शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

त्यागपत्र : भाग 14

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना! फिर रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती ! गाँव की गोरी रामदुलारी अब पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत है ! किन्तु गाँव में रामदुलारी के खुले विचारों की कटु-चर्चा होती है ! उधर समीर के पिता के कालेज की अध्यापिका रुचिरा का आकर्षण समीर के प्रति बढ़ता ही जा रहा है ! इधर रामदुलारी भी बहुत दिनों से प्रकाश नहीं मिला है ! अब पढ़िए आगे !!

-- करण समस्तीपुरी

बहुत दिनों से गायक, प्रकाश के दर्शन नहीं हुए थे। किसी से पता चला वह शहर से बाहर चला गया है। वह भी शोध कर रहा था। अंग्रेज़ी साहित्य में। रामदुलारी जब भी पुस्तकालय जाती तो उसकी आंखें प्रकाश को तलाशती प्रतीत होती। इसी तलाश में कई दिन बीत गए। उसे लग रहा था कि प्रकाश के प्रति उसका आकर्षण तीव्रतर होते जा रहा है। जब कोई पास न हो तो उसकी कमी बहुत सालती है।

उस दिन जब वह पुस्तकालय में कुछ शोधग्रंथों के अध्ययन में डूबी हुई थी, तभी द्वार से किसी के प्रवेश करने की आहट हुई। रामदुलारी के नयन उस ओर उठ गए। द्वार पर वही खड़ा था जिसके दर्शन को प्राण तड़प रहे थे उसके। ऐसा लगा मानों प्रत्यूष सारी रश्मि लेकर पुस्तकालय के उस कक्ष में प्रवेश कर गया हो। दिल के सारे तार झंकृत हो उठे। मन ऐसे मचला मानो मधुवन के सारे पुष्प अपनी सुरभि लुटा रहे हों। उस पल के आगमन से आनन्दमग्न हो गई रामदुलारी। स्थान की सीमाबद्धता का भी सहसा ध्यान हो आया। मन ने सावधान किया। यह पुस्तकालय है, और यहाँ सहपाठी भी हैं।

प्रकाश रामदुलारी की उपस्थिति से अनभिज्ञ अपने मित्रों की ओर बढ़ गया। रामदुलारी के कर्ण द्वार से शब्दों के दल ने प्रवेश करना प्रारंभ किया।

“कहां थे? बहुत दिनों से दिखे नहीं।”

“हां। मैं यहां नहीं था। मुझे एक इंटर कॉलेज में व्याख्याता की नौकरी मिल गई है। वहीं ज्वायन करने गया था। ... आज ही आया हूँ। यहां से नामादि कटवाने हैं। कल पुनः चला जाऊँगा। वहीं रहूँगा।”

रामदुलारी के नयन उठे। कुछ अविश्वास कुछ आशंका से। प्रकाश की आंखें भी खोजती हुई रामदुलारी की आंखों से जा टकराई। प्रकाश बड़े ही चाव से उसकी तरफ देख रहा था। पर इधर रामदुलारी का मन भीतर से भींग रहा था। उसे ऐसा लग रहा था फूलों ने जो रंग उसके जीवन की बगिया में बिखेरे थे वह उजड़ रहे हों। यह आने वाले बिछोह की पीड़ा थी। रामदुलारी अपने दुःख के जल से सनी अनमनी बैठी रही। मनोपीड़ा को भरसक दबाने का प्रयत्न करती रही। मन-ही-मन अपनी पीड़ा का विष प्याला पी कर सहज होने की चेष्टा करने लगी। कितना असहज था वह पल उसका।

प्रकाश उसकी तरफ बढ़ता प्रतीत हुआ। रामदुलारी अपनी सीट से उठी। प्रकाश उससे कुछ कहने को आतुर लग रहा था। पर राम दुलारी प्रकाश के पास आने से पहले ही पुस्तकालय के कक्ष से बाहर निकल आई। सड़कें, गलियां, पार कर हॉस्टल के अपने कक्ष में पहुंच गई। पुस्तकें खोल कर पढ़ने का प्रयत्न किया। पुस्तकों में मन नहीं लगा उसका। आंखें बंद की तो मां के स्वर कानों में घुलने लगे ......

“तू-त चुप्पे-चुप्पे जा रही है। कोई बचन भी नहीं दी।”


(रामदुलारी की स्मृति पर ये किसकी आहात है ? क्या होगा इसका उत्कर्ष ??.... पढ़िए अगले हफ्ते इसी ब्लॉग पर !!)

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पड़ाव

भाग ॥१॥, ॥२॥. ॥३॥, ॥४॥, ॥५॥, ॥६॥, ॥७॥, ॥८॥, ॥९॥, ॥१०॥, ॥११॥, ॥१२॥,॥१३॥, ॥१४॥, ॥१५॥, ॥१६॥, ॥१७॥, ॥१८॥, ॥१९॥, ॥२०॥, ॥२१॥, ॥२२॥, ॥२३॥, ॥२४॥, ॥२५॥, ॥२६॥, ॥२७॥, ॥२८॥, ॥२९॥, ॥३०॥, ॥३१॥, ॥३२॥, ॥३३॥, ॥३४॥, ॥३५॥, ||36||, ||37||

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

एक चौपाल कवि कर्म पर

नमस्कार मित्रों !

गुरूवार की चौपाल में एक बार फिर आपका हार्दिक स्वागत है ! यह होगी अपने तरह की पहली चौपाल !! ब्लॉग-विश्व में पहली बार पढ़िए काव्य-शास्त्र का मर्म........ कुछ कही, कुछ अनकही.... एक समीक्षा........ साहित्य साधक परशुराम राय की कलम से !!

आँच

-- परशुराम राय

आँच का उद्देश्य कवि की भावभूमि की गरमाहट को पाठकों तक पहुँचाना और पाठक (समीक्षक) की अनुभूति की गरमाहट को कवि तक पहुँचाना है। इसी उद्देश्य से आचार्य मम्मट के काव्य-लक्षण को ध्यान में रखकर इसी लक्षण से इस धारा का मंगलाचरण करने की इच्छा हुई।

‘तदोषौ शब्दार्थौ सगुणावन लङ्कृती क्वापि इति काव्यम्।’

‘गुण सहित एवं दोषरहित शब्द और अर्थ की समष्टि को काव्य कहते हैं, भले ही कहीं स्पष्ट अलंकार हो अथवा न हो।’

ध्वनि समुदाय को प्रतिष्ठित करने वाले ‘‘काव्य प्रकाश’’ के प्रणेता आचार्य मम्मट द्वारा दिया गया काव्य का यह लक्षण (परिभाषा) है। ब्लाग पर अनेक रचनाएँ आने लगीं हैं । पाठकों की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं तो लगा कि इस ब्लाग में समीक्षा की एक धारा क्यों न जोड़ी जाए। समीक्षा के लिए इसी ब्लाग पर आयी दो रचनाओं को चुना है- एक है श्री मनोज कुमार जी द्वारा रचित ‘अमरलता’ और दूसरी श्री हरीश प्रकाश गुप्त का ‘नवगीत’।

‘अमरलता’ में कवि ने भारत के सरकारी तंत्र में और समाज में जड़ जमा चुकी कुवृत्तियों पर बहुत ही पैना व्यंग्य किया है। जब मैंने इस कविता को पढ़ा तो भारतीय समाज के वृक्ष पर सरकारी-तंत्र और राजनीतिक दल अमरबेल की तरह कौंध गये और इस प्रकार रचनाकार ने मुझे चमत्कृत कर दिया। इन प्रजातियों को ‘अमर लता’ बहुत ही सटीक व्यंजित करती है।

जिस प्रकार बिना किसी जड़ के अमर लता व्यवस्थित ढ़ंग से वृक्ष की अन्तिम साँस तक छीन लेती है, उसी तरह व्यवस्थित भ्रष्टाचारी तंत्र बिना किसी जड़ के विभिन्न योजनाओं को डिफाल्टर बना देते हैं और जाँच दल को माथापच्ची करने के लिए समय दे दिया जाता है ताकि भारतीय जनमानस उसे विस्मृति के डस्टबीन में डाल दे। 60 वर्षों की प्रजातांत्रिक गतिविधियों का आकलन यही है कि कोई भी भारतीय किसी योजना और कानून पर विश्वास नहीं करता, बल्कि उसका इन पर विश्वास करना उसकी मजबूरी है। प्रजातंत्र के तीनों स्तम्भ अमरबेल की भाँति जनतंत्र के वृक्ष से लिपटे हुए हैं। इन सबका अघोषित धर्म शोषण है। जिनकी ये सवारी करते हैं, उनके पास कुछ नहीं बचता, सिवाय सूखी लकड़ी के।

कविता के अन्तिम चरण में- “ना औषधि है, न कोई खाद्य, तू प्रकृति विनाशनि शक्ति आद्य” में भाव शृंखला भंग हो गयी है। निष्कर्ष भाग ‘‘बढ़ते हैं जग में वही आज, जो देते औरों को धकेल’’ भी अपनी भाव-भूमि छोड़ चुका है। कवि से अनुरोध है कि इन पर पुनः विचार कर उन्हें एक ही भाव- भूमि पर प्रवाहित करे।

शैली की दृष्टि से मनोज कुमार जी ‘निराला ‘जी से प्रभावित लगते हैं, विशेषकर इस कविता से तो ऐसा अवश्य प्रकट होता है।

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