ये मेरा जीवन एकाकी।
नित - नित नूतन रूप तुम्हारा, देखूं मैं तो हारा - हारा।
कभी उर्वशी, कभी मेनका, लगो परी तुम इन्द्र सभा की।
ये मेरा जीवन एकाकी।
डालो एक नज़र है काफी, अंतिम सफ़र अभी भी बाक़ी।
मैं पीऊं तुम मुझे पिलाओ, पल भर को बन जाओ साक़ी।
ये मेरा जीवन एकाकी।
कहने को अधराधर तरसे, वही बात आंखों से बरसे।
गहन वेदना से भारी मन, लेकर आया बूंद घटा की।
ये मेरा जीवन एकाकी।
नियति जाल में उलझ-उलझ कर,अस्त हुआ ख़ुशियों का दिनकर।
संध्या के इस क्रंदन में है, कहां छुपी मुसकान उषा की।
ये मेरा जीवन एकाकी।
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