राष्ट्रीय आन्दोलन
297. गांधीजी
की रिहाई
1924
गांधीजी को गिरफ्तार कर यरवदा जेल भेजा
गया। यरवदा जेल की कोठरी साफ और हवादार थी, छत
के पास एक वेंटिलेटर था। बाहर एक त्रिकोणीय आंगन था जिसके सामने
एक ऊँची काली दीवार थी जो एकांत कोठरियों को जेल के बाकी हिस्सों से अलग करती थी। केवल
एक चीज उन्हें परेशान करती थी, वहां बिजली की
रोशनी नहीं थी, और
इसलिए शाम होने के बाद पढ़ना असंभव था। जेल अधीक्षक सख्त
और अडिग थे, उनके
साथ एक आम कैदी की तरह व्यवहार करते थे और उन्हें उचित सम्मान दिए जाने पर जोर
देते थे।
वे हर सुबह चार बजे उठते और सूर्योदय
से पहले अंधेरे में घंटों प्रार्थना और ध्यान में बिताते। जब उजाला होता, तो
वे काम शुरू कर देते, लिखते और पढ़ते। छह घंटे साहित्यिक
कार्य और चार घंटे कताई करते। जेल की एक अच्छी-खासी लाइब्रेरी थी जिसमें अधिकांश
भारतीय भाषाओं की किताबें थीं। उन्होंने गिब्बन की डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ द रोमन
एम्पायर, किपलिंग
की द फाइव नेशंस, बैरक-रूम बैलाड्स और द सेकेंड जंगल बुक, जूल्स
वर्ने की ड्रॉप्ड फ्रॉम द क्लाउड्स, मैकॉले की लेज ऑफ
एंशिएंट रोम और शॉ की मैन एंड सुपरमैन पढ़ीं। उन्होंने प्लेटो के संवादों को उसी
रुचि के साथ पढ़ा जैसे कि रोज़ीक्रूसियन मिस्ट्रीज़ नामक पुस्तक को। उन्होंने बहुत
ज़्यादा इस्लामी साहित्य पढ़ा, जिसमें पैगम्बर के
साथियों के जीवन, वाशिंगटन इरविंग की द लाइव्स ऑफ़ मोहम्मद
एंड हिज़ सक्सेसर्स और अमीर अली की शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ़ द सारासेन्स पढ़ा। उन्होंने
उर्दू का अध्ययन किया। उन्हें गिब्बन की डिक्लाइन एंड फॉल, मोटले
की राइज ऑफ द डच रिपब्लिक और बोहेम की द सुपरसेंसुअल लाइफ़ बहुत पसंद थी। जूल्स
वर्ने की ड्रॉप्ड फ्रॉम द क्लाउड्स के लिए भी उनके पास अच्छे शब्द थे, जो
शायद विज्ञान कथा की एकमात्र किताब थी जिसे उन्होंने कभी पढ़ा था। उन्होंने कभी
इतना नहीं पढ़ा, जितना
उन्होंने यरवदा जेल में रहने के दौरान पढ़ा। बाद के वर्षों में वे कहते थे: “मुझे यरवदा में पढ़ी गई एक-एक किताब याद
है—”
हालाकि गांधी जी को छह साल के क़ैद की
सज़ा हुई थी, पर जेल में ही वे सख़्त बीमार हो गए। 11 जनवरी, 1924
की शाम को गांधी का जेल जीवन अचानक समाप्त हो गया। उन्हें तीव्र अपेंडिसाइटिस हुआ
और उन्हें तुरंत पूना के ससून अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ
उनका ऑपरेशन करने का निर्णय लिया गया। अस्पताल में डॉक्टर कर्नल मेडोक ने उनका अपेंडिसाइटिस का आपरेशन किया। जब ऑपरेशन चल ही रहा था कि एक
तूफान ने बिजली काट दी। ऑपरेशन के अंतिम चरण लैंप की रोशनी में संचालित किए गए। अपेंडिक्स
को सफलतापूर्वक निकाल दिया गया, लेकिन एक स्थानीय फोड़ा बन गया और ठीक होने में देरी हुई।
सारा भारत गांधीजी की
अवस्थता की खबर सुन कर चिंता में डूब गया। लोग सांस रोके प्रतीक्षा करते रहे और
ऑपरेशन सफल रहा, संकट टल गया। कोने-कोने से लोग गांधीजी के स्वास्थ्य का हाल-चाल
जानने और देखने के लिए पूना की ओर टूट पड़े। अस्पताल पर पहरा बिठाया हुआ था। कुछ ही
लोगों को उनसे मिलने की इज़ाज़त दी गई। मिलने वालों में से प्रमुख थे श्री मोतीलाल
नेहरू और श्री जवाहरलाल नेहरू, लाला लाजपत राय, आयंगार, जमनालाल बजाज, हकीम साहब,
बी. अम्मा, अली बंधु, केलकर, केन्द्रीय विधान सभा सदस्य रंगास्वामी, कलकत्ता से
देशबंधु और वासंती देवी। दीनबंधु चार्ली एण्ड्र्यूज तो थे ही, बाद में कस्तूरबा और
देवदास भी पहुंच गए। अस्पताल से वे जेल वापस नहीं भेजे गए। 5 फरवरी को गांधीजी
बिस्तर पर बैठे थे और चार्ली एंड्रयूज से बात कर रहे थे, जब कर्नल मैडॉक अस्पताल के कमरे में दाखिल हुए और घोषणा की कि सरकार
ने उन्हें बिना शर्त रिहा करने का फैसला किया है। कुछ क्षणों के लिए गांधीजी चुप
रहे, और फिर उन्होंने कहा:
"मुझे उम्मीद है कि आप मुझे थोड़ी देर और आपका मरीज और मेहमान बने रहने
देंगे।" कर्नल मैडॉक ने हंसते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि गांधीजी डॉक्टर
के आदेशों का पालन करना जारी रखेंगे। गांधीजी अब जहाँ चाहें जाने के लिए स्वतंत्र
थे।
अब तक वे छह वर्ष में से लगभग दो वर्ष
की सज़ा काट चुके थे। स्वास्थ्य लाभ के लिए वे बंबई
से बारह मील दूर जुहू में समुद्र तट पर पारसी मित्र सिंधिया स्टीम नेवीगेशन के
मालिक शांतिकुमार मोरारजी के घर जुहू के ‘पामवन’ चले गए। वे लंबे समय तक समुद्र तट
पर बैठे रहते थे, अपने कंधों पर शॉल लपेटे हुए समुद्र को
देखते रहते थे। उनसे मिलने वालों की भीड़ लगी रहती थी, लेकिन
उनके पास उनसे कहने के लिए कुछ नहीं होता था। वहां वह ढ़ाई महीना रहे।
सत्याग्रह
जांच कमेटी
जेल जाते समय गांधीजी सत्याग्रह बंद
करने का ऐलान कर गए थे। परन्तु देशबंधु
चितरंजन दास और विट्ठलभाई पटेल असहयोग, सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह के सिद्धांत को
फिर से ज़ारी रखना चाहते थे। इस मतभेद को दूर करने के लिए जून 1922 में एक ‘सत्याग्रह जांच
कमेटी’ बनाई गई, जिसमें मोतीलाल नेहरू, डॉ. अंसारी, विट्ठलभाई पटेल, जमनालाल बजाज,
चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य और सेठ छोटानीकी सदस्य थे। समिति देश का भ्रमण करके इस
बात का रिपोर्ट देती कि देश सत्याग्रह के लिए तैयार है या नहीं। इसी बीच छोटे-मोटे
सत्याग्रह चलते रहे, जैसे – बोरसद सत्याग्रह, गुरु का बाग सत्याग्रह, नागपुर का
झंडा सत्याग्रह। कमेटी ने अपने रिपोर्ट में कहा कि इस समय देश सत्याग्रह के लिए
तैयार नहीं है। फिर भी कमेटी ने सुझाव दिया कि प्रांतीय कांग्रेस कमेटी को यह
अधिकार दे दिया जाए कि यदि ज़रूरत आ पड़े तो वे सीमित रूप में सत्याग्रह की अनुमति
दे सकती है।
परिवर्तनवादी
और अपरिवर्तनवादी
गांधीजी जब अस्पताल में थे, तभी उन्हें
यह भनक लग गई थी कि कांग्रेसियों के दो दल हो गए हैं और उनका आपस में विवाद चल रहा
है। देश का बुद्धिजीवी वर्ग दो विरोधी और लड़ाकू
सांप्रदायिक गुटों में बंट चुका था। कांग्रेस
में एक तरफ़ स्वराज्यवादी थे जिसका नेतृत्व मोतीलाल नेहरू और चितरंजनदास जैसे
संविधान के धुरंधर विद्वान कर रहे थे। ये लोग सुधार क़ानून के अंतर्गत स्थापित नई
विधायिकाओं के अंदर जाकर संघर्ष चलाना चाहते थे। यह दल परिवर्तनवादी कहलाता
था और वे धारासभा में प्रवेश चाहते थे ताकि वहां रहकर सरकार का असहयोग करें। दूसरी तरफ़ परिवर्तन-विरोधी (नो चेंजर्स) थे, जो जंगल में भी
महात्मा के पीछे-पीछे चलने के लिए तैयार थे। ये सत्याग्रह या रचनात्मक
कार्य में रुचि रखकर आगे बढ़ना चाहते थे। इन्हें अपरिवर्तनवादी कहा जाने लगा। इसमें
राजगोपालाचारी के नेतृत्व में सरदार वल्लभभाई पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, जमनालाल
बाजाज आदि प्रमुख नेता थे। वे चाहते थे कि गांधीजी अब जेल से छूट कर आ गए हैं, और
वे उनका नेतृत्व संभाले ताकि सत्याग्रह आगे के मार्ग पर चल सके। ऐसा लगने लगा था
कि अपरिवर्तनकारियों का पलड़ा भारी हो रहा है। गांधीजी विधान परिषदों का सदस्य बनने
और उसकी कार्यवाही में बाधा पहुंचाने की नीति के विरोधी थे। उनके अनुसार यह नीति
अहिंसक असहयोग आंदोलन की नीति से मेल नहीं खाती। अंग्रेज़ी सरकार तो इसी ताक में थी
कि कांग्रेस में विभाजन हो जाए और उसकी शक्ति कमज़ोर हो। रिहाई के समय ही बंबई
सरकार ने गांधीजी से कहा था कि वह अहिंसक असहयोग आंदोलन के सिद्धांत को त्यागने
वालों की निंदा करें।
गांधी और मोतीलाल
नेहरू
स्वराज्य पार्टी ने चुनाव लड़ा था और
अच्छी-खासी जीत भी पाई थी। अब वह गांधीजी का आशीर्वाद पाना चाहती थी। इसलिए सी.आर.
दास और मोतीलाल नेहरू जुहू पहुंचे। उनके
वहां पहुंचने का मुख्य मकसद गांधीजी से विचार-विमर्श करना था। गांधीजी वहां समुद्र
के किनारे एक छोटे से तम्बू में अपना डेरा डंडा जमाए बैठे थे। मोतीलाल नेहरू ने
गांधीजी को स्वराज पार्टी का दृष्टिकोण समझाना चाहा और उसके लिए सक्रिय सहानुभूति
नहीं तो कम-से-कम विरोधहीन सहयोग की कामना अवश्य की। मोतीलाल नेहरू गांधीजी को
स्वराजवादियों के पक्ष में लेश मात्र भी नहीं खींच सके। ‘अंदर से विरोध करने’ का
तर्क गांधीजी को सिरे से ग़लत लगता था। उनके अनुसार, “या तो सरकार से सहयोग
किया जा सकता है या असहयोग। अंदर जाकर असहयोग का भ्रम रखने से कुछ लाभ नहीं होगा। जो
दो काउंसिलें सत्ता में हैं वे केवल चटपटा मसाला दे सकती हैं, रोटी नहीं”। उनके बीच मतभेद
बना रहा। निराश होकर नेहरू और देशबंधु लौट गए।
गांधीजी और मोतीलाल नेहरू के बीच उभर आए मतभेद के बावज़ूद 1924 के मध्य तक क़रीबी स्थापित हो गई। बल्कि वे
पहले की अपेक्षा एक-दूसरे के ज़्यादा घनिष्ठ हो गए थे। मतभेदों के बावज़ूद दोनों का
एक-दूसरे के प्रति आदर में कमी नहीं आई थी।
“विचारधाराएं” शीर्षक पुस्तक की भूमिका में मोतीलाल नेहरू ने
लिखा था, “साधु-संतों और दैवी पुरुषों की बात तो मैंने सुनी
है, किन्तु उनसे मिलने का सौभाग्य कभी नहीं मिला। मैं यह स्वीकार करना चाहता हूं कि
मुझे इस प्रकार के प्राणियों की वास्तविक विद्यमानता में शंका है। मैं मनुष्य और मानवोचित
बातों में विश्वास करता हूं। जो विचारधाराएं इस पुस्तक में सुरक्षित की गई हैं वे एक
मनुष्य से प्रवाहित हुई हैं और मनुष्योचित हैं। उनमें मानुषिक स्वभाव के दो महान गुण
दिखाई देते हैं – विश्वास और बल ...
“आखिर इस सबका क्या नतीजा निकलेगा? वह एक ऐसे व्यक्ति
का प्रश्न है जिसमें न विश्वास है, न बल। “विजय या मृत्यु” – यह उत्तर उसके मन को नहीं भाता। ... इधर वह
विनीत और कृशकाय व्यक्ति दृढ़ विश्वास और अजेय बल के शक्तिशाली आधार पर डटकर खड़ा होकर
अब भी अपने देशवासियों के लिए त्याग करने और कष्ट सहने का संदेश दे रहा है। वह
संदेश लाखों के हृदय में गूंज उठता है। ...”
इस संदेश से यह स्पष्ट है कि मोतीलाल नेहरू गांधीजी का संत
या महात्मा के रूप नहीं बल्कि मनुष्य के रूप में आदर करते थे। स्वयं दृढ़ संकल्पी
होने के कारण वे गांधीजी के आत्मिक बल की प्रशंसा करते थे। इन बातों की व्याख्या
करें तो हम कह सकते हैं कि कृशकाय शरीर वाले गांधीजी में कोई चीज़ इस्पात से बनी
हुई थी। कोई बात ऐसी थी जो चट्टानों-सी सख्ती उन्हें प्रदान करती थी। तभी तो प्रबल से प्रबल झंझा भी उन्हें झुका नहीं सकती थी।
प्रभावहीन आकृति, जिस पर छोटी-सी धोती और नंगा बदन के बावज़ूद उनमें एक राजसीपन था
जिसके सामने लोग स्वेच्छा से सिर झुकाते थे। वे नम्र और विनीत थे, फिर भी उनमें बल
और अधिकार था। उनके आदेशों का पालन अनिवार्य होता था। उनकी शांत, गहरी आंखों के
आकर्षण से लोग स्वतः खिंचे चले आते थे। उनकी वाणी साफ़ और निर्मल थी, जो सीधे लोगों
के दिलों में प्रवेश करती थी। लोगों का हृदय सादे-सरल शब्दों में व्यक्त उनके विषय
संगत भाषणों से जाग्रत हो उठता था। उनकी अतिशय सच्चाई लोगों को जकड़ लेती थी।
उन्हें देख और सुन कर लोगों के बीच शक्ति और बल का अनंत सागर हिलोरें मारने लगता था। उनमें सबसे बड़ा गुण तो यह था कि अपनी
बातों और आचरण से वे विरोधियों को भी जीत लेते थे, कम-से-कम उन्हें निःशस्त्र तो
अवश्य ही कर देते थे।
उनका व्यवहार शालीन, सौम्य और शिष्ट होता था। भद्देपन और
खुरदरेपन का उनमें बिलकुल अभाव था। जो भी वे करने को कहते थे पहले अपने पर आजमाते
थे, फिर दूसरों को वैसा करने को कहते थे। कष्टमय रास्ते पर दृढ़ता और निर्भयता से
वे चलते रहे। इधर मोतीलाल जी के जीवन में राजसीपन था। बोलने में वे भी माहिर थे। जिस
किसी सभा में वे जाते लोगों के आकर्षण के प्रमुख केन्द्र बन जाते। एक अंग्रेज जज
ने तो यहां तक कह डाला कि टेबुल पर वे जहां बैठते वह मुख्य अतिथि की जगह बन जाती।
वे न तो विनीत थे और न ही नम्र। अपने से मतभेद रखने वाले को वे कभी छोड़ने वालों
में से नहीं थे। लोग या तो उन्हें पसंद करते थे या नापसंद, उनके प्रति तटस्थ रहना
मुश्किल था।
अपरिवर्तनवादियों
और स्वराजियों में समझौता
मोतीलाल नेहरू और सी.आर. दास को गांधीजी का समर्थन तो नहीं
मिला, लेकिन आने वाले महीनों में देश के राजनैतिक मंच पर स्वराज्य पार्टी का
अधिकार बना रहा। गांधीजी अत्यंत भिन्न और कभी-कभी परस्पर विरोधी दृष्टिकोण में भी
इस तरह सुमेल और सामंजस्य कराने की क्षमता रखते थे, कि जिससे समान ध्येय की
प्राप्ति में बाधक बनने के बजाय वे एक-दूसरे के पूरक और सहायक बन जाते थे।
कांग्रेस संगठन में मतभेद रखने वाले साथियों को बीच की दूरी को उन्होंने जिस तरह
से पाटा वह एक अनोखा उदाहरण है। अपरिवर्तनवादियों और स्वराजियों के बीच समझौता
कराने के काम में वे जुट गए। हालांकि गांधीजी ख़ुद यह मानते थे कि कांग्रेसियों को
विधान-सभा के चुनावों में नहीं जाना चाहिए। जून 1924 में अखिल भारतीय
कांग्रेस कमेटी के अहमदाबाद अधिवेशन में गांधीजी ने इस बात पर बल दिया कि
कांग्रेस की सदस्यता के लिए कताई की न्यूनतम अर्हता निर्धारित की जाए, काउंसिलों
में जानेवालों को कांग्रेस के पदों से हटाया जाए और हाल में बंगाल में हुई
आतंकवादी घटना की निंदा की जाए। पहले दो प्रस्ताव अस्वीकृत हुए। गोपीनाथ साहा की
निंदा के प्रस्ताव का सी.आर. दास और अधिकांश बंगाली प्रतिनिधियों ने कड़ा विरोध
किया। गांधीजी अपने समर्थकों सहित सभा से बाहर चले गए। उनकी अनुपस्थिति में यह
प्रस्ताव 70 के मुकाबले 78 मतों से स्वीकृत हुआ।
गांधीजी को कांग्रेसियों को आपसी फूट से बचाने की चिंता
हुई। गांधीजी को स्वराजी नेताओं की नीतियों से विरोध ज़रूर था, पर वे उनकी निष्ठा
और ईमानदारी पर कभी कोई प्रश्न-चिह्न नहीं खड़ा करते थे। बल्कि वे तो उन्हें
‘सुयोग्य, अनुभवी और ईमानदार देशभक्त’ कहते थे। गांधीजी को यह विश्वास हो गया था
कि जिस तरह से वे विधान परिषदों में कामकाज कर रहे थे वह साबित करता है कि स्वराजी
कभी भी साम्राज्यवादी प्रशासन का अंग नहीं बन सकते। गांधीजी एकता के प्रयत्नों में
लग हुए थे। बाद में भी उन्होंने अपने इस प्रयास को आगे बढ़ाया। 25 अक्तूबर, 1924 को सरकार ने बंगाल
में एक अध्यादेश निकाला, जिसके तहत कांग्रेस कार्यालयों और नेताओं के घरों पर
छापेमारी की जा सकती थी। वे बंगाल गए। वहां सरकार द्वारा स्वराज्य पार्टी के सदस्यों
को हिंसा के आरोप में जेल में भरा जा रहा था। इनमें सुभाषचंद्र बोस, और बंगाल
विधान मंडल के सदस्य अनिल बरन राय और एस.सी. मित्र भी शामिल थे। 6 नवंबर, 1924 को गांधीजी ने मोतीलाल नेहरू और देशबंधु के साथ मिलकर एक
संयुक्त वक्तव्य प्रकाशित किया, जिसमें कहा गया था कि सब दलों का सहयोग प्राप्त
करने के लिए विदेशी कपड़ों की पिकेटिंग के अलावा असहयोग के शेष सभी कामों को स्थगित
किया जाता है। अन्य दल भिन्न-भिन्न दिशाओं में रचनात्मक काम करें और स्वराज्य दल काउंसिल
में काम करे। यह भी कहा गया था कि स्वराज्य पार्टी कांग्रेस का अभिन्न अंग है और
उसे अलग से चंदा जमा करने और उसको ख़र्च करने का अधिकार है। यह भी तय किया गया कि
कांग्रेस सदस्यों द्वारा चार आना साल के बजाए सदस्यता के चंदे के रूप में दो हज़ार
गज हाथकता सूत प्रतिमास दिया जाएगा। दिसंबर में हुए बेलगाम के वार्षिक अधिवेशन में,
जिसके अध्यक्ष गांधीजी थे, कांग्रेस ने गांधी-नेहरू-दास समझौते पर मुहर लगा दी। इस
तरह उन्होंने कांग्रेस संगठन को विधान-सभा प्रवेश का कार्यक्रम चलाने के लिए स्वराजवादियों
के सुपुर्द कर दिया और ख़ुद रचनात्मक कार्य में लग गए। नतीज़ा यह हुआ कि 1926 के आगामी चुनावों में
कांग्रेस को 1923 से भी अधिक सफलता मिली। साथ ही
खादी के पुनरुज्जीवन और प्रसार का काम बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ा। ... और जब सत्याग्रह
करने का प्रश्न सामने आया तो सभी चुने गए नेताओं ने विधान सभा छोड़ दिया और गांधीजी
को कांग्रेस का सर्वाधिकारी बनाने के पक्ष में अपना मत दिया।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ पर
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