गुरुवार, 25 नवंबर 2010

आँच-45 (समीक्षा)–पर जन्मगाथा गीत की

आँच-45 (समीक्षा)

जन्मगाथा गीत की

आचार्य परशुराम रायimage

बांस का जंगल जला, फिर बांसुरी ने गीत गाए। तुम कहां हो गीत की यह जन्मगाथा मन सुनाए। तीर्थ से लौटी नहीं है श्वांस पश्चाताप की, दूर तक फैली हुई पगडंडियां है पाप की, पोर गिन-गिन उंगलियां डाकिन चबाए। अस्थियां इतिहास की कलश देहरी पर धरा है। और आंगन में अधूरे कत्ल का शोणित भरा है। कौन? आंखों के दिए में आग भर के प्रेत को फिर से जगाए।

पिछले दिनों 'राजभाषा हिन्दी' ब्लाग पर प्रकाशित स्व. पं. श्याम नारायण मिश्र का नवगीत 'जन्मगाथा गीत की' को आँच के इस अंक में समीक्षा के लिए लिया जा रहा है। मिश्र जी के गीतों में उनके परिवेश, चाहे वह गाँव हो, शहर हो या गाँवों और शहरों के भौतिक व सूक्ष्म स्वरूप, उनकी अन्त: और बाह्य प्रकृति से सह-सम्बन्ध सभी मुखरित हुए हैं। मिश्र जी एक छोटे से गाँव में जन्म लिए। जीवन की आवश्यकता ने हम सभी की तरह उन्हें भी सजाया, सँवारा और डावाँडोल किया। पर, गीत के प्रति उनकी अनुरक्ति तीव्रतर ही होती गई। ऐसा नहीं कि उन्होंने गद्य नहीं लिखा। उनकी गद्य-रचनाओं में भी गीत की प्राञ्जलता ने दम नहीं तोड़ा। वे भी गीतों से कम प्राञ्जल नहीं हैं। उन्हें पूरी प्रकृति संगीतमय लगती थी। उनकी शब्द योजना में अनुस्यूत बिम्ब हर जगह भाषा की ताजगी को गुम्फित किए रहते हैं। जीवन और प्रकृति के हर रूप उनके गीतों के विषय हैं। फिलहाल आँच के इस अंक का विषय है उनका एक गीत 'जन्मगाथा गीत की'

मिश्र जी के साथ यदि पाँच-छ: वर्ष न बिताए होते तो इस गीत की समीक्षा कुछ और होती। अभिव्यक्ति की उनकी अद्भुत प्रतिभा और उनका गीत से अलग प्रकृति के अस्तित्व की कल्पना न कर पाना, उनकी इस फितरत से परिचित होने के कारण समीक्षा अधिक आसान हो गयी है और इसके आयाम के नियतन काफी सुविधाजनक हो गया है।

विनाश के गर्भ से ही सृजन का जन्म होता है और सृजन से ही विनाश का या दूसरे शब्दों में कहा जाये तो सृजन और विनाश अन्योन्याश्रित हैं। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना असम्भव है। गीत के प्रथम बन्द में बाँस का जंगल जलाकर बाँसुरी के सृजन और क्रमान्तर से बाँसुरी से गीत के स्वरों के प्रस्फुटन में से इसी सिद्धान्त की बात निकलकर आती है। सात स्वरों का नियतन, फिर उनके क्रम-भेद से अनेक राग-रागिनियों का प्रादुर्भाव और पुन: उनमें विचलन से उनके भेदोपभेद तथा गायन काल का निर्धारण आदि गीत के एक लम्बे इतिहास की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं, जिसे मिश्र जी ने दो पंक्तियों में कहा है -

बाँस का जंगल जला,

फिर बाँसुरी ने गीत गाए।

आदिकालीन गीतों को लेकर इसके शास्त्रीय स्वरूप को कालान्तर में आयाम मिला। शास्त्रीय संगीत का स्वरूप लोगों के लिए इतना जटिल हो गया कि यह गाने वालों और समझने वालों दोनों के लिए धीरे-धीरे दुरूह होता गया और यहाँ से सुगम संगीत ने जन्म लिया।

पुन: स्वरों में आरोह-अवरोह के अवकाश को घटाकर तान द्वारा पश्चिमी शैली पर रॉक म्यूजिक युवा वर्ग की पहिचान बना। धीरे-धीरे इस संगीत के प्रति इतना आकर्षण बढ़ा कि प्राय: सभी भारतीय भाषाओं और बोलियों में इस शैली में गीत बनाए गए और गाए जाने लगे हैं और इस प्रकार गीत-जगत में विभिन्न मान्यताओं और अवधारणाओं ने जन्म लिया होगा। आजकल हमारे सामाजिक, धार्मिक आदि अवसरों पर फिल्मी गीतों का लगभग एकाधिकार हो गया है। अपनी परम्पराओं के प्रति नयी पीढ़ी की अनासक्ति के कारण सुसंस्कृत पारम्परिक गीत प्रायः लुप्त हो चले हैं। एक ओर मान्यताओं और अवधारणाओं की विविधता को विकास के रूप में उदारवादी देखते हैं, तो दूसरी ओर अन्य शैलियों को पसन्द और नापसन्द करने वाले इसके अन्तर्विरोध को लेकर एक दूसरे की निन्दा करते हैं। लेकिन यदि निष्पक्ष भाव से देखें तो कृत्रिम गीत, अर्थात् स्वरों में मनमाने ढंग से मैनिपुलेशन कर गीत के नैसर्गिक स्वरूप एवं विकास को विकृत रूप देने वाले झोलाछाप संगीतज्ञों का बोलबाला अधिक दिखाई पड़ता है। इनकी 'डाकिन' अर्थात् विकार रूपी चुड़ैल संगीत की नैसर्गिक पावनता को आए दिन विद्रूप करती दिखती है। इन्हीं तथ्यों को मिश्र जी ने गीत के दूसरे बन्द में व्यक्त किया है -

तीर्थ से लौटी नहीं है श्वास पश्चाताप की,

दूर तक फैली हुई पगडंडियाँ हैं पाप की,

पोर गिन-गिन उँगलियाँ डाकिन चबाए।

गीत के उपर्युक्त परिवर्तित परिवेश में गीत के प्रेमियों को लगता है कि कहीं नैसर्गिक गीत लुप्त न हो जाये। यदि आज के तथाकथित कृत्रिम गीत पर कोई उँगली उठाता है तो लोग-बाग भड़क उठते हैं। गीत प्रेमियों की इसी पीड़ा को गीतकार ने अंतिम बन्द में व्यक्ति किया है -

अस्थियाँ इतिहास की कलश देहरी पर धरा है।

और आँगन में अधूरे कत्ल का शोणित भरा है।

कौन? आंखों के दिए में आग भर के

प्रेत को फिर से जगाए।

नवगीत के शिल्प पक्ष की यहाँ चर्चा नहीं की जा रही है, क्योंकि नवगीतकार स्वयं इसकी रचना शिल्प पर एकमत नहीं हैं। कुछ लोग गीत में नये बिम्बों के प्रयोग मात्र को ही नवगीत की आवश्यकता समझते हैं, तो कुछ लोग अपने-अपने ढंग से इसे व्याख्यायित करते हैं। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि 'नयी कविता' की ही तरह छठवे दशक के बाद लिखे गए गीत ही नवगीत हैं। मिश्र जी की दृष्टि से प्रस्तुत गीत भी नवगीत है। हालाकि इसमें मात्राओं के किसी एक क्रम का विधान नहीं दिखता है। इसके अतिरिक्त दो सींगों वाला 'ह' अर्थात् पाँचवी, आठवीं और नौवी पंक्तियों में प्रयुक्त 'है' अनावश्यक है। मिश्र जी स्वयं 'है' का प्रयोग तब तक उचित नहीं मानते थे जब तक कि 'है' स्वमेव क्रियापद के रूप में प्रयुक्त न हो।

यदि उक्त बातों को छोड़ दिया जाये तो गीत का बिम्ब-विधान भाषा में नवीनता और ताजगी के सौरभ से युक्त है। मेरे लिए अफसोस की बात यह है कि यह समीक्षा ऐसे समय पर आ रही है जब पं. श्याम नारायण जी हमारे बीच नहीं हैं। मिश्र जी ने कई बार मुझसे अपने गीतों पर समीक्षात्मक विचार प्रस्तुत करने के लिए कहा था। लेकिन वह हो नहीं पाया। यदि वे आज होते तो इस समीक्षा पर उनके विचार जानने को मिलते जो हमारे लिए बहुमूल्य होते।

29 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय मनोज कुमार जी
    नमस्कार !
    .........समीक्षा बहुत अच्छी लगी
    अपनी टिप्पणियों के माध्यम से उत्साहवर्धन करने के लिए आभार।

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  2. तीर्थ से लौटी नहीं है श्वास पश्चाताप की,
    दूर तक फैली हुई पगडंडियाँ हैं पाप की,
    ... bahut sundar ... behatreen !!!

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  3. आदरणीय परशुराम जी आपके समीक्षा के माध्यम से ना केवल पंडित मिश्र जी के नवगीत को समझने का अवसर मिला बल्कि पूरी गीत विधा खास तौर पर नवगीत के बारे में समझ बढ़ी है.. उत्क्रिस्थ समीक्षा के लिए बधाई...

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  4. बहुत ही सार्थक और सटीक समीक्षा !
    गीत का तो जवाब नहीं !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  5. ये गीत पहले भी पढा था और एक अलग ही प्रभाव छोड गया था ।
    आज समीक्षा पढकर इसे जानने और समझने मे भी काफ़ी अच्छा लगा……………एक नया दृष्टिकोण मिला ……………काफ़ी सार्थक और सटीक समीक्षा।

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  6. आलोचना या समालोचना का अर्थ है देखना, समग्र रूप में परखना। किसी कृतिकी सम्‍यक व्‍याख्‍या या मूल्‍यांकन को आलोचना कहते हैं। यह कवि और पाठक के गीच की कड़ी है। इसका उद्देश्‍य है रचना कर्म का प्रत्‍येक दृष्टिकोण से मूल्‍यांकन कर उसे पाठक के समक्ष प्रस्‍तुत करना, पाठक की रूचि परिष्‍कार करना और साहित्यिक गतिविधि की समझ को विकसित और निर्धारित करना।
    आपकी यह समीक्षा इसका जीता-जागता उदाहरण है। बहुत गंभीर नवगीत को हमारे निवेदन पर राय जी आपने बिल्कुल खोल कर रख दिया है, जिससे इसके गूढतम अर्थ भी स्पष्ट हो गए हैं।
    आभार आपका।

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  7. समीक्षा बहुत अच्छी लगी बिशेष कर आपका यह वाक्य बहुत पसंद आया -
    विनाश के गर्भ से ही सृजन का जन्म होता है और सृजन से ही विनाश का ।

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  8. आंच पर आपकी प्रस्तुति ने मंत्र-मुग्ध कर दिया । इतनी गहराई से की गई आपकी समीक्षा निश्चित रूप से प्रशंसनीय है ।

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  9. बिरले साहित्यकारों को ही जीवन-काल में वह प्रशंसा प्राप्त हो पाती है,जिसके वे हक़दार होते हैं। इसी क्रम में यह भी।

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  10. आपकी इस पोस्ट का लिंक कल शुक्रवार को (२६--११-- २०१० ) चर्चा मंच पर भी है ...

    http://charchamanch.blogspot.com/

    --

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  11. अति दुरूह गीत का बहुत गहराई से अर्थ अनावरित किया है आपने। यह आपकी योग्यता और क्षमता, दोनो को प्रमाणित करता है।

    आभार।

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  12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  14. गंभीर गीत की गरिमामय समीक्षा ने बहुत प्रभावित किया। इस गीत के अर्थ तक पहुंचना आसान न था। अर्थ तक पहुंचाने के लिए आभार।

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  15. गहन एवं विस्तृत समीक्षा के लिए आभार। इस समीक्षा से आपके प्रति धारणा और बलवती हुई। अपेक्षा है कि भविष्य में भी इसी तरह की उत्कृष्ट रचनाएं पढ़ने को मिलती रहेंगी।

    पुनः आभार।

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  16. यह गीत तो मुझे बड़े होने पर ही समझ में आता। समीक्षा से यह आसन हो गया।

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  17. प्रस्तुत गीत पर मेरे विचारों से सहमत होने तथा अपननी टिप्पणियों के माध्यम से प्रोत्साहित करने के लिए आभार।

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  18. चर्चा मंच पर सम्मान देने के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।

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  19. इस समीक्षा को पढने के बाद गीत का अर्थ और अधिक स्पष्ट हुआ। आभार आपका।

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  20. गहन विश्लेषणात्मक समीक्षा ने इस कविता में सन्निहित गहन गूढ़ार्थों को उनके सही परिपेक्ष्य में समझने में काफ़ी मदद की. सुंदर समीक्षा के लिए आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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  21. सार्थक समीक्षा!
    .....समीक्षा को पढने के बाद गीत का अर्थ और अधिक स्पष्ट हुआ।
    आपका आभार ...

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  23. बहुत ही अनुशासित समीक्षा है यह. इस समीक्षा में गीत की पूर्वपीठिका पर जो प्रकाश डाला गया है वह अद्वितीय है एवं इस से नए गीतकारों और समीक्षकों की दृष्टि में विकास होगा. गीत के अंतिम बंद के बारे में समीक्षक की व्याख्या भी गीतकार की तरह ही कुछ अस्पष्ट सी है. अस्थियाँ इतिहास की कलश देहरी पर धरा है............. ! यदि नवगीत के शिल्प की चर्चा भी होती तो मुझ जैसे पाठकों का बहुत भला होता. एक बात मैं भी कहना चाहूँगा कि पंडित श्याम नारायण जी का असमय गोलोकगमन हम सब के लिए अपूरणीय क्षति है. अस्तु.... साधु समीक्षा के लिए साधुवाद !!!!

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  24. @ करण जी,

    आपकी सम्यक एवं उत्साहवर्धक टिप्प्णी के लिए धन्यवाद।

    पुनःश्च, प्रश्नगत पंक्तियों के संदर्भ में कहना चाहूँगा गीत के अंतिम बंद में कवि कहता है कि एक ओर गीत के मनोहारी और रमणीक स्वरूप का इतिहास है तो दूसरी ओर ‘आँगन में अधूरे कत्ल का शोणित’ अर्थात गीत का विकृत होता जा रहा स्वरूप (पूरी तरह विकृत नहीं) है और इनके बीच ‘कलश’ रूपी गीत शुचिता के साथ वर्तमान की देहरी पर अपनी प्राण रक्षा हेतु आशान्वित है। गीत विधा पर मची खींचतान की निराशा कवि के स्वर में मुखरित है, यहाँ उसका स्वर आक्रोश मिश्रित भी है। अंतिम पंक्ति ‘कौन? आंखों के दिए में/ आग भर के / प्रेत को फिर से जगाए’ में विपर्यय से अर्थ ग्रहण करते हुए वह प्रकट करता है कि कोई तो गीत के स्वरूप पर छाई काली घटा, धुंध को दूर करने के लिए सामने आए ताकि गीत अपने लालित्य के साथ अपने मूल स्वरूप में पुनः प्रस्तुत हो सके।

    यहाँ शिल्प पक्ष पर चर्चा नवगीत के प्रति कवि के स्वयं के आग्रहों के कारण नहीं की गई है और इसका संकेत भी समीक्षा में किया गया है।

    पं0 श्याम नारायण मिश्र का असमय निधन साहित्य जगत की क्षति के साथ-साथ मेरी निजी क्षति भी है।

    साभार,

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  25. धन्यवाद आचार्यवर !
    मैं मूल समीक्षा में इसी व्याख्या की अपेक्षा कर रहा था. बहुत संतुष्टि मिली आपकी प्रति-टिपण्णी से. इसी तरह अनुग्रह बनाए रखेंगे.
    सादर !!

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