गुरुवार, 30 जनवरी 2025

258. युद्ध सहायता परिषद

राष्ट्रीय आन्दोलन

258. युद्ध सहायता परिषद


वायसराय लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड

1918

यूरोप में महायुद्ध ज़ारी था। हालाकि यह अब अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर रहा था, लेकिन विकट संकट आसन्न था। मित्र राष्ट्रों को मदद की ज़रूरत थी। ब्रिटेन और उसके मित्र राष्ट्रों की हालत खराब थी और पश्चिमी मोर्चे पर जर्मनों के जोरदार आक्रमण की आशंका थी। इस युद्ध के लिए अंग्रेजों को हिन्दुस्तान से भी काफी संख्या में सिपाही भर्ती करने की जरूरत महसूस हो रही थी। रियासतों द्वारा बड़ी सेनाएँ भेजी गई थीं, लेकिन ब्रिटिश प्रशासन के अधीन क्षेत्रों से बहुत कम सेनाएँ आई थीं। तो वायसराय लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड ने युद्ध में सहायता देने के प्रश्न पर विचार करने के लिए अप्रैल के अंत में दिल्ली में भारतीय नेताओं का युद्ध सहायता परिषद का आयोजन किया। इसका उद्देश्य सैनिकों की भर्ती में तेज़ी लाने के लिए भारतीय नेताओं का समर्थन पाना था।

17 अप्रैल, 1918 को वायसराय के निजी सचिव ने गृह सदस्य को लिखा: "महामहिम वायसराय ने मुझसे तत्काल आपकी राय आमंत्रित करने के लिए कहा है कि क्या श्री गांधी को वायसराय से मिलने के लिए आमंत्रित करना अच्छी बात होगी या नहीं। ऐसा लगता है कि उनकी गतिविधियों को किसी उपयोगी दिशा में मोड़ा जा सकता है, जबकि अगर उन्हें उनके कामों पर छोड़ दिया जाए, तो उनकी हरकतें और ऊर्जा हमेशा परेशानी पैदा करती हैं।" गृह सदस्य ने जवाब दिया: "मैंने देखा है कि श्री गांधी मेसोपोटामिया या फ्रांस में युद्ध सेवा में नियुक्त होने के लिए उत्सुक हैं, और अगर उन्हें किसी भी क्षमता में मेसोपोटामिया भेजा जा सकता है, तो इससे बहुत परेशानी से बचा जा सकता है।"

गांधीजी को 26 अप्रैल 1918 को होने वाले युद्ध सम्मेलन में भाग लेने का निमंत्रण मिला। गांधीजी इस सम्मेलन में भाग नहीं लेना चाहते थे, क्योंकि सरकार ने लोकमान्य तिलक, मौलाना शौकत अली और मौलाना मोहम्मद अली आदि नेताओं को निमंत्रित नहीं किया था। लेकिन वह अली बंधुओं के ख़िलाफ़त आन्दोलन के समर्थन में वायसराय के समक्ष अपनी बात रखना चाहते थे इसके लिए वे दिल्ली गए। लेकिन यह संभव नहीं हो सका। वहां तो सिर्फ़ इस बात पर चर्चा हुई कि इंग्लैण्ड की सेना के लिए रंगरूटों को कैसे, कहां से भर्ती करना है? वायसराय ने अनुरोध किया: "आप जो भी नैतिक मुद्दे उठाना चाहें उठा सकते हैं और युद्ध की समाप्ति के बाद हमें जितनी चाहें चुनौती दे सकते हैं, आज नहीं।" गांधीजी ने इस शर्त के साथ वायसराय के साथ हुई बैठक में हिस्सा लिया था कि वे अपनी बात हिन्दुस्तानी भाषा में रखेंगे। इस सम्मेलन में गांधीजी ने अपने विचार हिंदी में रखे। पहली बार गोरी सरकार ने राष्ट्रीय भाषा को मान्यता दी। सारे देश को अच्छा लगा कि वायसराय के समक्ष कोई नेता हिंदी में बोलने का आग्रह रखता है। बहुतों ने उन्हें हिन्दुस्तानी में बोलने पर बधाई दी। गांधीजी ने रंगरूट भरती करने के प्रस्ताव का, हिन्दी में समर्थन कियाः अपने दायित्व का पूरा ध्यान रख कर मैं प्रस्ताव का समर्थन करता हूं।गांधीजी को कहीं न कहीं यह विश्वास था कि अगर भारत युद्ध में लड़ने के लिए अपने नौजवानों को भेजने की पेशकश करता है, तो वह कम समय में और कम प्रयास से स्वराज प्राप्त कर लेगा। 29 अप्रैल 1918 को गांधीजी ने युद्ध सम्मेलन से वापस आने के बाद वायसराय को एक पत्र लिखा। इस पत्र से स्पष्ट है कि गांधीजी ने युद्ध प्रयासों में भारत से बिना शर्त और पूरे दिल से समर्थन देने पर जोर दिया, लेकिन उन्होंने इस बात का भी ध्यान रखा कि सरकार खिलाफत और स्वशासन दोनों के संबंध में भारतीय लोगों की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को समझे और अपने हित में उन अपेक्षाओं को पूरा करने की आवश्यकता को समझे।

गांधीजी 30 अप्रैल को दिल्ली से निकले और अगली सुबह नाडियाड पहुंचे, जहां उन्होंने खेड़ा सत्याग्रह का मुख्यालय स्थापित किया था। वे उसी रात बंबई के लिए रवाना हो गए। वहां 3 मई को उनकी मुलाकात श्रीमती बेसेंट से हुई। वे भर्ती के लिए बिना शर्त समर्थन के बारे में गांधीजी का समर्थन करने के लिए सहमत हो गईं। शाम को गांधीजी कांग्रेस की बैठक में शामिल हुए। खापर्डे, तिलक और अन्य लोगों ने इस दृष्टिकोण की जोरदार वकालत की: "हमें स्वराज दो और हमारी मदद लो।" गांधीजी ने पूरी ऊर्जा के साथ भर्ती अभियान में खुद को झोंक दिया और वे तिलक, बेसेंट और अन्य होम रूलर्स को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करते रहे।

10 जून, 1918 को गवर्नर लॉर्ड विलिंगडन की अध्यक्षता में बंबई में एक युद्ध सम्मेलन आयोजित किया गया था। उन्होंने अपने श्रोताओं को होम रूल पर कठोर उपदेश दिया, जिनकी ईमानदारी पर उन्होंने सवाल उठाए थे। तिलक को बोलने के लिए बुलाया गया, लेकिन उन्हें होम रूल का उल्लेख करने की अनुमति नहीं दी गई और तिलक जिन्ना, कॉर्निमैन, केलकर और करंदीकर के साथ बाहर चले गए, जिन्हें भी होम रूल के उल्लेख पर गवर्नर ने रोक दिया। 16 जून को बॉम्बे में आयोजित एक सार्वजनिक बैठक में गांधी जी ने सम्मेलन में गवर्नर के व्यवहार के खिलाफ विरोध जताया। उन्होंने लॉर्ड विलिंगडन द्वारा होम रूलर्स का अपमान करने की निंदा की। उन्होंने कहा कि गवर्नर का व्यवहार असहिष्णु और निंदनीय था। तिलक को इस तरह अपमानित करना युद्ध के उद्देश्य को नष्ट करना है। लेकिन उन्होंने लोगों को इस बात पर जोर दिया कि संकट के समय ब्रिटेन की मदद करना जरूरी है। तिलक ने इस अवसर पर जोशपूर्ण भाषण दिया: "सरकार हमें कपटी कहती है, लेकिन मेरे पास इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि ये आरोप हम लोगों से अधिक सरकार पर सत्य हैं, और यदि यह संभावना स्पष्ट है कि युद्ध के बाद देश पर लगी बेड़ियाँ ढीली नहीं होंगी, बल्कि और कड़ी होंगी, तो सरकार की मदद कौन करेगा! यदि सरकार सेना में उच्च पदों पर भारतीयों को नियुक्त करने का वादा करती है, तो मैं तुरंत 5,000 भर्तियाँ करवाने का वचन देता हूँ और यदि मैं सफल नहीं हुआ, तो मैं प्रत्येक असफलता के लिए 100 रुपये का जुर्माना भरूँगा और मैं इस प्रस्ताव की गारंटी के रूप में गांधीजी के हाथों में 50,000 रुपये रखने के लिए तैयार हूँ।"

चंपारण और खेड़ा के बावजूद गांधीजी का अभी भी यही विश्वास था कि ब्रिटिश साम्राज्य अधिकतर एक शुभ शक्ति है और ब्रिटिश संबंधों के कारण कुल मिलाकर भारत का भला ही हुआ है। उन दिनों गांधीजी भी अंग्रेजी राज की तमाम बुराइयों के बावजूद यह मानते थे कि जर्मनी और इटली आदि की तानाशाही की तुलना में अंग्रेजों का शासन भारत सहित अन्य गुलाम देशों के लिए मौजूदा विकल्पों में बेहतर विकल्प है। साम्राज्य के संकट की घड़ी में उसकी सहायता करना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य था। फिर तो वह तन-मन से रंगरूट-भरती के काम में लग गए। उन्होंने साम्राज्ञी सेना के एक भरती करनेवाले सार्जेंट के रूप में सचमुच प्रचार कार्य किया। वायसराय के निजी सचिव को उन्होंने लिखा: "मुझे लगता है कि अगर मैं आपका भर्ती एजेंट-इन-चीफ बन गया, तो मैं आपके लिए लोगों की बारिश कर सकता हूँ।" यूरोप के मोर्चे पर लड़ने वाली ब्रिटेन की भारतीय फौज के लिए गुजरात के गांवों में रंगरूट भरती करने के लिए जाना अहिंसा के पुजारी गांधीजी के लिए एक तरह से हास्यास्पद ही था। उनके इस प्रयास में तिलक का भी साथ मिला।

गांधीजी ने 21 जून को नाडियाड में भाषण देकर गुजरात में भर्ती अभियान की शुरुआत की और अगले दिन अपनी पहली 'भर्ती के लिए अपील' जारी की। गांधीजी ने खेड़ा के लोगों से हजारों की संख्या में उनके बैनर तले आने का आह्वान किया: "खेड़ा जिले में 600 गांव हैं और हर गांव की औसत आबादी 1,000 से अधिक है। अगर हर गांव कम से कम बीस आदमी दे तो खेड़ा जिला 12,000 लोगों की सेना खड़ी कर सकता है।" उन्हें लगा कि खेड़ा के लोग उनकी बात मानेंगे और सेना में भर्ती हो जाएंगे।

पिछले अवसरों पर उन्होंने एम्बुलेंस कॉर्प्स का गठन करके संकटग्रस्त साम्राज्य की सहायता की थी। लेकिन इस बार उन्होंने मरने-मारने के लिए लोगों को भर्ती किया। उन्हें पता था कि उनका प्रचार जनता में कम ही उत्साह जगाता था। गाँधीजी ने सरदार वल्लभ भाई पटेल आदि साथियों से विचार करने के बाद तय किया कि सबसे पहले खेड़ा के युवाओं से फौज में भर्ती के लिए अपील करेंगे जहां कुछ समय पहले किसान आंदोलन में लोगों ने बढ चढकर भाग लिया था। जिस खेड़ा ज़िले में हाल ही में कर-बंदी अभियान का नेतृत्व किया था और जहां वे जन-नायक समझे जाते थे, उसी खेड़ा ज़िले में जब वे भर्ती कराने वाले सार्जेंट के रूप में गए तो शायद ही किसी ने उनका स्वागत किया था या उनकी बात सुनी थी। गांधीजी की आशावादिता को करारा झटका लगा। लेकिन गांधीजी जिस काम को अंतर्तत्त्व के आधार पर उचित समझते थे, उसे करने जनसमर्थन का अभाव उन्हें कभी नहीं रोक सका।

गांधीजी को अपने मन में अहिंसा में अपने विश्वास और अंग्रेजों के लिए लड़ने के लिए किसानों को भर्ती करने की उनकी इच्छा के बीच कोई विरोधाभास नहीं दिखाई दिया। उनका यह विश्वास था कि उनके देशवासियों की आभासी शांतिप्रियता अहिंसा में उनकी साहसपूर्ण आस्था के कारण नहीं थी बल्कि लड़ाई से उनके कायरतापूर्ण भय का नतीजा थी। उन्होंने अपने मित्र पोलाक को लिखा था, आप मेरे भर्ती अभियान के बारे में क्या कहते हैं? मेरे लिए यह अहिंसा के पवित्र सिद्धांत के हित में शुरू की गई एक धार्मिक गतिविधि है। मैंने यह खोज की है कि भारत अपनी लड़ने ली प्रवृत्ति को नहीं, उसकी शक्ति को ही खो बैठा है। उसे पहले इस शक्ति को पाना होगा और फिर अगर वह चाहे तो पीड़ा कराहती इस दुनिया को अहिंसा का संदेश दे। उसे अपनी कमजोरी का नहीं, अपनी शक्ति का भरपूर दावा करना चाहिए। संभव है, वह ऐसा कभी नहीं करे। यह मेरे लिए उसके विनाश का पर्याय होगा। वह अपनी विशिष्टता खो देगा और दूसरे राष्ट्रों की तरह पशुबल का उपासक बन जाएगा। भरती कराने का यह काम अभी तक मेरे द्वारा किया गया शायद सबसे कठिन काम है।

गांधीजी ने तर्क दिया कि स्वराज सभी चीजों में सबसे वांछनीय है, और इसे साम्राज्य की रक्षा के लिए केवल एक पुरस्कार के रूप में दिया जाना चाहिए। स्थायी सेना में स्वाभाविक रूप से कुछ भी गलत नहीं था; यदि भारतीय हथियारों का उपयोग सीखना चाहते थे, तो उनका कर्तव्य था कि वे भर्ती हों। समय के साथ भाड़े की सेना एक राष्ट्रीय सेना बन जाएगी और अगर अंग्रेज फिर भी स्वराज देने से इनकार करते हैं तो उनका इस्तेमाल उनके खिलाफ किया जा सकता है। लेकिन ये राजनीतिक तर्क थे। चार्ली एंड्रयूज ने उन्हें बिना किसी नैतिक आधार के सुविधा के तर्क माना, और उन्होंने स्पष्टीकरण की मांग करते हुए एक व्यथित पत्र लिखा।

तिलक और गांधीजी ने अंग्रेज़ों की सहायता के लिए धन और आदमी जुटाने का काम इस आशा से किया था कि इस निष्ठा के बदले सरकार बड़े राजनीतिक सुधार करेगी। तिलक ने कहा था, युद्ध के ऋणपत्र खरीदो, पर उन्हें होमरूल के पट्टे समझो। राजस्व अभियान के दौरान जहाँ लोग अपनी गाड़ियाँ निःशुल्क देने के लिए तैयार थे और जब एक की ज़रूरत होती थी तो दो स्वयंसेवक आगे आ जाते थे, वहीं अब किराए पर भी गाड़ी मिलना मुश्किल था, स्वयंसेवकों की तो बात ही छोड़िए। गुजरात के गांवों में यात्रा के लिए बैलगाड़ी तक न मिलने पर गांधीजी और उनके साथियों को अक्सर एक दिन में बीस-बीस मील तक पैदल चलना पड़ता था। कुछ ही समय पहले जब गांधीजी करों के खिलाफ अभियान चलाते हुए उनके बीच यात्रा कर रहे थे, तो उन्होंने उन्हें खाना खिलाया, बैलगाड़ियाँ उपलब्ध कराईं, सोने के लिए कमरे की व्यवस्था की, हर तरह से उनकी मदद की, लेकिन वे यह नहीं समझ पाए कि अहिंसा के पुजारी उन्हें सेना में भर्ती होने और फ्रांस या मेसोपोटामिया में अपने प्राणों की आहुति देने के लिए क्यों कह रहे हैं। वे जहाँ भी जाते थे, वहाँ उनकी बैठकें होती थीं। लोग आते थे, लेकिन मुश्किल से एक या दो लोग ही भर्ती के लिए खुद को पेश करते थे। 'आप अहिंसा के पुजारी हैं, आप हमसे हथियार उठाने के लिए कैसे कह सकते हैं?' 'सरकार ने भारत के लिए ऐसा क्या अच्छा किया है कि वह हमारा सहयोग पाने लायक है?' इस तरह के सवाल उनसे पूछे जाते थे।

उन्होंने एक महीना गाँव-गाँव घूमकर बिताया था; अनगिनत भाषण दिए थे; और इसके एवज़ में उन्हें कुछ खास प्राप्त नहीं हुआ। अपने परिश्रम और बेहद अपर्याप्त आहार के परिणामस्वरूप - वह मूंगफली के मक्खन और नींबू पर जी रहे थे। यह जानते हुए भी कि बहुत अधिक मक्खन खाने से स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है, फिर भी उन्होंने ऐसा किया। उन्हें पेचिश हो गई और वह सात सप्ताह तक बीमार रहे। उन दिनों वह शायद ही कोई दवा लेते थे। उन्हें लगा कि अगर वह एक भोजन छोड़ दें तो ठीक हो जाएंगे और उन्होंने सुबह का भोजन छोड़ दिया। चूंकि वह खुद को आहार का विशेषज्ञ मानते थे, इसलिए वह समझ नहीं पाए कि वह इतना कमज़ोर क्यों हो गए थे। यह उनकी अब तक की सबसे बुरी बीमारी थी। उनका स्वास्थ्य लगभग पूरी तरह नष्ट हो गया। लोगों को लगा कि अब वे मृत्यु के समीप हैं। एक समय उन्हें विश्वास हो गया था कि वे ज़िंदा नहीं बचेंगे और उन्होंने निराश होकर अपने आसपास के लोगों से कहा था कि ‘उनका पूरा जीवन ऐसा रहा है कि उन्होंने कुछ काम हाथ में लिए, उनको आधा किया और वे जा रहे हैं, लेकिन अगर यही ईश्वर की इच्छा है तो कोई चारा भी नहीं है।’ मिल मालिक अंबालाल साराभाई को बुलाया गया और गांधीजी को अहमदाबाद के बाहरी इलाके में मिर्जापुर स्थित अपने घर ले गए। डॉक्टरों का फैसला था कि वह पेचिश, भूख और नर्वस ब्रेकडाउन से पीड़ित थे। वह बेचैन रहने लगे और उन्होंने आग्रह किया कि उन्हें आश्रम में ले जाया जाए। उन्हें आश्रम ले जाया गया। । दूसरे दिन डा. राजेन्द्रप्रसाद मिलने के लिए आए तो उन्होंने गांधीजी को मरनासन्न अवस्था में पाया—शरीर सूखकर लकडी हो गया था और जीवन की कोई उमंग भी बाकी नहीं रही थी।

जब वह आश्रम में दर्द से कराह रहे थे, तब सरदार वल्लभभाई ने खबर दी कि जर्मनी पूरी तरह से पराजित हो चुका है और कमिश्नर ने संदेश भेजा है कि अब भर्ती की जरूरत नहीं है। यह खबर कि अब उन्हें भर्ती के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है, उनके लिए बहुत बड़ी राहत लेकर आई।

लोगों के आग्रह पर स्वास्थ्य लाभ के लिए वे नवंबर में मुंबई के सहयाद्रि की घाटी में मथेरान गए। कोई खास लाभ न होने की स्थिति में मुंबई आ गए। डॉ. दलाल के उपचार से ठीक हुए। 21 जनवरी, 1919 को डॉ. दलाल ने उनके फिशर का सफल ऑपरेशन किया। धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य बेहतर होने लगा और उन्होंने बंबई में स्वास्थ्य लाभ के दौरान कताई सीखी और उसका अभ्यास किया। उन्होंने कहा, "चरखा खुशी से गुनगुनाता था और मेरे स्वास्थ्य को वापस लाने में इसका बहुत बड़ा योगदान था।" हालाँकि कुछ हफ़्तों में तीव्र पेचिश ठीक हो गई, लेकिन वह साल के बाकी दिनों के लिए बिस्तर पर पड़े रहे।

बीमार होने पर ज़्यादातर लोगों की तरह, उन्हें भी बच्चों में सबसे ज़्यादा खुशी मिलती थी, हरिलाल के बेटे और बेटियों को उनके बिस्तर के आस-पास खेलने की इजाज़त दे दी गई थी। हरिलाल का सबसे बड़ा बेटा रसिक अब छह साल का था और अपने दादा की सबसे बड़ी खुशी था। कस्तूरबाई भी अपने चार पोते-पोतियों से बहुत प्यार करती थीं और उनकी पूरी जिम्मेदारी उठाती थीं। गांधीजी अपने बेटों से ज़्यादा अपने नाती-पोतों के प्रति समर्पित थे। उन्होंने मणिलाल को दक्षिण अफ्रीका में इंडियन ओपिनियन का प्रकाशन जारी रखने के लिए भेज दिया। रामदास को भी दक्षिण अफ्रीका भेजा गया। देवदास ने मद्रास में एक अध्यापन पद ग्रहण किया, जबकि हरिलाल कल्पना करते रहे कि वे एक दिन कलकत्ता में एक सफल व्यवसायी बनेंगे। उनके व्यवसाय आमतौर पर विफल हो जाते थे और इस समय उन्हें दस हज़ार रुपये का नुकसान हुआ था।

जब गांधीजी बीमार थे, तब भारत तेज़ी से बदल रहा था, इतनी तेज़ी से कि उन्हें शायद ही पता था कि क्या हो रहा है। युद्ध के परिणामस्वरूप जीवनयापन की लागत बढ़ गई, पूरे देश में इन्फ्लूएंजा महामारी फैल गई, छोटे पैमाने पर आतंकवादी साजिशें हुईं, जिन्हें सरकार ने चिंता के साथ देखा, और "बोल्शेविक खतरा" सरकारी अधिकारियों के बीच जुनून बन गया। युद्ध के अंत में स्वराज की उम्मीद करने वाले भारतीयों को लगातार दमनकारी उपायों का सामना करना पड़ा। एक बार फिर वे अपने ही घर में कैदी बन गए।

***     ***  ***

मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।