गुरुवार, 19 अप्रैल 2012
आंच-107 : रमपतिया की याद में गिरिजा जी की असाधारण कविता
मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011
देसिल बयना - 66 : हाथ में सुमरनी बगल में कतरनी
देसिल बयना – 65 : हाथ में सुमरनी बगल में कतरनी
-- करण समस्तीपुरी
"आबत रहनी दिल्ली से भैय्या कर के कमाई ! सोचत रहनी खुश हो जैहैं देख के बाबू-माई !!
बांकी रहिये में खेला बरियार हो गईल.... ! माल ले के बगल वाली सारा पार हो गईल.... !!"
टेनजिस्टर पर ई गाना बजिये रहा था कि उधर से हकासा-प्यासा खुटेरिया सों-सों रोते हुए चला आ रहा था। आहो बाबू भैय्या.... ! सच्चे में खेला बरियार हो गया.... ! साल भर का कमाई लुट गाया हो बाबू ! मंगल पेठिया पर जमी तास मंडली के चार खिलारी और चालीस दर्शक हक्का-बक्का.... लगे खुटेरी लाल को देखने। आहि तोरी के ई तो कमाए खातिर दिल्ली गया रहा.... मगर रो तो ऐसे रहा है जैसे बेटी आती है ससुराल से..... !
असरफिया आगे बढ़ के बोला, "धुर्र... मर्दा.... ! अरे मरद का जात हो के ई जर-जनानी जैसे रो का रहा है ? कछु बताओ तो जाने.... किन्ना अच्छा तो दिल्ली गया रहा कमाए.... अब ई रुदन काहे पसारा है.... ? और ई का....? दिल्ली से साल भर पर खालिए हाथ आया है....? पेटी बक्सा... पाछे कौनो रिक्शा-टमटम (तांगा) पर आ रहा है का....?
इतना सुन के तो खुटेरिया और फफक पड़ा, "हो असरफी काका ! कछु नहीं बचा हो..... ! उ हमरे फूटी किस्मत रेडी का गाना में बज रही है हो काका.... !" असरफी उको कंधा पकर कर झकझोरते हुए बोला, "अहि मरदे ! ई का बुझौव्वल बुझा रहा है.... अरे कछु फरिया के तो कहो।"
फिर खुटेरी लाल फफक कर रो पड़ा। गर्दन पर के गमछी से आंख-मुंह पोछ कर बोला, “काका...! जुलुम होय गया...! अब हम का लेके बाबू-माय के आगे जायें काका.....? बाबू-माय तो सोच रहे होंगे कि बेटा साल भर पर दिल्ली से कमा कर आ रहा है। बक्सा-पेटी भर कर तोहफ़ा-उपहार लायेगा...! ओ....हो....हो.....हो..... ला भी रहे थे काका.... दू गो बक्सा और एगो गदहबैग। मति मारी गयी काका....! कौनो पर विश्वास नहीं रहा काका। धरम-करम पर भी नहीं।
अभी तक बगल में चुपचाप खड़े झोंटा झा धरम-करम का नाम सुनते ही झटाक से बोल पड़े, “मार पाजी ! कछु बात तो बतायेगा नहीं और खा-म-खा धरम-करम को घसीट रहा है। अरे धरमे-करम पर न ई पिरिथबी अभी तक कायम है।
बेचारा खुटेरी दम धर के बोला, “हां, पंडीजी ! हम भी तो आज तक यही बूझते थे मगर जौन घटना हुआ.... कि आपका विश्वास भी हिल जायेगा.... !” “अरे हुआ का.... ई तो बताबा... !” खीखर दास बोला था।
खुटेरिया बताये लगा, “दिल्ली से चले। हमरा तो सलीपर में रजीवेसन था। मगर अभी लगन के भीड़-भार.... केतना पसिन्जर वेटिने लिस्ट में आ रहा था। बुझिये कि पूरा बोगिये कोंचाया हुआ था। खैर केहु तरह पहुंचे इलाहाबाद। टरेन के खिड़की से गंगा मैय्या को गोर लगे। गोर लग के जैसे ही मुरी उठाये, सामने साच्छात मैय्या खड़ी दिखी। यही कोई अधवयस औरत थी। गोर दक-दक.... चेहरा-मोहरा एकदम दिव्य। गोलका चश्मा पहिनी हुई और हाथ में सुमरनी लिये “सतनाम....सहस्सर नाम” का जाप कर रही थी। साथ में दु गो और कमसिन जनानी भी थी।“
खुटेरी की व्यथा-कथा जारी थी, “भीड़ ई बेतहासा.... सुमरनी वाली माई हमरे आगे खड़ी होकर बड़े सिनेह से बोली, “बेटा ! तनिक पैर समेट लो तो हम भी जर बैठ जायें... बड़ी पुण्ण होगा बेटा.... गंगामैय्या के मास-परायण कर के आ रहे हैं।“ इत्ता कह के उ खुदे हमरा पैर सरकाने लगी तो हम झट-पट उठ के बैठ गये। बुढिया माय साइड में बैठ कर सुमरनी पर राम-राम सुमरने लगी। उ के साथ वाली दुन्नु जनानी अपनी छोटी से गठरी को बगल में दबाये नीचे ही बैठ गयी।
बतियाने में मोगल सराय तक पहुंचे। बुढिया माय बोली, “बेटा ! तू बड़ा भला आदमी है रे.... बड़ा नेक। अपनी सीट पर हमें बैठाया.... गंगा मैय्या तोहरा भला करे। बहुत सारा अशीष दी थी मैय्या। फिर अपने ढक्कन वाला कमण्डल से एक डिबिया जल निकाल के दी। बोली, “ले बेटा ! ई परयागराज का नीर है। चरनामृत समझ के मुख-सिर में लग लो। और ई डिबिया अपने घर में रखना। गंगा मैय्या तन-मन-धन-पूत में बरकत देगी।“
खुटेरी आगे कह रहा था, “हमरी आंखे भी उ बुढिया माई के लिये सरधा से झुक गयी थी। डिबिया से एक जरा सा नीर दहिना हाथ की चुल्लु में लेकर सिरिफ़ ठोर से सटाये और माथा में पोछ लिये। फिर कछु देर तक और बतियान चलता रहा। मगर सासाराम पहुंचते-पहुंचते हमको कुछ-कुछ नशा होने लगा। फिर पता नहीं कैसे आंख लग गयी।“
“बीच में कई टीसन पार हुआ कुछ खबर नहीं लगी। एकाध दफ़े लगा कि हमरे जांघ पर कुछ सुरसुरा रहा है मगर न आंख खुल रही थी न ही दिमाग जग रहा था। डेहरी के बदले कोडरमा पहुंच गये। हुआं भी रेलबी पुलिस जगाया तो होश हुआ। हम धरफारा के अपना समान खोजे.... अहि रे बल्लैय्या के..... दुन्नु बक्सा और गदहबैग कहां गया ? हमरे साथ-साथ उ डिब्बा का सारा पसिंजर का समान गोल... ! हम तो भोक्कार पार के रोने लगे।“
पुलिसजी बहुत समझाये तब जा कर उठने का होश किये मगर जैसे ही टिकिट निकालने के लिये पाकिट में हाथ दिये कि फिर धम्म से बैठा गया। आहि हो दद्दा..... ! अरे बाप रे.... ! सगरे समान गया सो तो गया... हमरी तो जेबी भी कट गयी थी। हो असरफ़ी काका ! सारा शौख-मौज जला के पाई-पाई कर के जोरे थे... उ मौगिया एक्कहि बेर में हाथ साफ़ कर गगयी ... !” हमरा तो लगा कि हार्ट फैल हो जायेगा.... ! बांकिये और पसिंजर क भी वही हाल था। सारा आदमी रो-धो रहा था। समान के नाम पर उ डिब्बा में एगो सुमरनी था जौन हाथ में लेके उ सब को चकमा दे गई और एगो तनिक गो कतरनी जौन से उ सब का पाकिट को हलाल किये रही।“
खुटेरिया फिर से गला फार-फार के रोने लगा, “कंठी-माला सुमरनी देख के तो हम ओहको साधु-धरमतमा समझे.... उ हरजाई चोरनी निकली। हाथ में सुमरनी दिखा के जेबी पर कतरनी चला गयी हो काका... ! अब हम का मुंह लेके बाबू-माई के ओरे जायें....?”
सब-लोग खुटेरीलाल को तोष-भरोस दिलाने लगे। असरफ़ी बोला, “अब का करोगे खुटेरी... जौन तोरा भाग में नहीं था उ के लिये अब रोय-धोय के तबियत खराब मत करो।“ झोंटा झा बोले, “हाय हो भगवान ! अब सच में कौन किस पर भरोसा करेगा... बताओ तो ! ’हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी। देखाये को साधु और करनी के चोर... !”
सुंघनी साहु बोले, “ठीक कहावत कहे पंडीजी। कहिये तो भला कैसन जमाना आय गया....? ’हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी चलता है। बेचारा तपेसवी (तपस्वी) अबला समझ के सीट दिया और उल्टे वही को लूट के चली गयी... हो राम ! सच में अब धरम-करम पर भी कोई विश्वास नहीं रहा। सच्चे बात है, “हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी।“
खुटेरिया के साथ जौन हुआ उका दुख तो सब को था। हमको भी। मगर एक बात का संतोष था। चलो एगो नयी कहावत भी तो जाने। “हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी।“ मतलब ’मुख में राम बगल में छुरी। मतलब कि आस्तिन के सांप। चेहरा से साधु और करम से शैतान। कहावत तो ठीके है मगर का किया जाय ? आज के जमाना में तो जादातर आपको ऐसा ही आदमी मिलेगा... ’हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी वाला। सावधान रहियेगा.... नहीं तो बोलो गंगिया माई की............ !!!
शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010
त्याग पत्र : भाग 15
पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना! फिर रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती ! गाँव की गोरी रामदुलारी अब पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत है ! किन्तु गाँव में रामदुलारी के खुले विचारों की कटु-चर्चा होती है ! रामदुलारी से प्रकाश की और रुचिरा से समीर की मित्रता प्रगाढ़ होती जाती है ! अब पढ़िए आगे !- करण समस्तीपुरी
शिवाला सज-धज कर तैयार है। लाल-पीले-हरे-नीले कागज़ के पताकों से पाट दिया गया है। परसों से ही बच्चे पाट की पतली सुतली में गेहूं के आंते की लोई लपेस कर पताका चिपकाने में लगे हैं। कागज़ का डिजाइन निकालने में गिरधारी बाबू का कोई जोर नहीं है। रंग-बिरंग का फूल काढ़े हैं इस बार। प्रजापति बाबू का हुक्म है कि इस बार मंदिर को बंदनवार से सजाया जाए। बाबू-टोल के बच्चे सुबह से ही घूम-घूम कर फूल इकठ्ठा कर रहे हैं। अह्हा.... गेंदा के छोटे-बड़े फूलों की क्या सुन्दर लडियां बनी हैं... ! मंदिर के गुम्बद से चारों ओर लटक कर अमरावती सी आभा दे रही हैं। कीर्तन रात से ही शुरू है। 'हो शिव मठ पर हो.... शिव मठ पर हो......... शिव मठ पर... ! शिव मठ पर शोभे लाल धुजा........ शिव मठ पर.... !!' आठ गाँव की मंडलियों द्वारा बारी-बारी से छेड़े जा रहे फगुआ के तान पर सारा राघोपुर झूम रहा है। बीच-बीच में 'जोगीरा सा..रा...रा...रा...रा...रा......' भी गूंज उठाता है।
रात का आधा पहर बीत गया है लेकिन रामदुलारी अभी तक अपने कमरे में माँ के साथ बैठी है। वह कल ही छोटका चाचा के साथ पटना से आयी है। सोचा तो था कि इस बार थीसिस ख़तम कर के ही आराम से गृष्मावकाश मे घर जायेगी। लेकिन दो दिन पहले ही छोटका चाचा पटना पहुंचे। यूँ तो छोटका चाचा का आना कोई नई बात नहीं थी। हर महीने ही रामदुलारी के खाने-पीने का सामान और पैसे देने वही आते थे। लेकिन इस बार छोटका चाचा रामदुलारी को लेने आये हैं। रामदुलारी ने थीसिस का हवाला दिया जरूर था परन्तु बाबा के भेजे सन्देश के आगे उसकी एक ना चली। छोटका चाचा ने बताया कि इस बार के शिवाला में शिवरात का सारा आयोजन बाबा ही कर रहे हैं। उन्होंने रामदुलारी को ख़ास कर बुलाया है मेला देखने। असमंजस में पड़ीं रामदुलारी एक क्षण भी नहीं गंवाई और घर जाने के लिए अपना आवश्यक सामान तैयार चल पड़ीं थी।
पटना से चल कर भी रामदुलारी रास्ते भर पटना को छोड़ नहीं पायी थी। प्रकाश.... कितना अच्छा है प्रकाश... ! कल से वह उसे लायब्रेरी में मिस करेगा.... रामदुलारी भी...? रुचिरा के साथ भी तो थीसिस डिस्कस करनी थी। समीर का बर्थडे भी तो इसी बीच पड़ रहा है। सहसा उसके दिल में एक बार आया, काश ! ये रास्ता पटना को वापस हो जाए... ! लेकिन गंडक ढाला से जैसे ही बुद्दर दास का टम-टम जहाँ-जहाँ-झुन-झुन करता हुआ बढ़ा.... कोई शक्ति रामदुलारी को आगे ही आगे खींचने लगी। सड़क के किनारे झरबेरी के जो पौधे अमरबेल के साए से बच गए थे उनके बेर भी पीले हो गए थे । महुआ की मादक गंध उसकी अगवानी कर रही है तो चिरपरिचित आगंतुक को आते देख पपीहे का करुण स्वर उठाता है.... 'पिऊ कहाँ ? पिऊ कहाँ ?? फिर से रामदुलारी सौ मील पीछे पहुँच जाती है।
रानीपोखर पार हो गया। अब मृदंग की थाप और झाँझो की झंकार साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थी। 'हो........हो.......लाल धुजा....... हो....हो.....लाल धुजा..... ! दूर से छन-छन के आवाज आ रही थी। लाउड-स्पीकर का चार-चार चोंगा मंदिर के गुम्बद में चारों तरफ से बंधा था। छोटका चाचा ने बताया कल दिन में 'प्यारेदास किर्तनिया 'शिव विवाह प्रसंग' कहेगा। आँखों के ऊपर हाथ रख कर सामने दूर तक देखने की कोशिश कर रही रामदुलारी की आकुलता बुद्दर भांप गया था। तभी तो उसने ठप-ठप-ठप-ठप दौड़ रहे घोड़े को चाबुक लगाते हुए बोला था, 'अगत ठाम पे...जा बेट्टा....उड़ा....के.... !' फिर हौले से गुनगुनाने लगा था, 'शिवमठ पर हो...... शिवमठ पर हो..... !'
गाँव की परिधि में दाखिल होते ही रामदुलारी स्मृति की रेखाओं से बाहर आ गयी थी। झन-झन...टक-टक...झुन-झुन... ! हवेली के आगे जैसे ही तांगा रुका लक्ष्मण लपक कार आ गया, 'दीदी आयी..दीदी आयी....!' 'कितना बड़ा हो गया है मेरा लच्छो...' कहती हुई रामदुलारी उसे गोद में उठाने की कोशिश करने लगी। छोटका चाचा ने कहा था. 'मत उठाओ ! अब भारी हो गया है!' रामदुलारी ने उसके हाथों में रास्ते में खरीदे 'हाजीपुर के केले' रख दिए। 'दीदी आयी...केला लायी... दीदी आयी.... केला लायी....!' किलकारी भड़ता हुआ वह चारों तरफ कुलान्छे मारने लगा।
रामदुलारी ने सबसे पहले बाबा के पैर छुए। फिर मैय्या। मझले चाचा और चाची। बाबू अभी घर पर नहीं थे। मंदिर में ड्यूटी दे रहे हैं। लेकिन ये क्या... हवेली में सिर्फ लक्ष्मण ही चहक रहा है। सभी सदस्यों के चेहरे पर एक अपूर्व गंभीरता है। बाबा ने इस बार उसे अपने पास बैठने के लिए नहीं कहा था। इस से पहले भी वह पटना से घर आयी थी। पिछले छठ में ही तो.... कितनी चहल-पहल थी ! तो क्या अभी कुछ गड़बड़ चल रहा है घर में.... ! छोटकी चची को हाल-चाल का जवाब देती हुई रामदुलारी भी अपनी कोठारी की ओर बध गयी।
रात के खाने पर बाबू ने भी सिर्फ हाल-चाल ही पूछा था। भोजन के बाद मैय्या उसके साथ ही कमरे में आ गयी थी। थोड़ी देर इधर-उधर की बातों के बाद जैसे ही मैय्या अपने लक्ष्य पर आने को होती है कि मदिर में ढोल की थाप तेज हो जाती है। 'ढम-ढमा-ढम-ढम.........ढम-ढमा-ढम-ढम....... बम भोला बाबा कहमा रंगवाला पागारिया.... पागारिया हो...हो पागारिया ....!!' रामदुलारी खिलखिला कर बोली, 'खेलावन मल्लिक गा रहे हैं न...!' इस गीत वह पर बचपन से ही खिलखिला कर हंस पड़ती है। आज अँधेरे कमरे में भी उसके बतीसी की बिजली चमक उठी थी। मैय्या भी हमेशा की तरह अपना कथ्य भूल कर बिटिया को अरसे बाद अपने अंक मे समेट लिया।
(क्या कहना चाहती है मैय्या...? रामदुलारी के लिए क्या संदेसा लायी है इस बार की शिवरात्री ? पढ़िए अगले हफ्ते इसी ब्लॉग पर !!)
******
त्याग पत्र के पड़ाव |
| भाग ॥१॥, ॥२॥. ॥३॥, ॥४॥, ॥५॥, ॥६॥, ॥७॥, ॥८॥, ॥९॥, ॥१०॥, ॥११॥, ॥१२॥,॥१३॥, ॥१४॥, ॥१५॥, ॥१६॥, ॥१७॥, ॥१८॥, ॥१९॥, ॥२०॥, ॥२१॥, ॥२२॥, ॥२३॥, ॥२४॥, ॥२५॥, ॥२६॥, ॥२७॥, ॥२८॥, ॥२९॥, ॥३०॥, ॥३१॥, ॥३२॥, ॥३३॥, ॥३४॥, ॥३५॥, ||36||, ||37||, ॥ 38॥ |