी गया, चैन भी गया, समय भी गया.... और फिर बुद्धू लौट के घर को आये ! बोल सियावर राम चन्द्र की जय !!!

15 टिप्‍पणियां:

  1. 'निति' को 'नीति' कर दीजिए न !
    और भी छोटे छोटे हैं, देख लीजिए।

    ग़जब! कमाल की पोस्ट।
    आमफहम भाषा, प्रवाह और साथ साथ कदम मिलाता ह्यूमर ! वारे गए महराज।
    ऐसे गद्य लिखने वाले से कभी कभी ईर्ष्या सी होती है।

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  2. ज्ञान से सराबोर सुंदर सुंदर विचार,,धन्यवाद

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  3. सच है...होइहैं वही जो राम रचि राखा... !

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  4. न तो 'डिस्काउंट सेल' पर भाभी जी की नजर पड़ती और ना ही....... !
    ई आलेख पर भी भाभी जी की नज़र नहिए गई होगी। अगर चली जाये तो ... 'होइहैं तो वही जो राम रचि राखा... !'

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  5. काफी मजा आया लेख पढ़कर करण जी। बस यही कहने को दिल कर रहा है, "!!!सिया वर राम चन्द्र कि जय!!!"

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  6. आगत अनागत सभी पाठकों का आभार ! कम फुर्सत में लिखे इस फुर्सत के आलेख को आपने पसंद किया, बहुत बहुत शुक्रिया !! गिरिजेश जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.... सुझाव के अनुसार भूल-सुधार कर दिया है !!! आपकी तरह सुधि पाठकों के ब्लॉग पर आने से दिल बाग़-बाग़ हो जगता है !!!! बहुत-बहुत धन्यवाद !!!!!

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  7. राम चन्द्र की जय ... बहुत अच्छा लिखा है करण जी ............ सरल भाषा में लिखा अच्छा हास्य लिए .......

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  8. आज कल हर जगह सेल लगी हुई है...और ये द्रश्य हर जगह देखे जा सकते हैं....अच्छी हास्य रचना

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  9. प्रवामय भाषा, सहज हास्य और चुटील्स व्यंग्य से सजी इस प्रस्तुति ने मन मोह लिया!!!

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  10. Kahani ghar ghar ki aur is bar to kahani hai life essssstyle ki...kahani pasand aai....

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