मंगलवार, 5 जनवरी 2010

विश्‍व विटप की डाली पर

नमस्कार ब्लोगर बन्धु-गण ! महज तीन महीने हुए.... और हमने ब्लॉग पर पोस्टों का शतक पूरा कर लिया। इस शतकीय सफ़र में आपका सहयोग, सुझाव, आकांक्षा आशीर्वाद, पाठकीयता और शुभ-कामनाओं का स्थान सर्वोपरी है। आपकी सृजनात्मक प्रतिक्रया हर कदम पर हमारी रचनात्मक ऊर्जा को उत्प्रेरित करती रही। "मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल ! लोग मिलते गए और कारवां बनता गया !! मैं आपके स्नेह और सुझाव से कभी उऋण नहीं हो सकता पुनश्च सौवें पराव पर हृदय से आपका आभार ! एक महापुरुष ने कहा था, "हजालों मील लम्बे सफ़र की शुरुआत भी फ़कत एक कदम से ही होती है ।‘ सौवें मील-स्तम्भ के पार आज हमें याद आता है हमारा पहला कदम। आपकी नजर कर रहा हूँ इस ब्लॉग पर प्रकाशित पहली कविता !

-- मनोज कुमार

विश्‍व विटप की डाली पर है,
मेरा वह प्यारा फूल कहां !
है सुख की शीतल छांव कहां,

चुभते पग-पग पर शूल यहां !!


जग में बस पीड़ा ही पीड़ा,
दुख ज्वाला में जलते तारे।
शशि के उर में करुण वेदना,

प्रिय चकोर हैं दूर हमारे !!
बड़ी विचित्र रचना इस जग की,
कांटों में खिलते फूल यहां !
है सुख की शीतल छांव कहां,
चुभते पग-पग पर शूल यहां !!


नीर बरसते झम-झम झम-झम,
बादल अम्बर के विरहाकुल !!
टकरा-टकरा कर उपलों से,

तट छूने को लहरें व्याकुल !
कैसे पार लगेगी नौका,

हैं धाराएं प्रतिकूल यहां !!
है सुख की शीतल छांव कहां,
चुभते पग-पग पर शूल यहां !!

सुमनों में अब वह सुरभि नहीं,
कोकिल की कूक में दर्द भरा !
मरघट की सी नीरवता में,

है डूब रही सम्पूर्ण धरा !!
सब देख रहे इक-दूजे को,

कर दी है किसने भूल कहां !

है सुख की शीतल छांव कहां,
चुभते पग-पग पर शूल यहां !!

!! आशा है आपका स्नेह और सहयोग पूर्ववत बना रहेगा !!

24 टिप्‍पणियां:

  1. कविता का अद्भुत शब्द और नाद सौंदर्य कालजन्य विसंगतियों का सफल सम्प्रेषण कर रहा है! ब्लॉग-प्रस्तुति का शतक पूरा करने पर हार्दिक बधाई !! जय हो ... !!!

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  2. ब्लॉग-प्रस्तुति का शतक पूरा करने पर हार्दिक बधाई ! कविता बहुत अच्छी लगी। खासकर ये पंक्तयां जो आज के सच को दर्शाती हैं -
    सब देख रहे इक-दूजे को,
    कर दी है किसने भूल कहां !
    है सुख की शीतल छांव कहां,
    चुभते पग-पग पर शूल यहां !! !!

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  3. मेरी कामना है कि आप की सृजनात्मकता सुधीजनों को आकर्षित करती रहे।

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  4. मनोज कुमार जी एक सौ का पोस्‍ट सिक्‍का बनाने पर स्‍वीकारें बधाई
    इसे पहुंचायें जल्‍दी ही हजार तक भाई।

    जग में सिर्फ पीड़ा ही पीड़ा नहीं है
    सौ पोस्‍ट पूरी होने का आनंद
    हजार पोस्‍ट न होने के दुख से
    कहीं बहुत उपर है
    इसलिए जग में सिर्फ पीड़ा ही नहीं है
    कोशिश है
    प्रयत्‍न है
    विश्‍वास है
    संबल है
    और सबसे बढ़कर
    आत्‍म और कलम भाव बल है
    जुटे रहिए।

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  5. बहुत शानदार कविता, इस कविता में इस्तेमाल हुए शब्दों ने मुझे पाठ्य क्रम की हिन्दी पुस्तक में प्रकाशित कुछ कवियों की याद दिला दी, ऐसा लगा जैसे मैं उनमें से ही किसी एक को पढ़ रहा हूँ।

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  6. ब्लॉग-प्रस्तुति का शतक पूरा करने पर मेरी ओर से हार्दिक बधाई ! सुंदर रचना।

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  7. बार - बार रचना पढ़ने का मन कर रहा है। बधाई....

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  8. शतक की बहुत बहुत बधाई...अनेक शुभकामनाएँ.

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  9. सब देख रहे इक-दूजे को,
    कर दी है किसने भूल कहां !
    है सुख की शीतल छांव कहां,
    चुभते पग-पग पर शूल यहां !!

    शतक की बधाई।
    आशा है आपका चार अंकों में जाए।
    हां बात आपने बिलकुल सही कही है ... सब एक दूसरे की भूल निकालने में ही लगे हैं।

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  10. aplogo ko blog-prastuti ka satak pura karne ke liye bahoooooooooooot bahooooooooooooooooot badhai...aur apki ye kavita humesa ke tarah bahot he sundar hai..

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  11. kavita ke shabd aur lay mil kar uskee bhavana pathakon tak pahuncha rahe ,bahot sundar prastuti.

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  12. आज के हालात का बहुत अच्छा चित्रण।

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  13. शतक की बहुत बहुत बधाई...अनेक शुभकामनाएँ.

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  14. सुमनों में अब वह सुरभि नहीं,
    कोकिल की कूक में दर्द भरा !
    मरघट की सी नीरवता में,
    है डूब रही सम्पूर्ण धरा ...

    अद्भुत शब्द संयोजन है .......... अनुपम रचना ..........

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  15. टकड़ा-टकड़ा कर
    के स्थान पर
    टकरा-टकरा कर. ही रहता तो क्या बुरा था
    सुंदर गीत में यह लाइन मुझे खटकी सो ल‍िख द‍िया.

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