रविवार, 14 नवंबर 2010

भारतीय काव्यशास्त्र-आर्थी व्यंजना

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में शाब्दी व्यंजना के अंतर्गत लक्षणामूला व्यंजना पर चर्चा की गयी थी। इस अंक में आर्थी व्यंजना के भेदों पर चर्चा की जाएगी। काव्यशास्त्रियों ने निम्नलिखित वैशिष्ट्य के आधार पर आर्थी व्यंजना के दस भेद किए हैं-

1. वक्ता

2. बोद्धव्य

3. काकु

4. वाक्य

5. वाच्य

6. अन्यसन्निधि

7. प्रस्ताव

8. देश

9. काल

10. चेष्टा।

उक्त वैशिष्ट्य के द्वारा सहृदय लोगों को अन्य अर्थ की प्रतीति जिस अर्थ-व्यापार से होती है उसे आर्थी व्यंजना कहते हैं। जहाँ वक्ता प्रधानता विवक्षित हो वहाँ वक्ता वैशिष्ट्य से आर्थी व्यंजना होती है और जहाँ बोद्धव्य की प्रधानता विवक्षित हो वहाँ बोद्धव्य वैशिष्ट्य से आर्थी व्यंजना होती है। उक्त भेदों के उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं-

अतिपृथुलं जलकुम्भं गृहीत्वा समागतास्मि सखि त्वरितम्।

श्रमस्वेदसलिलनिःश्वासनिःसहा     विश्राम्यामि       क्षणम्।।

यहाँ एक ऐसी नायिका के विषय में बताया गया है जो पानी भरने के बहाने उपनायक के पास गयी और उसके साथ रतिकार्य करके आ रही है। जिसके कारण उसे पसीना आ रहा है और साँस भारी है तथा थक गयी है। रास्ते में उसकी सहेली मिल गयी। उससे वह कहती है-

हे सखि, पानी से भरा घड़ा बड़ा भारी है। इसे लेकर भागी चली आ रही हूँ। इससे बहुत पसीना-पसीना हो गयी हूँ और सांस भी भर गयी है। यहाँ थोड़ी देर बैठकर दम लूँगी।

यहाँ वक्ता के वैशिष्ट्य से चौर्यरत (चोरी से किया गया मैथुन) छिपाने का प्रयास व्यंग्य है।

बोद्धव्य वैशिष्ट्य मे व्यंजना के उदाहरण के रूप में निम्नलिखित श्लोक द्रष्टव्य है-

औन्निद्र्यं       दौर्बल्यं       चिन्तालसत्वं       सनिःश्वितम्।

मम मन्दभागिन्याः कृते सखि त्वामपि अहह परिभवति।।

इस श्लोक में एक नायिका की उक्ति है। नायिका की दूती नायक को मनाते-मनाते उसके प्रेम-प्रसंग का शिकार हो जाती है। इस बात का पता चलने पर नायिका उससे कहती है-

हे सखि, यह बड़े खेद की बात है कि मुझ मन्दभागिनी के कारण तुम्हारी भी नींद हराम हो गयी है, चिन्ता, आलस्य, निश्वास आदि की बीमारी तुम्हें भी लग गयी है।

यहाँ कामुक नायक के साथ दूती का भोग व्यंग्य है।

काव्यप्रकाश पर अपनी हिन्दी टीका में आचार्य विश्वेश्वर सिद्धांतशिरोमणि ने उक्त दोनों प्रकार की व्यंजनाओं के लिए एक हिन्दी दोहे का उदाहरण दिया है-

यहि अवसर किन कामना निज पूरन करि लेहु।

ये दिन  फिर  अइहैं  नहीं  यह  क्षण भंगुर देह।।

यहाँ वक्ता या बोद्धव्य यदि कामुक व्यक्ति है तो काम-वासना व्यंग्य है और यदि इसका वक्ता या बोद्धव्य वैरागी है तो व्यंग्य होगा तपस्या करके मोक्ष प्राप्त करना।

काकु वैशिष्ट्य से व्यंजना वहाँ होती है जहाँ विशेष प्रकार के लहजे में बोलने के ढंग से अर्थ में व्यंजना उत्पन्न करना प्रयोजन हो। काकु शब्द का अर्थ विशेष प्रकार की कंठ ध्वनि (stress) द्वारा किसी बात को कहना। काव्यप्रकाश में इसका निम्नलिखित उदाहरण दिया गया है-

तथाभूतां दृष्ट्वा नृपसदसि पाञ्चालतनयां

वने व्याधैः सार्धं सुचिरमुषितं वल्कलधरैः।

विराटस्यावासे स्थितमनुचरितारम्भनिभृतं

गुरुः खेदं खिन्ने मयि भजति नाद्यापि कुरुषु।।

यह श्लोक वेणीसंहार नामक एक संस्कृत नाटक से उद्धृत किया गया है। यह नाटक महाभारत के उस कथानक को लेकर लिखा गया है जिसमें भीम दुर्योधन का वध करके उसके हृदय का रक्त लेकर वे द्रौपदी के खुले बालों में लगाते हैं। इसीलिए इस नाटक का नाम वेणीसंहार रखा है।

यहाँ गुरु शब्द युधिष्ठिर के लिए प्रयोग किया गया है। गुरु शब्द माता-पिता, बड़े भाई आदि बड़े बुजुर्गों के लिए प्रयोग किया जाता है। उपर्युक्त श्लोक का अर्थ नीचे दिया जा रहा है-

राज्य-सभा में पांचाली (द्रौपदी) के बाल और वस्त्र को खींचा देखकर गुरु को कौरवों पर क्रोध नहीं आया, जब जंगल में वल्कल धारण कर चिरकाल तक व्याधों के साथ रहते रहे तब उनको क्रोध नहीं आया, महाराज विराट के पास रसोइये का काम का करते हुए छिपे रहे तब उनको क्रोध नहीं आया और आज जब मैं कौरवों पर क्रोध करता हूँ तो उन्हें मुझ पर क्रोध आ रहा है।

यहाँ व्यंग्य है- मेरे ऊपर नाराज न होकर कौरवो पर नाराज होना चाहिए। आचार्य विश्वेश्वर जी ने इसके उदाहरण के लिए एक हिन्दी पद्यांश उद्धृत किया है-

सोह कि कोकिल विपिन करीरा।

करीर के वन में कोयल शोभा नहीं देती, यह यहाँ व्यंग्य है।

जहाँ वाक्य की प्रधानता विवक्षित होती है वहाँ वाक्य वैशिष्ट्य से आर्थी व्यंजना होती है और जहाँ वाच्य की प्रधानता विवक्षित हो वहाँ वाच्य वैशिष्ट्य से आर्थी व्यंजना होती है। अब वाक्य और वाच्य वैशिष्ट्य के उदाहरण के लिए एक हिन्दी का दोहा लेते हैं। यह उदाहरण भी आचार्य विश्वेश्वर द्वारा उद्धृत किया गया है-

घाम घरीक निवारिये कलित-ललित अलिपुंज।

जमुना तीर तमाल तरु मिलति मालती कुंज।।

यह एक रमणोत्सुक नायिका की उक्ति है। वह कहती है कि यमुना नदी के किनारे तमाल वृक्ष के पास घने मालती कुंज में भँवरे मनोहर गुंजार कर रहे हैं, वहाँ थोड़ी देर बैठकर धूप बचकर आराम कर लो।

यहाँ वाक्य वैशिष्ट्य और वाच्य वैशिष्ट्य दोनों में व्यंग्य है- रमण के लिए इस मालती कुंज में प्रवेश करो।

अगले अंक में शेष भेदों पर विचार किया जाएगा।

17 टिप्‍पणियां:

  1. साहित्य के मर्म को समझने में मदद मिल रही है इस श्रंखला से !

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  2. काव्य समझने मे उपयोगी पोस्ट। धन्यवाद।

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  3. विद्यार्थी हों या शिक्षक सभी के लिए उपयोगी पोस्ट है!
    --
    बाल दिवस की शुभकामनाएँ!

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  4. बहुत ही उपयोगी पोस्ट । यह अंक साहित्य के छात्रों और समीक्षकों के लिये अत्यंत उपयोगी है । अर्थ की अन्विति की प्रक्रिया का मार्गदर्शन कर आपने हमारे साहित्य-ज्ञान में अभिवृद्धि की है । कोटिशः धन्यवाद !!

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  5. बूझो तो जानें, 'उदय' आप की टिपण्णी के लिए
    धन्यवाद!

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  6. अरुण चन्द्र राय,निर्मला कपिला: प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद.......

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  7. @मोहसीन, डॉ. रूपचंद्र,शमीम : प्रोत्साहन के लिए साधुवाद.....

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  8. @ कारन समस्तीपुरी: धन्यवाद....

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  9. श्रंखला बहुत उपयोगी साबित है रही है।
    आभार।

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  10. हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में आपके प्रयास सराहनीय हैं।

    आभार।

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