मनोजकुमार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मनोजकुमार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

आंच-107 : रमपतिया की याद में गिरिजा जी की असाधारण कविता


आंच-107
-    मनोज कुमार

 रमपतिया की याद में गिरिजा जी की असाधारण कविता 
गिरिजा कुलश्रेष्ठ की एक कविता पर आज नज़र पड़ी। गिरिजा जी का ब्लॉग Yeh Mera Jahaan है। इस ब्लॉग पर अपने परिचय में गिरिजा जी कहती हैं - जीवन के पाँच दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ। अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है। दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ । फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है । इसी तलाश में उनकी भेंट एक ग्रामीण महिला रमपतिया से होती है और होता है सृजन रमपतिया की याद में कविता का।
स्त्री पर स्तरीय कविताएँ कम ही मिलती हैं। गिरिजा जी ने एक साधारण स्त्री पर असाधारण कविता रची है। कविता में नारी चरित्र और उसके जीवन से जुड़ी समस्त घटनाओं को उसके तीन भावों हँसनारोना और प्रतिकार करना के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। कवयित्री ने हँसी और रुदन का इतना बारीकी से चित्रण किया है कि स्त्री को उसकी हँसी भी उतना ही सशक्त बनाती हैजितना उसका रुदन। कविता के अंतिम भाग में, जहाँ आम स्त्रियाँ (रमपतिया के परिवेश की) आँसू बहाती हैंवहाँ रमपतिया नारी चरित्र को सशक्त रूप से मुखरित करते हुए चीत्कार करती है, विरोध जताती है और अपने रुदन को अपनी असमर्थता और लाचारी नहीं बनने देती। एक साधारण सी स्त्री रमपतिया के माध्यम से गिरिजा जी ने जहाँ नारीजनित स्वाभाविक ईर्ष्या को जित्रित किया है वहीं उसके स्वाभाविक गुण प्रेम को भी उद्घाटित किया है और अपने सम्मान, स्वाभिमान और अधिकार के लिए संकोच छोड़ मजबूती के साथ सामना करने के लिए उठ खड़े होने वाले  चरित्र के साथ नारीत्व को शक्ति दी भी है।
इस कविता में माटी की गंध और गँवई मिज़ाज पैहम है। वह एक ऐसी स्त्री है जो जीवन के हर पल का आनंद उठाती है। उसकी हँसी निश्छल है, वह  भोली हैसरल है और जीवट वाली स्त्री है। वह जीवन के हर छोटे-बड़े पल को हँसकर जीना जानती है और उनका खुलकर आनन्द भी लेती है।
रमपतिया तुम हँसती थी
दिल खोल कर
एक बडी बुलन्द हँसी ।
छोटी-छोटी बातों पर ही
कविता के प्रारम्भ में इस ग्रामीणनिरक्षर स्‍त्री कीगली-नुक्कड़ तक गूँजती हँसी से हमारा परिचय होता है. किन्तु इस साधारण सी घटना के मध्य कवयित्री ने हौले से जीवन की उन दुरूह परिस्थितियों को भी पाठक के समक्ष रखा जिनके बीच आम आदमी हँसी की कल्पना भी नहीं कर सकता और यही उस नारी की विजय हैक्योंकि उसकी हँसी से
हो जाते थे शर्मसार
सारे अभाव और दुख ,चिन्ता कि
शाम को कैसे जलेगा चूल्हा
या कैसे चुकेगा रामधन बौहरे का कर्जा
बढते गर्भ की तरह चढते ब्याज के साथ ।
हम पाते हैं कि इन संघर्षों के बावज़ूद भी उसके चरित्र में संकोच का भावएक ग़रीबी का गर्वएक गंवईपन का स्वाभिमान है। गिरिजा जी ने अपनी कविता के लिए कोई भारी-भरकम विषय नहीं उठाया हैफिर भी उनकी इस कविता की यात्रा करते हुए हम पाते हैं कि उन्होंने कुछ ऐसा अवश्‍य कहा हैंजिसे नया न कहते हुए भी हल्‍का नहीं कहा जा सकता।
सरल, सहज रमपतिया इतनी हँस-मुख है कि कोई भी अभाव उसकी हँसी को म्लान नहीं कर पायाकारण अगर दिल को आघात पहुँचाने वाला हो तो वह रोती भी है। अपने किसी नजदीकी की मौत पर या फसल, जो गरीब के जीवन यापन का एक मात्र आधार है, या भले ही अपने पति द्वारा दिल को दुखाए जाने पर। हर बार रमपतिया ने अपने दुख को मुखर अभिव्यक्त करके अपने से पूरी तरह बाहर कर दिया और फिर पहले की तरह ही सहज हो गई। यहाँ नाली में फँसी पॉलीथीन बिम्ब बहुत स्वाभाविक प्रयोग है। जिस प्रकार नाली में जब पॉलीथीन फँस जाती है तो कचरा अन्दर ही जमा होने लगता है और जब तेज बहाव में वही पॉलीथीन एक झटके में निकलती है तो बहाव बहुत सहज हो जाता है। गहन दुख की भी स्थिति कुछ-कुछ वैसी ही है। वर्णन कवयित्री के शब्दों में ही देखें
तुम रोती थीं गला फाड कर
रुदन को आसमान तक पहुँचाने
तुम्हारे साथ रोतीं थीं दीवारें
आँगन ,छत , गली मोहल्ला और पूरा..गाँव
उफनती थी आँसुओं की बाढ
नाली में फंसी पालीथिन की तरह
रुके हुए दर्द बह जाते थे
तेज धार में ।

ऐसा लगता है रमपतिया अचानक व्यक्तिवाचक संज्ञा से जातिवाचक संज्ञा हो जाती है और हर उस स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है जिसके आँसू दिल दुखने पर आसमान के परमात्मा तक पहुँचने की शक्ति रखते हों.
तीसरे भाग में नारी को प्रताड़ित करने वालों और उपेक्षिता समझने वालों को रमपतिया के माध्यम से दिखाया है कि वह हंसती है मगर हंसते हुए जुल्मअन्यायउपेक्षा और चरित्र पर आक्रमण नहीं सह सकती। वह रोती हैमगर आँचल में छिपकर आँसू नहीं बहाती.
चीख-चीख कर जगा देती थी
सोया आसमान ।
भर देती थी चूल्हे में पानी
जेंव लो रोटी|
मारलो
काट कर डाल दो
रमपतिया नही सहेगी
कोई भी मनमानी ।
और यही कविता की ऊंचाई है जो उस स्त्री के साथ परवान चढी है जिसका चरित्र एक कोमल ह्रदय नारी का भी है और अन्याय का विरोध करती चंडिका का भी!
रमपतिया,
ओ अनपढ देहाती स्त्री
काला अक्षर भैंस बराबर
पर मुझे लगता है कि उस हर स्त्री को
तुम्हारी ही जरूरत है जिसने
तुम्हारी तरह
नही जाना -समझा
अपने आपको आज तक
इस कविता की जो बात मुझे अच्छी लगी वह यह कि वह न तो ज़्यादा क्रांति की बात करती हैंन चटपट मज़ेदार कविता की रचना ही। स्त्री और उसका संघर्ष ही इसका बुनियादी लय है। परिवर्तन की बात है तो वह सिर्फ़ रस्मी जोश तक सीमित नहीं है। ये सब कुछ इनकी रचना में बुनियादी सवालों से टकराते हुए है। इनकी लेखनी से जो निकला है वह दिल और दिमाग के बीच खींचतान पैदा करता है। क्योंकि इन्होंने घिसते जाने के बीच अपने को सिरजने की और शोषण के प्रति उसके विरोध को उस स्त्री की जद्दोजहद को परिचित बिंबों से उतारा है।
इस कविता में एक ओर जहाँ उत्पीडनशोषणअनाचार और अत्याचार जैसी सामाजिक विसंगतियों के प्रति ध्यान आकृष्ट किया गया है तो दूसरी ओर मानवीय संवेदनाममत्व, दयाकारुण्य भाव एवं विद्रोह की भावना अत्यधिक प्रखर है। नारी मन की गहराईउसका अन्तर्द्वन्द्वनारी उत्पीड़नमान-अपमान में समान भावुक मन की उमंगे, संवेदनशीलतासहिष्णुता आदि पर काव्य में अभिव्यक्ति दी गई हैजो कि वस्तुतः सुलझी हुई वैचारिकता की प्रतीक है।
कविता में काव्यात्मकता के साथ-साथ संप्रेषणीयता भी है। गिरिजा जी ने ग्रामीण स्त्री के जीवन के जटिल से जटिल यथार्थ को बहुत सहजता के साथ प्रस्तुत किया है। उनकी भा्षा काव्यात्मक हैलेकिन उसमें उलझाव नहीं है। कविता में प्रयोग किये गए परिवेश ग्रामीण हैं किन्तु दो जगह बड़ी सुंदरता से उन्होंने जिन बिम्बों का प्रयोग किया है वह उल्लेखनीय है. बढते गर्भ की तरह चढते ब्याज के साथ” तथा नाली में फंसी पालीथिन की तरह रुके हुए दर्द बह जाते थे” अपने आप में एक बेहतरीन प्रयोग है और अपना एक अलग मुहावरा रचती हैं। इस रचना की संवेदना और शिल्पगत सौंदर्य मन को भाव विह्वल कर गए हैं। इस कविता की स्थानिकता या ग्रामीण वातावरण इसकी सीमा नहीं हैइसकी ताक़त है। स्त्री जीवन के सामान्य घटनाक्रम के द्वारा इन्होंने जीवन के बड़े अर्थों को सम्प्रेषित करने की सच्ची कोशिश की है।
इस बदलते समय में सभ्‍यता की ऊपरी चमक-दमक के भीतर उजड़ती सभ्‍यतासूखती और सिकुड़ती संस्‍कृति की इस त्रासद स्थिति में कवि का कर्त्तव्‍य होता है कि वह उदात्त को नहींसाधारण को भी अपनी कविता में ग्रहण करे। यही आमजन सभ्‍यता और संस्‍कृति की नींव मजबूत रखते हैं । इसीलिए इस कविता में संवेदना का विस्तार व्‍यापक रूप से देखा जा सकता है।






मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

देसिल बयना - 66 : हाथ में सुमरनी बगल में कतरनी

देसिल बयना – 65 : हाथ में सुमरनी बगल में कतरनी


-- करण समस्तीपुरी

"आबत रहनी दिल्ली से भैय्या कर के कमाई ! सोचत रहनी खुश हो जैहैं देख के बाबू-माई !!

बांकी रहिये में खेला बरियार हो गईल.... ! माल ले के बगल वाली सारा पार हो गईल.... !!"

टेनजिस्टर पर गाना बजिये रहा था कि उधर से हकासा-प्यासा खुटेरिया सों-सों रोते हुए चला रहा था। आहो बाबू भैय्या.... ! सच्चे में खेला बरियार हो गया.... ! साल भर का कमाई लुट गाया हो बाबू ! मंगल पेठिया पर जमी तास मंडली के चार खिलारी और चालीस दर्शक हक्का-बक्का.... लगे खुटेरी लाल को देखने। आहि तोरी के तो कमाए खातिर दिल्ली गया रहा.... मगर रो तो ऐसे रहा है जैसे बेटी आती है ससुराल से..... !

असरफिया आगे बढ़ के बोला, "धुर्र... मर्दा.... ! अरे मरद का जात हो के जर-जनानी जैसे रो का रहा है ? कछु बताओ तो जाने.... किन्ना अच्छा तो दिल्ली गया रहा कमाए.... अब रुदन काहे पसारा है.... ? और का....? दिल्ली से साल भर पर खालिए हाथ आया है....? पेटी बक्सा... पाछे कौनो रिक्शा-टमटम (तांगा) पर रहा है का....?

इतना सुन के तो खुटेरिया और फफक पड़ा, "हो असरफी काका ! कछु नहीं बचा हो..... ! हमरे फूटी किस्मत रेडी का गाना में बज रही है हो काका.... !" असरफी उको कंधा पकर कर झकझोरते हुए बोला, "अहि मरदे ! का बुझौव्वल बुझा रहा है.... अरे कछु फरिया के तो कहो।"

फिर खुटेरी लाल फफक कर रो पड़ा। गर्दन पर के गमछी से आंख-मुंह पोछ कर बोला, काका...! जुलुम होय गया...! अब हम का लेके बाबू-माय के आगे जायें काका.....? बाबू-माय तो सोच रहे होंगे कि बेटा साल भर पर दिल्ली से कमा कर आ रहा है। बक्सा-पेटी भर कर तोहफ़ा-उपहार लायेगा...! ओ....हो....हो.....हो..... ला भी रहे थे काका.... दू गो बक्सा और एगो गदहबैग। मति मारी गयी काका....! कौनो पर विश्वास नहीं रहा काका। धरम-करम पर भी नहीं।

अभी तक बगल में चुपचाप खड़े झोंटा झा धरम-करम का नाम सुनते ही झटाक से बोल पड़े, मार पाजी ! कछु बात तो बतायेगा नहीं और खा-म-खा धरम-करम को घसीट रहा है। अरे धरमे-करम पर न ई पिरिथबी अभी तक कायम है।

बेचारा खुटेरी दम धर के बोला, हां, पंडीजी ! हम भी तो आज तक यही बूझते थे मगर जौन घटना हुआ.... कि आपका विश्वास भी हिल जायेगा.... ! अरे हुआ का.... ई तो बताबा... ! खीखर दास बोला था।

खुटेरिया बताये लगा, दिल्ली से चले। हमरा तो सलीपर में रजीवेसन था। मगर अभी लगन के भीड़-भार.... केतना पसिन्जर वेटिने लिस्ट में आ रहा था। बुझिये कि पूरा बोगिये कोंचाया हुआ था। खैर केहु तरह पहुंचे इलाहाबाद। टरेन के खिड़की से गंगा मैय्या को गोर लगे। गोर लग के जैसे ही मुरी उठाये, सामने साच्छात मैय्या खड़ी दिखी। यही कोई अधवयस औरत थी। गोर दक-दक.... चेहरा-मोहरा एकदम दिव्य। गोलका चश्मा पहिनी हुई और हाथ में सुमरनी लिये सतनाम....सहस्सर नाम का जाप कर रही थी। साथ में दु गो और कमसिन जनानी भी थी।

खुटेरी की व्यथा-कथा जारी थी, भीड़ ई बेतहासा.... सुमरनी वाली माई हमरे आगे खड़ी होकर बड़े सिनेह से बोली, बेटा ! तनिक पैर समेट लो तो हम भी जर बैठ जायें... बड़ी पुण्ण होगा बेटा.... गंगामैय्या के मास-परायण कर के आ रहे हैं।इत्ता कह के उ खुदे हमरा पैर सरकाने लगी तो हम झट-पट उठ के बैठ गये। बुढिया माय साइड में बैठ कर सुमरनी पर राम-राम सुमरने लगी। उ के साथ वाली दुन्नु जनानी अपनी छोटी से गठरी को बगल में दबाये नीचे ही बैठ गयी।

बतियाने में मोगल सराय तक पहुंचे। बुढिया माय बोली, बेटा ! तू बड़ा भला आदमी है रे.... बड़ा नेक। अपनी सीट पर हमें बैठाया.... गंगा मैय्या तोहरा भला करे। बहुत सारा अशीष दी थी मैय्या। फिर अपने ढक्कन वाला कमण्डल से एक डिबिया जल निकाल के दी। बोली, ले बेटा ! ई परयागराज का नीर है। चरनामृत समझ के मुख-सिर में लग लो। और ई डिबिया अपने घर में रखना। गंगा मैय्या तन-मन-धन-पूत में बरकत देगी।

खुटेरी आगे कह रहा था, हमरी आंखे भी उ बुढिया माई के लिये सरधा से झुक गयी थी। डिबिया से एक जरा सा नीर दहिना हाथ की चुल्लु में लेकर सिरिफ़ ठोर से सटाये और माथा में पोछ लिये। फिर कछु देर तक और बतियान चलता रहा। मगर सासाराम पहुंचते-पहुंचते हमको कुछ-कुछ नशा होने लगा। फिर पता नहीं कैसे आंख लग गयी।

बीच में कई टीसन पार हुआ कुछ खबर नहीं लगी। एकाध दफ़े लगा कि हमरे जांघ पर कुछ सुरसुरा रहा है मगर न आंख खुल रही थी न ही दिमाग जग रहा था। डेहरी के बदले कोडरमा पहुंच गये। हुआं भी रेलबी पुलिस जगाया तो होश हुआ। हम धरफारा के अपना समान खोजे.... अहि रे बल्लैय्या के..... दुन्नु बक्सा और गदहबैग कहां गया ? हमरे साथ-साथ उ डिब्बा का सारा पसिंजर का समान गोल... ! हम तो भोक्कार पार के रोने लगे।

पुलिसजी बहुत समझाये तब जा कर उठने का होश किये मगर जैसे ही टिकिट निकालने के लिये पाकिट में हाथ दिये कि फिर धम्म से बैठा गया। आहि हो दद्दा..... ! अरे बाप रे.... ! सगरे समान गया सो तो गया... हमरी तो जेबी भी कट गयी थी। हो असरफ़ी काका ! सारा शौख-मौज जला के पाई-पाई कर के जोरे थे... उ मौगिया एक्कहि बेर में हाथ साफ़ कर गयी ... !” मरा तो लगा कि हार्ट फैल हो जायेगा.... ! बांकिये और पसिंजर क भी वही हाल था। सारा आदमी रो-धो रहा था। समान के नाम पर उ डिब्बा में एगो सुमरनी था जौन हाथ में लेके उ सब को चकमा दे गई और एगो तनिक गो कतरनी जौन से उ सब का पाकिट को हलाल किये रही।

खुटेरिया फिर से गला फार-फार के रोने लगा, कंठी-माला सुमरनी देख के तो हम ओहको साधु-धरमतमा समझे.... उ हरजाई चोरनी निकली। हाथ में सुमरनी दिखा के जेबी पर कतरनी चला गयी हो काका... ! अब हम का मुंह लेके बाबू-माई के ओरे जायें....?

सब-लोग खुटेरीलाल को तोष-भरोस दिलाने लगे। असरफ़ी बोला, अब का करोगे खुटेरी... जौन तोरा भाग में नहीं था उ के लिये अब रोय-धोय के तबियत खराब मत करो। झोंटा झा बोले, हाय हो भगवान ! अब सच में कौन किस पर भरोसा करेगा... बताओ तो ! हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी। देखाये को साधु और करनी के चोर... !

सुंघनी साहु बोले, ठीक कहावत कहे पंडीजी। कहिये तो भला कैसन जमाना आय गया....? ’हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी चलता है। बेचारा तपेसवी (तपस्वी) अबला समझ के सीट दिया और उल्टे वही को लूट के चली गयी... हो राम ! सच में अब धरम-करम पर भी कोई विश्वास नहीं रहा। सच्चे बात है, “हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी।

खुटेरिया के साथ जौन हुआ उका दुख तो सब को था। हमको भी। मगर एक बात का संतोष था। चलो एगो नयी कहावत भी तो जाने। हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी। मतलब ’मुख में राम बगल में छुरी। मतलब कि आस्तिन के सांप। चेहरा से साधु और करम से शैतान। कहावत तो ठीके है मगर का किया जाय ? आज के जमाना में तो जादातर आपको ऐसा ही आदमी मिलेगा... ’हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी वाला। सावधान रहियेगा.... नहीं तो बोलो गंगिया माई की............ !!!

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

त्याग पत्र : भाग 15

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना! फिर रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती ! गाँव की गोरी रामदुलारी अब पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत है ! किन्तु गाँव में रामदुलारी के खुले विचारों की कटु-चर्चा होती है ! रामदुलारी से प्रकाश की और रुचिरा से समीर की मित्रता प्रगाढ़ होती जाती है ! अब पढ़िए आगे !
- करण समस्तीपुरी

साल के इस भाग में प्रजापति बाबू की हवेली और गुलजार हो जाती है। हवेली के सामने ही तालाब के उस छोर पर शिवाला है। बसंत पंचमी के बाद से ही यहाँ 'महाशिवरात्री मेले' की तैय्यारी जोर पकड़ लेती है। शिवरात्रि का आयोजन यहाँ होता भी है बहुत वृहत स्तर पर। इस बार सारी तैय्यारियों का नेतृत्व गोवर्धन बाबू खुद कर रहे थे। यूँ तो गाँव का परिवेश हमेशा ही मद मस्त रहता है लेकिन फागुन आते ही और अल्हड़ हो जाता है। मंजरी अमराई में कोयल की कूक रमणियों के दिल में हूक उठा देती है। कान में बरबस विद्यापति के गीत गूंज जाते हैं, 'सरस बसंत समय भेली सजनी गे............ !' फाल्गुनी बयार बहते ही राघोपुर गाँव अलस बसंत के आगे घुटने टेक देता है। आह..... अल्हड़ झोंके ने बाँध किनारे पसरे अरहर के पौधों का अंग-भंग कर छोड़ा है। निगोरी हवा को सरसों के गदराये यौवन पर भी तरस नहीं आयी। उसकी भी पीली चुनरिया मटिया-मेट हो गयी बसंत समीरन में। राघोपुर में अबर ऋतुराज के सामने अगर कोई सर उठा के खड़ा है तो वो है, अलसी के छोटे-छोटे पौधे। मंद थापेरों पर मदिर नृत्य किया पर बसंत-बाण के सामने हथियार नहीं डाले।

शिवाला सज-धज कर तैयार है। लाल-पीले-हरे-नीले कागज़ के पताकों से पाट दिया गया है। परसों से ही बच्चे पाट की पतली सुतली में गेहूं के आंते की लोई लपेस कर पताका चिपकाने में लगे हैं। कागज़ का डिजाइन निकालने में गिरधारी बाबू का कोई जोर नहीं है। रंग-बिरंग का फूल काढ़े हैं इस बार। प्रजापति बाबू का हुक्म है कि इस बार मंदिर को बंदनवार से सजाया जाए। बाबू-टोल के बच्चे सुबह से ही घूम-घूम कर फूल इकठ्ठा कर रहे हैं। अह्हा.... गेंदा के छोटे-बड़े फूलों की क्या सुन्दर लडियां बनी हैं... ! मंदिर के गुम्बद से चारों ओर लटक कर अमरावती सी आभा दे रही हैं। कीर्तन रात से ही शुरू है। 'हो शिव मठ पर हो.... शिव मठ पर हो......... शिव मठ पर... ! शिव मठ पर शोभे लाल धुजा........ शिव मठ पर.... !!' आठ गाँव की मंडलियों द्वारा बारी-बारी से छेड़े जा रहे फगुआ के तान पर सारा राघोपुर झूम रहा है। बीच-बीच में 'जोगीरा सा..रा...रा...रा...रा...रा......' भी गूंज उठाता है।

रात का आधा पहर बीत गया है लेकिन रामदुलारी अभी तक अपने कमरे में माँ के साथ बैठी है। वह कल ही छोटका चाचा के साथ पटना से आयी है। सोचा तो था कि इस बार थीसिस ख़तम कर के ही आराम से गृष्मावकाश मे घर जायेगी। लेकिन दो दिन पहले ही छोटका चाचा पटना पहुंचे। यूँ तो छोटका चाचा का आना कोई नई बात नहीं थी। हर महीने ही रामदुलारी के खाने-पीने का सामान और पैसे देने वही आते थे। लेकिन इस बार छोटका चाचा रामदुलारी को लेने आये हैं। रामदुलारी ने थीसिस का हवाला दिया जरूर था परन्तु बाबा के भेजे सन्देश के आगे उसकी एक ना चली। छोटका चाचा ने बताया कि इस बार के शिवाला में शिवरात का सारा आयोजन बाबा ही कर रहे हैं। उन्होंने रामदुलारी को ख़ास कर बुलाया है मेला देखने। असमंजस में पड़ीं रामदुलारी एक क्षण भी नहीं गंवाई और घर जाने के लिए अपना आवश्यक सामान तैयार चल पड़ीं थी।

पटना से चल कर भी रामदुलारी रास्ते भर पटना को छोड़ नहीं पायी थी। प्रकाश.... कितना अच्छा है प्रकाश... ! कल से वह उसे लायब्रेरी में मिस करेगा.... रामदुलारी भी...? रुचिरा के साथ भी तो थीसिस डिस्कस करनी थी। समीर का बर्थडे भी तो इसी बीच पड़ रहा है। सहसा उसके दिल में एक बार आया, काश ! ये रास्ता पटना को वापस हो जाए... ! लेकिन गंडक ढाला से जैसे ही बुद्दर दास का टम-टम जहाँ-जहाँ-झुन-झुन करता हुआ बढ़ा.... कोई शक्ति रामदुलारी को आगे ही आगे खींचने लगी। सड़क के किनारे झरबेरी के जो पौधे अमरबेल के साए से बच गए थे उनके बेर भी पीले हो गए थे । महुआ की मादक गंध उसकी अगवानी कर रही है तो चिरपरिचित आगंतुक को आते देख पपीहे का करुण स्वर उठाता है.... 'पिऊ कहाँ ? पिऊ कहाँ ?? फिर से रामदुलारी सौ मील पीछे पहुँच जाती है।

रानीपोखर पार हो गया। अब मृदंग की थाप और झाँझो की झंकार साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थी। 'हो........हो.......लाल धुजा....... हो....हो.....लाल धुजा..... ! दूर से छन-छन के आवाज आ रही थी। लाउड-स्पीकर का चार-चार चोंगा मंदिर के गुम्बद में चारों तरफ से बंधा था। छोटका चाचा ने बताया कल दिन में 'प्यारेदास किर्तनिया 'शिव विवाह प्रसंग' कहेगा। आँखों के ऊपर हाथ रख कर सामने दूर तक देखने की कोशिश कर रही रामदुलारी की आकुलता बुद्दर भांप गया था। तभी तो उसने ठप-ठप-ठप-ठप दौड़ रहे घोड़े को चाबुक लगाते हुए बोला था, 'अगत ठाम पे...जा बेट्टा....उड़ा....के.... !' फिर हौले से गुनगुनाने लगा था, 'शिवमठ पर हो...... शिवमठ पर हो..... !'

गाँव की परिधि में दाखिल होते ही रामदुलारी स्मृति की रेखाओं से बाहर आ गयी थी। झन-झन...टक-टक...झुन-झुन... ! हवेली के आगे जैसे ही तांगा रुका लक्ष्मण लपक कार आ गया, 'दीदी आयी..दीदी आयी....!' 'कितना बड़ा हो गया है मेरा लच्छो...' कहती हुई रामदुलारी उसे गोद में उठाने की कोशिश करने लगी। छोटका चाचा ने कहा था. 'मत उठाओ ! अब भारी हो गया है!' रामदुलारी ने उसके हाथों में रास्ते में खरीदे 'हाजीपुर के केले' रख दिए। 'दीदी आयी...केला लायी... दीदी आयी.... केला लायी....!' किलकारी भड़ता हुआ वह चारों तरफ कुलान्छे मारने लगा।

रामदुलारी ने सबसे पहले बाबा के पैर छुए। फिर मैय्या। मझले चाचा और चाची। बाबू अभी घर पर नहीं थे। मंदिर में ड्यूटी दे रहे हैं। लेकिन ये क्या... हवेली में सिर्फ लक्ष्मण ही चहक रहा है। सभी सदस्यों के चेहरे पर एक अपूर्व गंभीरता है। बाबा ने इस बार उसे अपने पास बैठने के लिए नहीं कहा था। इस से पहले भी वह पटना से घर आयी थी। पिछले छठ में ही तो.... कितनी चहल-पहल थी ! तो क्या अभी कुछ गड़बड़ चल रहा है घर में.... ! छोटकी चची को हाल-चाल का जवाब देती हुई रामदुलारी भी अपनी कोठारी की ओर बध गयी।

रात के खाने पर बाबू ने भी सिर्फ हाल-चाल ही पूछा था। भोजन के बाद मैय्या उसके साथ ही कमरे में आ गयी थी। थोड़ी देर इधर-उधर की बातों के बाद जैसे ही मैय्या अपने लक्ष्य पर आने को होती है कि मदिर में ढोल की थाप तेज हो जाती है। 'ढम-ढमा-ढम-ढम.........ढम-ढमा-ढम-ढम....... बम भोला बाबा कहमा रंगवाला पागारिया.... पागारिया हो...हो पागारिया ....!!' रामदुलारी खिलखिला कर बोली, 'खेलावन मल्लिक गा रहे हैं न...!' इस गीत वह पर बचपन से ही खिलखिला कर हंस पड़ती है। आज अँधेरे कमरे में भी उसके बतीसी की बिजली चमक उठी थी। मैय्या भी हमेशा की तरह अपना कथ्य भूल कर बिटिया को अरसे बाद अपने अंक मे समेट लिया।

(क्या कहना चाहती है मैय्या...? रामदुलारी के लिए क्या संदेसा लायी है इस बार की शिवरात्री ? पढ़िए अगले हफ्ते इसी ब्लॉग पर !!)

******

त्याग पत्र के पड़ाव

भाग ॥१॥, ॥२॥. ॥३॥, ॥४॥, ॥५॥, ॥६॥, ॥७॥, ॥८॥, ॥९॥, ॥१०॥, ॥११॥, ॥१२॥,॥१३॥, ॥१४॥, ॥१५॥, ॥१६॥, ॥१७॥, ॥१८॥, ॥१९॥, ॥२०॥, ॥२१॥, ॥२२॥, ॥२३॥, ॥२४॥, ॥२५॥, ॥२६॥, ॥२७॥, ॥२८॥, ॥२९॥, ॥३०॥, ॥३१॥, ॥३२॥, ॥३३॥, ॥३४॥, ॥३५॥, ||36||, ||37||, ॥ 38॥