रविवार, 17 जनवरी 2010

विष वृक्ष के मीठे फल

-- करण समस्तीपुरी

संसार-विष वृक्षस्य द्वे एव मधुरे फले !
काव्यामृतरसास्वादः संगमः सज्जनै: सह !!


यह संसार विष वृक्ष है। किन्तु इसके दो ही मधुर फल हैं -- एक, काव्यामृत का रसास्वादन और दूसरा सज्जनों का संग। क्यूंकि "कबिरा संगत साधु कि ज्यों गंधी को बास ! जौं कछु गंधी दे नहीं तों भी वास-सुवास !!" और काव्यानंद तो ब्रह्मानंद सहोदर है।
पर-ब्रह्म ने 'एकोस्मि बहुस्यामः' की कामना से प्रेरित हो 'इश्वर अंश जीव अविनाशी' का निर्माण किया। सृष्टी का सृजन किया। उसी प्रकार आदिशक्ति-स्वरूपा मात्रिका एक से अनेक हो काव्य, ग्रन्थ हो गयी। उत्तप्त उदार-ज्वाला के शमन में कुछ वर्षों से 'गीत-प्रीत सबै बिसरी' तो हो ही गया था पूर्वानुशीलन पर भी विस्मृति की धूल सी जमती जा रही थी। आज फुर्सत में एक श्लोक "संसार-विष वृक्षस्य द्वे एव मधुरे फले ! काव्यामृतरसास्वादः संगमः सज्जनै: सह !!" बारम्बार स्मृति-पटल पर दस्तक देने लगा।

व्यवसायिकता की इस अंधी दौर में 'संसार सच-मुच कभी कभी विष-वृक्ष' सा ही लगने लगता है। परन्तु अंतर्मन में संकल्प-विकल्प ये चल रहा था कि इस विष-वृक्ष के किस मधुर फल का आनंद लें...? सोचा कि 'काव्यामृत रसास्वादन' तो आज-कल आउट-डेटेड हो गया है सो 'सज्जनों की संगत ही कर ली जाए। लेकिन बीच में गोसाईं जी बाधा बन गए। "बिनु हरि-कृपा मिलहि नहि संता"। भला भगवान की कृपा के बगैर 'साधु-संगति' कैसे मिले। लेकिन आज तो मुझ पर संसार विष-वृक्ष के मधुर फल को ग्रहण करने का भूत सवार था। नहीं ये तो वो सही। 'काव्यानंद अमर रहे !' लेकिन हातिम जैसा सवाल फिर पीछे पड़ गया, 'काव्यानंद...... कहाँ मिलेगा...कहाँ मिलेगा....?' लेकिन रविवार होने के कारण मैं भी फुर्सत में ही था। आखिर ढूंढ़ ही लिया। अध्येता-जीवन में लिखी गयी एक डायरी के पन्ने पलटने लगा। महाविद्यालय की कक्षाओं में मिले हिंदी के व्याख्यान, चंद शे'र-ओ-शायरी, कुछ दोहे, कुछ कवित्त... कुछ संभाषण, कुछ सूक्तियां...... कुछ अपनी लिखी कवितायें, कुछ आलेख, कुछ पद्यांश.... कुछ गद्यांश........ लेकिन सब कुछ खालिस 'काव्यमय' लगा।

पृष्ठ-पलटन-अभियान में कई बार ऐसा लगा कि यह आपको दिखाऊं.... यह आप से बांटू। आज फुर्सत में काव्यामृत आस्वादन की इस कड़ी में एक रस ऐसा मिला जो मैं आपसे बांटे बिना नहीं रह सकता। कलम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद। भारत की गंगा-यमुनी तहजीब को हिंदी और उर्दू जुबाँ में जीने वाले प्रेमचंद को अदबी समाज 'उपन्यास-सम्राट' की उपाधि देता है। खुद अल्लामा इक़बाल ने एक बार कहा था, "मैं शायर नहीं होता, गर नवाब की तरह अफ़साना लिख पाता।" लेकिन आज वर्षों बाद फुर्सत में मेरी नजर पड़ीं कथा-सम्राट के पद्य-कौशल पर। आपकी नजर कर रहा हूँ, संग्राम में संकलित मुशी प्रेमचंद की एक ग़ज़ल !

दफ़न करने ले चले थे, जब तेरे दर से मुझे !
काश तुम भी झाँक लेते रौज-ए-दर से मुझे !!


सांस पूरी हो चुकी, दुनिया से रुखसत हो चुका !
तुम अब आये हो उठाने, मेरे बिस्तर से मुझे !!

क्यों उठाता है मुझे, मेरी तमन्ना को निकाल !
तेरे दर तक खींच लाई थी वही घर से मुझे !!


हिज्र की सब कुछ यही मूनीस था मेरा, ऐ क़ज़ा !
रुक जरा रो लेने दे, मिल-मिल के बिस्तर से मुझे !!

-- संग्राम : प्रेमचंद

23 टिप्‍पणियां:

  1. संसार-विष वृक्षस्य द्वे एव मधुरे फले !
    काव्यामृतरसास्वादः संगमः सज्जनै: सह ...
    यही सच भी है.

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  2. blog se jude rahane se dono hee ful mil jate hai vo bhee ghar baithe .aur kya chahiye.....
    gazal ke liye bahut bahut dhanyvad...
    ek ek sher me vajan hai.

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  3. यह संसार विष वृक्ष है। किन्तु इसके दो ही मधुर फल हैं -- एक, काव्यामृत का रसास्वादन और दूसरा सज्जनों का संग। बिलकुल सही कहा आपने।

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  4. जिसने काव्य अमृत का स्वाद चख लिया उसका तो जीवन ही तृप्त हो जाता है
    आपके कारण मुंशी जी की यह काव्य रचना हमने पढ़ ली ,
    आपको धन्यवाद

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  5. शालदार प्रस्तुति।
    बहुत शुक्रिया।

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  6. वाकई आपका लेख बहुत अच्छा लगा।

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  7. Bahut saarthak lekh or premchand ki gajal bhi bahit achhi lagi....

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