गुरुवार, 18 नवंबर 2010

आंच-४४ (समीक्षा) पर ज्ञानचन्द ‘मर्मज्ञ’ का गीत “ये शहर अब सो रहा है”

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आचार्य परशुराम राय

कोई सन्नाटा तो लाओ, ये शहर अब सो रहा है! हादसों को मत जगाओ, ये शहर अब सो रहा है ! भागने की होड़ है सबको उलझना है यहाँ , रस्ते वीरान हैं फिर भी पहुंचना है वहां , पांव धीरे से उठाओ ये शहर अब सो रहा है ! कौन हैं वो लोग जिनके हाँथ में तलवार है, कंठ की ये प्यास कैसी खून की दरकार है , सब्र को मत आजमाओ, ये शहर अब सो रहा है! कहकहे नादान हैं खुशियों से कतराते हैं ये , जब भी होठों पर बुलाओ दूर छुप जाते हैं ये , फिर भी थोड़ा मुस्कराओ,ये शहर अब सो रहा है ! खोखली दीवार को चीखों से कोई भर गया, आईना भी आदमी पहचानते ही डर गया, कौन हो कुछ तो बताओ, ये शहर अब सो रहा है! खौफ के बाज़ार में बेची गयी है हर ख़ुशी , ढूंढ़ लो इस ढेर में शायद पड़ी हो ज़िन्दगी , क्या पता पहचान जाओ,ये शहर अब सो रहा है!

मेरा फोटोआँच के इस अंक में ज्ञानचन्द ‘मर्मज्ञ’ का गीत “ये शहर अब सो रहा है” समीक्षा के लिए लिया जा रहा है। श्री ज्ञानचन्द ‘मर्मज्ञ’ अध्यवसाय से एक मेकेनिकल इंजिनियर हैं। आजकल बंगलुरु में इनका अपना व्यवसाय है। छात्र-जीवन से ही लेखन की ओर इनकी प्रवृत्ति रही है। इनका काव्य संकलन “मिट्टी की पलकें” प्रकाशित हो चुका है। इसके अतिरिक्त इन्हें अबतक कई सम्मान भी मिल चुके हैं। कुल मिलाकर ‘मर्मज्ञ’ जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं।

प्रस्तुत रचना “ये शहर अब सो रहा है” एक गीत है जो पढ़ने पर सहसा गजल होने का भ्रम पैदा कर देता है। समीक्षा लिखने के पूर्व इस रचना को कई बार पढ़ा और हर बार इसमें प्रयुक्त कई पद-बंध नये अर्थ का पता देते दिखे। मतलब यह कि इस गीत का भाव-पक्ष काफी सशक्त है। गीत की भावभूमि आतंकवाद, इसके कारक और परिणाम आदि हैं। शब्द-योजनाएँ पाठक को अभिभूत करती दिखती हैं। इसमें प्रयुक्त बिम्ब बहुत ही अर्थ-प्रवण हैं और चमत्कृत करने वाले हैं!

पहले चरण में आया ये शहर अब सो रहा है पद-बंध बहुत ही अभिव्यंजक है। यहाँ यह आर्थिक, बौद्धिक आदि रूप से सम्पन्न वर्ग की ओर संकेत करता है जो सो रहा है, अर्थात् निष्क्रिय है। दूसरे चरण में प्रयुक्त पद-बंध हादसों को मत जगाओ व्यक्त करता है कि हादसे भी सोए हैं। यहाँ द्रष्टव्य है कि हादसे आर्थिक, बौद्धिक, राजनीतिक, सामाजिक आदि विसंगतियों के गर्भ से जन्म लेते हैं। गीतकार का अभिप्राय है कि उक्त विसंगतियों को बढ़ावा न दिया जाय। क्योंकि जो लोग इसमें संतुलन के लिये उत्तरदायी हैं या जिनसे संतुलन की अपेक्षा है, वे सो रहे हैं अर्थात् उन्हें इसकी कोई चिन्ता ही नहीं है, क्योंकि वे अपने को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं, उनकी सुरक्षा की व्यवस्था है, उनके पास अनेक उपलब्धियाँ है। इसलिए वे सो रहे हैं।

जिनके हाथ में तलवार है वे अपरिचित हैं, उनके इस कृत्य का उद्देश्य अज्ञात है। उक्त परिवेश मे कवि अपरिचित खड्गधारियों को चेतावनी देता है कि सब्र को मत आजमाओ। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि सब्र का बोध किसके पास है? उनके पास जिन्हें खोने के लिए कुछ भी नहीं है, जो केवल अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं तथा जिन्हें आर्थिक, शैक्षिक, बौद्धिक, राजनीतिक, सामाजिक आदि उपलब्धियों से वंचित रखा गया है। हाँ, वे ही इनके शिकार बन रहे हैं। आतंक का भूत इन्हीं के शवों पर से होकर गुजरता है। क्योंकि इनके जीवन की सुरक्षा का केवल वादा है, गारंटी नहीं। फिर भी कवि को उनके सब्र की इतनी चिन्ता क्यों है? कुछ तो बात है, कवि को पता है कि जिन लोगों के पास केवल सब्र बचा है और उनके भी सब्र का बाँध टूट गया तो विप्लव की स्थिति पैदा हो जाती है। क्योंकि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है, सिवाय उनकी जान के और वह भी सुरक्षित नहीं तो उनके पास विप्लव करने के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं बचता। अतएव कवि उन अज्ञात खड्गधारियों को सावधान कर रहा है कि उनके सब्र की परीक्षा न लें।

नादान कहकहे, खुशियों का कतराना, होठों पर बुलाने पर उनका दूर छुप जाना पद-बंध मानस-पटल पर लक्षणामूलक व्यंजना की लेखनी से कई गूढ़ अर्थों को उत्कीर्ण करते हैं। वैसे इस पूरी रचना में लक्षणामूलक व्यंजना का बाहुल्य है। नादान कहकहे में मुझे भाड़े पर जुटे लोगों के अर्थहीन उल्लास भरे जिंदाबाद के नारे, अनावश्यक ठहाके आदि दिखाई देते हैं और जब शहर का आदमी अर्थात् बुद्धिजीवी हमें यथार्थ के प्रति सजग होने की बात करता है तो हम जाति, धर्म, भाषा, प्रांत आदि के नाम पर अपनी खुशियों से मुख मोड़ लेते हैं। ऐसी परिस्थिति में खुशियाँ हमारे होठों से छिन जाती हैं। फिर भी कवि मुस्कराने की बात करता है। यह बहुत ही अर्थपूर्ण है। क्योंकि उक्त परिस्थितियाँ जिजीविषा का अंत नहीं कर पातीं। यहाँ मुस्कराना जिजीविषा का व्यंजक है। यही सृजन का मूल है।

अगले बंद में खोखली दीवार और आइने का आदमी को पहिचान कर डर जाना पद-बंध अद्भुत अर्थोद्भावना करते हैं। यदि दीवार शब्द को लें तो कई अर्थों में प्रयुक्त होता है, जैसे बाँटना, सुरक्षा आदि। खोखली विशेषण के जुट जाने से यह पद-समुच्चय अर्थ की दृष्टि से बहुत ही सशक्त हो उठा है, अर्थात् हमारी सुरक्षा मात्र नाम के लिए है; जाति,धर्म, भाषा, प्रांत आदि हमें केवल बाँटते दिखते हैं, जबकि इंसानियत और प्रेम के सूत्र में ये पिरोये हुए हैं। हम इनकी अर्थवत्ता को इतना खोखला कर दिए हैं कि उस खोखलेपन में आतंकवादी चीखें और दर्द ठूँस देते हैं। भ्रष्टाचार एक संस्कृति का रूप लेकर सरकार और राजनीति की पर्याय बन चुका है और यही आतंकवाद का पोषक है। उक्त माहौल ने आदमी को इतना विद्रूप कर दिया है कि दर्पण भी उसे देखकर भयभीत हो उठता है, अर्थात् यही आदमी सा दिखने वाला राक्षसी-वृत्ति का अनुयायी हो गया है, हर व्यक्ति को देखकर डर लगता है कि कहीं वह आतंकवादी तो नहीं।

गीत का अंतिम बंद भी भाव-पक्ष की दृष्टि से काफी सशक्त है। इसमें प्रयोग किए गए पद-बंध- खौफ का बाजार, बेची गयी हर खुशी और ढेर में जिंदगी को ढूँढ़ना समान रूप से सशक्त और अभिव्यंजक हैं। धन लेकर खौफ या दहशत पैदा करना आजकल एक पेशा बन गया है। धन के लोभ में व्यक्ति जघन्य से जघन्य कार्य करने को उत्सुक दिखता है। क्योंकि देश की कार्यपालिका और काफी हद तक न्यायपालिका खोखली हो गयी हैं। ऐसे परिवेश में मुर्दा बने अर्थात् संवेदनहीन लोगों की ढेर में उत्साह, उदारता, मैत्री, करुणा, धैर्य आदि मानवीय मूल्यों से युक्त जीवन-रेखा शायद खोजने पर मिल जाय। क्योंकि इन्हीं से जिन्दगी की पहिचान होती है। क्या पता पहचान जाओ यह शब्द-योजना भी चमत्कृत करने वाली है। क्या शब्द संदेह उत्पन्न करता है कि पहचानने वालों में भी पहचानने की क्षमता शेष है या नहीं।

इसके बाद यहाँ मैं सर्वप्रथम यह उल्लेख करना चाहूँगा कि गीत के तीसरे और चौथे चरण गीत के अन्य चरणों के साथ अन्वित करने में असमर्थ रहा। इसीलिए समीक्षा करते समय उनकी चर्चा नहीं की गयी है। हाँ, यदि उन्हें गीत के अंतिम बंद के रूप में लाया जाता तो शायद कुछ हद तक अन्विति हो सकती थी। यदि इस विसंगति को छोड़ दिया जाय तो गीत भावपक्ष की दृष्टि से आद्योपांत सशक्त है। पर शिल्प की दृष्टि से उतना सशक्त नहीं है। गीत जिस रूप में प्रकाशित है उसके अनुसार इसमें कुल सत्रह चरण हे। वैसे प्रत्येक चरण को दो-दो चरणों मे विभक्त तो गीत का स्वरूप अच्छा हो जाता। इसके अतिरिक्त यदि प्रांजलता या प्रवाह की बात करें तो यह कई स्थानों पर अवरोध उत्पन्न करता है। कारण है मात्राओं में एक निश्चितत मानदण्ड का अभाव। यथा प्रथम चरण में तीस मात्राएँ हैं; दूसरे, पांचवें, आठवें, नौवें, दसवें, चौदहवें और सत्रहवें चरणों में अठइस-अठाइस मात्राएँ हैं। तीसरे, छठवें, सातवें, तेरहवें, पंद्रहवें और सोलहवें चरणों में छब्बीस-छब्बीस मात्राएँ हैं। चौथे में चौबीस, ग्यारहवें में उन्तीस और बारहवें चरण में सत्ताइस मात्राएँ हैं। यह विभिन्नता गीत के गीतात्मक प्रवाह को भंग करती है। इसके अलावा प्रथम चरण में प्रयुक्त सन्नाटा शब्द शोर पैदा करता दिखता है। इसके स्थान पर यदि किसी अन्य कोमल वर्णयुक्त समानार्थी शब्द का प्रयोग अच्छा रहता।

इस समीक्षा व्यक्त किए गए विचार मेरे अपने हैं। कवि का या पाठकों का उनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। हाँ, इसपर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मार्गदर्शन का काम करेगी।

21 टिप्‍पणियां:

  1. Yeh shahar aab so raha hai -par ki gai sankshipt samiksha achhi lagi.Chitron ke sath post self- explanatory ho gaya hai.Geet ki maulikata aur bhavbhumi ka sarokar manviya mulyon ke sath hone ke karan udgaron ka sahaj bhav se prasphutit hona swabhavik hai.Samiksha satik aur sankshipt hone ke karan prasansaniya hai.Dhanyavad.

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  2. यह समीक्षा एक बहुत ही ओजपूर्ण गीत के अर्थ और महत्व को कई गुणा अधिक विस्तार दे रही है। एक-एक बन्द का अर्थ स्पष्ट हुआ और साथ ही समीक्षक ने शिल्पगत कमज़ोरियों की ओर भी ध्यान दिलाया है।
    एक निष्पक्ष समीक्षा प्रस्तुत करने के लिए आपका आभार राय जी।

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  3. इस समीक्षा ने कविता को पुनः पढने पर बाध्य कर दिया और निश्चय ही इस कविता में वर्णित भाव को देखने की एक नई दृष्टि उपलब्ध कराई है!!

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  4. समीक्षा बहुत अच्छी लगी ...हर शब्द के भावों का विस्तार से विवेचन किया गया है ..

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  5. सर्व प्रथम मैं मनोज जी का आभारी हूँ जो उन्होंने मेरी रचना `ये शहर अब सो रहा है `को समीक्षा के योग्य समझ कर आंच पर लिया !
    प्रातः वन्दनीय आचार्य परशुराम जी ने इसकी समीक्षा की, यह मेरे लिए बहुत ही सौभाग्य और गौरव की बात है ! उनके वन्दनीय विचार मेरी लेखनी में नई उर्जा संचारित कर रहे हैं ! मैं अति विनम्रता पूर्वक उनका आभार प्रकट करता हूँ !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  6. मर्मज्ञ जी की यह कविता मुझे पहले ही अच्छी लगी थी... आज आंच पर देख अच्छा लगा .. समीक्षा और भी उछ कोटि का है.. कविता में जहाँ राष्ट्र कवि दिनकर जी के ओज की झलक मिलती है. समीक्षा द्विवेदी जी सी लग रही है...

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  7. अच्छी समीक्षा . सधी समीक्षा कविता के अर्थों को नया उभार देती है .

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  8. कविता पहले भी पढी थी मगर आज उसके सौन्दर्य मे चार चाँद और लग गये…………बेहतरीन समीक्षा।

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  9. आलोच्य गीत की विस्तृत और तटस्थ समीक्षा पढ़कर मन प्रसन्न हुआ। गीत में भाव हैं, विचारोत्तेजना है जो संवेदित करती है। गीत में प्रयुक्त सन्नाटा शब्द मुझे प्रारम्भ से ही कर्कश लग रहा था। राय जी ने भी इस ओर संकेत किया है।

    गीत और समीक्षा के साथ साथ रसास्वादन से आनन्द बढ़ गया।

    आभार,

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  10. निष्पक्ष समीक्षा प्रस्तुत करने के लिए आपका आभार ।

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  11. विवेचना की दृष्टि से,अब तक की सबसे वृहद् समीक्षा। सम्यक् चिंतन। गुरुवत् प्रोत्साहन के कारण समीक्षा की मर्यादा बढ़ी है।

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  12. संतुलित समीक्षा प्रस्तुत करने के लिए आपका आभार

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  13. सारगर्भित संतुलित अतिसुन्दर समीक्षा...वाह !!!!

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  14. बहुत अच्छा विश्लेषण. हर बात की गंभीरता को उजागर करती हुई ये पोस्ट बहुत अच्छी लगी

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  15. .

    सुन्दर समीक्षा !
    ज्ञानचन्द्र जी को नमन ।

    .

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  16. प्रस्तुत गीत पर मेरे विचारों से साम्य रखने तथा अपनी टिप्पणियों के माध्यम से उत्साहवर्धन करने के लिए आभार।

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