मंगलवार, 16 नवंबर 2010

कहानी :: उत्तरदायी कौन?

उत्तरदायी कौन?

बीना अवस्थी

बाहर स्याह अंधेरा बढ़ता जा रहा था, धरती से अम्बर तक कालिमा छाती जा रही थी, किसी भयावह दैत्य के पंजे की तरह बढ़ता अंधकार प्रकाश को निगलता जा रहा था और उस अंधेरे को देखती सुरभि का मन अतीत की स्मृति में छटपटा उठा। कल प्रभात के साथ ही अंधेरा समाप्त हो जायेगा, सूर्य की सुनहली रश्मियों के पदार्पण से जड़ से लेकर चेतन तक जगमगा उठेगा, उषा की गुलाली में कालिमा की स्मृति भी न रहेगी .......... लेकिन उसके अपने जीवन में कभी उषा न आयेगी प्रकाष की एक किरण के लिये तरसता उसका हृदय रेत में पड़ी मछली की तरह हमेशा तड़पता रहेगा, आखिर इस सबका उत्तरदायी कौन है? दोष किसका है? उसने कुछ अधिक तो चाहा नहीं था जिसे पल्लव दे पाने में असमर्थ था/बस! जीवन के प्रभात में उसकी ऑंखों में भी मासूम सपनों की मादकता तैरी थी, लेकिन उसे मिला क्या? एक सूना जीवन -- दूर-दूर तक फैले रेगिस्तान की तरह वीरान जीवन।

अभी बी0ए0 के अन्तिम वर्ष में ही थी कि उसके कानों में माँ का स्वर पड़ा था - चहक से भरा उल्लास से पूर्ण। एक दिन कालेज से वापस आई तो घर में उत्सव का सा वातावरण था, सब कुछ जानकर भी अनजान बनी रही। मन में कोई हल्के से गुदगुदान लगा। उसी शाम घर में विशिष्ट मेहमानों की चहल-पहल हुई। उससे भी तैयार होकर बैठक में आने के लिए कहा गया। लाज और शर्म से उसके पैर उठते ही न थे। मेहमानों के हर प्रश्न का उत्तर उसनें पलके झुकाये हुए ही दिया था। मन-मीत देखने की इच्छा लाज के आवरण से ढक गई।

इसके बाद तो जैसे सुरभि की दुनियां बदल गई। रंगीन सपनों से उसकी रातें सज गई, सुखद भविष्य की आकांक्षा से उसका अन्तर भीग गया। पल्लव का ख्याल आते ही मन अजीब सा हो उठता। पलकें अपने आप बोझिल होने लगती। एकान्त और नीरवता ही उन दिनों रास आती थी उसे। सुरभि के मन में, ऑंखों में, ख्वाबों में और यहाँ तक साँसों में भी पल्लव समा गया। पल्लव के नाम से उसके हृदय में गुलाब की पंखुड़ियां चटकने लगती। सुरभि को खुद नहीं मालूम था कि उसके कानों में किलकारी का प्यारा सा शोर क्यों गूँजा करता है। क्यों शहनाइयों की आवाज उसकी आत्मा में समा गई है ...............। लेकिन स्वप्न केवल स्वप्न सिद्ध हुए। ख्वाबों के टुकड़े-टुकड़े होने से उसका दिल छलनी हो गया। सुरभि ने तो बहुत चाहा था..............।

विवाह हुआ, दुल्हन बनी सुरभि के नयनों में कुंवारी आकांक्षाओं के गुलाबी डोरे डोलने लगे। क्या जानती थी कि उसके हाथ अरमानों की राख ही लगेगी। सौभाग्य कक्ष में पल्लव को जन्म-जन्मान्तर का देवता मानकर तन-मन से समर्पण को तत्पर सुरभि ने मदिरा के नशे में लड़खड़ाते शराबी को आते देखा, ''यह उसके मन-मन्दिर का देवता कैसे हो सकता है।'' हृदय में बसी पल्लव की सौम्य देव मूर्ति खंडित होने लगी। सपर्मण के अवसर पर मदिरा के चरणों में समर्पित पति को सहारा देने के लिये उसके हाथ चाहकर भी आगे न बढ़े और पल्लव बिस्तर पर गिरकर बेसुध हो गया।

अरमानों की पहली रात, सुख-सामीप्य एवं मिलन की रात में सुरभि के नैन सावन-भादों की घटा बनकर बरसते रहे। बरसों के संजोये सपने टूटकर बिखरे तो भविष्य का रंगमहल बिखरता नजर आने लगा। अरमानों के टुकड़ों को सीने से लगाये सिसकती सुरभि की ऑंखों का समन्दर कम होने नाम ही नहीं ले रहा था।

धीरे-धीरे सारे रहस्य प्रकट होने लगे। पतिदेव तो मदिरा ओर ताश की बेगम के गुलाम थे। उस घर में किसी को पत्नी या बहू की आवश्यकता थी ही नहीं। वहाँ तो एक मशीन की आवश्यकता थी - बेजान, भावनाशून्य, इच्छारहित और जो अत्याचार सहकर भी एक शब्द न बोले।

विवाह के पन्द्रह दिनों बाद जब सुरभि मायके आई तो माँ से भी उसने दिल का दर्द प्रकट न किया। क्या बीतेगी उन पर? माता-पिता को उस पर गर्व था। माँ बड़े विश्वास से कहा करती थी, ''मेरी बेटी हमेशा सुरभि ही बिखेरेगी। जिस घर में इसके पैर पड़ेंगे, वहाँ सुख, शान्ति और समृद्धि निवास करेगी।'' वह उस विश्वास को खंडित कर दे। सुरभि पढ़ाई में निपुण होने के साथ ही घर के कामों में भी कुशल थी। इसी कारण जब प्रसन्नता से खिले चेहरे के साथ माँ ने उससे पूछा, ''तेरी ससुराल वाले कैसे हैं?'' उस उत्फुल्ल आभायुक्त मुख पर पल्लव की असलियत बताकर वह कैसे निराशा की कालिमा लगा दे। सिर झुका लिया कहीं माँ सूनी ऑंखों का दर्द पढ़ न लें। माँ ने उसकी खामोशी को नारी-सुलभ लज्जा ही समझा, ''मैं जानती हूँ, पल्लव लाखों में एक लड़का है और घर-बार भी अच्छा है, बस अपनी बेटी के मुँह से सुनना चाहती हूँ। ''सीने पर पत्थर रखकर कह दिया, ''सभी लोग बहुत अच्छे हैं।'' माँ आश्वस्त हो गई। बेटी को सीने से लगा लिया।

सुरभि का मन छटपटा उठा। आखिर कब तक वह झूठ पर सच का आवरण डालेगी। लेकिन उसने आशा का दामन थाम लिया, वह प्रेम से जीत लेगी, सभी को। अपने प्रेम में पल्लव को इतना डुबो लेगी कि उसे कभी याद भी न रहेगी - ताश की बेगम और लाल परी। अपना छोटा सा घर होगा, एक सुखद भविष्य होगा।

सुरभि भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। माता-पिता के नैनों की ज्योति थी वह। पड़ोसी तक उसके स्वभाव की प्रशंसा करते थे। सुरभि को याद न था कि कभी किसी ने उससे तेज स्वर में बात भी की हो वही सुरभि पल्लव ओर उसकी माँ के अत्याचारों में पिसकर रह गई। पल्लव तो कोई न कोई बहाना बनाकर हमेशा पीटता ही रहता था उसे, शरीर के नीले निशान पल्लव की निर्दयता की कहानी कहते थे और उसकी सास तो हमेशा सुरभि पर झूठे इल्जाम लगाकर उसे प्रताड़ित किया करती थी। इतने बन्धन थे उस पर कि बाहर के किसी आदमी औरत से तो दूर बच्चे तक से बोलने की अनुमति न थी। घर का सारा काम अकेली सुरभि पर। काश! पल्लव का जरा सा भी प्यार मिला होता तो वह सारी व्यथा भूल कर उस जीवन में ही स्वर्ग की कल्पना कर लेती। लेकिन पल्लव तो आधी रात के बाद नशे में लड़खड़ाता उसके पास आता था - वह भी अपनी ही ज्वाला में झुलसता हुआ। उसका इन्तजार करती सुरभि थकान और नींद होते हुए भी कभी सो नहीं सकती थी वरना.............।

कई बार उसने पति को समझाने का प्रयत्न किया - प्यार से, उलाहनों से, मनुहार से। लेकिन कुछ कहने का प्रयत्न करते ही हर बार पल्लव का क्रोध चरम सीमा पार कर जाता। आज भी उस व्यवहार को याद करके सिहर जाती है सुरभि। नारी त्याग और सहनशीलता की प्रतिमा होती है। क्षमा, दया, प्रेम उसके हृदय के अंग होते हैं। वह चाहे तो पत्थर में जान डाल दे। परन्तु पल्लव और उसकी माँ न जाने किस धातु के बने थे, जिन्होंने सुरभि को कभी कुछ कहने का अवसर ही न दिया। कभी सोचा भी नहीं कि सुरभि भी हाड़-माँस की एक इन्सान है। उन्हें तो बस मासूम सुरभि को प्रताड़ित करने में ही आनन्द आता था। कभी उसके पिता लेने आते तो सुरभि ही न जाने का कोई न कोई बहाना बना देती। एक-एक करके सुरभि के सारे जेवर मदिरा के प्यालों और क्लब के पत्तों की भेंट चढ़ गये।

उन्हीं दिनों रिंकी का जन्म हुआ। माँ बनने की खुशी में उसके जीवन में एक बार फिर मधुरिम इच्छाओं की बेलें लहराने लगीं। गृहस्थी का बोझ, खाने-पीने पर पाबन्दी, प्रताड़नाओं का अंतहीन सिलसिला - परन्तु मातृत्व की सुखद अनुभूति सब सहन कर गई। बच्चे के लिये छोटी-छोटी इच्छाएं मचल कर रह जाती। रिंकी को देखकर उसे लगा जैसे उसने अपना ही कोई अंश साथी के रूप में धरती पे ला उतारा हो। लेकिन पल्लव और उसकी माँ दोनों ही रुष्ट हो गये। उन्हें बेटा चाहिए था। रिंकी को देखकर सुरभि सारी व्यथा, सारा गम पी जाती। कुदरत की वह देन जब उसकी गोद में आकर मुस्कराने लगती तो पागलों की तरह वह उसे चूमने लगती लेकिन पल्लव की माँ रिंकी को दूध पिलाने और गोद में उठाने पर भी पाबन्दी लगाती तो पीड़ा से उसका मन कराह उठता। बच्ची के रोने की आवाज उसके कानों में पड़ती तो ममता छटपटाने लगती, ऑंखें मचल उठतीं।

ऐसे ही एक दिन रिंकी के बहुत देर तक लगातार रोने पर उससे न रहा गया। रसोई से निकल कर उसके कदम बेटी के पालने तक पहुँच गये और इसी बात पर नाराज होकर उसे बरसात की अंधेरी रात में घर से निकाल दिया गया। जाये तो कहां जाये? पल्लव के स्वभाव से परिचित कोई भी कुछ न कर सका। उस रात बरसते पानी में बेटी को सीने से लगाकर वह सारी रात दरवाजे पर बैठी सिसकती रही। काश! वह रात न आई होती तो वह सारा जीवन हर अमानवीय अत्याचार सहकर भी उफ तक न करती। परन्तु वह रात तो उसका सर्वस्व हरने आई थी। मौत सी काली रात - उसके जीवन का एकमात्र आशादीप छीनने आई थी।

सुरभि ने सब कुछ बर्दाश्त कर लिया। 'कल रिंकी ही बड़ी होकर अपने पिता को पूछेगी तो वह क्या जवाब देगी, जरा सी भूल से उस मासूम का जीवन अंधेरे से घिर जायेगा।' परन्तु नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। हिन्दू नारी के पति को देवता मानने के संस्कारों, खोखली सामाजिक मान्यताओं और असुरक्षा का भय उसे जकड़े था।

लगातार भीगने से रिंकी बीमार पड़ गई। बेटी की दवा के लिये उसके पास कुछ न था। रो-रोकर उसने पल्लव और सास के पैर पकड़ लिये, पर व्यर्थ। सुरभि की तड़प, उसकी पीड़ा ही तो उनके आनन्द का स्रोत था। एक माँ की इससे अधिक परीक्षा क्या होगी कि उसकी ऑंखों के सामने उसके कलेजे का टुकड़ा तड़पता रहे और वह कुछ कर न सके। हालाँकि उसकी सास भी एक माँ थी, पर पता नहीं कैसे ममता की तड़प नहीं थी उसके दिल में। असहाय सुरभि ज्वर से जलती बेटी को कलेजे से लगाकर रो पड़ती ईश्वर से उसके जीवन की भीख मांगती। सिवा ऑंसुओं के उसके पास था ही क्या? और मासूम रिंकी भी विषम ज्वर में भी कभी-कभी अपनी बड़ी-बड़ी ऑंखें खोल कर मानो मुस्करा कर उसे सान्त्वना दे देती थी।

आज वह सब याद करके सुरभि का मन हाहाकर कर उठता है। दूसरे दिन करीब 8-9 बजे रिंकी हमेशा-हमेशा के लिये उसकी गोद से चली गई। सुरभि तो जैसे पत्थर की हो गई। बेटी की मासूम सूरत उसे कभी न भूली। उसकी गोद सूनी हो गई, ममता तड़प-तड़प कर रह गई।

उस दिन के बाद से उसे वह घर हमेशा के लिये छोड़ दिया। उस घर के कण-कण से उसे घृणा हो गई। और यहाँ तक कि कभी-कभी अपने आप से घृणा होने लगती। यही करना था तो थोड़ा पहले साहस किया होता। कम से कम जीवन को वीरान होने से बचा लेती। कभी भी न पल्लव ने ही जानने का प्रयत्न किया कि सुरभि कहाँ है? कैसी है? जिन्दा भी है या नहीं। और न ही सुरभि ने उसे। आज पल्लव की स्मृति में उसकी ऑंखों में महकते सपनों की तस्वीर नहीं तैरती। आज तो पल्लव का ख्याल आते ही उसकी ऑंखों में ऐसे इन्सान की तस्वीर तैर जाती है जिसने अपनी ही बीवी पर जुल्म और अत्याचार का कहर ढा दिया। अपनी ही मासूम बेटी की हत्या कर दी।

पल्लव का घर छोड़ने के बाद सबके बहुत मना करने पर भी उसने एक अध्यापिका की नौकरी कर ली। उसके पिता ने भी बेटी के दर्द को महसूस करके निरन्तर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी - और आज वह डा0 सुरभि है, विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य की प्रवक्ता। मातृत्व से वंचित उसका हृदय अपनी कक्षा की छात्राओं की हर सम्भव सहायता करके जैसे तसल्ली पा जाता था। जीवन में न कोई उत्साह है न उमंग। बस, जन्म लिया है इसीलिये जिये जा रही है। साँसों के रहते जिन्दगी का क्या करे।

लेकिन आज जो घटना घटी है वह तो अप्रत्याशित थी। वैसे तो उसके जीवन में हर घटना अनहोनी ही घटी है पर आज ............................ एम.ए. प्रथम वर्ष की क्लास ले रही थी तभी चपरासी ने आकर उसे सूचना दी, ''कोई सज्जन आपसे मिलने आये हैं।''

''उनसे कह दो कि दो पीरियड बाद आयें, तुम्हें तो मालूम है मैं कक्षा छोड़कर किसी से नहीं मिलती। और हाँ, उनका नाम और काम भी पूछ लो।''

चपरासी थोड़ी देर बाद फिर वापस आ गया, बोला 'वे आपके कोई रिश्तेदार हैं और शाम को आपसे मिलने बंगलें पर आयेंगे, मैंने पता बता दिया है।''

''अच्छा जाओ मुझे पढ़ाने दो।''

लेकिन सुरभि का मन फिर पढ़ाने में न लगा। सारा दिन एक अजीब से मानसिक तनाव में ही बीता। आज किस रिश्तेदार को ऐसे आना है जिसने अपना नाम तक नहीं बताया। उसके भाई-बहनों में से कोई होता तो सीधे बंगले पर आता। इस नाटकीयता की क्या जरूरत थी।

और शाम को जो व्यक्ति आया उसे देखकर तो सुरभि हतप्रभ रह गई। आज कितने दिनों बाद उसने पल्लव को देखा है। समय और शराब ने पल्लव को बिल्कुल जर्जर कर दिया था। जिस व्यक्ति के साथ अग्नि के फेरे लेते समय जीवन-भर साथ रहने की प्रतिज्ञा की थी, जिसके नाम के स्मरण मात्र से मादक स्वप्न लहराते चले आते थे, वही व्यक्ति ऐसी जर्जर स्थिति में सामने खड़ा है और सुरभि के मन में तो दूर हमदर्दी और दया की हल्की सी किरण भी नहीं उभरीं, बल्कि नफरत की अनगिनत परछाइयाँ उसके चेहरे पर तैरने लगी। घृणा और क्रोध के आवेष से उसका चेहरा विकृत हो गया। उसने तो यही सोचा था कि कभी भी पल्लव की सूरत न देखेगी और न उसे अपनी दिखायेगी। लेकिन किसी तरह अपने को संभालकर धीमे स्वर में ही पूछ ''कहिये क्या काम है?''

''सुरभि, माँ नहीं रहीं, मुझे तुम्हारी जरूरत है। आखिर मैं तुम्हारा पति हूँ।''

आज भी वही क्रूरता, पति होने का दंभ। वर्षों से सुरभि के अन्तर में दहकता लावा आज अवसर पाकर बाहर आ गया। ''हैं नहीं थे कहिये कुछ अधिक ही शोभा देगा। आज कैसे याद आ गया कि आप मेरे पति भी हैं? आज आपको जरूरत है तो आप आ गये पति के अधिकार का दंभ भरे अपने अधिकार की दुहाई देने। मैं भी तो आपकी पत्नी थी, कभी सोचा था आपने कि मुझे क्या चाहिये? क्या दिया था आपने मुझे? बीते दिनों में क्या-क्या नहीं सहा मैंने और आज सहते-सहते मैं पत्थर की हो गई हूँ। मेरी इच्छायें मर चुकी हैं।''

''मुझे क्षमा कर दो।''

''कैसी क्षमा? जब मैंने जीवन के प्रभात में अपनी अछूती भावनाओं और कुंवारी आकांक्षाओं के साथ आपके घर में कदम रक्खा था तब कभी उस घर की दीवारों तक ने मुझे इन्सान नहीं समझा था। माँ की बात तो जाने दीजिये, अगर आपसे प्रेम के दो शब्द भी मिले होते...... '' उत्तेजना से सुरभि का चेहरा लाल पड़ गया, ''आज, जब मैंने अंधेरों को जीवन मान लिया है, तब आप मुझे लेने आये हैं?''

''मैं तुम्हारे जीवन का हर अभाव दूर कर दूँगा।''

''कौन सा अभाव दूर करेंगे आप? उम्र की इस सन्ध्या में आप दे भी क्या पायेंगे। मेरी आकांक्षाओं और हसरतों ने मचल-मचल कर दम तोड़ दिया है।'' सुरभि के कानों में एक बार फिर किलकारी का शोर गूँजने लगा। उस छोटे से घर के सपने तैर गये जो बन सकता था पर बना नहीं, ''लौटा सकते हैं तो लौटा दीजिये मेरे टूटे अरमाँ, जो मुझसे बीते दिनों का हिसाब माँगते हैं। भर सकते हैं तो भर दीजिये एक माँ का हृदय जिसकी ममता तड़प-तड़प कर अपने अधिकार माँगती है। मुझे मेरी रिंकी चाहिये। इस अभाव की पूर्ति कर दीजिये, मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ, बस। कैसे माफ कर दूँ आपको?'' सुरभि की पलकें भीग गई।

''लेकिन सुरभि एक बार..................'' पल्लव का स्वर बहुत हल्के से उभरा।

''मैंने अपने आपको इस जीवन के अनुरूप ढाल लिया है। मैं संतुष्ट हूँ। प्लीज पल्लव जी, मेरा अधिक समय नष्ट न करें। मुझे अभी कल का लेक्चर तैयार करना है।'' पल्लव की समझ में न आया क्या करे, क्या कहे। यही सुरभि है जो हर सितम चुपचाप होठों में पी लेती थी।

तभी सुरभि ने नौकर को आवाज दी, ''श्याम सिंह, साहब को बाहर छोड़ आओ।''

पल्लव कुछ देर तक खड़ा रहा फिर धीरे-धीरे सिर झुकाये बाहर निकल गया।

इतना मर्मान्तक आघात पहुँचाकर सुरभि भी तो बुरी तरह आहत हो गई। दूसरे कमरे में जाकर पलंग पर गिर पड़ी, ऑंखें बरस पड़ी।

19 टिप्‍पणियां:

  1. सत्य को छूती कहानी पढ़ कर बहुत अच्छा लगा |
    बधाई
    आशा

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  2. जीवन के कई पहलुओं को समेटे यह कहानी मन को छूती है। लंबी कहानियों को पढने का अलग ही आनंद होता है।

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  3. कथा ने व्यथित किया ...सुरभि के दुःख की क्या सीमा हो सकती है ...
    पल्लव को बहार का रास्ता दिखाकर सुरभि ने ठीक ही किया ....!

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  4. यथार्थ के बहुत नजदीक। चित्रण बहुत स्वाभाविक सा है। कहानी ने मन को स्पर्श किया। बधाई।

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  5. जीवन के कड़वे सच को बहुत सहजता से व्यक्त किया है बीना जी ने कहानी में। यह कठोर परिस्थितियों से गुजरते हुए मजबूत होकर उबरने की मर्मांतक कथा है।

    आभार,

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  6. जिनको ऐसी परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है उनमें से ज्यादातर स्त्रियाँ टूट जाती हैं। इस दृष्टि से देखें तो यह कहानी विषम परिस्थितियों भी मानसिक संतुलन बनाए रखते हुए जीवन का उद्देश्य निर्धारित कर आत्मनिर्भर बनाने, स्वाभिमान की रक्षा करने तथा स्वयं को मजबूत और बेहतर बनाने का संदेश देकर जाती है। फिर वही लोग जो पहले ठोकर मारते हैं, तिरस्कार करते है , पैरों पर गिरे होते हैं।

    उद्देश्यपूर्ण और मार्मिक कहनी के लिए आभार।

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  7. सुन्दर, संवेदी कथा। भाषा का उत्कृष्ट प्रयोग।

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  8. मार्मिक कथा ...बहुत संवेदनशील ...सच ही काश कुछ पहले ही घर छोड़ दिया होता सुरभि ने ...पर जब हर ओर से निराशा मिलती है तभी संघर्ष कि भी ताकत आती है ...अंत बहुत सटीक लगा ..

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  9. मन को छूती यह कहानी पढ़ कर बहुत अच्छा लगा !

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  10. किसी फिल्म की सी मार्मिक कहानी.

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  11. बेहद मार्मिक और संवेदनशील कहानी……………अंत सटीक है ऐसा ही करना चाहिये हर स्वाभिमानी इंसान को……………दिल मे उतर गयी।

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  12. अच्छी लगी कहानी मैं तो बहती गई सुरभि के साथ ही

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  13. मन bheeng गया...बोझिल हो गया...

    परन्तु यही संभवतः इस कथा की सार्थकता है...

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