रविवार, 31 जनवरी 2010

धन्य बिटिया निशा रानी !





कल रंजीत जी के ब्लाग http://koshimani.blogspot.com/>दो पाटन के बीच पर एक आलेख पढ रहा था! उनकी इन पंक्तियों ने मुझे इस पोस्ट को आप तक पहुंचाने के लिये प्रेरित किया -:

"जिसे शादी में दहेज की मोटी राशि नहीं मिलती, वो खुद को अभागा मानता है। अपराधबोध से ग्रस्त हो जाता है। बला यह कि दहेज लेना और देना स्टेटस सिंबल बन गया है। इसलिए लोग पचास हजार लेते हैं, तो दो लाख बताते हैं और दो लाख देते हैं , तो पांच लाख गिनने का प्रचार करते हैं।"

मैं भी उसी राज्य से हूं जहां के रंजीत जी हैं। इस राज्य में सामंती-अर्द्ध सामंती प्रव्रित्ति आज भी विद्यमान है! इसका नतीज़ा यह है कि यहां दहेज़ जैसे अभिषाप की "ग्लोरिफ़िकेशन" आम बात है। दूसरे राज्यों में शायद स्थिति इतनी भयावह न हो फिर भी इस दावानल की आंच की दहक तो इस देश में सर्व-व्यापी है।

इस समस्या से निपटने का क्या उपाय हो इस पर मैं नहीं जाता पर आपके पास कुछ सुझाव हों तो अवश्य सामने लायें। हां मैंने जो किया और जो करता आ रहा हूं वह आपसे बांटना चाहूंगा।

मैं दहेज़ लेकर शादी करने वालों की बारात नहीं जाता। चाहे वह घर परिवार की शादी हो चाहे समाज की। और यह काम मैं अपने विद्यार्थी जीवन से कर रहा हूं। इसके दो फ़ायदे हुए। एक हमारे जानने वाले हमारे सामने इसकी ग्लोरिफ़िकेशन से बचते थे, दूसरे, कुछ लोग ही सही, प्रेरित होकर दहेज़ नहीं लेते थे/हैं।

इसी से जुड़ा एक वाक़या, आपको भी अवश्य ही याद होगा। सात-आठ साल पहले की बात है। टीवी-मीडिया आदि में इसकी उन दिनों ख़ूब चर्चा हुई थी। मैं बात कर रहा हूं दिल्ली की रहने वाली बिटिया निशा की। उसने हिम्मत दिखाई और दहेज़ के लोभी वर पक्ष को बिना शादी किये ही अपने दर से वापस भेज दिया था।

उसके इस महान कार्य ने मुझे काफ़ी प्रेरित किया था। मैने उसके इस हौसले को सलाम करने के लिये एक कविता लिखी थी। पर कहीं भेजा नहीं, और न ही निशा को अर्पित कर सका। आज इस ब्लोग के माध्यम से आप लोगों द्वारा उसे पहुंचाता हूं।

धन्य बिटिया निशा रानी

--- --- मनोज कुमार

धन्य बिटिया निशा रानी !

हाथ में मेंहदी रचा कर,

लाल जोड़ा तन सजाकर,

तक रही थी राह जिस पर,

थी अभी बारात आनी।

धन्य बिटिया निशा रानी !

आस और विश्‍वास अपने,

पल रहे थे लाख सपने,

एक सुनहरा कल होगा,

और होगी नई कहानी।

धन्य बिटिया निशा रानी !


फूल की लड़ियाँ सजी थी,

द्वार शहनाई बजी थी,

हर्ष और उमंग ने थी,

ख़ुशियों की चादर तानी।

धन्य बिटिया निशा रानी !


सगे-संबंधी सब आए थे,

ख़ुशियों का तोहफ़ा लाए थे,

शुभ कामना हृदय से,

दे रहे आशीष जुबानी।

धन्य बिटिया निशा रानी !


फ्रीज़-टीवी कम लगेगा,

मांग मोटर की करेगा,

बाप ने की थी व्यवस्था,

बेच कर अपनी जवानी।

धन्य बिटिया निशा रानी !


वह अनोखी शाम आई,

लाख पन्द्रह दाम लाई,

दे कहां से जो नहीं है,

जनक की थी परेशानी।

धन्य बिटिया निशा रानी !

रोक अश्रु बाबुल मेरे,

लूंगी न मैं सात फेरे,

विवाह के व्यापारियों को,

सबक सीखाने की है ठानी।

धन्य बिटिया निशा रानी !


छोड़ सारी लाज उसने,

रीति और रिवाज उसने,

कर दिया विदा दूल्हे को,

जिससे थी शादी रचानी।

धन्य बिटिया निशा रानी !


देकर निज बलिदान उसने,

रक्खा पिता का मान उसने,

दहेज के दानवों को,

पड़ी थी उससे मुंह की खानी।

धन्य बिटिया निशा रानी !


त्याग ना ये व्यर्थ होगा,

नारी बल समर्थ होगा,

हे निशा ! तू लेकर आई,

युवतियों की भोर सुहानी।

धन्य बिटिया निशा रानी !


सीख दुनियां को दी है,

मिसाल क़ायम जो की है,

भारत की हर ललना के लिए,

बन गई है वह निशानी।

*** ***

28 टिप्‍पणियां:

  1. मनोज जी आपके इस जज़्बे को सलाम सही मे अगर हम समाज को बदलना चाहते हैं तो पहले खुद को बदलना होगा। बहुत सराह्णीय पहल कविता मर्मस्पर्शी है धन्यवाद और शुभकामनायें

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  2. मैं दहेज़ लेकर शादी करने वालों की बारात नहीं जाता। चाहे वह घर परिवार की शादी हो चाहे समाज की।
    ----------
    आपकी यह भावना स्तुत्य है। मैं तो अपनी शादी में दहेज निषेध पर टिका रहा पर कुटुम्ब-परिवेश-समाज से अनुकरण कराने को दो-दो हाथ करने की मन में संकल्प शक्ति न ला पाया! :(

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  3. @ आ. निर्मला कपिला दीदी
    बिल्कुल सही कहा आपने। इसकी शुरुआत पहले ख़ुद से करनी चाहिए।

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  4. @ ज्ञानदत्त पाण्डेय सर!
    अपने इस निर्णय और निश्चय के कारण घर-परिवार में मुझे विलेन की तरह देखा जाता रहा! "बड़ा साहब हो गया है न, हमारी बारात थोड़े ही जायेगा।" पर धीरे-धीरे उनके इस चिंतन में बदलाव भी देखा। तो खुशी भी होती है।

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  5. आपका प्रयास अनुकरणीय है। पर पता नहीं कितने लोग इसका अनुकरण करेंगे?
    कविता बहुत प्यारी है।

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  6. आपके इस आलेख को पढ़कर कुछ सोचने को मजबूर हो गया। आपका कदम सराहनीय ही नहीं बल्कि अनुकर्णीय भी है। और कविता बड़ी प्यारी है।
    रणजीत जी और आप जिस राज्य से हैं मैं भी उसी राज्य का रहने वाला हूँ। आये दिन सुनाने को मिलता है कि उसने इतने लाख दहेज़ में लिए। अब तो मामला करोड़ों तक जाने लगा है ख़ासकर के IAS और IPS लड़कों को। खैर हमारे यहाँ तो हमने ऐसे भी लोग देखे हैं जो कि बिना दहेज़ कि मांग के ही बेटी कि शादी में पूरे से दहेज़ उड़ेल आते हैं लार्के वालों के यहाँ। कही दूर कि बात नहीं, मेरे घर में ही पहले बहन कि शादी में पिताजी ने ऐसा किया और फिर वही कुछ भैया कि शादी में भी हुआ। खैर आशा करता हूँ कि ये पाप जल्द ही ख़त्म होगा। धन्यवाद!!!

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  7. @ Aashu जी अगर आप जैसे कुछ लोग आगे आयें तो एक से ग्यारह होगा! आपमें यह विचार है, वह हमारे जैसे लोगों को हौसला देता है। आपने ठीक कहा कि बिना दहेज़ कि मांग के ही बेटी की शादी में पूरे से दहेज़ उड़ेल आते हैं लार्के वालों के यहाँ।
    हमने अपनी शादी में यह शर्त रख दी थी कि सुहाग के गहनों के अलावा कुछ भी बहू की ससुराल नहीं जायेगा। और आपको तो मालूम ही होगा की सुहाग में गहने लड़्के वालों की तरफ़ से ही दिया जाता है।

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  8. समाज उत्थान में सहयोगी रचना ।

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  9. वाकई आपका निर्णय स्‍वागतयोग्य है ।
    आपकी कविता सुंदर बन पडी है ।

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  10. Waaqayi sarahneey pahal hai...Nisha Rani bhi dhany aur uske maa-pitabhi!

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  11. अनुकरणीय..निश्चय ही साहस की जरुरत है इस तरह समाज का विरोध करने के लिए..

    धन्य बिटिया निशा रानी !

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  12. मनोज जी
    स्वयं आदर्शो पर चल कर ही तो मिसाल बन सकते है हम असर धीरे होता है पर प्रेरणा तो मिलती ही है दूसरों को |
    हम लोग तो कोंसो दूर है इस दावानल से | शिक्षा परिवर्तन लाएगी जरूर थोडा समय लग सकता है ...................|
    हमे जरूरत है निशा जैसी मानसिकता वाली बेटियों की भी .......
    आपकी कविता बहुत अच्छी लगी |
    स स्नेह

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  13. हम सिर्फ़ इसी तरह से अपने समाज मे फ़ैले गन्दगी को कम कर सकते है !

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  14. आपने बहुत सुन्दर लेख लिखा है जो प्रशंग्सनीय है! कविता भी बहुत अच्छा लगा ! इस उम्दा पोस्ट के लिय बधाई!

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  15. सत्य घटना पर सार्थक संदेश । आपके निर्णय को सलाम

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  16. अनुकरणीय है आपकी बात ........ प्रणाम है आपके जज़्बे को ....

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  17. shayad garbmen hi bachchi ki hatya ka ye karan hai ki dahej ....
    kya ye hamari pragati ki nishani hai ?
    aapki kavitane bhavuk kar diya ...mujhe lagta hai ki beti ki himmat ko ham maa ko hi jagaani hogi uske saath khade rahna hoga ...shuruaat ho chuki hai ..mashaal jal chuki hai bas use aage tak le jaana hai .....

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  18. स्वयं आदर्शो पर चल कर ही तो मिसाल बन सकते है हम असर धीरे होता है पर प्रेरणा तो मिलती ही है दूसरों को |
    हमे जरूरत है निशा जैसी मानसिकता वाली बेटियों की भी .
    आपकी कविता बहुत अच्छी लगी |

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. हर घर में ऐसी निशा आये तभी नया सवेरा आयेगा !
    स्तुत्य !!!

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  21. बहुत सराह्णीय पहल कविता मर्मस्पर्शी है धन्यवाद और शुभकामनायें

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  22. आपका प्रयास अनुकरणीय है। कविता बहुत प्यारी है।

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  23. अनुकरणीय है आपकी बात . कविता मर्मस्पर्शी है .

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  24. प्रिय मनोज जी,
    हार्दिक बधाई और धन्यवाद। अपने गांवों में कहा जाता है कि दुनिया इसलिए चलती है कि आज भी इस दुनिया में कुछ अच्छे लोग हैं। देहज की कुप्रथा के विरोध में आपका प्रतिरोध-व्रत अनुकरणीय है। इसका प्रतिकात्मक महत्व है। समाज को आप जैसे लोगों की जरूरत है। आपकी ही कविता- " रानी बिटिया निशा' के अंतिम अंश हैं-
    सीख दुनियां को दी है,

    मिसाल क़ायम जो की है,

    भारत की हर ललना के लिए,

    बन गई है वह निशानी।
    इस कविता में "निशा ' के प्रतिरोध में जो उम्मीद आपको दिख रही है; आपके व्रत से कुछ वैसी ही उम्मीद मुझे दिख रही है। ... और हम सभी उम्मीद पर ही कायम हैं... उम्मीद कि यह दुनिया एक दिन सच में खूबसूसरत बना ली जायेगी।
    सप्रेम
    रंजीत

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  25. राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।